रोहित की आत्महत्या (Rohit Vemula- Dalit Suicide - Essay in Hindi) [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना: - हैदराबाद विश्वविद्यालय के दलित छात्र रोहित वेमुला ने ’व्यवस्थाओं’ से खिन्न होकर खुदकुशी कर ली। ये कहीं ना कहीं सामाजिक ताने-बाने में गुथीं हुई समस्याएं थी जो इस दुखद घटना के रूप में सामने आई। अब राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोंपों का दौर शुरू हो गया है। सत्ता पक्ष अपने बेगुनाह साबित करने में जुटा है तो विपक्ष ने बयानबाजियों के जरिये जोरदार हमला बोल दिया है। विश्वविद्यालयों में राजनीतिक दखल क्यों बढ़ रहा हैं? विश्वविद्यालयों के जरिये अपना जनाधार बढ़ाने के लिए राजनीतिक कठहरे को तेज करने की परिपाटी आखिर कब खत्म होगी? शिक्षा के प्रांगण से सियासत को कैसे दूर रखें? छात्र खुदखुशी से उपजे सवाल कहीं सियासी में ही न खो जाएं। विश्वविद्यालय परिसरों में शिक्षा अनुकूल वातावरण बनाने में राजनीतिक दल सामने आएं।

गंभीर: - हैदराबाद के केन्द्रीय विश्वविद्यालय के पीएचडी दलित छात्र की खुदखुदशी को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता बयानबाजी कर रहें या फिर विश्वविद्यालय का दौरा कर रहे हैं देश भर में किसी एक विश्वविद्यालय या दूसरी उच्च शिक्षण संस्था का नाम बता दें जो दलितों के पढ़ने लायक हो, जहां का माहौल प्रजातांत्रिक हो। क्या वे ऐसी संस्था बता सकते हैं जो इस बात का आकलन कर सके कि दलितों के साथ किस किस्म का भेदभाव होने लगा है? विश्वविद्यालयों में तो यह भेदभाव का और परिष्कृत रूप हो गया है। इसकी भाषा शैली और वाक्य विन्यास भी अलग है।

दलित छात्र को लेकर चिंता जताने वाले सचमुच गंभीर हैं तो वे पहले देश भर के विश्वविद्यालयों में बनते जा रहे कलुषित वातावरण की पड़ताल करें। यदि ऐसा नहीं कर सकते तो कहीं किसी की खुदखुशी हुई है या हत्या इसको लेकर राजनीति करने की कतई जरूरत नहीं है।

पाठयक्रम: - दलितों के साथ सबसे अलग पहलू जो पिछले सालों में उभर कर आया है वह यह है कि इस वर्ग का बालक अब पढ़ने लगा है। जाहिर हैं कि ये विश्वविद्यालयों तक में जाने लगे हैं। लेकिन दलितों के प्रति समाज की सोच निचले से लेकर ऊपरी स्तर तक अभी खास नहीं बदल पाई है। आप स्कूल से लेकर विश्वविद्यालयों तक के पाठयक्रमों को उठा कर देख लें। क्या कहीं दलित, आदिवासियों व महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने व उनके हितों के लिए आवाज उठाने वालों को पढ़ाया जा रहा हैं? जब हमारे दिलोदिमाग में ही बराबरी का दर्जा नहीं दे पा रहे तो फिर पाठयक्रमों में कहां दे पाएंगे? आज बच्चे पढ़ने लगे हैं तो वे अपने साथ अपने नायकों की तस्वीर भी साथ रखने लगे हैं। लेकिन अंबेडकर व ज्योतिबा फुले की तस्वीर रखना तो दूर उन पर बहस तक नहीं करा पाते। विश्वविद्यालयों में छात्र न केवल पढ़ाई के जरिए बल्कि विचारधारा के तौर पर भी परिष्कृत होते हैं। कोशिश करते-करते हम गलतियां भी करते हैं। अब कोई गलती हो भी गई तो हम उसे सुधारने का काम करेंगे या सजा देने का? शिक्षा के प्रागणों में जो कुछ हो रहा है उस पर कभी बहस नहीं होती। आज विचारधारा को लेकर इस कदर बदलाव आया है कि जहां पहले मार्क्स व लेनिन की तस्वीरें लगा करती थीं उन शिक्षण संस्थाओं में अब अम्बेडकर व फुले की तस्वीरें लग रहीं है। जो संघर्ष दिखता है वह भी विचारधाराओं से जुड़ा लगता है।

