रमजान माह में आंतकी घटनाएं (Terrorist Incidents in the Month of Ramadan) [ Current Affairs ]

()

प्रस्तावना:- धर्म के नाम पर आतंक व हिंसा की बढ़ती घटनाओं के बीच यह बात सामने आती हैं कि गुनाहगार का कोई मजहब नहीं होता हैं। इस्लाम समेत दुनिया के सभी धर्मो में आंतकवाद का कोई स्थान नहीं हैं। पिछले सालों में हुई आतंकी घटनाओं में यह बात सामने आई कि रमजान के पवित्र महीने में भी आतंकी बेगुनाहों की हत्या करने में नहीं चूके। भले ही धर्म के नाम पर आतंक फेलाने वालों की संख्या गिनती की हो लेकिन अपने आक्रात्मक तेवरों से ये दुनिया में खौफ का माहौल बनाए हुए हैं। एक ओर जहां दुनिया तरक्की की नई राहें तलाशने में जुटी हैं, ही दूसरी ओर ’धर्म युद्ध’ के नाम पर दहशतगर्द आतंक की खौफनाक इबारत लिखने में लगे हैं। आतंकवाद का यह चेहरा मजहब के नाम पर क्यों पनपता जा रहा हैं? कौन है इसके लिए जिम्मेदार और कैसे इनके इरादों को समाप्त किया जाए?

ढाका हमला:-

पाकिस्तान भले ही लाख मना करे पर ढाका में हुए हमले के पीछे पाकिस्तानी खुफियां कार्यकर्ता का हाथ नहीं था लेकिन दुनिया अब मानने वाली नहीं हैं। क्योंकि आतंकवाद को खुलकर समर्थन देने के मामले में पाकिस्तान एक बार नहीं अनेक बार बेपर्दा हो चुका हैं। भारत के खिलाफ आतंकवाद को हवा देने वाला पाकिस्तान आज स्वयं इस आतंक का शिकार है लेकिन वह इस बात को न समझने को तैयार है और संभलने को। ढाका में हमले के पीछे बेशक बांग्लादेश के स्थानीय आतंककारी संगठन का हाथ होने के प्रमाण मिले हो लेकिन इसके पीेछे पाक खूफिया कार्यकर्ता आईएसआई का हाथ होने से इनकार नहीं किया जा सकता है। बांग्लादेश के सूचना मंत्री हसनुल हम ने तो खुलकर पाकिस्तान के हाथ होने की बात कही हैं बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना के भारत के साथ मधुर संबंध होने की बात पाकिस्तान स्वीकार नहीं कर पा रहा हैं। बांग्लादेश में मौजूद आतंकवादी संगठनों की मदद करने को लेकर पाकिस्तान के साथ शेख हसीना का पहले भी टकराव हो चुका हैं।

भौगोलिक सीमा:-

आतंकी ने आज भौगोलिक सीमा को तोड़ दिया है। एशिया, इराक-सीरिया के अलावा हमले अब अमरीका, फ्रांस और ब्रिटेन में भी होने लगे हैं। आतंकवाद एक बड़े व्यवसाय में परिवर्तित होता जा रहा हैं। जितने हथियार गोला बारूद युद्ध में काम नहीं आते उतने आतंकी हमलों में काम आते हैं। दुनिया के सामने आज सबसे बड़ी आवश्यकता आतंकवाद को पनाह देने वालों देशों की हैं। उन्हें पहचान कर उन्हें जड़ से उखाड़ फेंकने की है। अन्यथा आतंकवाद एक दिन पूरी दुनिया को ऐसे चपेट में ले लेगा कि तब इससे चाहकर भी बाहर नहीं निकला जा सकेगा।

