हत्याकांड (Rajiv Gandhi Assassinators - Essay in Hindi) [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना: - कुछ मामले ऐसे होते हैं, जिन्हें सियासत में हमेंशा याद किया जाता हैं ताकि उनके माध्यम से वे अपने सियासत को मजबूत करते हुए उसी पद पर बने रहे। यह मामला है पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों की रिहाई का। इस मामलें को तमिलनाडु से रह-रहकर जेल में कैद सात दोषियों को रिहा करने की गांग उठती रही है। राज्य से लेकर केंद्र तक इसका राजनीतिक इस्तेमाल होता रहा है। अब तमिलनाडु ने चुनाव से पहले राज्य सरकार से गृह मंत्रालय को पत्र लिखकर दोषियों को रिहा करने की सम्मति मांगी है। तर्क यह है कि ये लोग 24 साल जेल में काट चुके हैं। इससे पहले यूपीए सरकार में भी मुख्यमंत्री जयललिता ने इनकी रिहाई की मांग की थी पर सफलता नहीं मिली।

मामला: - राजीव गांधी की हत्या के दोषियों की सजा माफ करने को लेकर तमिलनाडु सरकार ने केंद्र सरकार से राय मांगी है। दिसंबर 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने हत्यारों की रिहाई पर रोक लगाते हुए आदेश जारी किया कि बिना केंद्र सरकार की अनुमति के तमिलनाडु सरकार ऐसा नहीं कर सकती है। न्यायालय ने यह भी कहा कि हत्यारों की माफी का अधिकार राज्य सरकार को नहीं है। अब तमिलनाडु सरकार के मुख्य सचिव के गणदेशकन ने केंद्रीय गृह सचिव राजीव गांधी महर्षि को पत्र में कहा कि राज्य सरकार को सातों दोषियों की ओर से उन्हें रिहा करने की याचिकाएं मिली हैं।

त्रासदी: - राजीव गांधी की हत्या हमारे लिए राष्ट्रीय त्रासदी थी। कानूनी दावपेचों और तकनीकी बातों को एक बार छोड़ भी दें लेकिन उनके हत्यारों को माफ कर दिए जाने को लेकर देश में जिस तरह की राजनीति हो रही है, वह अनुचित और देश के लिए अहितकर है। राजीव गांधी किसी एक परिवार के सदस्य नहीं थे। यह सही है कि वे सोनिया गांधी के पति, राहुल व प्रियंका के पिता थे। उनके लिए राजीव गांधी की हत्या निस्संदेह निजी त्रासदी से कम नहीं है लेकिन इस तथ्य को भी मानना चाहिए कि वे देश के पूर्व प्रधानमुत्री थे। उनकी हत्या पारिवारिक त्रासदी से बढ़कर राष्ट्रीय त्रासदी थी। राजीव गांधी पर हमला अर्थात्‌ हमारी राजनीतिक व्यवस्था पर हमला था। अत: यह देश पर हमले के बराबर था।

बयान: - सर्वोच्च न्यायालय ने राजीव गांधी की हत्या के मामले में सजा सुना दी है। उसका फैसला अंतिम है। पूर्व में आजीवन कारावास की सजा को बीस वर्ष का कारावास समझा जाता था। हालांकि आजीवन कारावास की सजा भुगतने वाले व्यक्ति की सजा को उसके आचरण के आधार पर कम भी किया जा सकता था। लेकिन, सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामलें में ओर स्पष्ट कर दिया है कि आजीवन कारावास की सजा अर्थ जिंदगी भर के लिए कारावास है। इसके बाद इस सवाल की गुंजाइश ही नहीं रह जाती है कि बीस साल से अधिक कारावास भुगत चुके लोगों मानवीय आधार पर छोड़ा जाए कि नहीं? यह विषय केंद्र या राज्य सरकार रह ही कहां गया है? चूंकि प्रधानमंत्री देश की राजनीतिक व्यवस्था का केंद्रीय उपकरण होता है। और वर्तमान में इस केंद्रीय उपकरण यानी नरेंद्र मोदी राहुल गांधी के निशाने पर हैं। राजीव गांधी के हत्यारों को सजा मिले या माफी, इस मामले पर राहुल गांधी के बयानबाजी वास्तव में नरेंद्र मोदी की विरुद्ध कहा जा सकता है। फिर, भी इस तरह राजनीति को कभी भी सही नहीं ठहराया जा सकता है। खासतौर पर राष्ट्रीय स्तर की राजनीति करने वाली कांग्रेस पार्टी की ओर से इस तरह का बयान शर्मनाक है। दुखद है कि राजीव गांधी के हत्यारों की माफी के नाम पर वोट की राजनीति हो रही है।

