ब्रिटेन में जनमत संग्रह के चुनाव व परिणाम भाग-1 (the Results of the Elections and Referendum -Essay-in Hindi) [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना: - 28 देशों के यूरोपीय संघ में रहने या छोड़ने को लेकर ब्रिटेन में जनमत संग्रह हो गया है। इसे ब्रेग्जिट नाम दिया गया हैं। नतीजा ’ब्रेग्जिट’ के रूप में दुनिया के सामने है। इस नतीजे ने न सिर्फ सभी को चौंकाया बल्कि एक मुल्क को भी बांट दिया। इस अनहोनी को रोकने के लिए न सिर्फ खुद ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन बल्कि अमरीका, जर्मनी, फ्रांस जैसे बड़े देश लगे हुए थे। पर ब्रिटेन के लोगों ने तय कर ही लिया था कि अभी नहीं तो कभी नही। अरसे से प्रवासियों की समस्या से जूझ रहे यूरोपीय संघ और कमजोर अर्थव्यवस्था ने लोगों में रोष भर दिया था। पिछले महीनों में यूरोप में हुए आतंककारी हमलों से तो ब्रिटेन में यूरोपीय संघ से अलग होने का भाव प्रबल हो चला था। हालांकि जनमत संग्रह से पहले हुए कई सर्वे में झुकाव तो संघ में रहने का था पर नतीजा रहा एकमद उलट। अब सवाल है इस ऐतिहासिक निर्णय का यूके, यूरोपीयन संघ पर क्या असर होगा और भारत के लिए इसके क्या मायने होंगे?

जनमत संग्रह: -

  • ब्रिटेन में जून को ब्रेक्जिट पर जनमत संग्रह होने जा रहा है। इसमें देश की जनता इस बात पर मत देगी कि ब्रिटेन, यूरोपीय संगठन में बना रहे या नहीं। नतीजा 24 जून को आएगा। दुनिया के शेयर बाजारों में इसे अस्थिरता का माहौल है। बाजार का डर है कि यदि ब्रिटेन यूरो जोन से अलग हुआ तो ब्रिटेन समेत दुनिया को एक बड़े मुद्रा और वित्तीय संकट का सामना करना पड़ सकता हैं। पिछले सप्ताह एक ब्रिटिश सांसद की हत्या के बाद भावना ब्रिटेन के ’यूरोपीय संगठन में बने रहने ’ के पक्ष में उमड़ी है। इससे बाजारों में तेजी भी देखी गई हैं। वहीं अमेरिका में फेड प्रमुख द्वारा आर्थिक विकास सुस्त रहने की बात कहने से बाजारों में सतर्कता का रुख रहा है। लेकिन इस साल ब्याज दरों में दो बार बढ़ोतरी की संभावना जताना बाजारों के लिए खराब संकेत रहा है। इससे अमेरिका समेत अन्य बाजारों में गिरावट देखने को मिली है।

मतदान: -

  • पेंशनर्स लंदन के रॉल चेल्सिया चिकित्सालय में मत के लिए पहुंचे। ब्रिटेन 1973 में यूरोपियन संघ में शामिल हुआ था। ब्रिटेन के कई हिस्सों में बेमौसम तूफान और बारिश के बीस ऐतिहासिक ब्रेक्जिट जनमत संग्रह हुआ। परिणाम आने तक ब्रिटेन 28 देशों वाले संघ यूरोपीय संघ में रहेगा या बाहर निकलेगा यह तो आने वाला समय बताएगा। प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने लोगों से ईयू में बने रहने के पक्ष में मत करने की अपील की हैं। उन्होंने कहा कि ईयू से अलग रहकर ब्रिटेन कभी महान नहीं बन सकता है। इस जनमत संग्रह के नतीजे पर भारत समेत दुनिया की नजरें हैं। लंदन और इंग्लैड में भारी बारिश हुई। इसके बावजूद इसके मतदान केंद्र पर लंबी रेखा देखी गई। फैसला 4.65 करोड़ पंजीकरण मत कर रहे हैं।

मतदाता-

  • कुल मतदाता- 46, 501, 241 रहने के पक्ष में 48 प्रतिशत मत 16, 141, 241, छोड़ने के पक्ष में 51.9 प्रतिशत मत 17, 410, 742 है।
  • यूरोपियन संघ (ईयू) में ब्रिटेन रहेगा या नहीं इस पर जनमत संग्रह शुरू हो गया है। जनमत संग्रह में 4.6 करोड़ से ज्यादा लोग हिस्सा लेंगे। ईयू में ब्रिटेन के बने रहने को लेकर ब्रिटेन की जनता की राय बंटी हुई है। ताजा जनमत सर्वेक्षण के नतीजों के मुताबिक, इंग्लैंड के 45 फीसदी मतदाता ईयू का हिस्सा बने रहना चाहता हैं, जबकि 44 फीसदी इसे उलट चाहते हैं। 11 फीसदी मतदाता अनिर्णय की स्थिति में है।
  • ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरून ने ईयू में बने रहने को लेकर बड़े उद्योगों से मिल रहे समर्थन का स्वागत किया है। उन्होंने कहा है कि मतदाता जो भी फैसला करते हैं, उसे बदलना मुमकिन नहीं होगा। उन्होंने कहा है कि ईयू से बाहर होने का फैसला ब्रिटेन के लिए बड़ी समस्या साबित होगी। इससे आर्थिक वृृद्धि और रोजगार के मोर्चे पर बड़ा नुकसान उठाना होगा। साथ ही आनी वाली पीढ़ियों के भविष्य पर भी असर पड़ेगा। अंतिम समय तक कैमरून इस पक्ष में मतों को लुभाते रहे कि वे ईयू में ब्रिटेन के बने रहने के पक्ष में मतदान करें।

मांग: -

  • ब्रिटेन 2008 से मंदी की चपेट में है। इससे बहस शुरू हो गई कि ईयू में रहने की वजह से ब्रिटेन आगे नहीं बढ़ पा रहा हैं। इस कारण को भी ब्रेग्जिट कहा गया हैं। यानी यूरोपीय संघ से ब्रिटेन का एक्जिट। धीरे-धीरे यह चुनावी मुद्दा बन गया। ना चाहते हुए मौजूदा पीएम डेविड कैमरन ने वादा किया कि अगर वे सत्ता में आते हैं तो जनमत संग्रह कराएंगे।

यूरोपीय संघ क्या हैं-

  • दूसरे विश्वयुद्ध के बाद यूरोप के 28 देशों का एक संघ बना। मकसद था जंग न हो और सहयोग बढ़े। कोई भी देश आ जा सकता हैं। कारोबार के एक से नियम हैं यानी खुला हुआ बाजार नियम।

कानून-

  • 1992 में एकल बाजार कानून पर सभी सदस्य देशों ने हस्ताक्षर किए है। 1995 में यूरो को यूरोपीय संघ की मुद्रा बनाया गया। लेकिन ब्रिटेन ने यूरो को अपनी करेंसी नहीं बनाया। उसकी करेंसी पौंड है।

फैसला: -

  • ब्रिटेन यूरोपीय संघ से अलग हो गया है। यह फैसला न तो यूरोपीय संघ के 28 सदस्य-राष्ट्रों ने किया है और न ही ब्रिटेन की सरकार ने। यह फैसला किया है, ब्रिटेन की जनता ने। 48 प्रतिशत मतदाता चाहते थे कि ब्रिटेन यूरोपीय संघ में बना रहे, लेकिन 52 प्रतिशत मतदाताओं ने उससे बाहर निकलने का समर्थन कर दिया। सिर्फ चार प्रतिशत मतदाताओं ने बाजी पलट दी। ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने पूरी ताकत झोंक दी, इसके बावजूद जनता ने यूरोपीय संघ को छोड़ने का फैसला कर लिया है। इसका नतीजा क्या हुआ? जैसे ही जनमत संग्रह के परिणाम सामने आए, प्रधानमंत्री ने इस्तीफे की घोषणा कर दी। उनके विरोधी भी हिल गए। वे आग्रह कर रहे है कि प्रधानमंत्री पद पर बने रहें और यूरोपीय संघ को ब्रिटेन को बाहर निकालने की प्रक्रिया का संचालन करें, लेकिन स्वाभिमानी केमरन कह रहे हैं कि ”अब नई स्थिति को संभालने के लिए नया प्रधानमंत्री ही चुना जाना चाहिए।”

(वेदप्रताप वैदिक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष )

ब्रिटेन: -

  • जिन कारणों से ब्रिटेन अलग हो रहा है, उन्हीं कारणों से ऐसे क्षेत्रीय संगठनों से अन्य सबल राष्ट्रों को भी अलग होना पड़ सकता है। अभी तो हमारा दक्षेस (सार्क) लंगड़ा हैं। वह यूरोपीय संघ बनने से काफी दूर है, लेकिन उसमें भारत की स्थिति है, उससे कहीं ज्यादा मजबूत है। किन्तु जैसे ब्रिटेन को यूरोपीय संघ छोड़ना पड़ रहा है, क्या भारत को भी दक्षेस छोड़ना पड़ सकता है? यह भयावह संभावना तभी से व्यथित कर रही है, जबसे ब्रिटिश जनमत संग्रह की बात सुनी है। ब्रिटेन ने यूरोपीय संघ आखिर क्यों छोड़ा, यह सवाल सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।
  • यूरोपीय संघ की स्थापना 1957 में हुई थी और ब्रिटेन इसमें 1973 में शामिल हुआ। 16 साल तक वह शामिल क्यों नहीं हुआ? क्योंकि वह अपने आपको यूरोपीय नहीं मानता है। उनसे अलग और ऊपर मानता रहा है। शामिल होने के बावजूद उसने ’यूरो’ मुद्रा को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया। उसने पाउंड को ही अपनी मुद्रा बनाए रखा। इसी तरह अन्य सदस्य-राष्ट्रों की तरह वीजा के आधार पर उसने अपने देश में मुक्त यात्रा की सुविधा नहीं दी। 1975 में भी मांग उठी थी कि ब्रिटेन यूरोपीय संघ छोड़े, लेकिन प्रधानमंत्री हेराल्ड विल्सन को जनमत संग्रह में 67 प्रतिशत लोगों ने समर्थन दिया और ब्रिटेन यूरोपीय संघ में टिका रहा है। किन्तु अब केमरन के जमाने में 43 साल के अनुभव ने ब्रिटिश जनता का मोहभंग कर दिया। यूरोपीय संघ में पूर्वी यूरोप के लगभग दर्जन भर देश आ मिले। इन देशों का जीवन-स्तर पश्चिमी यूरोपीय देशों के मुकाबले बहुत नीचा था। संघ में मिलने वाली छूट का फायदा उठाकर लाखों पूर्वी यूरोपीय मजदूर ब्रिटेन में भर गए। ब्रिटेन के अपने मजदूरों के रोजगार छिनने लगे, जीवन-स्तर गिरने लगा और अपराध बढ़ने लगे। आतंकियों को ब्रिटेन में डेरा जमाने की सूविधा मिल गई। यूरोपीय संघ के कानूनों को ब्रिटिश व्यापार, खेती, कारखानों और मछली-संग्रह आदि पर लागू करने पर ब्रिटेन को काफी नुकसान होने लगा था। ब्रिटेन इस संघ का दूसरा सबसे मालदार और शक्तिशाली देश हैं। वह सांस्कृतिक दृष्टि से अपने आप को सर्वश्रेष्ठ समझता है। यदि वह यूरोपीय संघ पर निर्भर रहा है तो यूरोपीय संघ भी उस पर निर्भर रहा है। उसका 45 प्रतिशत व्यापार संघ के साथ होता है। अभी-अभी दोनों का अलगाव ब्रिटेन के साथ अपनी द्धिपक्षीय संबंधों की पुनपरिभाषा में जुट जाएंगे। इसी स्थिति को ये देश यूरोपीय सपने का भंग होना मान रहे हैं।

