उच्च सात समाचार भाग-2 (Top Seven News Part - 2) [ Current Affairs - International Relations ]

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न्यूयार्क:- फोर्ब्स ने तकनीकी की दुनिया के 100 सबसे अमीरों की सूची में दो भारतीय विप्रो के मुखिया अजीम प्रेमजी और एचसीएल के सह-संस्थापक शिव नाडर को जगह मिली है। अजीम जी (विप्रो) 13वें रेंक पर 16 अरब डॉलर व शिव नाडर (एचसीएल) 11.6 अरब डॉलर 17वें स्थान पर हैं। भारत के दोनों टेक टायकून सूची में गूगल के एरिक शमिट और उबर के सीईओ ट्रैविस कैलनिक से भी आगे हैं। माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल सूची में उच्च पद पर बने हुए हैं। इस सूची में दो भारतीय अमेरिकी भी हैं। सिम्फनी तकनीकी के सीईओ नेटवर्थ 3 अरब डॉलर के साथ रोमेश वाधवानी 67 वें स्थान पर हैं। आईटी कंसल्टिंग एंड आउटसोर्सिग (सलाह और बाहर) जनसमूह सिनटैल भारत के संस्थापक भरत देसाई और उनकी पत्नी नीरजा सेठ्ठी को भी सूची में जगह मिली है।

टेक टायकून की इस सूची में पांच महिला भी हैं। इनमें हांगकांग की झोऊ क्यु नफेई 33वें स्थान पर आई हैं।

Table showing the top ten rich peoples

The top ten rich peoples

टॉप 10 टेक टायकून

नाम

डॉलर

  • बिल गेट्‌स

78 अरब डॉलर

  • जेफ बेजोस

66.2 अरब डॉलर

  • मार्क जुकरबर्ग

54 अरब डॉलर

  • लैरी इलिसन

51.7 अरब डॉलर

  • लैरी पेज

39 अरब डॉलर

  • सर्गेई ब्रिन

38.2 अरब डॉलर

  • स्टी व बॉमर

27.7 अरब डॉलर

  • जैक मा

25.8 अरब डॉलर

  • मा हुआटेंग

22 अरब डॉलर

  • मइकल डेल

20 अरब डॉलर

100 उच्च टेक टायकून में आधे लागे अमरीका से है। इसी तरह उच्च 10 में से भी आठ टेक बिलियनेयर अमेरिका के ही है। दुनिया में दूसरा सबसे ज्यादा टेक बिलियनेयर वाला देश चीन हैं।

कालेधन लाने की चेतावनी:-

  • देश के प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री 30 सितम्बर तक कालेधन का खुलासा करने की चेतावनी दे रहे हैं और उधर स्विटफजरलैंड के बैंको में भारतीयों का जमा कालाधन तेजी से घटता जा रहा है, यानी बैंकों से पैसा निकल तो रहा है लेकिन उसका खुलासा नहीं हो रहा है। दस साल तक मनमोहन सिंह सरकार भी विदेशों में कालाधन वापस लाने के आश्वासन देती रही। कभी कोई समिति तो कभी श्वेत पत्र, ताकि जनता को लगता रहे कि सरकार इस दिशा में सक्रिय है। दस साल राज करके सरकार चली गई तो जवाब देने की जिम्मेदारियों से भी मुक्त हो गई। नई सरकार ने तो आने से पहले ही कालेधन को वापस लाने का मुद्दा गर्मा दिया था। जनता ने सोचा, दस साल उनको देखा अब पांच साल इनको देखने में क्या हर्ज हे। शायद कुछ बात बन जाए।