लिट्‌टे: -यह बात तो सबको पता चल चुकी है कि राजीव गांधी की हत्या लिबरेशन टाइगर्स और तमिल ईलत (लिटटे) ने करवाई थी। इस बात को लिटटे नेता प्रभाकरण भी मान चुका था इस दुर्घटना के लिए कांग्रेस पार्टी के वे लोग भी जिम्मेदार थे जो लिटटें के संपर्क में थे और उसके एजेंट के तौर पर काम कर रहे थे। जस्टिस जे. एस. वर्मा की रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया है। कि तमिलनाडु में श्रीपेंरुबदूर जाने का राजीव गांधी का कोई कार्यक्रम था ही नहीं। उन्हें तो उड़ीसा के दौरे पर जाना था लेकिन उन्हें उ़ड़ीसा का कार्यक्रम बदलकर चुनाव प्रचार के लिए उन्हें तमिलनाडु लाया गया। इस हत्याकांड में षडयंत्र का पता लगाने के लिए काम कर रहे मिलापचंद्र जैन आयोग ने भी अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि दो बार लिट्‌टे का प्रतिनिधिमंडल राजीव गांधी से उनके निवास 10 जनपथ पर जाकर मिला। राजीव गांधी को भरोसा गया कि यदि लोकसभा चुनाव प्रचार के लिए वे तमिलनाडु जाएंगे तो उनकी सुरक्षा को कोई खतरा नहीं है। यही नहीं तमिलनाडु के तत्कालीन राज्यपाल भीष्म नारायण सिंह ने प्रोटाकॉल तोड़कर राजीव गांधी को जान के खतरे को लेकर आगाह किया और तमिलानाडु यात्रा टालने की सलाह दी थी इसके बावजूद उन्होंने तमिलनाडु की यात्रा का फैसला लिया। जैन आयोग ने लिखा है कि राजीव गांधी की हत्या लिट्‌टे ने ही करवाई है। अदालत ने भी इस बात को मानकर राजीव गांधी की हत्या के दोषियों को सजा सुनाई। यह कोई एक परिवार के मुखिया की हत्या का मामला नहीं बल्कि देश की हमले का मामला था। राजीव गांधी के हत्यारें किसी भी स्थिति में करुणा या दया के अधिकारी नहीं हो सकते है।

वोट: - नब्बे के दशक के उत्तरार्ध में श्रीलंका में तमिल और सिंहलियों के बीच संघर्ष चरम पर था। बड़ी संख्या में तमिल के लोग श्रीलंका से भारत के तमिलनाडु में आ रही थी। ऐसे में तमिलनाडु इन तमिलों का समर्थन पाने के लिए स्थानीय राजनीतिक दलों में होड़ मच गई। हालात तमिलनाडु में ऐसे हो गए हैं कि वहां स्थानीय तमिलों के बीच समर्थन न होने से सत्ता पर बनाए रखना कठिन सा हो गया था यही वजह है कि स्थानीय राजनीति को चमकाते के लिए यहां के सभी क्षेत्रीय दल राजीव गांधी की हत्यारों को मानवीयता के आधार पर माफी तक की बात करने लगते हैं। चूंकि 2016 में ही तमिलनाडु में चुनाव होने हैं और इस चुनाव में जयललिता सरकार भी तमिलों की बड़ी शुभचिंतक के रूप में खुद को दिखाना चाहती हैं इसलिए उनकी सरकार की ओर से यह मुद्दा केंद्र सरकार की ओर उछाला गया हैं। लेकिन कांग्रेस तो राष्ट्रीय पार्टी है, वह सत्ता में रही है, उसके लिए अवसर भी है। उसे तो इस मामले से दूर रहना चाहिए।