रिजर्व बैंक-सेबी: -

  • ब्रिटेन में होने जा रहे ब्रेग्जिट चुनाव से एक दिन पहले रिजर्व बैंक ने कहा कि वह घटनाक्रम पर ’बारीक नजर’ रखे हुए है। वित्तीय बाजार सही तरीके से काम करते रहें यह सुनिश्चित करने के लिए जरूरत पड़ी तो वह नकदी की मात्रा बढ़ाने समेत तमाम जरूरी कदम उठाएगा। रिजर्व बैंक की ओर से जारी एक बयान में यह जानकारी दी गई। इस बीच पूंजी बाजार नियामक सेबी ने भी अपने निगरानी तंत्र में तेजी लाई है।
  • एक अधिकारी ने कहा कि घरेलू पूंजी बाजार का निगरानी तंत्र काफी मजबूत है। जोखिम ढाँचा व्यवस्थित तरीके से काम कर रहा है। ब्रेक्जिट चुनाव के विपरीत परिणाम से निपटने के लिए निगरानी बढ़ा दी गई है। आर्थिक मामलों के सचिव शक्तिकांत दास ने कहा, ’सरकार किसी भी स्थिति से निपटने के लिए तैयार है। मुद्रा की अस्थिरता से निपटने के लिए देश के पास 360 अरब डॉलर का पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार है। अभी तक यह माना जा रहा है कि ब्रिटेन यूरोपीय संगठन से बहार नहीं निकलेगा। यदि निकलता है तो इससे दिखने वाले दुष्परिणामों से निपटने के लिए पूरी तैयार हैं। ब्रिटेन, यूरोपीय संगठन के साथ बना रहे या इससे बाहर निकल जाए इस पर देश की जनता 23 जून 2016 को अपना मत दे दिया है।

ब्रिटेन की भूमिका: -

  • संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य होने के साथ नाटो संस्थापक सदस्यों में से एक है। सब जानते हैं कि दोनों विश्वयुद्ध में ब्रिटेन की अहम भूमिका रही हैं। यूरोपीय समुदाय को विश्वयुद्ध के दुष्परिणामों के बाद फिर खड़ा करने और जर्मनी को फिर बड़ी सैन्य शक्ति बनने से रोकने में भी ब्रिटेन की भूमिका रही है।

अर्थव्यवस्था: -

  • संघ में यदि फ्रांस और जर्मनी को छोड़ दें तो अन्य देशों की तुलना में इसकी अर्थव्यवस्था काफी मजबूत है। यही वजह रही कि जनमत संग्रह के नतीजे के बाद ब्रिटेन से ज्यादा अन्य देशों के बाजारों में जबरर्दस्त गिरावट देखने को मिली। कई देशों के बाजार तो 10 - 10 फीसदी तक अधिक टूट गए। ऐसा नहीं है कि ब्रिटेन पर शुरुआत में इस फेसले का असर नहीं होगा लेकिन आधाभूत तौर पर अर्थव्यवस्था मजबूत है इसलिए दीर्घकाल में परिस्थिति पर काबू पा लिया जाएगा। ब्रिटेन में अनेक देशों की जनसमूहों के कार्यालय हैं।
  • यदि वे यहां से हटते हैं तो संबंधित देश प्रभावित होंगे ही। उन देशों की जनसमूहों के कामगारों के लिए बेरोजगारी की आशंका बढ़ सकती हे। यूरोप के देशों में पिछले एक वर्ष के दौरान करीब 12 लाख शरणार्थी इराक, अफगानिस्तान, अफ्रीका, सीरिया, लीबिया, पाकिस्तान और बांग्लादेश से आए हैं। ब्रिटेन को यह डर भी सताता रहा है कि देर-सबेर ये ब्रिटेन में भी घुस सकते हैं। जर्मनी की नागरिकता के बाद शरणार्थियों को ब्रिटेन में आने से कोई नहीं रोक सकता है। नागरिकता के बाद इनको पासपोर्ट (विदेशी यात्री का पार-पत्र जिसमें यात्री का विवरण दिया होता हैं) आसानी से मिल जाता है।

कानूनी बाध्यता: -

  • जनमत संग्रह को स्वीकार करने की कानूनी बाध्यता नहीं है और न ही इसके आधार केमरून को इस्तीफा देने की जरूरत थी। ब्रिटेन में सभी राजनीतिक दल जनादेश को प्रमुखता देते हैं और इसलिए उन्होंने इस्तीफा देने का फैसला लिया हैं यह भी संभव है कि संसद में यूरोपीय संघ में रहने के फेसले के पक्ष में बहुमत हो, फिर भी केमरून ने जनादेश का सम्मान किया है।

सूचना-

  • अब देखना यह है कि जनमत संग्रह के नतीजे पर कार्रवाई कब तक होती है। यूरोपीय संघ के नियमों के मुताबिक अलग होने के लिए सूचना देनी होती है और इस नोटिस से दो साल के दौरान ही अलग हुआ जा सकता है। हो सकता है कि यह सूचना एक हफ्ते में या एक महीने में कभी भी दे दिया जाए लेकिन इतना तय है कि इसके लिए ज्यादा इंतजार नहीं किया जाएगा। अब शरणार्थी किसी देश से होते हुए ब्रिटेन में घुसेंगे तो उन्हें रोकने की जिम्मेदारी केवल ब्रिटेन की होगी।

गुस्सा: -

  • ब्रिटेन में यह भावना काफी उग्र हो गई है कि विदेशी लोग उनका हक छीन रहे हैं। उन्हें समझना चाहिए कि बाहरी लोगों की वजह से ही उनका जीवनस्तर बेहतर हुआ है पर उन्हें लग रहा है कि जितना विदेशी नागरिक ब्रिटेन से फायदा उठा रहे हैं, उसके बदले उनका योगदान कम है। हालांकि यह देखना दिलचस्प होगा कि किस आयुवर्ग के लोगों ने एग्जिट और रीमेन (निकलना और रहना) के लिए मत किया। पर माना जा रहा है कि युवाओं ने निकलने के लिए ज्यादा मत किया है। लोगों में बाहर निकलने के लिए गुस्सा तो था, तभी वहां भारी बारिश में भी लोग बड़ी तादाद में मत करने आए।
  • आर्थिक पक्ष देखें तो बड़ा प्रत्यक्ष असर नहीं होगा। हमारा निवेश वहां ज्यादा है। अगर यूके टूूट गया तो भी इंग्लैंड कोई खत्म नहीं हो जाएगा। हमारे संबंधों की बुनियाद मजबूत हैं। पर इसमें बूते हम आगे बढ़ सकते हैं। पर इसमें काफी समय लगेगा, यह प्रक्रिया आसान नहीं होगी। अभी जो ब्रिटेन ने खुद यूरोपीय संघ से नाता तोड़ा है, उसके बाद बाकी देशों के साथ संबंधों की मरम्मत करना टेढ़ा काम रहेगा।

घरेलू शेयर बाजार: -

  • की बात करें तो बीते हफ्ते बाजार को बढ़त दिलाने वाली और निराश करने वाली कुछ खबरें देखने को मिली थीं। रिजर्च बैंक राजपाल रघुराम राजन द्वारा दूसरा कार्यकाल लेने से इनकार करने वाली खबर ने निवेशकों को निराश किया, क्योंकि राजन आरबीआई का विश्वसनीय चेहरा हैं। गवर्नर के तौर पर उनका काम काफी अच्छा रहा है। इसमें ब्रेक्सिट को लेकर कम होने से निकली रैली और सरकार द्वारा रक्षा, विमानन सहित कई क्षेत्रों में 100 फीसदी एफडीआई की अनुमित का योगदान रहा हैं। इन आर्थिक सुधारों से बाजार में आराम रैली देखने को मिली हैं। जब 23 जून को होने वाले ब्रेक्सिट चुनाव का नतीजा नहीं आ जाता, तब दुनिया के शेयर बाजारों में धारणा सतर्कता की बनी रहेगी। यदि ब्रेक्सिट रेफरेंडम का नतीजा बाजार की उम्मीद के विपरीत रहा तो निफ्टी में गिरावट देखने को मिलेगी। अभी 8268 अंक पर चुनाव हैं और 8157 पर सहारा हैं। ऐसे में यह 7957 तक नीचे आ सकता है।

Table showing the survey of news tv.

Table showing the survey of news tv.

