आतंकवाद (Terrorism Essay in Hindi) [ Current Affairs - International Relations ]

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प्रस्तावना:- एक के बाद आंतकी घटनाएं यह बताने के लिए काफी हैं कि पड़ोसी देश पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब देने के बजाए हम अभी भी पाक को नसीहत भरी बातें ही कह रहे हैं। पंपोर में सीआरपीएफ के काफिले पर हुए हमले के बाद केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह से लेकर जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती तक ने इस घटना की निंदा की है। ऐसी हर वारदात के बाद ऐसा लगता है कि अब तो सरकार ने पाकिस्तान को सबक सिखाने की ठान ही ली हैं। पर हकीकत इससे उलट नजर आती है। हैरत की बात यह है कि पठानकोट हमले की जांच के लिए पाक दल का हम स्वागत करते हैं और वही पाकिस्तान हमारी जाचं दल को पाक आने से इंकार कर देता है। भले हम पाक से बात करें या न करें पर आतंकी हमले नहीं रुकते है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि अाखर हम कब तक अपने जवानों को यूं शहीद होते देखते रहेंगे?

हमला:-

25 जून 2016 को सीआरपीएफ के 40 जवान ऐ फाइरिंग अभ्यास के बाद श्रीनगर लौट रहे थे। पंपोर में जवानों की बस पर दो आतंकियों ने अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। इसमें आठ जवान शहीद हुए और 22 जवान घायल हो गए। पंपोर में सुरक्षाबलों पर हुआ हमला 2013 के बाद बड़ा हमला था। श्रीनगर में जून माह की ही 24 तारीख को हमला हुआ था और तब भी हमारे 8 जवान शहीद हुए थे।

पाकिस्तान:-

अब पाकिस्तान से आने वाले आतंककारियों की तादाद भले ही कम हुई है पर हमले की ताकत बढ़ गई है। पहले के मुकाबले ज्यादा प्रशिक्षित आतंककारी आ रहे हैं। वे ज्यादा बड़े हथियार और बारूद लाते हैं। सैन्यबलों से लड़ने में सक्षम होते हैं। पहले सीमा पार से हमारे खिलाफ ’प्रॉक्सी वॉर’ (प्रतिनिधि युद्ध) हो रही थी और अब वे सीधी लड़ाई लड़ रहे हैं। पाकिस्तानी चाहते हैं कि कश्मीर का मुद्दा जीवित रखा जाए। वहां उग्रवाद का स्वरूप बनाए रखा जाए। हमें सेन्य तैनाती बराबर बनाए रखनी होगी। सीआरपीएफ को कश्मीर जैसी जगह संभालने के लिए अधिक प्रशिक्षिण की जरूरत होती हैं।

पीओके:-

पीओके के आसपास इलाकों में लश्कर-ए-तैयबा और हिज़बुल मुजाहिदीन की आतंकी प्रशिक्षण गतिविधियां बढ़ गई हैं। हमारी ओर से भी पहले के मुकाबले सख्ती हुई है, इससे हमले करने वाले कमजोर रहते हैं। दो-चार आत्मघाती आतंकी ज्यादा से ज्यादा नुकसान पहुंचाने के इरादे से आते हैं लेकिन पंपोर हमले से भी स्पष्ट हो गया है कि उनकी क्षमता बढ़ी है। इसलिए हमें ओर ज्यादा चौकस रहना होगा। इन आतंककारियों को अलगाववादियों से स्थानीय मदद भी मिलती है। पहले ये आतंककारी छिपकर हमले करके भाग जाते थे अब तो ये आमने-सामने खड़े होकर हमारे सैन्यबलों से लड़ रहे हैं।