नई सरकार -

  • आई तो उसने भी पिछली सरकार की तरह यहि दिखाने का प्रयास किया कि इस दिशा में सरकार गंभीर है। सरकार ने आते ही इस मुद्दे पर विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित कर दी। कुछ देशों के साथ संघि करने की बात भी कहीं गई हैं। सरकार ने अघोषित 3770 करोड़ रुपए के खुलासे की बात भी कहीं। लेकिन दो साल के कार्यकाल में ये उपलब्धि पर्याप्त मानी जाए क्या? सरकार ने 30 सितम्बर तक कालेधन के खुलासे की चेतावनी दी है। सरकार को बताना चाहिए कि इस अवधि तक अपेक्षित कालाधन सामने नहीं आया तो वह क्या करेंगी? विदेशी बैंको में जमा कालाधन तेजी से घट रहा है। मतलब साफ हैं कि उनका ये धन है वे उसे निकाल रहे हैं। निकालकर कहां ले जाएंगे, कोई नहीं जानता। देश की जनता को पिछली सरकार की मंशा पर भी संदेह नहीं था तो इस सरकार की नीयत पर भी संदेह नहीं है। लेकिन जनता ये जरूर चाहती है कि प्रधानमंत्री मोदी ने लोकसभा चुनाव से पहले जो कहा था वह करके जरूर दिखाएं। आम भारतीय के खाते में 15-15 लाख रु. ना सही, देश के खाते में ही ये रकम आ जाए तो लोगों को संतोष हो जाएगा और जो कुछ करके दिखाना है उसके लिए सरकार के पास ढाई साल का ही समय बचा है। साठ महीनें कार्यकाल में से 25 तो निकल गए। आखिरी के पांच महीने चुनावी जमा खर्च में निकल जाएंगे। जो करना है बचे बीस महीनों में ही करना है। ये नहीं चलेगा कि सरकार कहने लगे इतना कालाधन वापस लाने के लिए पांच साल का समय कम है।

पाकिस्तान-

  • स्विस बैंको में भारतीयों के केवल 8,392 करोड़ रुपए जमा हैं। इन बैंको में भारतीयों का इतना कम पैसा पहले कभी नहीं था। एक साल पहले की तुलना में इसमें 33 फीसदी गिरावट आई हैं पिछले साल भी इसमें कमी आई थी। चीन और अमेरिकी नागरिको की तरफ से भी यहां जमा पैसा कम हुआ। लेकिन रोचक बात यह है कि पाकिस्तानियों का जमा 16 फीसदी बढ़ा है। यहां पाक नागरिकों के 10,427 करोड़ जमा हैं। बीते साल भी इनके जमा में वृद्धि हुई थी।
  • पिछले तीन वर्षो में पहली बार पाक नागरिकों का जमा पैसा भारतीयों की तुलना में ज्यादा हुआ हैं, ये सभी आंकड़े दिसंबर 2015 के हैं जो स्विस राष्ट्रीय बैंक (एसएनबी) ने जारी किए हैं। स्विट्‌जरलैंड अपने बैंको में कुल जमा की जानकारी 1997 से दे रहा है। इसके अनुसार भारतीयों के सबसे ज्यादा 23,000 करोड़ रुपए 2006 के अंत में थे। वैसे तो जमा उसके बाद से घट ही रहा है, लेकिन 2011 में यह 12 प्रतिशत और 2013 में 42 प्रतिशत बढ़ गया था। पाकिस्तानी नागरिकों की तरफ से 23,640 करोड़ रुपए का सबसे ज्यादा जमा 2001 में था। इनमें वे आकंड़े शामिल नहीं हैं जो लोगों ने दूसरे देशों के बैंक खातों से यहा स्थानांतरण किए हैं। गौरतलब है कि स्विट्‌जरलैंड में 266 बैंक हैं।