ब्रेक्जिट के लिए हुए तीन सबसे बड़े सर्वे में दिखी कांटे की लड़ाई

आईटीवी समाचार और डेली (रोज के) मेल

इप्सॉस मोरी नामक सर्वे

पपुलस (लोग) आनलाइन पोल

48 % रिमेन (बने रहेंगे)

41 % लीव (छोड़ देंगे)

रिमेन 48%

55% रिमेन

11 % तय नहीं किया

लीव 52%

45 % लीव

परिणाम के बाद: -

  • नतीजे आने के बाद कैमरन ने कहा कि मैंने इस्तीफा दे दिया है। अभी अक्टूम्बर तक काम करूंगा। मुझे नहीं लगता कि देश जिस अगले पड़ाव पर जा रहा है, वहां की कमान मुझे संभालनी चाहिए। दल को नया नेता चुनना है।

डेविड कैमरन, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री

  • ब्रिटेन का यूरोपीय संघ से अलग होना युवाओं के लिए बड़ा झटका है। 45 से अधिक उम्र के लोगों ने इसके लिए सबसे ज्यादा मत किया। परिणामों के अनुसार 18 से 24 वर्ष करीब 73 फीसदी युवाओं ने ब्रेग्जिट का विरोध किया है जबकि 65 वर्ष से अधिक उम्र के 60 फीसदी बुजुर्गों ने इसके लिए समर्थन व्यक्त किया।

यूरोपीयन संघ (ईयू): -

  • 52 प्रतिशत लोगों ने ब्रिटेन के यूरोपीयन संघ से बाहर जाने पर मुहर लगा दी हैं। 59 साल में पहली बार कोई देश यूरोपीयन संघ (ईयू) से बाहर हुआ हैं। 1957 में साझा कारोबार के लिए यूरोपीयन संघ का गठन किया गया था। अभी 28 देश इसके सदस्य हैं।
  • 43 साल पहले 1973 में ब्रिटेन ईयू में शामिल हुआ था। दो साल बाद ही 1975 में चुनाव हुआ था। तब देश ने ईयू में रहने का फैसला किया था। ब्रिटेन में यह सबसे बड़ा जनमत संग्रह हैं। इसलिए 1975 में बाकायदा एक जनमत संग्रह हुआ। 67 प्रतिशत नागरिकों ने साथ जुड़े रहने के पक्ष में मत दिया।

ब्रिटेन: -

  • अगर कैमरन धेर्य दिखाते है और इस कोशिश में रहते कि वे यूके को ब्रेग्जिट से दूसरी ओर ले जाएंगे तो नतीजा सकारात्मक हो सकता था ब्रिटेन सरकार का राजनीतिक प्रबंधन कमजोर साबित हुआ। ब्रिटेन के राइट विंग तबके के लोग खुश होंगे। वे यूरोपियन संगठन में कतई नहीं रहना चाहते थे। उन्होंने एतिहासिक जीत दर्ज की है। इसका राजनीतिक लाभ उन्हें जरूर मिलेगा। उनकी आवाज मुखर होगी। जैसा अभी कहा जा रहा है कि वहां आमचुनाव जल्दी कराए जाने चाहिए। हालांकि ब्रिटेन संसद में मजबूत हैं पर वे भी इस मत में बंट गए हैं।
  • ब्रिटेन में लोगों का मत काफी पहले ही विभाजित हो चुका था। ब्रिटेन सरकार का राजनीतिक प्रबंधन कमजोर रहा और उसके खिलाफ नकारात्मक मत ज्यादा पड़ा जब तक प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने यूरोपीय संघ में रहने की अपील की तब तक काफी देर हो चुकी थी। दुनिया के बड़े देशों ने इसकी पैरवी की थी। पर अब चुनौती ’आइडिया ऑफ यूरोप’ अर्थात यूरोपी की योजना को बचाने की है। वरना कभी डेनमार्क तो कभी नीदरलैंड निकलने की बात करेंगे। चूंकि यूरोप में राइटविंग हावी होने लगे हैं। इसलिए यूरोपीय संघ की योजना को बचाए रखना प्राथमिकता होगी। विश्व की यह मजबूत आवाज है।

कैमरन की आय: -

  • ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन भी उन लोगों में शामिल हैं, जिन्हें यूरोपीय संघ (ईयू) से अलग होने के कारण व्यक्तिगत रूप से आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा। नेट (जाल) पर जो चर्चाएं हैं, उसके अनुसार ब्रिटिश प्रधानमंत्री के तौर पर उनका सालाना वेतन एक करोड़ 26 लाख रुपए है, जिसमें 66 लाख रुपए सासंद का वेतन शामिल है। इसके अतिरिक्त पश्चिम लंदन के उत्तर दिशा केन्सिंगटन में उनका 32 करोड़ रुपए कीमत वाला उनका एक घर है, जिनका सालाना किराया 75 लाख रुपए आता था। अगर कैमरन वहां स्थानांनातरण होते हैं, तो प्रतिमाह मिलने वाला किराया बंद हो जाएगा। सांसद का वेतन उन्हें मिलता रहेगा, लेकिन प्रधानमंत्री के वेतन के तौर पर 1.3 करोड़ रुपए इस्तीफा देने के बाद नहीं मिलेंगे। इस तरह हर महीने उन्हें 16.6 लाख रुपए बतौर आय नुकसान होगा। कैमरन ने जनमत संग्रह के आठ दिन पहले ही नॉटिंग हिल वाले घर के लिए लोन लिया है। ऐसा अभी क्यों, स्पष्ट नहीं है, लेकिन चर्चाएं हैं कि अगर उन्हें तीन माह की अवधि के पहले 10 डाउनिंग (नीचले स्तर) स्ट्रीट (सड़क) छोड़ने के लिए कहा जाता है, तो वे नोटिंग हिल या नॉर्थ केन्सिंगटन स्थित किसी एक घर में स्थानांनातरण हो सकते हैं। इसके अलावा ऑक्सफोर्डशायर नामक जगह में भी उनके पास 11 करोड़ रुपए कीमत वाला कॉटेज (कुटीर उद्योग) है। वो उनका संसदीय क्षेत्र है।
  • कैमरन को व्यक्तिगत रूप से आर्थिक नुकसान की यह चर्चा इंटरनेट पर है। फाइनेंशियल (निवेश) प्लानर (योजना) डेनी कॉक्स की सलाह है कि कैमरन को वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए नॉटिंग हिल वाला घर वापस करने की प्रक्रिया शुरू कर देनी चाहिए।

महिंद्रा: -

  • आम धारणा के विपरीत महिंद्रा समूह के चेयरमैन महिंद्रा का मानना है कि ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से बाहर निकलने (ब्रेग्जिट) को दुनिया के लिए सुनामी की चेतावनी की तरह बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है जबकि इस मामले में शांत रहने की जरूरत है। ब्रेग्जिट के एक दिन बाद महिंद्रा ने ट्‌िवटर पर लिखा, ब्रेग्जिट दुनिया के लिए सुनामी चेतावनी है। जो लगता है कि यह अतिशयोक्ति है। दुनिया को इस मामले में शांति रखना चाहिए। महिंद्रा का मानना है कि ब्रेग्जिट के बाद होने वाली वार्ताएं साझा बाजारों तथा यात्रा के लिए अधिक व्यावहारिक ग्लोबल, आदर्श पेश करने का अवसर भी है। हालांकि, महिंद्रा समूह ने कहा कि भारत तथा भारतीय उद्योग महिंद्रा और महिंद्रा पर इसका प्रभाव नहीं होगा।
  • समूह के मुख्य वित्त अधिकारी वी. एस. पार्थसारथी के अनुसार, भारत और भारतीय उद्योगों पर इसका प्रभाव बहुत अधिक नहीं पड़ेगा। एक समूह के तौर हमारा लचीलापन हमें बेहतर स्थित में रखेगा और हम आने वाले किसी भी अवसर का लाभ उठाने को तैयार हैं। उद्योग जगत ने एक दिन आगाह किया था कि भारत ब्रेग्जिट के प्रभावों से अछूता नहीं रह सकता है। जनमत संग्रह ने गंभीर अनिश्चितताओं का पिटारा खोल दिया है और भारतीय जनसमूह खासकर आईटी क्षेत्र से जुड़ी फर्मो को क्षेत्र के लिए अपनी रणनीति फिर से तैयार करनी होगी। यह भी अनुमान जा रहा है कि भारतीय जनसमूहों को अपना संचालन ब्रिटेन से अन्य यूरोपीय देशों में स्थानानांतरण करना पड़ सकता है।