मजहब:-

  • मजहब कोई भी हो, किसी बेगुनाह की जान लेने की बात कभी नहीं कराता। ऐसा कृत्य किसी भी धर्म-समुदाय से जुड़े लोग करें उनकी कड़े शब्दों में भर्त्सना ही की जानी चाहिए। इस्लाम को मानने वाले और वह भी रमजान के पवित्र माह में कत्ले आम करें तो वह घोर निदां के योग्य हैं। कुरान की एक आयत में साफ कहा गया है। ’बेगुनाह इंसान को मारना पूरी इंसानियत को मारने के बराबर हैं। वहीं किसी बेगुनाह की जान बचाना समूची इंसानियत को बचाने के बराबर है।’
  • कुरान की एक अन्य आयत में सारे मुसलमानों से ताकीद की गई है। ’आप दूसरे के खुदाओं को बुरा मत कहो’ उनसे कह दो तुम्हारे लिए तुम्हारा मजहब है और मेरे लिए मेरा मजहब। कोई जबरर्दस्ती नहीं है। सवाल यही उठता है कि खुद को जिहादी बताने वाले आतंकी रमजान के पवित्र माह में भी इंसानों को मारने का नापाक काम करते हैं। लेकिन अगर इनमें इंसानियत होती तो यें लोग आंतक वाला काम ही क्यों करते?
  • जब भी धर्म की बात आती है तो कोई भी धर्म छोटा-बड़ा या सच्चा-झूठा नहीं होता हैं। कुरान में यह भी लिखा हैं कि अल्लाह ने एक लाख 24 हजार पैगम्बर, लोगों को हिदायत देने के लिए इस धरती पर भेजे हैं। उनके बताए रास्ते पर चलना या न चलना तुम्हारा काम हैं। यह कायनात बहुत बड़ी हैं।

प्रकरण:-

बांग्लादेश की राजधानी ढाका में जिस रेस्टोंरेंट में भारतीय लड़की तारिषी जैन की आतंकियों के हाथों जान गंवानी पड़ी, उस हादसे में इंसानियत से जुड़े इन पहलुओं का खुलासा होता हैं तारिषी जैन के साथियों में उस समय एक मुस्लिम युवक फाराज अय्याज होसेन भी था। उसने सिर्फ मुसलमान होने के आधार पर आतंकियों दव्ारा छोड़े जाने की पेशकश को मंजूर नहीं किया। तारिषी समेत अपने दूसरे गैर मुसलमान साथियों को नहीं छोड़ने पर अय्याज ने भी जान गंवाना मंजुर किया और अंतत: आतकियों ने उसे भी रेत दिया। यहां दोनों तरह के लोग थे। एक वे जो धर्म के नाम पर हिंसा फेलाने पर उतारू थे और दूसरे वो जिन्होंने धर्म के आधार पर दूसरे साथियों का साथ छोड़ना मंजूर नहीं किया।

हिंसा:-

आतंकी घटनाओं को केवल मुसलमान ही अंजाम दे रहे हैं, ऐसा नहीं है। जिन लोगों ने पहले अपने परिजनों के साथ व तबाही का मंजर देखा है वे भी मौका मिलने पर बदले के भाव से हथियार उठा रहे हैं। अमरीका ने अफगानिस्तान, सीरिया व लीबिया में जो कुछ किया वह सबकों पता हैं। इराक के सुन्नी मुसलमानों को जब इराक से उखाड़ दिया गया, उनकी सेना में नहीं लिया गया तो बेराजगार युवकों ने बाहर आकर हाथों में बंदूकें थाम लीं। सीरिया में सुन्नियों को हथियार कहां से उपलब्ध कराए गए, यह पता नहीं। हम आईएस के बढ़ते संपर्क की बात तो करते हैं लेकिन सवाल यह भी उठाया जाना चाहिए कि आखिर इनके कब्जे में आए तेल के कुओं को कौन खरीद रहा है। सुनने में तो यह भी आता है कि विश्व बाजार में टर्की के माध्यम से तेल बेचा जा रहा है। सवाल इस्लाम का नहीं बल्कि इस बात का है कि वे ताकते कौनसी हैं जो धर्म के नाम पर युवाओं को गुमराह कर रही हैं। मुस्लिम समुदाय में गुमराह लोग तो गिनती के होंगे पर हम देख रहे हैं कि हर आतंकी घटनाओं के पीछे वे लोग हैं जो धर्म के नाम पर इस्लाम बदनाम करने में लगे हैं। आखिर कट्‌टरता के नाम पर हिंसा फेलाने वालों से कैसे निपटा जाए? और, उनका क्या करें जो ऐसी हरकतों को प्रश्रय देनें में लगे हैं?