प्रताड़ना: - हैदराबाद विश्वविद्यालयों में आत्महत्या करने वाले छात्र रोहित का पत्र पढ़ेंगे तो उससे साफ लगता है कि वह अलग-थलग महसूस करने लगा था। कहीं न कहीं ऐसा भेदभाव ही ऐसे कदम उठाने को मजबूर करता है। न केवल देश के विश्वविद्यालय बल्कि आईआईटी, आईआईएम और एम्स सरीखे संस्थाओं में भी ऐसे दलित ऐसे भेदभाव का शिकार होते आए हैं। सोचिए, यदि दलित किसी को प्रताड़ित कर दे तो क्या हो? क्या कभी दलितों पर अत्याचार की जो शिकायत मंत्री तक पहुंची उस पर तुरंत कार्रवाई हुई? उसके पत्र को कहीं फारवर्ड किया गया? ऐसा होने लगे तो हालात बदलते देर नहीं लगेगी। लेकिन दलित के लिए तो मंत्री तक पहुंचना ही मुश्किल भरा होता है। हां वह ज्यादा जागरुक हो कर हक की बात करने लग गया।

आरोप: - रोहित वेमुला पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के नेता एन. सुशील कुमार पर हमले का आरोप लगा था। रोहित और उनके साथी छात्रों पर आरोप था कि उन्होंने अंबेडकर छात्र संगठन के बैनर तले कुछ मुद्दों को उठाया था। 5 अगस्त, 2015 को हैदराबाद विवि ने रोहित समेत पांच छात्रों के खिलाफ जांच समिति का गठन किया। केंद्रीय राज्य मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने इस संबंध में मानव विकास मंत्रालय को 17 अगस्त को पत्र लिखा था। कहा, हाल के वर्षों में हैदराबाद विश्वविद्यालय जातिवादी, अतिवादी व राष्ट्र विरोधी गतिविधियों का गढ़ बन गया है। हैदराबाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने सितंबर, 2015 में रोहित समेत पांचो छात्रों को निष्कासित कर दिया था। 03 जनवरी, 2016 को पांचों छात्र निष्कासन पर मुहर लगने के बाद हॉस्टल छोड़कर विश्वविद्यालय परिसर में तंबू लगाकर आमरण अनशन पर बैठ गए। निष्कासन के बाद पीएचडी छात्र राहित विश्वविद्यालय परिसर में ही रहे। इस दौरान रोहित ने कुलपति जी को भी पत्र लिखा। मगर मदद न मिलने से हताश होकर छात्र रोहित ने खुदखुशी कर ली थी।

प्रशासन: - रोहित की आत्महत्या का कारण तो अभी तक साफ नहीं है। पर यह कहना सही नहीं होगा कि इस हादसे के लिए केंद्रीय राज्यमंत्री बंडारू दत्तात्रेय ही जिम्मेदार है। गलती कुलपति के स्तर पर ज्यादा रही है। हालांकि केंद्रीय स्तर पर इस मसले की गंभीरता को नहीं समझा गया। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रशासनिक क्षमताएं दिखाने में विफल रहे। उन पर दलित छात्रों को नजरंदाज करने के आरोप लग रहे हैं। गौरतलब है कि आंध्रप्रदेश में दलित बनाम सवर्ण और ओबीसी को लेकर जमकर छात्र राजनीति होती है। यहां के कैम्पसों में राजनीति अधिकांशत: जाति आधारित होती है। आंध्रप्रदेश एक तरह से दक्षिण का बिहार है। अब वो जमाना नहीं है जब दल आधारित छात्र राजनीति हो रही थी। दक्षिण में तेलंगना, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु जैसे राज्यों में कैम्पस में जातिगत दिखने लगे हैं। अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन जब हैदराबाद विवि में आए थे। तो दलित संगठनों ने उनका विरोध किया। सेन ने कहा कि मैं तो गरीबों का हिमायती हूं पर संगठनों ने कहा कि कुलपति सवर्ण हैं और उनके हिमायती हैं। दलितों के समर्थक नहीं है।