देश-

  • हाल समय मेंं भारत और अमेरिका समेत कई देशों ने स्विट्‌जरलैंड पर जानकारी साझा करने का दबाब बढ़ाया हैं। इन देशों ने कालेधन के खिलाफ मुहिम चल रखी है। इसके बाद यहां जमा कम होने लगा है। भारत और स्विट्‌जरलैंड के बीच 2018 के बाद सूचनाएं साझा करने का समझौता भी होने वाला है। भारत में कालेधन की जांच एसआईटी कर रही है। दूसरे देशों में भारतीयों के बैंक खातों की जानकारी उजागर होने के बाद आयकर विभाग ने करीब 13,000 करोड़ रुपए के कालेधन का पता लगया है।
  • स्विस बैंको में दुनियाभर के ग्राहक के 98,00,000 करोड़ रुपए हैं। इसमें एक साल पहले की तुलना में 4 फीसदी कमी आई है। इसमें कालाधान कितना है यह साफ नहीं है। वे आकंड़े भी शामिल नहीं है, जो लोगों ने दूसरे देशों के मार्फत या फर्जी नामों से जमा कर रखे हैंं। चीन का जमा 9 प्रतिशत और अमेरिका का 20 प्रतिशत हैं।

Table showing 2015, the country’s increase and the decrease of black money

2015, the country’s increase and the decrease of black money

2015 के अनुसार देश के कालेधन की बढ़त व घटत की सूची

नाम

राशि बढ़कर

राशि घटकर

भारत

12,502

8,392

चीन

56,239

51,000

अमेरिका

16.81

13.43

पाकिस्तान

10,427

8,966

यूके

23.77

22,12

चीन में कालाधन:-

  • कालाधन चीनी सरकार के लिए बड़ी मुसीबत बनता जा रहा है। एक अनुमान के अनुसार चीन में हर माह करीब 3 हजार अरब रुपए का लेनदेन अवैध ढंग से किया जाता हैं। हालांकि चीनी अधिकारियों ने इस साल अवैध राशि हस्तांतरण के मामले में 450 संदिग्धों को गिरफ्तार किया है। इन संदिग्धों को ओफशोर जनसमूहों, अंडरग्राउंड (छिपे हुए) बैंक आदि के मामले में गिरफ्तार किया गया है। यह कार्रवाई बाजार में कालेधन की उपस्थिति को रोकने के लिए की गई है। यह गिरफ्तारियां 200 अरब यूआन (करीब 2 हजार अरब रुपए) के लेनदेन के मामले में की गई है।
  • जुलाई 2016 में 55 अरब डॉलर (35 सौ अरब रुपए) और जून में 49 अरब डॉलर (33 सौ अरब रुपए) ऑफशोर जनसमूह और अंडर ग्राउंड बैंक के जरिये बाहर गया। अकेले दिसंबर में 171 अरब डॉलर (करीब 11.5 हजार आरब रुपए) का अवैध लेन लेन किया गया।

चीन:-

  • गूगल छोड़कर चली गई। फेसबुक को ब्लॉक (बंद) कर दिया। अमेजन आगे बढ़ने के लिए संघर्ष कर रही है। यदि इस बात के और सबूत चाहिए कि चीन की तकनीकी बाजार अलग ही दुनिया है, तो इस सप्ताह इसका पक्का सबूत मिल गया है। दुनिया की सबसे मूल्यवान स्टार्टअप टैक्सी सेवा देने वाली उबर ने चीन में अपनी स्थानीय इकाई वहीं की प्रतिदव्ंदव्ी दीदी चुशिंग को बेचने का फैसला लिया है। कई जनसमूहों की तरह उबर का भी चीनी सपना खत्म हो गया है।
  • ताजे घटनाक्रम का संदेश साफ है चीन एक ऐसा भिन्न और बिल्कुल अलग परिवेश वाला देश है, जिसमें स्थानीय जनसमूहों ही फूलती-फलती है। चीनी नियम-कायदे और ग्रेट फायरवॉल (महान अटेक के साथ) स्थानीय जनसमूहों को बाहरी स्पर्द्धा से बचाते हैं। इस संरक्षण का मतलब है, उन्हें इनोवेशन (नवीन प्रक्रिया अर्थात तकनीक) की जरूरत नही है, बल्कि पश्चिम के व्यापार नमूना की नकल कर फले-फूल रहे हैं।