मानवता:- हिंसा की ऐसी घटनाओं से निपटने के लिए जरूरी है कि किसी एक मजहब को दोष देने के बजाय हालात बदलने की कोशिश करें। धर्म के आधार पर भेदभाव करने वाली शिक्षा प्रणाली में भी बदलाव किया जाए। विश्व समुदाय में ऐसा माहौल बनाना होगा जो इंसानी हक का समर्थन करें। कट्‌टरपंथियों में किसी एक को खत्म करेंगे तो दूसरे पैदा होंगे। ऐसे में सबसे बड़ी जरूरत एक-दूसरे के प्रति पनपे नफरत के भाव को खत्म करने की हैं।

हमले निम्न हैं-

  • बांग्लादेश-की राजधानी ढाका के एक रेस्तरां में आतंकवादियों ने 1 जुलाई 2016 को हमला कर एक भारतीय लड़की सहित 20 विदेशियों की धारदार हथियारें से हत्या कर दी। 8 जून को एक पुजारी, 17 जून को पुस्तक प्रकाशक ही हत्या हुई।
  • पाकिस्तान- 22 जून 2016 को कराची में दिन दहाड़े सूफी गायक अमजद साबरी की हत्या कर दी गई। तालिबान के एक गुट ने साबरी की हत्या की जिम्मेदारी लेते हुए कहा कि हमने साबरी को मारा है क्योंकि वे अल्लाह विरोधी थे।
  • अफगानिस्तान:- 21 जून 2016 को अफगानिस्तान में 25 लोगों की हत्या की गई, इनमें भारत के दो नागरिक भी शामिल थे। इससे पहले 7 जून 2016 को अफगानिस्तान में एक अमरीकी पत्रकार और उसके साथ रहने वाला अनुवादक मारा गया।
  • 28 जून 2016 को इस्तांबुल हवाई अड्‌डे पर आत्मघाती हमले में 45 लोग मारे गए।
  • 8 जुन 2016 को जोर्डन में शरणार्थियों के शिविर के सुरक्षा कार्यालय में आतंकी में 6 लोग मारे गए।
  • 3 जूलाई 2016 को इराक की राजधानी बगदाद में आतंकी में सैकड़ों लोगों की मौत हुई।

रमजान के महीने में पहले इस्तांबुल एयरपोर्ट, ढाका रेस्टोंरेंट, और बगदाद में ईद की खरीददारी करते लोगों को मौत के घाट उतारा गया। यह सब आतंकवाद के ववर्चस्व की लड़ाई का एक हिस्सा भी हो सकता हैं।

ढाका के रेस्टोंरेंट पर हमले की तकलीफ को हम शब्दों में बयां नहीं कर सकते। भारत बांग्लादेश के हमारे भाइयों और बहनों के साथ मजबूती से खड़ा है। शोकसंतान परिवारों के साथ मेरी संवदेनाएं हैं।

                                                                                                       नरेंन्द मोदी, भारत प्रधामंत्री

ये कैसे मुसलमान है जो पवित्र रमजान के माह में बेगुनाहों की जान ले रहे हैं हमला करने वाले धर्म के दुश्मन हैं। ऐसे लोगों का धर्म सिर्फ हिंसा है। इस्लाम शांति का धर्म है। इस्लाम के नाम पर यह सब बंद हो।

                                                                                               शेख हसीना, प्रधामंत्री बांग्लादेश

आतंकी हमलों की संयुक्त राष्ट्र घोर निंदा करता है। साथ ही हम यह उम्मीद भी करते हैं कि आतंकी हमलों में लिप्त लोगों को जल्दी से जल्दी और सख्त से सख्त सजा मिलेगी।