मुद्दा: - तमिलनाडु में चुनावी माहौल शुरू होते ही राजीव गांधी के हत्यारों की रिहाई का मुद्दा फिर उठाया गया है। इस बार सरकार और विपक्ष के पास चुनाव के लिए कोई बहुत बड़ा मुद्दा नहीं है। पिछले विधानसभा चुनाव में तो 2-जी घेटाला बड़ा मुद्दा बन गया था। इस बारे ऐसा कोई मसला नहीं है। अभी जोड़-तोड़ की राजनीति ही चल रही है। खुद विपक्ष के पास सरकार को घेरने के लिए बड़ा मुद्दा नहीं है। इसलिए एआईएडीएमके इस मुद्दे से राजनीतिक फायदा उठाना चाह रही हैं। तमिलनाडु में हमेशा से श्रीलंकाई तमिलों के लिए ’अंडर-करंट’ रहा है। इसलिए जयललिता तमिलों की भावनाओं का फायदा उठाने के लिए दोषियों की रिहाई की बात कर रही हैं। इसके लिए राज्य सरकार के मुख्य सचिव ने केंद्र सरकार को पत्र भी लिखा है।

इजाजत: - केंद्र सरकार की इजाजत के बिना उनकी रिहाई संभव नहीं है। इसलिए मुख्य सचिव ने परामर्श मांगा है। अगर केंद्र सरकार इजाजत दे देती है तो जयललिता इस मुद्दे को जोर-शोर से विधानसभा चुनावों में उठांएगी। अगर केंद्र ने इजाजत नहीं दी तो वे चुनाव में कह सकेंगी कि उन्होंने रिहाई के लिए पूरी कोशिश की। यानी दोनों ही परिस्थितियां जयललिता के अनुकूल है। वैसे भाजपा को तमिलनाडु चुनावों में कोई उम्मीद नहीं है। हालांकि वह जयललिता के साथ चुनाव लड़ने को तैयार है। वैसे भी भाजपा की कोई उपस्थिति नहीं है। आरएसएस की मौजूदगी कर्नाटक और केरल में जरूर है पर तमिलनाडु में कहीं नहीं है। भाजपा तो जोर लगा रही है कि केंद्र में उनकी सरकार जयललिता की मदद से तमिलनाडु में थोड़ी-बहुत जगह बना लें। पर जयललिता भी राजनीति की मंझी खिलाड़ी हैं। वे गंठबंधन करना ही नहीं चाह रही हैं। उनका जोर चुनावों में भावनात्मक मुद्दों पर ही रहेगा। राहुल गांधी जानबूझकर कोई दबाव नहीं बना रहे हैं। यह सभी को मालूम है कि खुद प्रियंका गांधी राजीव गांधी हत्य की दोषी नलिनी से मिलकर आई थीं। हालांकि तमिलनाडु में कांग्रेस को कोई बड़ा दाव भी नहीं है। उधर, डीएमके का राज्य में संगठन टूट चुका है। उसका कटिबद्ध वोटबैंक छिन्न-भिन्न हो गया है। इसलिए उसने डीएमडीके के साथ गठबंधन किया है। एम. के. स्टालिन ने पार्टी पर कब्जा कर रखा है। अभी चुनावी माहौल जरूर शुरू हो गया है पर दोनों ओर से किसी मुद्दे पर बात हो नहीं रही है। वैसे भी तमिलनाडु में बड़े ही ’अलोकतांत्रिक’ ढंग से सत्ता चलती है। एक व्यक्ति के चारों तरफ ही सरकार और पार्टी घूमती है। यहां भ्रष्टाचार का बोलबाला है पर यह बड़ा मुद्दा नहीं बनता। भावनात्मक मुद्द ही हावी रहते हें। जयललिता फरवरी 2014 में भी सभी सात दोषियों की रिहाई की कोशिश की थी। लेकिन उस समय सुप्रीम कोर्ट ने एक फेसले में साफ तौर पर कहा कि तमिलनाडु केंद्र सरकार के परामर्श के बिना रिहाई नहीं कर सकती है।