समर्पण-

  • उबर का समर्पण आंशिक रूप से जुलाई अंत में जारी नियम के कारण हुआ, जिसे सब्सिडी देने पर रोक लगा दी गई। उबर यानी चीनी ड्राइवरों व सवारियों को रियायतें देने पर सालाना 1 अरब डॉलर खर्च कर रही थीं। लेकिन नजदीक से देखें तो न केवल दीदी का, बल्कि चीनी तकनीकी जनसमूहों का पूरा परिदृश्य सकारात्मक नजर आएगा।

सरकार-

  • बेशक सरकार ने कुछ क्षेत्रों में स्पर्द्धा पर अंकुश लगाया है, जिसके कारण चीन में पश्चिमी जनसमूहों के सुपर (शक्तिशाली) क्लोन (किसी अन्य व्यक्ति या वस्तु का पूर्ण अनुकरण करने वाले वस्तु या प्राणी) बने हैं, जैसे गूगल जैसा बाइदू और फेसबुक जैसी रेनरेन। किन्तु चीन उतना अभेद्य नहीं, जितना आलोचक बताते हैं। वॉट्‌सएप्प उपलब्ध है, लेकिन वीचैट के सामने बौना है, जो चीन का सबसे लोकप्रिय एप है। उसने स्थानीय इंटरनेट जुड़े अलीबाबा को मात दी है। उबर की दीदी में 17.7 फीसदी हिस्सेदारी बुरी नहीं है। हालांकि, उबर को केवल 5.9 फीसदी मत अधिकार होंगे।

कारण-चीन में उबर को मात के अन्य कारण भी हैं जो निम्न हैं-

  • एक तो वह चीन में देर आई और लंबे समय तक गूगल नक्शे इस्तेमाल करती रही, जो वहां अच्छी तरह काम नहीं करता।
  • उसने क्रेडिट कार्ड आधारति पेमेंट व्यवस्था रखी, जबकि वहां वीचैट से पेमेंट लोकप्रिय है। वीचैट (जिसके मालिक टेनसेंट दीदी में निवेशक हैं) कई बार उबर को ब्लॉक यानी बंद कर देती है।
  • फिर भीड़ वाले क्षेत्रों में ज्यादा किराये की सब्सिडी पर रोक लगाने के नियम ने उसका भट्‌टा ही बैठा दिया। ऐसा नहीं है कि चीन की दिग्गज तकनीकी जनसमूहों खुद को दुनिया से दूर रख रही हैं। उन्होंने कई अमेरिकी स्टार्टअप में निवेश किया है।

उबर व्यवसाय-

  • उबर जैसा टैक्सी का व्यवसाय गलाकाट स्पर्द्धा वाला है, जिसमें विजेता को पूरा बाजार मिल जाता हैं। दीदी खुद 2015 में दों स्थानीय फर्म के विलय से जन्मी हैं। उबर स्पर्द्धा में मात खा गई। उसने पांच साल कारोबार में रहने के बाद 2015 के अंत में अरबवें यात्री को सवारी कराई, जबकि दीदी ने 2015 में केवल चीन में ही 1.40 अरब सवारियां ले ली। दीदी को स्थानीय संस्कृति की समझ है, उसने खुद को समाज संचार माध्यम स्थान से अच्छी तरह जोड़ा और बिल्कुल शुरूआत से ही ड्राइवरों (वाहन चलाने वाले) को एप से जोड़ लिया। सब्सिडी पर रोक लगाकर नियामकों ने उस लड़ाई पर विराम लगा दिया जो उबर पहले ही हार चुकी थीं दोनों के बीच स्पर्द्धा बहुत महंगी रही। दो साल में उबर को 2 अरब डॉलर की चपत लगी। समझा जाता है कि दीदी को और भी ज्यादा नुकसान हुआ है।

प्रश्न-उबर के निवेशक बेंचमार्क कैपिटल के बिल गर्ली कहते हैं कि उबर ने दीदी के साथ सौदा करके चीन में फेसबुक व गूगल और अमेजन को मात दे दी। इस सौदेे से तीन प्रश्न उठते हैं-

प्रश्न-एक इसका ग्लोबल राइडिंग (धोखा) बाजार पर क्या असर पड़ेगा?