राज्य सरकार ने ज्यादा दखल ही नहीं दिया। यह हादसा पूरी तरह से प्रशासनिक विफलता का उदाहरण है। जो यह बातें सामनें आ रही है कि छात्र किसी खास राजनीतिक मकसद के लिए काम कर रहे थे, सह सरासर गलत है। वे दलित छात्र है और अपने मकसद के लिए विरोध कर रहे थे। यहां छात्रों के दलित यूनियन ज्यादा हावी हैं। किसी अन्य धार्मिक-रानीतिक संगठन की इनमें घुसपैठ नहीं है। कुलपति चाहते तो यह मामला पहले ही शांत कर सकते था।

रोहित आत्माहत्या: - आर्थिक रूप से कमजोर जरूर था पर प्रतिभावान था। भले ही वह दलित छात्र था पर उसका प्रवेश मेरिट से हुआ था परिवार का भार उसी कंधों पर था। रोहित की आर्थिक स्थिति खराब थी। छात्रवृति रुक गई तो वह खर्चा वहन नहीं कर पा रहा था। उसका खर्च इस छात्रवृति से ही चलता था। वह घर में पैसा भेजता था। एक मित्र से उसने पैसे उधार भी लिए थे। आत्माहत्या चुनना उसका अंतिम रास्ता हो गया था। लगातार बढ़ते आर्थिक -मानसिक दबाव के कारण उसने यह रास्ता चुना। रोहित समेत बाकी छात्र काफी समय से धरना-प्रदर्शन कर रहे थे। उन्हें विश्विविद्यालय या सरकार की ओर से कोई समाधान नहीं मिलता दिख रहा था। इसके लिए रोहित की मौत का जिम्मेदार विश्वविद्यालय प्रशासन ही है। प्रशासन की निष्क्रियता एक प्रतिभावान छात्र पर भारी पड़ गई।

राजनीति: - विश्वविद्यालय और उच्च शैक्षणिक संस्थानों में छात्र राजनीति कोई नई बात नहीं है। यह भारत की आजादी की लड़ाई के दौरान भी होती रही हैं। महात्मा गांधी शुरू में इसके खिलाफ थे लेकिन भगत सिंह इसके पक्ष में थे आजादी के दौरान राजनीति में सभी विचारधाराओं के छात्रों ने भाग लिया। दुनियाभर के लोकतांत्रिक देशों में विश्वविद्यालय परिसरों में देशनिर्माण, देश की दिशा को लेकर, वैचारिक सवालों को लेकर आंदोलन होते रहे हैं। देश में लोकतंत्र बहाली को लेकर, शिक्षा के लोकतांत्रिकीकरण को लेकर आंदोलन होते रहे हैं। लोकतंत्र बहाली को लेकर चले जयप्रकाश आंदोलन में भाग लेने वालों में विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों के छात्रों की बड़ी संख्या थी। ये कहना कि विश्वविद्यालय में राजनीति उचित नहीं हैं। गलत हैं।