सलाह: -निम्न हैं-

  • नई दिल्ली, सिन्हा- केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री जयंत सिन्हा ने कहा कि सरकार ब्रिटेन में काम कर रही जनसमूहों की मदद करेगी ताकि वे ब्रेग्जिट के बाद यूरोपीय संघ के साथ पहले की तरह व्यापार कर सके। सिन्हा ने संवाददाताओं से कहा कि हमारी जनसमूहों प्रतिस्पर्धी और काबिल हैं और विश्वास है कि वे इससे समायोजित करने में कामयाब होगी। उन्होंने कहा कि व्यापार या बातचीत को लेकर अन्य देशों से बात करेंगी। ऐसी आशंका है कि ब्रिटेन में काम कर रही आईटी तथा वाहन क्षेत्र से जुड़ी भारतीय जनसमूहों को ब्रेग्जिट के बाद यूरोपीय संघ में तरजीही पहुंच को लेकर मसलों का सामना करना पड़ सकता है।
  • सिंगापुर यस बैंक सीईओ: - भारत को ब्रेग्जिट और 6 महीने के दौरान अमेरिकी ब्याज दर में बढ़ोतरी नहीं होने का फायदा हो सकता है। यह बात यस बैंक के कार्यकारी अधिकारी राणा कपूर ने कही है। कपूर के अनुसार अगले एक से 6 महीनों में भारत को इस असाधारण स्थिति से उल्लेखनीय फायदा हो सकता है क्योंकि यूरो क्षेत्र में समस्या होंगी, अमेरिकी ब्याज दर बढ़ोतरी में देरी होगी और भारत रणनीति एवं वित्तीय निवेशकों के लिए अनिवार्य निवेश गंतव्य बनता जा रहा है। इसलिए भारत के लिए इस बुरी खबर में भी अच्छी खबर है। कपूर ने कहा कि ब्रिटेन के अपने यूरोपीय संघ की सदस्यता से बाहर निकलने का विकल्प चुनने के बाद से वैश्विक बाजार में बेहद उतार-चढ़ाव की स्थिति है। उन्होंने कहा, निकट भविष्य में शेष विश्व से वित्तीय संपर्क होने के मद्देनजर भारत में कुछ विपरीत असर हो सकता है। हालांकि हमारे नीति-निर्माता जब उतार-चढ़ाव से निपटने के तरीको का इस्तेमाल करेंगे तो स्थिति शांत हो जाएगी।
  • यूरोपियन संघ से अलग होने में ब्रिटेन को तीन साल का लंबा समय लगेगा। लेकिन इसका असर तुरंत ही दिखने लगा है। विदेशों में छट्‌िटयां मना रहे ब्रिटिश नागरिकों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। क्योंकि पाउंड की कीमत लगातार गिर रही है। बदलाव कीमत तय नहीं हुए हैं। इससे ज्यादातर देशों में पाउंड को स्थानीय मुद्रा में नहीं बदला जा रहा है। यहां तक कि होटल्स, टूर एंड टैक्सी सर्विस (घूमना और गाड़ी सेवा) ने भी पाउंड लेने से मना कर दिया है। अमेरिका, ग्रीस, बुल्गारिया और ऑस्ट्रलिया में इस तरह के ज्यादा मामले देखने को मिले हैं। ऑस्ट्रलिया की कॉमनवेल्थ बैंक ने पाउंड को बदलनेे से मना कर दिया है। ब्रेग्जिट के बाद से पाउंड की कीमत 20 के फीसदी तक गिर चुकी है। वह डॉलर के मुकाबले 31 साल के निचले स्तर पर चला गया है।
  • चुनाव- ब्रेग्जिट पर ग्रहण लग सकता हैं। दोबारा चुनाव की मांग करने वाली ऑनलाइन याचिका में 24 घंटे के अंदर 15 लाख साइन कर चुके हैं। ऐसे में ब्रिटिश संसद इस पर बहस कर सकती है। क्योंकि इसके लिए जरूरी 1 लाख से ज्यादा लोगों ने साइन किए हैं। याचिका में दस्तखत करने वाले ज्यादातर लंदन, ब्राइटन, आफक्सफोर्ड, कैंब्रिज और मैंचेस्टर के हैं। साइट पर इतने लोग आए कि साइट नष्ट तक हो गई विलियम ओलिवरी हीले से शुरू हुई इस याचिका में कहा गया है, यदि रिमेन या लीव मत 60 प्रतिशत से कम हों और मत देने वालों की संख्या 75 प्रतिशत से कम हो तो इस मामले में एक और चुनाव होना चाहिए।
  • एजुकेशन सेक्टर (शिक्षा के केंद्र) - इंगलैंड द्वारा यूरोपियन संघ से बाहर निकलने के लिए गए फेसले के बाद पाउंड में आई गिरावट से उच्च शिक्षा के लिए ब्रिटेन आने वाले विद्यार्थियों को लाभ हो सकता है। हालांकि करेंसी को लेकर कायम अस्थिरता एक चिंता का विषय हो सकती है। जनसमूहों के अनुसार पिछले तीन दशकों में पहली बार पाउंड की इतनी बुरी हालत देखने को मिली है। अन्यथा इसमें उतार-चढ़ाव नहीं आते थे। डॉलर के उतार-चढ़ाव के मुकाबले पाउंड में अपेक्षाकृत स्थिरता रहती आई है।
  • जयपुर, फोरे: - ब्रिटेन के यूरोपियन संगठन से बाहर होने से राजस्थान के निर्यातकों पर ज्यादा असर पड़ने की संभावना कम है। फैडरेशन ऑफ राजस्थान एक्सपोर्ट (फोरे) के सचिव अनिल बक्षी का कहना है कि राजस्थान से हैं बढ़िया कागज, आभूषण, हैंडीक्राफ्ट (दस्तकारी) समेत लगभग सभी उत्पादों का निर्यात होता है। प्रदेश से सालाना करीब 40, 000 करोड़ रुपए मूल्य की वस्तुओं का निर्यात किया जाता है। इसमें यूरोप की हिस्सेदारी 30 - 35 फीसदी है। अभी व्यवस्था जरूर खराब हुई हैं। निर्यातकों में थोड़ी घबराहट है, लेकिन दीर्घावधि में इस घटनाक्रम का राजस्थान से निर्यात पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा। विशेषज्ञों के अनुसार यदि ब्रिटेन को यूरोपीय संघ में गैर सदस्य देश की तरह का दर्जा मिलता है, तो इससे भारत के यूरोपीय संघ तथा ब्रिटेन के निर्यात पर सकारात्मक असर होगा। वित्त वर्ष 2015 - 16 में भारत का यूरोपीय संघ को निर्यात 35.35 अरब डालर तथा ब्रिटेन को 9.35 अरब डालर रहा है।
  • द टाइम्स (यह समय) - ब्रेग्जिट से हर कोई हतप्रभ है। इस भूकंप में कैमरन को पीएम (प्रधानमंत्री) पद छोड़ना पड़ रहा है। यह ईयू से ब्रिटेन का ब्रेकअप हैं।
  • द गाजिर्यन (यह संरक्षक) - यूरोपीयन संघ ने यूके को तत्काल संघ छोड़ने को कहा है। ब्रिटेन का पाउंड 30 साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है।
  • लिबरेशन (मुक्ति) - ब्रेग्जिट से बोरिस जॉनसन विजेता बनकर उभरें हैं। कैंमरन के साथी रहे जॉनसन अक्टूबर में पीएम बन सकते हें। वे लीव कैंपेन (अलग रहने) की अगुवाई कर रहे थे।
  • द डेली टेलीग्राफ (रोज के हिसाब का चार्ट) - यह ब्रिटेन का नया जन्म है। बोरिस जॉनसन और माइकल गोव ब्रेग्जिट सरकार को चलाने के लिए तैयार हैं कैमरन का युग खत्म होने की तरफ दिख रहा हैं।

असर: -निम्न हैं-

  • जीडीपी-अर्थशास्त्रियों का आकलन है कि यूरोपीय संघ से अलग होने पर 2030 तक ब्रिटेन की जीडीपी 4 प्रतिशत बढ़ जाएगी। लेकिन ऑक्सफोर्ड अर्थशास्त्रियों का मानना है कि जीडीपी 3.9 प्रतिशत और ओईसीडी के मुताबिक 5.1 प्रतिशत घट जाएगी। भारत के आयात-निर्यात में यूरोप बड़ा हिस्सेदार हैं। ब्रिटेन अगर यूरोपीय संघ से अलग हुआ तो इस पर असर पड़ेगा। ब्रिटेन के रास्ते भारतीय जनसमूहों की यूरोप के 28 देशों के 50 करोड़ से ज्यादा लोगों तक सीधी पहुंच है। ब्रिटेन के बाहर निकलने पर यह आसान पहुंच बंद हो जाएगी। इसके अलावा ब्रिटेन में आज टाटा समूह सहित कई बड़ी जनसमूह (कंपनियां) मौजूद हैं। उन्हें अपने उत्पाद यूरोपीय देशों को भेजने पर कर से छूट मिलती हैं। ब्रिटेन के ईयू से अलग होने पर यह छूट बंद हो जाएगी।
  • भविष्य- फुटबॉलर डेविड बेकहम ने कहा, बच्चों के भविष्य के बारे में सोचिए, ब्रिटेन के ईयू के साथ बने रहना ही सही निर्णय है।
  • सेंसेक्स- इस जनमत संग्रह का जबर्दस्त असर हुआ है। ब्रिटिश मुद्रा का जितना तगड़ा अवमूल्यन आज हुआ है, पिछले 31 साल में कभी नहीं हुआ। भारत का सेंसेक्स 1000 अंक नीचे रह गया हैं। कई अन्य देशों की मुद्राएं भी नीचे लुढ़क गई हैं। ब्रेग्जिट से बाजार में कोहराम मचने से सेंसक्स में इससे पहले 11 फरवरी 2016 को सेंसक्स 807 अंक लुढ़का था। सेंसक्स में अब तक की सबसे भारी गिरावट 24 अगसत 2015 को दर्ज की गई थी। जब चीन में जारी आर्थिक मंदी के दवाब में वहां के शेयर बाजार में आठ प्रतिशत से अधिक की गिरावट से सेंसक्स 1624.51 अंक लुढ़का था। सेंसक्स में सबसे ज्यादा 7.99 प्रतिशत का नुकसान टाटा मोटर्स को हुआ। इसके अलावा टाटा स्टील के शेयर भी छह प्रतिशत से अधिक लुढ़क गए।
  • दुनियाभर के बाजारों में तेज गिरावट से निवेश की कीमत करीब 170 लाख करोड़ रुपए घट गई हैं। लेकिन इस भूचाल के बीच भारत के खुदरा निवेशकों ने विपरीत रुख अपनाया है। इन्होंने उस दिन 118 करोड़ रुपए की शुद्ध खरीददारी की। घरेलू संस्थागत निवेशकों से भी ज्यादा। यह बीते 4 महीनों का विवरण है। 23 मार्च 2016 को इन निवेशकों ने करीब 150 करोड़ रुपए के शेयर खरीदे थे। रोचक की बात यह है कि उस दिन सेंसेक्स में महज 7 अंकों की बढ़त थी। 24 जून 2016 को ब्रेग्जिट के नतीजे आने के बाद सेंसेक्स, 1, 090 अंक लुढ़क गया। तब बीएसई का बाजार उपलब्धि चार लाख करोड़ रुपए घट गया थी। बाद में इस साल की दूसरी बड़ी 605 अंक की गिरावट के साथ बंद हुआ। तब बाजार कैप एक दिन पहले की तुलना में 1.8 लाख करोड़ रुपए कम था।
  • देश-यूरोपीय संघ के बाकी 27 सदस्यों में भी उथपुथल शुरू हो गई हैं। इटली, हॉलैंड, फ्रांस, डेनमार्क आदि देशों के तथाकथित राष्ट्रवादी तत्व मांग करने लगे हैं कि वे भी जनमत-संग्रह करवाएं और यूरोपीय संघ छोड़ें। पहले भी कुछ देशों ने यूरोपीय संघ की सदस्यता छोड़ी है, लेकिन यह छोड़ना छोटा-मोटा धक्का था। अब स्कॉटलैंड दुबारा जनमत संग्रह की मांग करने लगा है। वह ब्रिटेन को छोड़कर यूरोपीय संघ में शामिल होना चाहता है। ब्रिटेन के निकलने से यूरोपीय संघ की मूल अवधारणा पर भी प्रश्न-चिन्ह लगा दिया है। इतना ही नहीं, दुनिया के अन्य महाद्धीपों में बने क्षेत्रीय संगठनों के भविष्य के बारे में भी शक पैदा होने लगा हैं।
  • स्कॉटलैंड: - की पहली मंत्री निकोला स्टर्जन ने घोषणा की है कि स्कॉटलैंड यूरोपीय संघ से रिश्ते बनाए रखेगा। वे ईयू के सभी सदस्यों के नेताओं से बात करेंगी। उन्होंने स्कॉटलैंड के यूके से अलग होने के लिए फिर से रेफरेंडम (चुनाव) करवाने के संकेत भी दिए। स्कॉटलैंड के 62 प्रतिशत मतों ने बने रहने के पक्ष में मत दिए थे। वहीं ईयू ने साफ किया कि स्कॉटलैंड अब संगठन का नहीं लंदन का हिस्सा है।
  • (विदेशी बाजार में) सोना चांदी: - ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से बाहर होने का देश -दुनिया के आर्थिक कारोबार पर व्यापक असर पड़ा है निवेश के लिए सुरक्षित माना जाने वाला सोना एक बा फिर चमका वहीं चांदी के भाव भी उछल गए अंतरराष्ट्रीय व घरेलू बाजार में सोना 27 महीने के उच्चस्तर पर पहुंच पहुंच 30, 700 रुपए प्रति दस ग्राम हो गया है। इससे पहले जयपुर में 8 मार्च 2016 को सोना इस स्तर पर पहुंचा था। इसके असर से जयपुर सर्राफा बाजार में सोना स्टैंडर्ड 900 तथा 22 कैरेट जेवराती सोना 800 रुपए प्रति दस ग्राम उछल गया है। चांदी (999) प्रति किलोग्राम 42, 600 रुपए हो गई। चांदी कलदार प्रति सैकड़ा 72, 000 रुपए हो गया। जेवराती सोना प्रति दस ग्राम 28, 900 रुपए हो गई। 22 के कैरेट सोने का भाव 28, 000 व सोना 995 30, 700 रुपए हैं।