उत्तर- स्पर्द्धा के चलते दीदी ने उबर के प्रतिस्पर्द्धियों, अमेरिका में लिफ्ट, भारत में ओला और दक्षिण-पूर्व एशिया में ग्रैब नामक गाड़ियों में निवेश किया था ताकि शत्रु को कमजोर किया जा सके। अब तो एक चीनी फर्म उबर में 1 अरब डॉलर निवेश करने वाली है। उधर लिफ्ट, ओला और ग्रैब को दीदी की चेकबुक का भरोसा नहीं रहा।

प्रश्न- यह है कि इसका ग्राहकों पर क्या प्रभाव होगा?

उत्तर- चीनी ग्राहकों की शिकायतें थी कि किराया बहुत बढ़ गया है। भीड़भाड़ के समय में किराये के 1.8 गुना के बराबर सब्सिडी मिलती थी, अब यह नहीं मिलेगी।

प्रश्न- इस सौदें को चीनी अधिकारी किस रूप में लेंगे?

उत्तर- वाणिज्य मंत्रालय ने दीदी के इस दावे को सख्ती से नकार दिया है कि सौदे पर एंटी-ट्रस्ट (प्रवेश संस्था या भरोसा) जांच लागू नहीं होगी। लेकिन सरकार ने पहले भी इंटरनेट सेक्टर में बड़े विलय और अर्ध-एकाधिकार को मंजूरी दी है। राष्ट्रीय चैपियनों (सर्वश्रेष्ठ विजेता) के लिए सरकार खास उदार है। अपने बड़े शत्रु को हजम करके दीदी ने वह रुतबा हासिल कर लिया है।

उबर व चेंग वी-

  • ’परिवहन सेवा की मांग विभिन्न बाजारों के आधार पर अलग-अलग होती है व स्थानीय जनसमूहों इन मांगों की पूर्ति करने में बेहतर स्थिति में होती है।’ चीन की ऐप आधारति टैक्सी सेवा प्रदाता जनसमूह ’डीडी शूजिंग’ के संस्थापक व मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) चेंग वी ने जनसमूह की औपचारिक घोषणा के दौरान यह बयान दिया था। आज उनकी यह बात सही सिद्ध हुई है। पिछले दो वर्षो से चीन की सड़कों पर एक सत्र राज करने वाली उबर को पछाड़ने हुए जनसमूह ने 3500 करोड़ डॉलर की कमाई की है। निवेशकों ने इसके लिए चेंग वी को श्रेय दिया हैं। निवेशकों का कहना है कि उनकी देश भक्ति की भावना और बिजनेस आइडिया (कारोबार योजना) की बदौलत हमने भी मुनाफा कमाया है।
  • निवेशको और जनसमूहों के स्टाफ के अनुसार, वे बहद ही सरल हैं, लेकिन उनकी व्यापार की सूझबूझ बेहद अलग है। उबर को इतनी जल्द पछाड़ कर उन्होंने यह सिद्ध किया है कि वे चीन के प्रतिस्पर्धी बाजार के बादशाह हैं। लेकिन इस सबसे बेहतर उनकी नेतृत्व शैली है। वे जनसमूह के स्टाफ और ड्राइवरों को हमेशा देशभक्ती की भावना के साथ काम करने बल देते हैं। इसके लिए वे अपने भाषण में चीन के इतिहास का सहारा लेते हैं।