                                                                                        बान की मून, महासचिव, संयुक्त राष्ट्र

इस्लाम की बुनियाद ही अमन, रहम और दूसरों का दर्द महसूस करना है। ऐसे में क्या मुसलमान चुप बैठ मजहब को बदनाम होनें देगे? वो खुद इस्लाम के सही मायने दूसरों को बताए कि जुल्म और नरसंहार इस्लाम नहीं हैं।

                                                                                                              इस्लाम खान, अभिनेता

इस्लाम:-

  • के मौलिक आधार हैं, कुरान और पैगंबर साहब की जीवनी। हम इसका बारीकी से अध्ययन करते हैं तो समझ में आता हे कि रमजान सिर्फ खुदा और बंदे के ताल्लुक का खास महीना हैं। इस पूरे महीने में मुस्लिम इबादत में व्यस्त रहते हैं। आमतौर पर 5 समय की नमाज होती है लेकिन इस महीने नमाज में बढ़ोतरी हो जाती है। पैगेम्बर के अनुसार यह महीना सब्र का महीना है। लोगों के साथ दुखों का बांटने और उनके साथ हमदर्दी व्यक्त करने का महीना है। तमाम पश्चिमी देश और भारत में भी बहुत से लोग इस्लाम को इस दृष्टि से देखते हैं कि इस्लाम लड़ाई-झगड़े वाला धर्म है।
  • हकीकत में इस्लाम कट्‌टर सोच वाला धर्म बिलकुल भी नहीं हैं। भारत के उत्तरी क्षेत्र में जब मुसलमान आए तो उनकी मस्जिदें वहां के लोगों की संस्कृति के अनुसार बनी। यदि आम मुसलमान कट्‌टर सोच का होता तो वह स्थानीय संस्कृति को नहीं अपनाता। लेकिन, देश के मुसलमानों ने भारतीयता को अपनाया। आम भारतीय मुसलमान अमन पसंद है। यह कोई नहीं कहता कि अरब की बात ही मानी जाए। यह तो समझना ही होगा कि इस्लामिक को हथियार कौन मुहैया करा रहा है? क्या उन्हें पश्चिमी देश ये सब चींजे मुहैया नहीं करा रहे।

साम्यवाद और इस्लाम:-

1917 के बाद जब दुनिया में साम्यवाद का तेजी से विस्तार हो रहा था। तब रूस सहित दुनिया के 40 से अधिक देशों में साम्यवाद पैर जमा चुका था। रूस की तो शक्ति भी तेजी से बढ़ती जा रही थी। तब इसे रोकने के उद्देश्य से अमरीका और यूरोपीय देश जो इंसानियत के अधिक पक्षधर थे उन्होंने अपने तरीके से चाल चली। तभी पहली बार दुनिया ने मुजाहिद्दीन शब्द को सुना। अमरीका ने रूस के विरुद्ध इस्लामिक कट्‌टरता का इस्तेमाल किया। इस काम में अफगान मुजाहिद्दीनों का इस्तेमाल किया गया। अमरीका ने इन्हें समर्थन देने का काम किया। इसके बाद तालिबान को चुना गया उसी दौर में ओसामा बिन लादेन को खड़ा किया गया। उसे मदद पहुंचाई जाने लगी। अलकायदा को समर्थन व सहायता मिलने से अरब में इस्लाम की गलत तरीके से व्याख्या शुरू हो गई। वहीं से कट्‌टर वादी समुह पैदा होने लगे। अरब ने इस बारे में कोई सुधार किया नहीं किया इसलिए परिणामस्वरूप अलकायदा, इस्लामिक राज्य, बोकोहराम आदि पनपने लगे।