चांदी में 1, 300 रुपए प्रति किलोग्राम तथा चांदी में कलदार में 1, 000 रुपए प्रति सैंकड़ा की तेजी रही। जबकि घरेलू बाजार में अगस्त, 2013 के बाद सोने में एक दिन में इतनी बड़ी तेजी देखने को मिली है। उधर, अमेरिकी वायदा एक्सचेंज कॉमेक्स (बदलता वाणिज्य) में शुरुआती कारोबार में अगस्त में पहुंचा सोना 4.27 फीसदी बढ़कर 1, 309.90 डॉलर पर था जुलाई में चांदी की पहुंच 2.81 फीसदी की तेजी से 17.73 डॉलर प्रति औंसत हो गई।

बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक जनमत संग्रह के परिणामों के बाद ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से बाहर हो गया इस वजह से सुरक्षित निवेश के लिए निवेशकों ने सोने की खरीद तेज कर दी। इस कारण सके अंतरराष्ट्राय बाजार में वर्ष 2008 के बाद सोना एक दिन में इतना चढ़ा। लंदन में एक बार तो सोना 1, 350 डॉलर प्रति औसत को पार कर गया था। एमसीएकस में वायदा सौंदो में सोने के भाव 32, 000 रुपए प्रति दस चलते चांदी में जोरदार उछाल आया।

  • रुपए- रुपया भी डॉलर के मुकाबले चार महीने के निम्न स्तर पर पहुंच गया है जिससे सोना काफी मंहगा हो गया है। अब सोने के भाव 42, 000 रुपए प्रति किलोग्राम हो गई है। ब्रेग्जिट के असर से अन्य प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले डॉलर में आई जबरदस्त तेजी से घरेलू शेयर बाजार में साल की दूसरी सबसे बड़ी गिरावट से अंतरबैंकिग मुद्रा बाजार में आज रुपया 71 पैसे टूटकर चार महीने के निचले सतर 67.96 रुपए प्रति डॉलर पर आ गया हैं।
  • कच्चा तेल- ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से बाहर होने के पक्ष में मतदान करने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल छह प्रतिशत से अधिक लुढ़क गया है। कच्चा तेल का मानक कहे जाने वाले ब्रेंट क्रूड का वायदा एशियाई बाजारों में कारोबार के दौरान 3.37 डॉलर गिरकर 47.54 डॉलर प्रति बैरल तक उतर गया था।
  • पाउंड: - फैसला आने के तीन घंटे के अंदर ही पाउंड 1.50 डॉलर से 1.41 डॉलर पर आ गया है। यह 31 साल की विवरण गिरावट थी। रुपया 60 पैसे लुढ़का। ब्रिटेन के यूरोपियन संघ से बाहर निकलने के फेसले से एक झटके में 10 पाउंड फीसदी गिर गया है। यात्रा विशेषज्ञों के अनुसार यह ब्रिटेन जाने का बिल्कुल सही समय है।

कारण-

  • कमोडिटी (उपयोगी तथा मूल्यवान वस्तु) बाजार में बेस (आधार) मेटल (धातु) की कीमतों में गिरावट, कच्चे तेल के भाव घटने और शेयर बाजार के लुढ़कने से निवेशकों के पास फिलहाल सोनें के अलावा दूसरा विकल्प नहीं है। वहीं ब्रिटिश मुद्रा पौंड भी दस फीसदी टूट गया। पौंड में सितंबर, 1985 के बाद एक दिन ही सबसे बड़ी गिरावट आई हैं।

शेयर के डाटा (आकड़े): -

  • ऐक्सचेंजो ने ट्रेडिंग के बाद के जो डाटा जारी किए हैं, उनके अनुसार विदेशी निवेशकों ने 4, 494 करोड़ के शेयर बेचे जबकि 3, 865 करोड़ के खरीदे। एलआईसी (जीवन सुरक्षा बीमा) जैसे घरेलू संस्थागत निवेशकों ने 2, 969 करोड़ के शेयर खरीदे और 2, 854 करोड़ बेचे। यानी उनकी शुद्ध खरीद 115 करोड़ की रही। लेकिन खुदरा निवेशकों ने 1, 723 करोड़ के शेयर के खरीदे और 1, 605 करोड़ के बेचे। इस साल 2016 में सिर्फ चार दिन ऐसे रहे जब खुदरा निवेशकों ने 100 करोड़ से ज्यादा की शुद्ध खरीददारी की। भारतीय बाजारों में निवेशकों संख्या 3.13 करोड़ है, लेकिन इसकी चाल विदेशी निवेशकों पर निर्भर करती है। बाजार में मार्ग बनाने के लिए जितने शेयर उपलब्ध हैं उसमें से सिर्फ 8 प्रतिशत घरेलू संस्थागत निवेशकों के पास हैं। प्रमोटर्स (समर्थक) के पास 50 प्रतिशत खुदरा निवेशकों के पास 10 प्रतिशत और कॉरपोरेट बॉडी (संयुक्त समुह शरीर/ संस्था के पास 11 प्रतिशत निजी संपत्ति हैं। बाकी 21 प्रतिशत विदेशी निवेशकों के पास हैं।

सुधरा बाजार: -

  • शुरुआती कारोबार में 1, 000 से अधिक अंक तक टूटे सेंसक्स को वित्त मंत्री अरुण जेटली और रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन के बयान से राहत मिली थी। जेटली ने कहा यूरोपीय संघ से ब्रिटेन अलग होने की स्थिति से निपटने के लिए भारत पूरी तरह तैयार है। वहीं राजन ने कहा कि ब्रेग्जिट के मद्देनजर पूंजी बाजार में व्यवस्था बनाए रखने के लिए कदम उठाए जाएंगे। आरबीआई ने आज बाजार में प्रतिभूतियों की खरीद के माध्यम से 102.75 अरब रुपए (लगभग 1.53 अरब डॉलर) डाला हैं।

समीकरण: - निम्न हैं-

  • यूरोपियन कमीशन के चेयरमैन ज्यां- क्लाउद जंकर ने ब्रिटेन से कहा है कि वह अक्टूबर तक इंतजार करने की बजाय तत्काल रिश्ते तोड़े।
  • यूरोपीय संघ के छह संस्थापक देशों जर्मनी, फ्रांस, इटली, नीदरलैंडस, बेल्जियम और लक्समबर्ग के विदेश मंत्रियों ने बर्लिन में इमरजेंसी बैठक मेें ब्रिटेन के निकलने की परिस्थितियों पर चर्चा की।
  • मूडी ने ब्रिटेन की क्रेडिट रेटिंग के आउटलुक को स्थिर से घटा कर नकारात्मक करार दिया है।
  • यूरोपीय संघ के नतो को ब्रसेल्स में विचार विमर्श करेंगे।
  • एक समानान्तर याचिका में लंदन के मेयर सादिक खान से आग्रह किया गया है कि लंदन को स्वतंत्र घोषित किया जाए।
  • यूरोपीय संघ में ब्रिटेन के कमिश्नर (आयोग का सदस्य) जोनाथन हिल ने इस्तीफा दे दिया है।

भ्रम: -

  • इस अलगाव से कई सवाल उठ रहे हैं। आखिर ब्रिटेन ने ईयू से अलग होने के लिए क्यों सोचा? या फिर भ्रामक प्रचार के प्रभाव में आ गए। दरअसल यूरोप में एक नए तरह का एकाधिकारवादी और कट्टर राष्ट्रवादी रवैया पनप रहा है। ब्रिटेन के लोगों को ऐसा भी महसूस हो रहा था कि संघ अपनी शर्तें थोप रहा है और उनसे बड़ी रकम ले रहा है फिलहाल ईयू से ब्रिटेन के अलग होने निर्णय को भले ही यूके स्वतंत्रता रूपी दल (यूकप) के नेता नाइजेल फैराज स्वतंत्रता दिवस के रूप में पेश कर रहे हों। हो सकता हें कि वे ब्रिटेन के लोगों में यह भ्रम भरने में सफल रहे हों कि ईयू से निकलते ही ब्रिटेन पुन: सुनहरे युग में पहुंच जाएगा लेकिन सच यह है कि ब्रिटेन अब नयी चुनौतियां की ओर बढ़ेगा।