तरीका:-

  • भारत में पाकिस्तानी उच्चायुक्त कहते हैं कि हमें एक शांतिपूर्ण समाधान की जरूरत है। अब हमारे जवानों पर हमला करके हम कैसे शांति की बात कर सकते हैंं? फिर वे कहते हैं कि हमले पाकिस्तान नहीं करा रहा है। हमारी दिक्कत यह है कि हम निशाना किसे बनाएं? आतंककारियों को तो हम मार देते हैं पर उनका आना जारी रहता है। पर पाकिस्तान में हम किसे पकड़ें? वहां सरकार सेना और आईएसआई की मर्जी के खिलाफ चल नहीं सकती है। पाकिस्तान में व्यापार करना दुनिया के मुश्किल कार्यो में से एक है। वहां भले एक सरकार है पर चेहरे अलग-अलग हैं, जो पाकिस्तान को चला रहे हैं।
  • हमारी विदेशी नीति को हमने भले ही सख्त किया है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, जरूरत पड़ने पर टेबल पर बात भी होगी पर सीमा पर जवाब भी दिया जाएगा। पर सवाल है कि जब हमले होते रहेंगे तो बात करने का मतलब भी क्या हैं? पाक की हकीकत दुनिया के सामने है। अमरीका ने उसे सम्मान देना कम किया तो वह अब चीन से दोस्ती कर बैठा है। हमने उससे निपटने के सारे रास्ते अपना लिए हैं। अब दुनिया हमें गतिरोध के लिए जिम्मेदार नहीं ठकरा सकती है। हमें अपने सीमा पर ज्यादा चौकस रहना चाहिए। एलओसी को हमने मजबूत किया है। पर सीमा इतनी लंबी है कि उसे ’फुल प्रुफ’(पूरा प्रमाण) बनाना संभव नहीं हैं। इसलिए जरूरत सावधानी और मुंहतोड़ जवाब की है।

खामियां:-

सवाल हमारे सुरक्षाबलों की खामियों संबंधी भी उठाए जा रहे हैं। रक्षा मंत्री ने स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसिजर (एसओपी) ने अपनाने की बात कही है। पंपोर में जवानों की बस के पास कोई एस्कॉर्ट नहीं था। न ही ’रोड ओपनिंग पार्टी’ चल रही थी, जो कि हाईवे को सुरक्षित करके चलती है। बस पर हमला करने वाले आतंकियों के पास एके-47 और हैंड ग्रेनेड थे।

लोकल मिलिटेंसी (स्थानीय लड़ाकूपन):-

हमले के बाद लोकल मिलिटेंसी की भी चर्चा जोरों पर हैं। 2007 से कश्मीर में स्थानीय मिलिटेंसी का नाम किसी भी घटना में नहीं आया हैं। नौ साल में पहली बार ऐसा हुआ है।

नापाक इरादेे:-ये पिछले दो साल की प्रमुख आतंकी घटनाएं हैं जिन्हें सीमा पार से आतंककारियों ने अंजाम दिया है। प्रस्तुत घटनाएं निम्न हैं-

  • 03 जून 2016- श्रीनगर-जम्मू राष्ट्रीय राजमार्ग पर बिजबहेड़ा के निकट आतंकवादियों ने सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के काफिले पर घात लगाकर हमला बोल दिया, जिसमें तीन जवान शहीद हो गए और चार गंभीर रूप से घायल हो गए।
  • 23 मई 2016- श्रीनगर के जादीबल इलाके में आतंकियों ने एक घंटे के भीतर पुलिस दल पर ताबड़तोड़ फायरिंग की। हमले में हमारे 3 जवान शहीद हो गए। टेंगपुरा में आतंकियों ने पुलिस वाहन को निशाना बनाया।
  • अगस्त 2015- पाकिस्तानी आतंककारियों ने उधमपुर में सीमा सुरक्षा बल के काफिले पर हमला किया। बीएसएफ के दो कॉस्टेबल को जान गंवानी पड़ी।
  • 27 जुलाई, 2015- गुरदासपुर में दीनानगर पुलिस स्टेशन (स्थान) पर तीन आतंककारियों ने फायरिंग की। तीनों आतंकी ढेर हुए। हमारे 4 पुलिसकर्मी भी शहीद हुए।
  • 20 मार्च 2015- कठुआ पुलिस थाने पर सेना की वर्दी में पाक फिदायीन आतंकियों का हमला हुआ हैं। इससे पहले 27 जनवरी को त्राल में मुठभेड़ भारतीय सेना के सीओ समेत चार सुरक्षाकर्मी शहीद हुए व 2 आतंकी ढेर हुए।
  • 5 जनवरी 2015- शॉपिया में सेना ने मुठभेड़ में जैश कमांडर अबू तोइबा समेत 5 पाक आतंकी मार गिराए।
  • 03 जनवरी 2016- पठानकोट में एयरफोर्स (हवाईसेना) बेस को आतंकियों ने निशाना बनाया। हमारें सात जवान शहीद और 17 घायल हो गए।