देश के सामने चुनौतियों, सामाजिक चुनौतियों और अलग-अलग विचारों पर बहस होती रहती है। इससे ही विद्यार्थियों का लोकतांत्रिकरण और राजनीतिकरण होता है। 18 साल में वोट देने का अधिकार प्राप्त है तो वह कैंपस में भी राजनीति कर सकता है और विचारों की लड़ाई पढ़े-लिखे लोगों के बीच कैंपस में नहीं होगी तो कहां होगी। इसमें कई बुराइयां ही सत्तर के दशक के बाद आ गई लेकिन इसके लिए सरकार, राजनीतिक पार्टियां और विश्वविद्यालय प्रशासन जिम्मेदार हैं। राजनीति दलों ने कई परिसरों में वैचारिक लड़ाई को धनबल और बाहुबल में बदल दिया हैं। यही हमारी राजनीति में हो रहा है। इसका जवाब भी राजनीति में ही आ सकता है। तानाशाही से नहीं कई ऐसे विश्वविद्यालय हैं जहां राजनीति भी होती है और पढ़ाई का स्तर भी अच्छा है। दूसरी तरफ कई ऐसे विश्वविद्यालय हैं जो किसी समय में बहुत अच्छे थे और आज वहां छात्रसंघ चुनाव नहीं होते है लेकिन वहां पढ़ाई का स्तर बहुत खराब है।

राजनीतिक दल एक तरफ तो कहते हैं कि विश्वविद्यालयों में राजनीति नहीं होनी चाहिए जबकि इन्हीं राजनीतिक दलों के छात्र संगठन वहां राजनीति करते हैं। देश में कई बड़े राजनेता विश्वविलयों के परिसरों से निकले हैंं। इसलिए इन पर रोक लगाना उचित नहीं हैं। इसमें सुधार किया जा सकता हैं जिससे आपराधिक तत्वों से छूटकारा पाया जा सके।

वेमूला की आत्महत्या को लेकर राजनीति का गरमाना अस्वाभाविक नहीं है। विपक्षी दल भाजपा एवं उसके सहयोगी संगठनों को दलित-विरोधी बताने का यह मौका अपने हाथ से नहीं जाने देगे, लेकिन यह इस मामले का मूल बिन्दू नहीं है। दरअसल, सत्तापक्ष इंसाफ सुनिश्चित करने प्रभावी कदम उठाए, तो वह ऐसे आरोपों को निराधार सिद्ध करने की बेहतर स्थिति में होगा।

ध्यान: - विश्वविद्यालय की स्थिति इसलिए खराब नहीं है कि वहां छात्र राजनीति होती है बल्कि इसलिए खराब है है कि वहां सुविधाओं का अभाव हैं। उच्च शिक्षा में जितना पैसा सरकार को खर्च करना चाहिए था वो सरकार ने किया नहीं। अच्छे शिक्षक नहीं है। शिक्षकों की भर्ती में भेदभाव किया जाता है। पुस्तकालय और प्रयोगशाला की स्थिति दयनीय है। सरकार से मिलने वाला पैस वेतन में चला जाता है। सरकार इस ओर ध्यान देती नहीं हैं। सरकार ने उच्च शिक्षा में पैसा लगाना बहुत कम कर दिया है। यह जो मूल मुद्दा है इसमें ध्यान देने के बजाय सरकार राजनीति के मुद्दे को हवा दे रही है जिससे कि लोगों का ध्यान इस ओर जाए ही नहीं और कोई इस मुद्दे पर सवाल न करे।

मानवता: - के लिए सबसे दुखद स्थिति जब होती है जब कोई युवा खुदखुशी करता है। यह हादसा खास तौर पर तब हदय विदारक होता है जब वह युवा शिक्षित, बृद्धिमान, संवदेनशील हो अपनी क्षमताएं दिखा रहा हो, लेकिन उसे लगता है कि उसके लिए कोई और विकल्प नहीं है। यही तो हुआ जब हैदराबाद विश्वविद्यालय के 25 साल के शौध छात्र रोहित वेमुला ने मर्मस्पर्शी पत्र लिखने के बाद खुदखुशी कर ली। आत्मघाती व्यवहार के एक हिस्से को व्यक्ति के विशिष्ट व्यक्तित्व और मानसिक गठन से जोड़ा जा सकता हैं, लेकिन इसका काफी कुछ खासतौर पर इस मामले में आसपास के वातावरण से संबंधित हो सकता है। जहां रोहित ने इपने पत्र में किसी को दोषी नहीं ठहराया हैं, लेकिन उसे बहिष्कृत किए जाने (उसे कुछ अन्य छात्रों के साथ निलंबित कर हास्टल छोड़ने को कहा गया था) हक से वंचित किए जाने (उसकी छात्रवति में देरी हुई, जिससे उसे आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा) और भेदभाव (वह दलित था) को लेकर अपनी पीड़ा व्यक्त की हैं।