सऊदी अरब:-

  • बेराजगारी के चलते हजारों की तादाद में सऊदी अरब में फंसे भारतीयों के लिए खुशखबरी है। सऊदी अरब किंग सलमान बिन अब्दुल अजीज अल सउद ने जनसमूहों को भारतीय कामगारों के बकाया वेतन देने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने भारतीयों और अन्य देशों के बेरोजगार नागरिकों की मदद के लिए उस करोड़ रियाल (174 करोड़ रुपए) की धनराशि आवंटित की हैं।
  • सऊदी अरब मंत्रालय ने यह जानकारी दी हैं। इसमें श्रम मंत्रालय को निर्देश दिया गया है कि वह संबंधित देशों के प्रतिनिधियों से संपर्क कर सऊदी अरब सरकार दव्ारा उठाए गए कदमों के बारे में बताए। विदेश राज्यमंत्री वीके सिंह के सऊदी अरब के दौरे के सऊदी अरब के किंग ने यह कदम उठाया है, गौरतलब है कि सऊदी अरब में करीब 30 लाख भारतीय रहते हैं।
  • संकट- अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल कीमतों में गिरावट के बाद सऊदी अरब में कई जनसमूहों के बंद होने से हजारों की तादाद में भारतीय कामगार जेद्दा नामक स्थान सहित अन्य शहरों में फंसे हैं। भारत सरकार इनको भोजन मुहैया कराने के अलावा स्वदेश वापस लाने के लिए भी प्रयासरत हैं। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भी मदद की है। 30 लाख अकेले सऊदी अरब में हैं। सऊदी अरब के 20 शहरों में 60 लाख भारतीय हैं, खाड़ी देशों में 8 हजार कामगार प्रभावित हैं।
  • आदेश- सऊदी अरब किंग ने मजदूरों को एग्जिट (प्रस्थान) वीजा (देश में आने या जाने की अनुमति) देने का पासपार्ट (विदेशी यात्री का पार-पत्र जिसमें यात्री का विवरण दिया जाता है) विभाग को आदेश दिया है। किंग सलमान ने देश भर में श्रमिक विवाद निपटारा ट्रिब्यूनल (विशेष न्यायालय) की तादाद बढ़ाकर 30 करने की घोषणा भी की है। उनकी घोषणाओं के बाद सऊदी अरब अधिकारियों ने जेद्दा स्थित भारतीय दूतावास से संपर्क कर मजदूरों के लिए वैकल्पिक रोजगार तलाशने का काम तेजी से शुरू कर दिया है।

दिल्ली:-

  • कमर्शियल (वाणिज्य संबंधी) रियल एस्टेट (कानून अचल संपत्ति) के बाद आवासीय रियल एस्टेट सेक्टर में भी अच्छी तेजी देखी जा सकती है। इसकी पुष्टि खोज जनसमूह लियास फोरस की नवीनतम विवरण ने भी की है। विवरण के अनुसार देश के उच्च 8 शहरों में वित्त वर्ष 2016-17 की जून में समाप्त पहली तिमाही में घरों की बिक्री पिछले वर्ष के समान अवधि की तुलना में 9 फीसदी ज्यादा रही है। अहमदाबाद, हैदराबाद और कोलकत्ता में घरों की बिक्री में इस दौरान 20 फीसदी से भी अधिक का इजाफा देखा गया हैं। आने वाले महीनों में बिक्री में और वृद्धि होने की उम्मीद है। अच्छी बात यह है कि यह लगातार तीसरी तिमाही है जब रेजिडेंशियल (आवासीय/रिहायशी) रियल एस्टेट सेक्टर की बिक्री में बढ़ोतरी हुई हैं। नोएडा और गुड़गांव जैसे उच्च बाजार वाले एनसीआर में 12 फीसदी ज्यादा घर खरीदे गए। वहीं मुंबई में यह आंकड़ा महज दो फीसदी पर सीमित रहा। इसके उलट पुणे, चेन्नई और बेंगलुरू में घरों की बिक्री में गिरावट दर्ज की गई है।
  • खोज फर्म के अनुसार उच्च 8 शहरों में 25 लाख से कम कीमत वाले घरों की बिक्री में कोई बढ़ोतरी देखने को नहीं मिली, क्योंकि खराब गुणवत्ता के चलते ये उपभोक्ता के उपयोग के लिहाज से संतोषजनक नहीं माने गए।