विचार निम्न हैं-

हम यह सुनिश्चित करते हैं कि हमारी ओर से पहली गोली न ही चलाई जाएगी। पर पाकिस्तान गोली चलाता है तो फिर हमारी ओर से गोलियों की कोई गिनती नहीं होगी।

राजनाथ सिंह, केन्द्रीय गृहमंत्री

पिछले एक महीने में सीमापार से घुसपैठ कर रहे 25-30 आतंककारियों को जवानों ने मार गिराया है। अब उनके हाथ हमलों को अंजाम देने के अवसर कम हो गए हैं।

मनोहर पर्रिकर, रक्षामंत्री

आतंकी गतिविधियों से कुछ भी हासिल न ही हो सकता हैं। सिर्फ कश्मीर बदनाम हो रहा है। सीआरपीएफ जवानों पर हमला शर्मनाक हैं। रमजान के पाके महीने में भी ऐसी वारदात हो रही हैं।

महबूबा मुफ्ती, जम्मू-कश्मीर

भारत:-पिछले वर्ष दुनिया के 92 देशों में आतंकी घटनाएं हुई, जिनमें भारत और पाकिस्तान भी शामिल हैं। चौंकाने वाली बात यह हैं कि पूरे दुनिया में आतंकवाद की कुल वारदातों में 55 फीसदी भारत, पाकिस्तान, इराक, अफगानिस्तान और नाइजीरिया में हुई है। यह बात अमरीका की मैरीलैंड विश्वविद्यालय में आंकड़ो के विश्लेषण से सामने आई है। हालांकि 2014 के मुकाबले 2015 में आतंकी घटनाओं में 13 फीसदी की कमी आई हैं।

गृह राज्य मंत्री दव्ारा संसद में दी गई जानकारी के अनुसार निम्न हैं-

Table showing the number of soldiers killed in Kashmir in years

According to the number of soldiers killed in Kashmir in years

कश्मीर में शहीद हुए सालों के अनुसार जवानों की संख्या

साल

संख्या

2012

30

2013

68

2014

53

2015

54

नवंबर तक

कारण:- आतंकवादियों के नापक मंसूबों को कामयाबी दो कारणों से ही मिल सकती हैं-

  • एक तो यह कि उसे हमारे बारे में पूरी जानकारी हो।
  • दूसरी बात यह कि आतंकियों के स्थानीय मददगार हों।

सीमा पार से आ रहे आतंकियों की कारगुजारियों में ये दो कारण साफ तौर से काम कर रहे हैं। ऐसा नहीं है कि सीमा पार से आतंकियों की घुसपैठ कोई पहली बार हुई है। फर्क इतना आ गया है कि पहले आतंकी अपने साथ हथियार और गोला बारूद तक लेकर आते थे। अब ये जयादातर भारतीय सेना की वर्दी में अथवा सामान्य नागरिक के रूप में हमारी सीमा में दाखिल होते हैं। इससे इन पर एकाएक किसी को शक भी नहीं होता हैं। पिछले सालों में हमारे जवानों ने आतंकियों को मुठभेड़ में मार भी गिराया है लेकिन जब ये हमारे जवानों पर घात लगाकर हमला करने में सफल हो जाते हैं तो सबसे बड़ा सवाल हमारे खुफिया तंत्र पर ही उठना स्वाभाविक है। सवाल यह है कि आतंकियों को यह कैसे जानकारी मिल जाती हे कि हमारे जवानों का मूवमेंट (हरकत) कब और कहां होने वाला है। निहत्थे दाखिल होने वाले इन आतंकियों को हथियार आखिर कौन देता है। जाहिर है कि हमारे घर में ही भेदिए छिपे हैं जो न केवल इनको खुफिया सूचनाएं देते हैं बल्कि गोला-बारुद तक उपलब्ध कराते हैं। ताजा हमलों में तो सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि हमारे यहां अमरनाथ यात्रा की तैयारियां चल रही है। जाहिर है ऐसे में सतर्कता तो और अधिक ही बरती जानी चाहिए थी।