प्रवासी: -

  • 1993 में यूरोपीय संघ बनने से पहले यूके में आने जानो वालों को घटाने पर मात्र 10 हजार प्रवासी बढ़े। 1993 से 2014 के बीच विदेशों में जन्मी ब्रिटिश आबादी 38 लाख से 83 लाख हो गई। ब्रिटेन में विदेशी नागरिकों की संख्या भी 20 लाख से 50 लाख हो गई। प्रवासियों में सबसे आगे भारतीय व तीसरे नंबर पर पाकिस्तान हैं। ईयू में प्रवासियों पर कम प्रतिबंध लगाने में ब्रिटेन की खास भूमिका रही है। यही आगे चलकर ’लीव’ (अकेला रहने की) अभियान की रीढ़ बन गई हैं।
  • ब्रिटेन में बढ़ती मुस्लिम प्रवासियों की संख्या ब्रेक्जिट कैंपेन का मुख्य आधार है। ईयू से अलग होने की वकालत कर रहे नेताओं का कहना है ईयू की उदार प्रवासी नीति के कारण ब्रिटेन में पूर्व से आ रहे प्रवासियों की संख्या लगातार बढ़ रही है इससे मूल नागरिक संकट में पड़ सकते हैं। यूकिप नेता जैक्लीन जैक्सन ने कहा कि अलग होने की सबसे बड़ी वजह इस्लामोफोबिया है।

बैठक: -

  • ब्रेग्जिट के नतीजे से यूरोप में भूचाल आ गया है। क्योंकि परिणाम उम्मीद के उलट आए है इसको लेकर किए गए ज्यातर सर्वे गलत साबित हुए। परिणाम के बाद यूरोपीय संघ के मजबूत देश फ्रांस ले लगातार तीन आपात बैठक की। फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने फोन पर जर्मनी की चांसलर एंगेला मर्केल और यूरोपीय संघ के अध्यक्ष डोनाल्ड टस्क से लंबी बात की। ओलांद ने कहा, यह यूरोप के लिए सबसे कठिन समय हैं। हमें एकजुटता दिखानी होगी। वही मर्केल ने सदस्य देशों का चेताते हुए कहा कि वे जल्दबाजी में किसी नतीजे में न पहुंचे। माना जा रहा है कि यूरोपीय संघ में बिखराव को रोकने के लिए उन्होंने ऐसा बयान दिया। ऐसे में हमारी सरकार जल्द ही स्कॉडलैंड की आजादी के लिए दूसरे जनमत संग्रह का ऐलान करेगी। आयरलैंड ने भी ऐसी ही बात दोहराई है। इसका यूरोपीय संघ ने स्वागत किया है।
  • ब्रिटेन के बाहर निकलने के बाद अब फ्रांस, डेनमार्क, फिनलैंड, हंगरी जैसे देश भी यूरोपीय संघ से बाहर निकल सकते हैं।

नये उम्मीवार- निम्न हैं-

बोरिस जानॅसन: -सबसे पहले लीव कैंपन के बोरिस जानॅसन पीएम दौड़ में आगे हैं। वे लंदन के मेयर रह चुके हैं।

मुद्दे: - निम्न हैं-

  • लीव कैंपन (अकेले रहने) वालो ने अप्रवासियों का मुद्दा उठाया। सीरिया-इराक में आईएसआईएस प्रभावित इलाकों से आने वाले शरणार्थियों का विरोध किया, इन्हें खतरा बताया है।
  • ब्रिटेन में अप्रवासियों के मुद्दे को उन्होंने देश की संस्कृति, पहचान और राष्ट्रीयता से जोड़ दिया।
  • कैमरन ने जमकर रीमेन (संघ में बने रहने का) इन ईयू का प्रचार किया लेकिन लाइजल का लीव ईयू कैमपेन इंग्लैंड और वेल्स में कही ज्यादा सफल रहा है।
  • माइकल गोव ने ईयू से अलग होने के बाद ब्रिटेन का मकसद क्या होगा, इसका मसौदा तैयार करने में समय लगाया। ब्रिटेन हर सप्ताह संघ को 350 मिलियन डॉलर देता है। इसका इस्तेमाल स्वास्थ्य केंद्र में होगा।

फराज नाइजल: -

  • जॉनसन बाद फराज नाइजल ने अपने कैम्पन में लगातार मुस्लिम अप्रवासियों का मुद्दा उठाया। ईयू से ब्रिटेन को बाहर कराने वाले नाइजेल फैरात यूके स्वतंत्र दल के नेता हैं। ब्रिटिश सांसद बनने के लिए 5 बार चुनाव लड़े, हर बार हारे। पर 1999 से यूरोपीय संसद का चुनाव जीत रहेे हैं। अब इसी ईयू से ब्रिटेन को अलग करा दिया। फैराज ने कैमरन का इस्तीफा मांगा है। साथ ही कहा रेफरेंडम के नतीजे का दिन ब्रिटेन के लिए आजादी का दिन है।

विचार निम्न हैं-

कोई भी यूरोप के कमजोर देशों को मदद या सब्सिडी देना नहीं चाहता था। हम ब्रिटेनन के साथ नए सिरे से जुड़ने के लिए तैयार हैं।

ब्लादिमीर पुतिन, रुस के राष्ट्रपति

यूरोप अब पहले जैसा नहीं रहा। संघ के बाकी देशों के लिए यह अग्नि परीक्षा का समय है। यह एकजुटता दिखाने का समय है।

फ्रांस्वा ओलांद, राष्ट्रपति फ्रांस

भारत बिटेन और यूरोपीय संघ दोनों के साथ संबंधों को महत्व देता है और आगामी वर्षों में सबंधों का मजबूत करने का प्रयास करेगा।

विकास स्वरूप, विदेश मंत्रालय प्रवक्ता

अलग: -

  • बंटा हुआ दिखा ब्रिटेन ईयू से अलग होने के फेसले पर, स्कॉडलैंड, नॉदर्न आयरलैंड और लंदन ने ईयू में बने रहने के पक्ष में मत दिया। जबकि बाकी इंग्लैंड और वेल्स ब्रेग्जिट के पक्ष में दिखा। इस तरह बंटे हुए देश की तस्वीर सामने आई।

Table showing the Do leave and Do not leave the Britain in favor of

Shows the Do leave and Do not leave the Britain in favor of

ब्रिटेन को छोड़े जाने के पक्ष में

ब्रिटेन को न छोड़े जाने के पक्ष में

इग्लैंड

53.4%

46.6%

पूर्वी आयरलैंड

44.2%

55.8%

स्कॉटलैंड

38%

62%

वेल्स

52.5%

47.5%

वर्ल्ड मीडिया (विश्व संचार माध्यम): -के विचार निम्न हैं-

  • द इकॉनामिस्ट (अर्थशास्त्र) - यह दुखद अलगाव है। ब्रिटेन के लोगों ने गलत फैसला किया है। इससे उसे सामरिक, आर्थिक स्तर पर नुकसान ही होगा।
  • द वाशिंगटन पोस्ट- ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से अलग होने के फेसले से ब्रितानी सरकार के गिरने का खतरा पैदा हो गया है। ब्रिटेन के इस कदम से कई देश और यूरोपीय संघ से बाहर जा सकते हैं। इससे संघ बिखर सकती है।
  • सिडनी मॉर्निंग हेराल्ड- यूरोपीय संघ के बिना ब्रिटेन एक कमजोर देश साबित होगा। यूरोपीय संघ से अलग होने की सूरत में दुनियाभर में ब्रिटेन का दबदबा कम हो जाएगा।

इस्तीफा: -

  • यूरोपीय संघ (ईयू) से यूके (यूनाइडेड किंगडम) के बाहर निकलने के फैसलेे से ब्रिटेन की राजनीति में हड़कंप मच गया है। सत्तारूढ़ सभा दल में प्रधानमंत्री डेविड कैमरन की जगह लेने के लिए मशक्कत शुरू हो चुकी है। वहीं, विपक्षी मजदूरी दल के छाया मंत्रिमंडल (शैडो कैबिनेट) के आधे से ज्यादा मंत्रियों ने इस्तीफे दे दिए। वहीं दूसरी ओर जनमत संग्रह के लिए दायर याचिका पर दस्तखत करने वालों की संख्या महज 48 घंटे में 31 लाख पार कर गई। इस पर अब हाउस ऑफ कॉमन्स की पिटीशंस सलेक्ट कमेटी विचार करेगी। विपक्षी मजदूरी दल भी ईयू में बने रहने के पक्ष में थी। लेकिन उलट फैसला आने के बाद शैडो कैबिनेट के इस्तीफा देने वाले मंत्रियों ने अपने नेता जेरेमी कोर्बिन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। उनका कहना है कि कोर्बिन पक्ष जनता के सामने मजबूती से पक्ष नहीं रख सके। दो सांसदो ने उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश कर दिया। कुछ सांसदो ने कोर्बिन से इस्तीफा मांगा हैं। शैडो कैबिनेट के विदेश मंत्री हिलेरी बैन ने कहा कि ”मैंने कोर्बिन से कहा कि मुझे आपके नेतृत्व में भरोसा नहीं रहा, तो उन्होंने मुझे बर्खास्त कर दिया” जबकि कोर्बिन ने कहा ”बैन कैबिनेट के अन्य सदस्यों को इस्तीफे के लिए भड़का रहे थे।” उन्होंने इस्तीफा देने या अविश्वास प्रस्ताव का सामना करने से भी मना कर दिया।

सभा दल: -

  • में प्रधानमंत्री कैमरन की जगह लेने के लिए नेताओं ने जोड़-तोड़ शुरू कर दी है। अक्टुम्बर में होने वाले दल अधिवेशन में नया नेता चुना जाएगा। लंदन में पूर्व मेयर बोरिस जॉनसन और गृहमंत्री थेरेसा के बीच कड़ी टक्कर लग रही है। संडे टाइम्स मैंगजीन (रविवार समय पत्रिका) के मुताबिक माइकल गोवे ने जॉनसन को समर्थन किया है वहीं, कैमरन समर्थक के साथ हैं।