हत्या: - 21 मई 1991 को श्रीपेंरुबंदूर में चुनाव पूर्व रैली के दौरान एक आत्मघाती हमलावर महिला राजीव गांधी के पैर छूने को झुकी और उसने खुद को बम से उड़ा दिया। इस मसले में राजीव गांधी सहित 14 अन्य लोगों की मौत हो गई थी। यह आत्मघाती हमलावर महिला धानु थी जो श्रीलंका के अलगाववादी संगठन लिट्‌टे के लिए काम कर रही थी। इस हत्या का कारण लिट्‌टे की नाराजगी को माना जाता है। उल्लेखनीय है कि श्रीलंका में तमिलों और सिंहलियों के बीच बढ़ते संघर्ष के मद्देनजर, 1987 में राजीव गांधी ने श्रीलंका में इंडियन (भारतीय) पीस कीपिंग फोर्स (आईपीकेएफ) वहां भेजी थी। इससे ही लिट्‌टे उनसे खासा नाराज था। बाद में राजीव गांधी ने अपने फेसले को सही ठहराया है।

जांच: - 22 मई 1991 को मामला केंद्रीय जांच ब्यूरों और डी. आर. कार्थिकेयन के नेतृत्व वाले वेिशेष जांच दल (एसआईटी) को सौंप दिया गया। इस जांच में भी पाया गया कि हत्या के पीछे लिट्‌टे का ही हाथ था। इस बात को सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपने फेसले में माना है। विशेष जांच दल में मारे गए 12 लोगों और तीन भगोड़ों सहित कुल 41 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दायर की। राजीव गांधी की हत्या के बाद राज्य की डीएमके सरकार को बर्खास्त कर दिया गया। इस सरकार पर आरोप था कि वह भी राजीव गांधी के हत्याकांड में शामिल थी। जस्टिस मिलाप चंद जैन की अंतरिम रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि तमिलनाडु की तत्कालीन डीएमके सरकार की लिट्‌टे के साथ सांठ-गांठ थी और उसने लिट्‌टे की राह को सरल बनाने में काम किया था।

सजा: - 1998 में विशेष टाडा न्यायालय ने इस मामले में 26 लोगों को मौत की सजा दी। सर्वोच्च न्यायालय ने नलिनी, मुरुगन, संथम और पेरीवलन की मौत की सजा को बरकरार रखा। तीन अन्य को उम्रकैद की सजा सुनाकर शेष 19 को बरी कर दिया। हालांकि नलिनी की मौत की सजा को आजीवन कारावास में तब्दील कर दिया गया। मौत की सजा पाए अन्य तीनों ने दया याचिका दाखिल की जिसे 2011 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील ने खारिज कर दिया। 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा अन्य तानों की सजा को उम्रकैद में बदल दिया। इसका कारण दया याचिका कि निस्तारण में हुई देरी को बताया। तब से राज्य सरकार इनकी सजा माफ करने पर दबाव बनाए हुए है।

उपसंहार: - न्यायालय ने कहा था कि राष्ट्रहित से जुड़े ऐसे महत्वपूर्ण मसले में कोई भी राज्य सरकार दोषियों को रिहा नहीं कर सकती थी। ऐसा ही हर फैसला हर दोषयुक्त के लिए सुनाना उचित होगा ताकि आगे हर व्यक्ति जुर्म करने से पहले उसके परिणाम के बारे में विचार कर लें।

- Published on: April 19, 2016