मदद:-

हमारी सीमा पर जो जवान तैनात रहते हैं वे निश्चित समय के बाद दूसरी जगह पदस्थापित हो जाते हैं। हम अपनी सीमाओं पर अपने पूर्व सैनिकों को घर व बंकर बना कर दे सकते हैं। इसके लिए जरूरी है कि सीमा से सटे इलाके को ’लव फॉर लैंड’ के रूप में विकसित किया जाए। अर्थात पूर्व सैनिकों को यहां खेती के लिए जमीनी भी उपलब्ध कराई जाए। पूर्व सैनिको को इस तरह जोड़कर सीमाओं की रक्षा की जिम्मदारी दी जा सकती है। इससे एक ओर हमारे देश की सीमाओं से सटी बंजर भूमि पर हरियाली नजर आ सकेगी और राष्ट्रभक्त सैनिकों को माटी की सुरक्षा के काम में लिया जा सकेगा। हम अपने इसी तरह से अपने पूर्व सैनिकों को सीमाओं पर तैनाती दे रखी है।

कार्यवाही:-

किसी भी देश का इतिहास उठाकर देख लो, वही देश आगे बढ़ हैं जहां के नेताओं ने निजी और दल हित से ऊपर उठकर जनहित में फेसले किए हैं। और विषय से हटकर कुछ किया। परंपरागत रास्ते पर चलकर कोई नेता मजबूत देश नहीं बन सका हैं। इसलिए देश में हमला होने से उसकी निंदा के लिए प्रचार नहीं करना चाहिए बल्कि तुरंत कार्यवाही करनी चाहिए।

देश का हर आदमी भी यही मानता है कि प्रचार के लिए अलग-अलग हंथकंडे अपनाने से कुछ नहीं होने वाला है। राजनीतिक फायदे के लिए ऐसे हथकंडे सनसनी तो पैदा कर सकते हैं लेकिन इससे नुकसान देश और देशवासियों को ही उठाना पड़ता है।

लाचार:-

यह दुर्भाग्यजनक है कि सेना को छोटी-मोटी बातों के लिए राजनेताओं और नौकरशाहों की ओर देखना होता हैं। 1985 से 2001 के बीच दो बार घाटी में तैनात रहा हूं। मुझे याद है कि एक बार पाक सेना दव्ारा हमारी चौंको पर कब्जा कर निर्माण कार्य कराने की पुख्ता सूचना के बावजूद हमें राजनीतिक दबाव में कार्रवाई करने से रोक दिया गया था। आज भी हालात हम देख रहे है। जहां आतंकी गतिविधयां चल रहीं हैं वहां देश विरोधी माहौल को रोकने के प्रयास नहीं होते हैं। भारत विरोधी नारे व दुष्प्रचार वहां आम है। ऐसे में आतंकियों के मददगारों की पहचान क्यों नहीं हो पाती? हमारे नेता भी हर आतंकवादी घटना के बाद पड़ौसी देश को चेतावनी देते बयान तो देते नजर आते हैं लेकिन ऐसी हरकतों का ठोस जवाब देने में हिचकिचाते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि हमारे जवानों से ज्यादा आधुनिक हथियार आतंकियों के पास हैं जो एक चक्कर में 50-100 गोलियां दाग सकते हैं। सेना को जब तक व्यापक अधिकार नहीं सौंपे जाएंगे तब तक घुसपैठ के दूसरे रास्ते तलाशने वाले आतंकियों की रोकथाम आसान नहीं होगी। हमारे जवानों की जिस तरह से शहदत हो रही है वह चिंताजनक है।

कौशल मिश्र, सेवानिवृत कर्नल

कमजोर:-

पंपारे में आतंककारियों का हमला हो या उरी में, या इससे पहले पठानकोट पर हमारे एयरबेस (हवाई स्थान) पर। सबकी तह में जाए तो यह बात साफ होती है कि सीमा पार से हमारे यहां घुसपैठ सुनियोजित तरीके से की जा रही है। जानबूझ कर सेना के जवानों को निशाना बनाया जा रहा हैं ताकि उसका मनोबल कमजोर किया जा सके। बड़ी चिंता का विषय यह हैं कि हमारे यहां सेना को आतंकियों से निपटने के लिए भी राजनेताओं और नौकरशाहों के आदेशों का इंतजार करना होता है। इस बीच आतंकी बड़ी वारदात के अपने नापाक मंसबो में कामयाब हो जाते हैं। जो नहीं होने चाहिए।

उपसंहार:-हमलों से निपटने के लिए हमारी सेनाओं को आदेशों के इंतजार से छुटकारा मिलना चाहिए जिससे वे हमला करने वालें हर आंतकी को ढेर करके देश की सुरक्षा कर सकें।

- Published on: August 17, 2016