न्यूजीलैंड:-

  • बैंको में आमतौर पर नकद का ही ट्रांजेक्शन (कारोबार करने की क्रिया) होता है। लेकिन न्यूजीलैंड के वांगरे शहर में दूनिया के पहले मूड (मनोदशा) बैंक की शुरूआत की गई। यह एक एटीएम मशीन जैसा बैंक है। यहां लोग अपने स्टेट ऑफ माइंड (राज्य की आपत्ति) यानी मनोदशा को जमा करवा सकते हैं। इस प्रोजेक्ट (योजना) को शुरू करने वाली आर्टिस्ट वेनेसा क्रो का कहना है कि लोगों में दिनोदिन गुस्सा बढ़ता जा रहा है। यह काम के बढ़ते दबाव के कारण भी है और सामाजिक भी। इस बैक की शुरूआत करने का मकसद लोगों के स्टेट ऑफ माइंड (आपत्ति/ध्यान रखना वाला राज्य) का पता लगाना हैं। लोग इस बैंक में अपना गुस्सा, प्यार, उस समय दिमाग में क्या चल रहा है, सब कुछ जमा कर सकते हैं। यहां तक इस मशीन पर भड़ास भी निकाल सकते हैं। इस मशीन से मिलने वाले डाटा (आकड़ा) का इससे जुड़े खोज में काफी अहम योगदान हो सकता है। शहर के लोगों की मानसिक स्थित का सटीक आकलन किया जा सकता है। वेनेसा के अनुसार मशीन को काफी अच्छा रिस्पांस (प्रतिक्रिया/अनुक्रिया) )मिल रहा है। अब तक हजारों लोग इस मशीन को इस्तेमाल कर चुके हैं वेनेसा ने कहा मूड बैंक काफी पॉपलुर (प्रसिद्ध) हो रहा और जल्द ही इसे अन्य शहरों में भी शुरू किया जाएगा। यह बैंक सोशल मीडिया (समाज संचार दव्ारा) पर भी काफी चर्चा बटोर रहा है। आम लोगों में इस बैंक में खाता खोलने को लेकर काफी उत्सुकता बढ़ रही है। लोगों का कहना है कि उनके पास खुशियों और दुखों का भंडार जमा है। अगर प्रयास किया जाए तो इस मूड बैंक की मदद से वे खुशियों और दुखों का क्रेडिट (उधार/साख) और जमा भी शुरू कर सकते हैं।
  • वेनेसा के अनुसार मशीनों पर आरोप लगता है कि वो इंसानों को भावनात्मक तौर कर कठोर बनाती जा रहीं हैं। हमारे इस योजना का लक्ष्य है कि कैसे मशीने इंसानों की भावनाएं व्यक्त करने के लिए प्रेरित कर सकती हैं। इस समूह के स्पोक्सपर्सन ऐश हॉलों ने कहा कि लोगों को ये समझना होगा कि केवल पैसे कमाने के अलावा भी जीवन में कई अहम चीजें मौजूद है।

काम-

  • जब आप इस मशीन के पास पहुंचते हैं तो ये सबसे पहले यही सवाल पूछती है कि आज आप कैसा महसूस कर रहे हैं। इसका जवाब देने के लिए आपके पास हजार से ज्यादा विकल्प मौजूद होगें। इन जवाबों को आप अपने हिसाब से मॉडरेट (नियामक व्यक्ति) भी कर सकते हैं। जैसे ही मूड को मशीन में फीड (किसी वस्तु दव्ारा तीव्रता/उग्रता बढ़ना) करते हैं, एक एक्नॉलेजमेंट रिलप मिलती हैं। इस तरह यह मशीन काम करती हैं।

उपसंहार:-इसी प्रकार देश दुनिया में सबसे महत्वपूर्ण घटनाएं क्या घटित हो रही हम आगे भी आपके लिए ऐसे ही लाते रहेंगे।

- Published on: September 7, 2016