जांच: - अभी जारी हैं और पूरी कहानी हमें मालूम नहीं हैं। घटनाओं की एक श्रृंखला दिखाई देती हैं, जिसकी परिणाम आत्मघात में हुई है। रोहित छात्र राजनीति में सक्रिय था। ऐसा लगता है वह याकूब मेमन की फांसी के विरोध में हुए प्रदर्शन में शामिल था, तब उसका भाजपा समर्थित अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) से झगड़ा हुआ था। ऐसी घटनाएं ठीक तो नहीं होती है लेकिन वे भारतीयों विश्वविद्यालय में असामान्य नहीं हैं। इसके बाद स्थानीय सांसद और केंद्रीय श्रम मंत्री बंडारू दत्तत्रेय ने केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी को पत्र लिखा और आरोप लगाया कि यूनिवर्सिटी जातिवदी, अतिवादी और राष्ट्रविरोधी राजनीति का अड्‌डा हो गई हैं। इस पर मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने यूनिवर्सिटी कुलपति को पत्र लिखकर जवाब मांगा कि उसने इस बारे में क्या कार्यवाई कि हैं परिणामस्परूप रोहित सहित पांच छात्रों का निलंबित कर छात्रावास से वंचित कर दिया गया। छात्रों ने विरोध स्वरूप विश्वविद्यालय के समाने एक तंबू बनाकर उसमें पनाह ली। कुछ दिनों बाद दुर्भाग्य से राहुल ने खुदखुशी कर ली। विश्वद्यािलय ने दावा किया है कि छात्रवति में देरी प्रशासनिक कारणों से हुई है इसके पीछे बदला लेने का कोई इरादा नहीं था। क्या यही वह राजनीतिक संदर्भ हैं, जिसकी के कारण केंद्रीय मंत्री व मानव संसाधन विकास मंत्रालय से तत्काल हस्तेक्षेप चाहा, जिसने बदले में विश्वविद्यालय को बार-बार स्मरण पत्र भेजकर जानकारी मांगी? और इस वीआईपी प्रेशर ने विश्वद्यािलय के कुलपति और कार्यपरिषद को पूर्व लिए निर्णय के उलट जाकर निलंबन का फैसला लेने पर मजबूर किया? और क्या यहां पर संस्थागत भेदभाव की गंध आती है। इसी प्रकार रोहित की मौत से उठे अन्य प्रश्नों का उत्तर तो स्वतंत्र, निष्पक्ष और तटस्थ जांच से ही मिल सकता हैं। बंडारू और कुलपति तथा कुछ अन्य लोगों पर अनुसूचित जाति एवं जनजाति (उत्पीड़न निरोधक) कानून के तहत मुकदमा दर्ज हुआ है। अब एक मात्र उचित रास्ता यह है कि उस पूरी पृष्ठभूमि की निष्पक्षता से विश्वसनीय जांच हो, जिस कारण एक शौध छात्र को खुदखुशी करनी पड़ी। दोषियों को बख्शा नहीं जाना चाहिए।

अग्रेंजी के युवा उपन्यासकार चेतन भगत के अनुसार ज्यादा ुदखद स्थिति क्या है, एक युवा का आत्मघात या अपने वोट बैंक के तुष्टीकरण के लिए नेताओं का वहां जमा होना? । रोहित के पत्र में कहा गया है कि आर्थिक कठिनाइयां आत्मघात के पीछे सबसे बड़ा कारण है। रोहित की दलीत पहचान और परिसर में ऐसे छात्रों के साथ भेदभाव की है। यह निंदनीय होने के साथ-साथ एक ऐसी व्यवस्था की दुर्भाग्यपूर्ण वास्तविकता है। जिसमें पहचान को ज्यादा अहमियत दी जाती हैं। यदि हमारे यहां जाति आधारित आरक्षण न हा तो परिसर में जाति की इतनी प्रासंगिता नहीं हेगी। अर्थात इस प्रकार यह मुद्दा नहीं रहेगा।