फ्रेग्जिट: -

  • ब्रेग्जिट के बाद क्या अब फ्रांस यूरोपीय संघ से निकलने के लिए फ्रेग्जिट करवाएगा? राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने संभावना से इनकार किया है, लेकिन 2017 में होने वाले चुनावों के कारण वे दबाव में हैं। धुर दक्षिणपंथी नेता मेरिन ले पें चाहती हैं कि ब्रिटेन जैसा जनमत संग्रह हो। ले पें बेहद लोकप्रिय फ्रांस यूरोपीय संघ के संस्थापक सदस्यों में से है। लेकिन 2005 में यूरोपीय संघ के संविधान को फ्रांस के मत नकार चुके हैं।

रणनीति: - निम्न हैं-

  • व्यापार मंत्री साजिद जाविद ने कहा कि वे विश्वास जीतने के लिए इस सप्ताह दो दर्जन बड़े उद्योगपतियों का गोलमेज सम्मेलन करेंगे।
  • यूकेआईपी के सांसद डगलस कार्सवैल ने कहा कि दहशत में आने की जरूरत नहीं है। हम क्यों ईयू से निकलने के लिए कोई समय सीमा तय करें।
  • पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने कहा है कि दूसरा जनमत संग्रह भी हो सकता हैं।
  • चीन के वित्त मंत्री लाऊ जीवेई ने चेतावनी दी है। कि ब्रिटेन के ईयू से अलग होने के नतीजे दुनिया को 5 - 10 साल तक भुगतने पड़ेगे। चीन ने ब्रिटेन में करीब 3.3 अरब डॉलर के निवेश का वादा कर रखा है।
  • यूरोपीय संघ ने कहा है कि ब्रिटेन ईयू के आर्टिकल-50 के तहत तत्काल कदम उठाए। अक्टुम्बर तक इंतजार न करे। उसके लिए पूरी एक गाइडलाइन (सलाह रेखा) जारी कर दी है। इसके तहत ब्रिटेन को ईयू से निकलने में कम से कम दो साल लगेंगे।

भारत: -

  • क्या कभी भारत के साथ भी यही हो सकता हैं? क्यों नहीं? यूरोपीय संघ में तो ब्रिटेन की टक्कर के दो देश हैं-फ्रांस और जर्मनी, लेकिन भारत की टक्कर में कौन हैं? अकेला भारत दक्षेस के अन्य सातों देशों को मिला दें तो उनसे भी बड़ा है। पूरे दक्षिण एशिया में कहीं कुछ बवाल होता है, चाहे बांग्लादेश हो, म्यांमार हो, श्रीलंका हो, अफगानिस्तान हो, लाखों लोग जबर्दस्ती भारत में घुसे चले जाते हैं। यदि यूरोपीय संघ की तरह दक्षेस-राष्ट्रों में वीजा हट जाएं, नौकरियां खुल जाएं आवागमन मुक्त हो जाए तो यह भय तो है ही कि भारत में करोड़ों शरणार्थियों हो सकते है। ऐसे में भारत क्या करेगा, इस प्रश्न पर सोचने का मसला हमें ब्रिटेन ने अभी से दे दिया है। शायद ऐसी नौबत न आए, क्योकि यूरोप के देशों में कच्चा माल नहीं है और उनकी जमीन भी छोटी है, जबकि दक्षिण एशिया और मध्य एशिया के राष्ट्रों के पास अथाह कच्चा माल है और उनके पास इतनी ज्यादा खाली जमीन पड़ी हुई है कि वहां वे लाखों नहीं करोड़ों नए आगंतुकों को बसा सकते हैं और उन्हें रोजगार दे सकते हैं।
  • भारत पर प्रभाव-
  • यूरोपीय संघ ब्रिटेन के अलग होने का भारत पर क्या प्रभाव पड़ेगा, इस प्रश्न पर अभी तक गहरी पड़ताल नहीं हुई है। उसका कारण है। भारत को दोनों से ही अच्छा संबंध है। ब्रिटेन में लगभग 30 लाख भारतीय मूल के लोग रहते हैं। लाखों भारतीय वहां पर्यटक, छात्र व्यापारी आदि के तौर पर यूरोप देश से ज्यादा जाते रहते हैं। ब्रिटेन में भारत की 800 से ज्यादा जनसमूहों सक्रिय हैं। यूरोप में जितनी है, उनसे कहीं ज्यादा। अंग्रेजी में काम करने पर उन्हें ज्यादा सुविधा होती है। अब उन्हें अपने कार्यालय शायद यूरोप में खोलने पड़े। यों भी ब्रिटेन को यूरोपीय संघ से अलग होने में अभी कम से कम दो साल लगेंगे। इस अवधि में भारतीय हित-रक्षा का समुचित प्रबंध हो जाएगा। भारत को अभी थोड़ी और दूरदर्शी से काम लेना होगा। अभी तो सिर्फ ब्रिटेन टूटा है, कल इटली, फ्रांस और जर्मनी आदि देश भी अलग होने लगे तो भारत की नीति क्या होगी? यूरोपीय संघ से अलग होना, न केवल यूरोपीय संघ के विसर्जन की शुरुआत हो सकता है बल्कि पश्चिमी सभ्यता के विनाश का प्रारंभ हो सकता है। यह प्रतिक्रिया जरा भावुकताभरी है, लेकिन इसमें शक नहीं है कि रूस के ब्लादिमीर पुतिन से ज्यादा खुश आज कौन होगा
  • वेदप्रताप वैदिक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष
  • अन्य प्रभाव- भारत की दोस्ती ब्रिटेन से अच्छी रही है। आपसी सहयोग दोनों ओर से रहा है। अगर ब्रिटेन कमजोर हो गया, जैसा परिणाम आया है और अगर स्कॉटलैंड, आयरलैंड भी अलग हुए तो ब्रिटेन पर गंभीर असर होगा। उसकी साझेदारी न सिर्फ भारत के साथ बल्कि बाही देशों के साथ प्रभावित होगी। इस नजरिए से जो परिणाम आया है, उसे देखना होगा कि ब्रिटेन कैसे संभालता है। पर इसका असर भारत में जरूर पड़ेगा। स्कॉटलैंड इस जनमत संग्रह में तो ’रीमेन’ में रहा। पर दो साल से वह कोशिशों में है कि ब्रिटेन से ही अलग हो जाए। ’स्कॉग्जिट’ की बात चल रही है। इतिहास में वे कभी ब्रिटेन के साथ मिल जाते हें या अलग हो जाते हैं। अरसे से यह दिक्कत रही है। स्कॉलैंड के लीडर कह रहे हैं कि एक और जनमत संग्रह की जरूरत है। इसके मायने है कि वे अप्रत्यक्ष रूप से इंग्लैंड से अलग होने की वकालत कर रहे हैं। इस तरह की भावनाएं पैदा होना और ब्रिटेन में टूट पड़ना भारत के लिए नकारात्मक होगा। हमारी साझेदारी जरूर प्रभावित होगी। हमारा काफी कुछ दाव पर है क्योंकि दोनों देश मजबूत साझेदार बन रहे हैं।
  • निवेश- यूरोपीय देशों में ब्रिटेन में भारतीयों ने बड़ी मात्रा में निवेश कर रखा है। ब्रिटेन में निवेश के मामले में अमरीका और फ्रांस के बाद भारत तीसरे नंबर पर हैं। यही वजह थी, ब्रिटेन के यूरोपीय संघ में रहने के मुद्दे पर भारत ने भी कहा था कि वह ब्रिटेन को यूरोप के दरवाजे के तौर पर देखता है और इसलिए चाहता है कि यूरोपीय संघ में वह बना रहे। ऐसे में शुरुआती तौर तो भारत की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा लेकिन दीघकाल में संभलकर चले तो स्थितियों पर काबू पाया जा सकता है। टाटा जैसी बड़ी जनसमूहों ब्रिटेन को आधार देश बनाकर यूरोप के अन्य देशों में कारोबार करती हैं।
  • भाषा की समस्या कम- कहने में भी भले ही आसान लगे कि यूरोपीय संघ से अलग होने पर भारतीय जनसमूहों अन्य देशों में अपने कार्यालय खोलकर काम कर लेगी। लेकिन, हकीकत यही है कि अंग्रेजी भाषा में कामकाज भारतीयों के लिए काफी सरल रहता है। जर्मनी और फ्रांस में काम करने के लिए वहां की भाषा सीखना और फिर नए सिरे के काम करना काफी महंगा भी साबित हो सकता है। लेकिन इस मामले में हमें सोच की सकरात्मक बनाए रखने की बहुत जरूरत होगी। हम ऐसा करने में सफल रहे तो यह भारत के लिए यह बेहतर अवसर भी साबित हो सकता है।
  • फायदा-भारतीय अर्थव्यवस्था अब दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले काफी बेहतर हैं। भारत इन दिनों देश में निवेश के लिए काफी प्रोत्साहन दे रही है जबकि अन्य देशों की अर्थव्यवस्था लड़खड़ाई हुई हैं। ऐसे में ब्रिटेन की जनसमूहों को देश में आकर्षित करने के लिहाज से सोचना बेहद जरूरी है। ब्रिटेन का एक दिन यूरोपीय संघ से अलग होने के फैसला लागू होने में काफी समय ले लेगा। हमें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि ब्रिटेन में जो समूह यूरोपीय संघ से अलग होने के पक्ष में रहे, उनका झुकाव भारत की ओर है। वे भारत को बेहतर अर्थव्यवस्था के तौर पर देखते हैं। ऐसे में नए निवेश समझौते होने की प्रबल संभावनाएं हैं। भारत को ऐसे अवसरों का फायदा उठाना चाहिए। भारत के लिए विशेष नुकसान की बात नहीं है।