बगदादी:-

  • दरअसल, इस्लामिक राज्य का मुखिया अबू बकर बगदादी ने शिया और सुन्नी मुसलमानों के बीच विवाद का फायदा उठाया। वह पहले यहुदी था। उसके बाद वह ईसाई बना। और फिर बेहद शातिर दिमाग से मुसलमान बन बैठा। दुनिया के 90 फीसदी सुन्नी मुसलमानों का समर्थन हासिल करने के लिए अपना नाम अबू बकर रखा। पैंगम्बर साहब ने किसी भी प्रकार आतंक के लिए नहीं कहा था पर बगदादी यही सब करता था।
  • रमजान का महीना इतना पाक माना है कि इस दौरान गैर मुस्लिम देश जो मुस्लिम देशों से सीमा पर लड़ते हैं, वे भी युद्ध नहीं करते है। यहुदी देश व इस्लाम को मानने वाला हर व्यक्ति इस दौरान धार्मिक कार्यों में लगा रहता है। आतंकी भी इस दौरान अपनी हरकतों को टालते रहें है। पर बगदादी तो रमजान में भी आंतक करता था।

मुसलमान:-

दुर्भागय की बात तो यह है कि पाकिस्तान, बांगलादेश, बगदाद, तुर्की आदि देशों में हुए नरसंहार में चंद दिनो 450 लोग मार गए है ऐसा नहीं हैं सिर्फ गैर मुस्लिम मारे गए हो साथ मुस्लिमों की संख्या भी अधिक है। इसका रमजान या खास मौके से कोई संबंध नहीं होता हैं यही कारण है कि इस आतंक के दौर लाखों मुस्लिम भी मारे गए हैं। इस्लामिक राज ने तो हत्याओं के साथ सांस्कृति धरोहरों को भी बहुत नुकसान पहुंचाया है।

अलकायदा और आईएस:-

ऐसा लगता है कि दो आंतकी संगठन अलकायदा और इस्लामिक राज्य में ववर्चस्व को लेकर लड़ाई चल रही है। अमरीका अलकायदा और उसके सहयोगी संगठनों को समर्थन देता रहा हैं। जब भी उनकी ओर से कोई वारदात होती है तो वह उस ओर से आंखे बद कर लेता हैं। दूसरी ओर चीन काश्गर से होते हुए आथिर्क गलियारा की परियोजना की सुरक्षा करता हुआ पाकिस्तान में अलकायदा के लोगों का समर्थन करता है। ऐसे में अलकायदा और इस्लामिक राज्य में ववर्चस्व को लेकर लड़ाई होनी थी। इस लड़ाई में दोनों ही अपने उद्देश्य से आमजन को परेशान करते है।

अमरीका:-

तकनीक के मामले में कई गुना आगे हैं। और उसको सब पता है कि सद्दाम हुसैन व पाकिस्तान का एबटाबाद में ओसामा बिन लादेन कहां छिपा हुआ तो उसे अभी तक यह क्यों नहीं पता लग पा रहा है कि अबुबकर कहां छिपा हैं। वह कहां से अपनी गतिविधियां संचालित कर रहा हैं। यह भी ध्यान देना होगा कि उससे तेल कौन खरीद रहा हैं? उसे हथियार कौन दे रहा है? इरादे नेक हो तो सारी बातों को पता लगाकर समस्याएं काबू में आ सकती हैं।

चुनौती:-

भारतीय मुसलमानों के चुनौती का समय है। उन्हें 1990 में, 1992 में आतंक का रास्ता दिखाकर पाकिस्तान ने बरगलाने की कोशिश की। लेकिन, वे किसी झांसे में नहीं आए। कश्मीर में भी अलगाव के लिए आतंक में उन्होंने साथ नहीं दिया। अब आईएस के प्रलोभनों से भी उन्हें बचना है। आतंक के विरुद्ध जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाते हुए विश्वास को बनाए रखना होगा। आईएस की केवल लड़ाई ही नहीं करनी होगी बल्कि उसकी आतंकी सोच को भी मिटाना होगा।