आरक्षण: - देर्भाग्य से आरक्षण जो लोगों में समानता का लाने की योजना है, वही प्रत्येक विश्वविद्यालय परिसर में भेदभाव का सबसे बड़ा का कारण बन गया है। यदि हम जाति की बजाय आर्थिक पिछड़ेपन को आरक्षण का मानदंड बनाएं तो हम जाति के साथ जुड़े कलंक से मुक्ति पा सकते हैं। निश्चय ही रोहित की मौत से जातिगत पहचान और छात्र राजनीति के बीच विचलित करने वाला संबंध उजागर हुआ है। रोहित की फेसबुक पोस्ट पर सरसरी नजर डालने पर एक ऐसी विचार प्रणाली उजागर होती है जो मुख्यधारा के राजनीतिक एजेंंड के भीषण विरोष से ओत प्रोत है आंबेडकर स्टूडेंस ऐसासिएशन (एएसए) के सदस्या रोहित और उनके सहयोगी हिंदूत्व विचारधारा का तिरस्कार करते थे, विवेकानंद की शिक्षाओं को खारिज करते थे, वामपंथी नेताओं पर दोहरे मानंदडों का आरोप लगाते थे और भाजपा व कांग्रेस को उच्चवर्गीय ब्राह्यणवादी अत्याचारी मानते थे। उन्होंने याकूब मेंमन को फांसी देने का विरोध किया, जो इस वैश्विक दृष्टिकोण से मिलता था, जिसमें मौत की सजा को शासक वर्ग के प्रभुत्व को बढ़ावा देने के रूप में देखा जाता है। वे ऐसे विरोधी हैं, जो धर्मनिष्ठा को वैसी चुनौती दे रहे हैं, जैसी आंबेडकर ने जातिगत ऊंच नीच को बरसों पहले दी थी। हैदराबाद विश्वद्यािलय में पिछले दशक में आठ दलित छात्रों ने आत्महत्या की है, जो शायद शिक्षा परिसरों में बढ़ते सामाजिक विभाजन का स्पष्ट उदाहरण है। पुलिस अगर रोहित के समर्थक छात्रों की शिकायत पर बंडारू दत्तत्रेय एवं कुलपति के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने आनाकानी करती है तो ऐसी भावनाओं को और बल मिलता है।

जाति: -उच्च शिक्षा के अनेक नामी संस्थानों में दलित छात्रों के साथ भेदभाव की धारणा पुरानी है। इन छात्रों को उनकी गलती के अनुपात में अत्यधिक कठोर दंड देने की शिकायतें भी आती रही हैं। दलित छात्रों का इल्जाम है कि उनके संगठित होने और अपना अधिकार जताने को भेदभाव की सदियों पुरानी मानसिकता से ग्रस्त लोग आज भी स्वीकार नहीं कर पाते।

पत्र: - मर्मस्पर्शी आत्महत्या पत्र में रोहित कहता हैं, ’मेरी अंत्येष्टि शांति से होने दीजिए। ऐसा व्यवहार करें कि जैसे मैं अभी आया था और फिर चला गया। मेरे लिए आंसू न बहाएं। जान लें कि मैं जिंदा रहने की बजाय मरकर खुश हूं।’ अब सबके दिलों व दिमाग में खास तौर वोटों के लिए राजनीतिक संघर्षों में रोहित की मौत की आवाज गुजेंगी।

उपसंहार: -रोहित की समय से पहले मौत को सच्ची श्रद्धांजलि तो यह होगी कि हम इससे सही सबक लें। हम जिस तरह से विश्वविद्यालय चलाते हैं, उसमें हमें बदलाव लानें की आवश्यकता है। हमें विश्वविद्यालयों को जाति और राजनीति से मुक्त करना चाहिए। इसे जितनी जल्दी हो सके अंजाम दें ताकि हम भविष्य में ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं होने से रोक सकें।

- Published on: February 18, 2016