भारत पर ओर भी असर: - निम्न हैं-

  • कारोबार-ब्रिटेन में करीब 800 भारतीय जनसमूह हैं। ईयू से बाहर होने पर इन जनसमूहों के कारोबार पर भी असर पड़ेगा। क्योंकि इनमें अधिकतर यहां रहकर खुला यूरोपीयन बाजार में व्यापार करती हैं। इनमें टाटा मोटर्स भी शामिल है।
  • आवाजाही- यह आशंका भी है कि यूरोप के देश अपने रास्ते ब्रिटेन के लोगों के लिए बंद कर सकते हैं। अब तक लोग यूरोप के एक दूसरे देश में बिना किसी रुकावट या वीजा के आ-जा रहे थे। भारतीय जनसमूहों को भी यूरोप में घुसने के नए रास्ते बनाने होंगे।
  • दाम- ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से अलग होने के फेसले के साथ ही पाउंड की स्थिति डॉलर के मुकाबले कमजोर हो गई। डॉलर की मजबूती के साथ रुपए की कीमत गिर गई है। कच्चे तेल की खरीद डॉलर में होने से कच्चा तेल भी महंगा हो जाएगा। इससे पेट्रोल और डीजल के दाम ओर बढ़ेंगे।
  • खतरा- उत्तरी आयरलैंड और स्कॉटलैंड के लोग जनमत संग्रह के नतीजों से दु: खी हें। दोनों प्रांत यूरोपीय संघ में बने रहना चाहते थे। ब्रेक्जिट मत के बाद यह हो सकता है कि ये दोनों देश यूके से अलग होने की मांग उठाने लगे है।
  • नुकसान- लंदन को अब तक अंतरराष्ट्रीय वित्तीय राजधानी माना जाता रहा है यूरोपीय संघ की सदस्यता की वजह से दूसरे कई देश लंदन को वित्तीय खिड़की के तौर पर इस्तेमाल करते थे। ब्रेक्जिट के कारण इस खिड़की के बंद होने के आसार बन गए हैं।

अन्य देश: -

  • ब्रिटेन के जनमत संग्रह के नतीजे का असर यूरोप के अन्य देशों पर पड़ना लाजिमी ही हैं। पिछले एक-दो वर्षों में जिस तहर से शरणार्थियों की संख्या में बढ़ोतरी हुई, इसे देखते हुए ब्रिटेन में भी दक्षिणपंथी संगठन काफी उग्र होने लगे थे। वे इस समस्या से निपटने के लिए यूरोपीय संघ से अलग होने की वकालत कर रहे थे। ऐसी ही स्थिति हॉलैंड मेें भी बनी हुई हैं। ऑस्ट्रिया में भी दक्षिण पंथी इसी स्वर में बात कर रहे है और वे सत्ता के काफी नजदीक तक पहुंच गए वहां की संसद में उनकी संख्या में काफी बढ़ोतरी हुई। इसी तरह से फ्रांस में भी दक्षिणपंथी आवाजें तेज हो रही हैं। पिछले चुनाव में उन्हें सीटें भी काफी मिली थी। वे कह चुके हैं कि अगले चुनाव में यूरोपीय संघ से अलग होना एक मुद्दा हो सकता है। जर्मनी में भी कुछ ऐसा ही हाल है कि वहां यूरोपीय संघ के अलग होने को लेकर स्वर तेज हो रहे हैं। तात्कालिक रूप से इस तरह का फैसला यूरोपीय संघ से जुड़े अन्य देश भले ही न लें लेकिन उनके लिए खतरे की घंटी जरूर बज चुकी है। यूरोपीय संघ के देर-सबेर छिन्न-भिन्न होने के आसार बन गए हैं।

लंदन: -

  • दूसरी तरफ ईयू से ब्रिटेन के बाहर होने की आवाज बुलंद करने वाले लंदन के पूर्व मेयर बोरिस जॉनसन ने मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की अंतिम कोशिश की। जानॅसन ने कहा ”ईयू से बाहर होने के फेसले से ही ब्रिटेन को वह आजादी मिल सकेगी, जो उसके बेहतर भविष्य का रास्ता खोलेगी।”

इंग्लैंड: -

  • अभी वहां जो शेयर बाजार नीचे गया है, उसके कारण नकारात्मक भावनात्मक है। पर यह फिर से ठीक होने लगेगा। बाजार खराब होने से भारत और इंग्लैंड के रिश्तों पर तात्कालिक असर नहीं होने वाला है। हां, अगर इंग्लैंड को अपने घरेलू हालात को संभालने में ही दिक्कतें आई तो उनके मजबूत व्यापारिक ताल्लुकात में कमजोरी आएगी। वैसे ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रहे हैरोल्ड विल्सन ने एक मजेदार बात कही थी कि ’वन वीक इज लॉन्ग टाइम इन पॉलेटिक्स।’ (राजनीतिक) यानी अभी नाकरात्मक भाव जरूरी है पर ब्रिटेन का ध्यान खराब हुए बिना नियंत्रण पर रहेगा। वहां दक्षिणपंथी (राइट विंग) भावना उभरी है। पर यह कई पश्चिमी देशो में दिख रही है। इसमें किसी नतीजे पर पहुंचना अभी जल्दबाजी है।

जर्मनी: -

  • ब्रेग्जिट के बाद ब्रिटेन की लेबर दल और स्कॉलैंड में हलचल तेज हो गई है। इसके संभावित खतरे से चिंतित यूरोपीय देशों के साथ चीन और अमरीका आगामी रणनीति को आकार देने लगे हैं। उधर जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल के चीफ ऑफ स्टाफ पीटर एल्अमायर ने कहा है कि ब्रिटेन के राजनीतिक नेताओं को ब्रेग्जिट के परिणामों के बारे में दोबारा सोचने का मौका मिलना चाहिए। सभी को धैर्य के साथ ब्रितानी नेताओं को रणनीति तय करने का इंतजार करना चाहिए। स्कॉडलैंड की पहली मंत्री निकोला स्टर्जन ने कहा है कि ब्रिटेन के ईयू से बाहर आने के लिए स्कॉटलैंड की संसद को अपनी रजामंदी देनी होगी चीनी वित्त मंत्री लू जिवेई ने कहा कि इसके परिणाम 10 सालों में सामने आ जाएंगे।

अमरीका: -

  • अमरीकी विदेश मंत्री जॉन कैरी लंदन जाएंगे। यात्रा के दौरान वे पहले लंदन और फिर यूरोपीय संघ के मुख्यालय जाएंगे। अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ब्रिटेन के लोगों से ईयू बने रहने की अपील की थी।
  • लेबर (मजदूरी) दल के शैडो कैबिनेट के 6 सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया हैं। ये सभी अपने नेता जेरेमी से नाराज हैंं। इनका आरोप है कि यूरोपीयन संघ से देश के बाहर जाने से रोकने के लिए कार्बिन ने मजबूती से अभियान नहीं चलाया।

संकट: -

  • यूरोपीय संघ के ब्रिटेन की ’निकासी’ भारत समेत दुनिया के अनेक देशों को संकट में डाल गई है। संकट भी ऐसा जिसके चंद दिनों में हल होने के आसार नजर नहीं आते है। मंदी के दौर से गुजर रही अर्थव्यवस्था को यह घटना गहरे घाव दे गई। दुनियाभर के शेयर बाजरों में कोहराम मच गया तो ब्रिटेन के पाउंड में 31 साल की सबसे बड़ी गिरावट देखने को मिली। डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया भी 72 पैसे लुढ़ककर चार महीने के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया। भारतीय शेयर बाजार भी धड़ाम होकर आँंधे मुंह गिरा। मतलब साफ है कि ब्रिटेन का जनमत अभी और संकट के दौर दिखाएगा। पाउंड के गिरने से डालर की मांग के बढ़ने का सीधा असर आयात पर पड़ेगा, जो महंगा होगा। लेकिन इन आर्थिक पहलुओं के बीच बड़ा सवाल ये कि ब्रिटेन को यूरोपीय संघ को अलविदा कहना क्यों पड़ा? क्या संघ में बने रहने का आर्थिक बोझ ब्रिटेन सह नहीं पा रहा था। या फिर संघ में फ्रांस और जर्मनी के मुकाबले उसका प्रभुत्व कमजोर हो रहा था या फिर टर्की से घुसपैठ की आशंका थीं। जिस ब्रिटेन के राज में कभी सूरज अस्त नहीं होता था उस ब्रिटेन के नागरिको ने यूरोपीय संघ से अलग होने का फैसला लिया तो सोच-समझकर ही लिया होगा। लोकतंत्र की खूबी भी यही है कि इसमें बहुमत का सम्मान किया जाता है। साथ ही ये सोचने को भी मजबूर कर दिया है कि क्या संगठन के दूसरे बचे 27 देशों में से कोई और भी ब्रिटेन का अनुसरण करेगा? 23 साल पहले बने यूरोपीय संघ ने यूरोप के तमाम देशों को एक सूत्र में बांधने में सफलता पाई, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। लगभग 51 करोड़ की आबादी वाला यह संगठन दुनिया के दूसरे देशों के लिए उदाहरण पेश कर रहा था। संघ ने यूरोपीय कमीशन (कार्याधिकार), यूरोपीय काउंसिल (पार्षद/सलाह) के साथ यूरोपीय संसद का भी गठन किया। आपसी व्यापार को भी बढ़ाया और एक-दूसरे देशों में आने-जाने की पेचीदगियों को भी दूर किया।

समस्याएंे: -

  • एक बड़ी समस्या यह है कि यूके के अलग होने के बाद इंग्लैंड की अर्थव्यवस्था अगर कमजोर हो गई तो बाजार के लिए परिणाम गंभीर होंगे। उनका सबसे बड़ा सेक्टर फाइनेंशियल (धन निवेश) केंद्र है। उस पर इस मत का सबसे बड़ा असर हुआ है। इससे इंग्लैंड पर दीर्घकालिक असर देखने को मिल सकता है। अगर वे इस मुश्किल से नहीं निकल पाएंगे तो उनके साझेदार देशों पर असर होगा। ब्रेग्जिट से सिर्फ यूके पर ही नहीं बाकी यूरोपीय देशों पर भी नकारात्मक असर होगा। भारतीय जनसमूहों को वहां अपना कारोबार बनाए रखने के लिए ’रीनेगोशिएट’ करना होगा। यूरोपीयन संगठन में कारोबार फेलाने में समस्या आएंगी। क्या शर्तो के साथ भारतीय जनसमूहों वहां कारोबार कर पाएंगी, क्योंकि यूके का ज्यादा साथ नहीं मिलेगा।

उपसंहार: -

  • ब्रिटेन का यूरोपीय संघ से अलग होना इसके, यूरोपीय संघ, भारत और दुनिया के लिए कितना फायदेमंद या नुकसानदेह होगा, यह तो समय बताएगा। लेकिन इतना तय है कि ब्रिटेन की जनता के फेसले ने एक बार तो दुनिया में भूचाल ला ही दिया है। लेकिन ब्रिटेन को अपनी कुछ मजबूरियों के चलते संघ को छोड़ना पड़ा। फैसला उचित था या अनुचित, इसका निर्धारण भविष्य तय करेगा।

- Published on: July 6, 2016