आतंक:-

जब हम आतंकवाद के बारे मे सोचते हैं तो विशिष्ट समूह पर किया सशस्त्र हमला हमारे ख्याल में आता हैं ठीक 26/11 के मुंबई हमले की तरह, जहां हमलावरों ने हर किसी को निशाना बनाया। पर विदेशी पासपोर्ट (विदेशी यात्री का पार पत्र) वाले खास निशाने बने। लेकिन 14 जुलाई के नीस हमले ने तो परिभाषा ही बदल दी। 31 साल के एक आदमी ने जानबूझकर 19 टन का कार्गो ट्रक फ्रांस स्थित प्रोमेना दिस आंगले के सी पहले हुई मौजूद भीड़ में घुसा दिया। 84 लोक मारे गए और 303 अन्य जख्मी हो गए। यह हमला उसका अकल्पनीय, विचित्र और भयावह रूप ही कहा जाएगा। हाल के समय में हुए हमलों में एक चीज समान हैं और वह हैं हमले के लक्ष्य ठिकानों की अकल्पनीयता। हम तो यही जानते हैं कि वैश्विक पैमाने के ये घातक हमले तभी रोके जा सकते हैं, जब उन्हें कालिकावस्था में ही यानी शुरू में ही कुचल दिया जाए। ऐसे घिनौने काम अंजाम देने वाले लोगों की विचार प्रक्रिया को ही निशाना बनाना होगा, क्योंकि हर हमले का कारण और इरादा हमलावर के परिवेश में ही मौजूद होता है। हमें हमले के उद्गम ऐसे परिवेश की पहचान करनी होगी। फिर वैचारिक वातावरण में बदलाव लाकर इस दृष्ट विचार-प्रक्रिया को उलटना होगा। इस तरह से देखें तो आतंकवाद से असल लड़ाई वैचारिक लड़ाई ही हैं।

                                                        देवांश झांझरिया, एमरी विश्वविद्यालय, अटलांटा, अमेरिका

बांग्लादेश:-

की पहचान दुनिया में एक लोकतांत्रिक और धार्मिक कट्‌टरता से मुक्त देश की रही हैं। इस देश में मुस्लिमों में सुन्नी, शिया और सूफी मत के मामने वालों के अलावा अन्य धार्मिक अल्पसंख्यक हिन्दू और ईसाई अमन-चैन से रहते आए हैं। लेकिन पिछले कुछ समय से धार्मिक कट्‌टरवाद और आतंकी गतिविधियां सामने आ रही हैं। पिछले समय में विश्वद्यािलय के व्याख्याता, धर्मनिरपेक्ष, लेखक, समलैंगिक कार्यकर्ता, विदेशी व्यक्तियों, पुलिस के लोगों और धार्मिक अल्पसंख्यकों शिया एवं सूफी मुस्लिम, हिन्दू और ईसाईयों की हत्या और उन पर हमले हुए है। इनमें से कई हत्याओं और हमलों की जिम्मेदारी कुख्यात आतंकी संगठन आईएसआईएस ने ली है। हालांकि बांग्लादेश सरकार प्रारंभ में आईएसआईएस की मौजूदगी से इनकार करती रही हैं। लेकिन पिछले दिनों पुलिस अधिकारी की पत्नी की हत्या के बाद सरकार ने आतंकियों और कट्‌टरपंथियों के खिलाफ अपना रुख कड़ा कर लिय है। इसके बाद बड़े पैमाने पर गिरफ्तारी शुरू हुई। अब तक देशभर में आतंक विरोधी मुहिम के तहत लगभग 11000 गिरफ्तारियां हुई हैंं। इस कार्रवाई में कुछ निर्दोष लोगों को भी गिरफ्तार कर लेने के बाद विपक्षी राजनीतिक दलों ने इस मुद्दे को राजनीतिक रंग देना शुरू कर दिया है। विपक्षी दलों का कहना है कि साजिश के तहत उनके राजनीतिक कार्यकर्ताओं को फंसाया जा रहा है। इसके बाद पुलिस ने सर्तकता बरतनी शुरू की है। और कहा कि अब केवल आंतकी गवितिधियो में लिप्त लोगों को ही गिरफ्तार किया जाएगा।

उपसंहार:- मुसलमानों को सावधान रहना होगा। उन्हें बरगला रहे आतंकी संगठनों की सोच का विरोध कर मानव धर्म की रक्षा करनी है। रमजान के महीने में ही नहीं सदैव ऐसा करना होगा ताकि दुनिया में किसी भी समय आतंकवाद की घटनाएं न हों।

- Published on: August 17, 2016