उच्च दस समाचार भाग-1 (Top Ten News Part - 1) [ Current Affairs - International Relations ]

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अंतरिक्ष में जुपिटर (बृहस्पति)ग्रह :- प्रागैतिहासिक काल से आकाश की हर चीज को, आकाश मेे घटने वाली हर घटना को इंसान ने कुछ हैरानी तो कुछ डरी हुई निगाह से देखा है। यह इंसान के स्वाभाविक कौतुहल की वजह से है। जीवन व ब्रह्यांड से संबंधित मूलभूत प्रश्नों ने उसे सदा सोचने पर मजबूर किया है। सार्वभौमिक नियमों की जानकारी के अभाव में ब्रह्यांड का खाका अलौकिक परिकल्पनाओं के रंग में रंगता रहा है। मध्य युग के बाद यूरोप में नवयुग एक वैचारिक जागृति लेकर आया। खगोल में भी एक नई दिलचस्पी का युग शुरू हुआ। कॉपरनिकस ने जहां सौरमंडल की सही तस्वीर पेश की वहीं 400 साल पूर्व गैलीलियों ने छोटी सी दूरबीन से इसके प्रत्यक्ष रूप को दिखाकर एक क्रांति का सूत्रपात कर दिया। बृहस्पति ग्रह के चारों ओर घूमते चार चमकीले बिंदुओं सरीखे इसके उपग्रह एक छोटे सौरमंडल का आभास दे गए। दूरदर्शी की भेदन शक्ति बढ़ी तो ब्रह्यांड की तस्वीर भी पेचीदा होने लगी। अंतरिक्ष में स्थापित हब्बल दूरदर्शी से खींची तस्वीरें बेहद रोमांचक हैं। मगर खगोल वैज्ञानिक अब महज दूर बैठा प्रेक्षक नहीं प्रयोगकर्ता बन चुका है। अंतरिक्ष कार्यक्रम आज तकनीकी से ही महत्वपूर्ण मुकाम हासिल कर पा रहे हैं।

  • जूनों- ऐसे ही प्रयासाेे की परिणिति है नासा अंतरिक्ष यान ’जूनो’ जो 5 वर्ष की यात्रा के बाद 5 जुलाई की सुबह बृहस्पति ग्रह की कक्षा में स्थापित कर दिया गया। यह बृहस्पति की गहरी खोजबीन कर महत्वपूर्ण जानकारी भेजेगा। अंतरिक्ष में दूरियां अकल्पनीय हैं। पृथ्वी पर रहते हुए 87 करोड़ किलोमीटर दूर बृहस्पतिग्रह की कक्षा में अंतरिक्ष यान को पहुंचाना बेहद नाजुक एवं पेचीदा कार्य था। इसका सफल संपादन एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। योजना पर लगभग 7 हजार करोड़ रुपए खर्च हुए। मगर, इसे सांसारिक मूल्यों में नहीं तौल सकते क्योंकि ज्ञान की कीमत आंकी नहीं जा सकती हैं।
  • तो ऐसा क्या है जो बृहस्पति ग्रह की पिछले 400 साल की खोजबीन नहीं बता पाई और अब सामने आएगा? सूर्य से दूरी के हिसाब से यह ग्रह पांचवां ग्रह है। यह सबसे बड़ा और अनेकानेक ग्रहों का स्वामी भी है। यह पृथ्वी से आकार में 11 गुणा बड़ा व वजन में 318 गुणा है। इसे सौरमंडल का दूसरा शक्ति केंद्र कह सकते हैं। इसका गुरुत्व बल सौरमंडल के सभी पिंडो को प्रभावित करता है। देखने में यह गैसीय रूप है। कहीं भी इसका ठोस धरातल नहीं दिखता। इसके वातावरण में सूर्य की मुख्य गैसों की तरह ही हाइड्रोजन व हीलियम की प्रधानता है। जहां यह सूर्य का परिभ्रमण 11.9 वर्ष में करता है अपनी अक्ष पर 10 घंटे में घूम जाता है। इस तेज रफ्तार ने इसे थोड़ा चपटा कर दिया है। तस्वीरों में इसके वातावरण में समानंतरण पट्‌िटयां दिखाई देती हैं वहीं सैकड़ों वर्षों से इस पर विद्यमान एक विशाल लाल रंग का धब्बा वैज्ञानिकों को अचंभे में डाले हुए है। विशाल दूरबीनों से तो बृहस्पति के बारे में हमने बहुत कुछ जान लिया अब बेहद नजदीक से इसे जानने का मौका आ गया है। जूनों यानी जुपिटर न्यू पोलर आर्बिटर मिशन का काल 20 महीने का है। इस दौरान यह बृहस्पति के 37 फेरे लगा चुका हैं। वैज्ञानिक यह जानना चाहते हैं कि यह ग्रह कितना गैसीय है। क्या इसके ठोस केंद्रक भाग भी हैं? इसके घने वातावरण की गहराइयों में क्या पानी व अमोनिया मौजूद है? दरअसल यह पदार्थ पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति में महत्वपूर्ण घटक रहे हैं। बृहस्पति का अपना चुंबकीय क्षेत्र है जो बेहद पेचीदा है। इससे निकलता विकिरण बेहद शक्तिशाली है।
  • चुंकि, यह चुंबकीय क्षेत्र पृथ्वी से 20 हजार गुणा शक्तिशाली है इससे बचने के लिए जूनो का कंप्यूटर व अन्य संवेदनशील इलेक्ट्रानिकी (विद्युतीय) 180 किलोग्राम वजनी टाइटेनियम बॉक्स के अंदर रखे गए हैं। बिल्कुल बुलेट प्रूफ जैसा इंतजाम है। बृहस्पति के चुंबकीय क्षेत्र का मानचित्रण जूनो विज्ञान मिशन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। तभी हम जानेंगे कि इस ग्रह के वातावरण की ध्रुवीय रोशनियां कैसी हैं? इसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा है बृहस्पति के वातावरण के ऊपरी से होकर गुजरेगा। ये बेहद जोखिम भरे क्षण होंगे। इसका हर फेरा चुनौती भरा रहेगा। लेकिन, पहली बार इतने निकट से होकर गुजरने के कारण हम बृहस्पति के बाहरी वातावरण को भौतिक एवं रासायनिक संरचना को भी जान पाएंगे। फरवरी 2018 में जूनो की गति को धीमा किया जाएगा ताकि वह बृहस्पति ग्रह के घने वातावरण में समा जाए। इस आत्मसात में भी बहुत महत्वपूर्ण जानकारियां मिलने की उम्मीद है। सौरमंडल की हर खोज इसके वर्तमान रूप व उद्भव संबंधी हमारी तस्वीर को ओर बेहतर बनाती है। जूनो का बृहस्पति की कक्षा में जा पहुंचना एक खुशनुमा एहसास है। हम सभी खगोल वैज्ञानिकों के लिए यह उत्सव का क्षण भी है। इससे पूर्व के दशकों में नाभिकीय ऊर्जा से संचालित गैलिलियों सहित आठ अंतरिक्षयानों ने बृहस्पति को नजदीक से जांचा, परखा हैं।

अमेरिका:- अमेरिका की चुनावी गर्मियों में एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी था। अचानक 115 अरब रुपए नगद ईरान भेजने के मामले ने बड़ी बहस शुरू कर दी है। इंटरनेट पर यह पैलेट्‌स ऑफ कैश हैशटेग के साथ चल रही है। बात बढ़ी तब सरकार ने भी स्वीकार किया कि उसने ऐसा किया है।

  • वित्तीय विवाद- बराक ओबामा की सरकार ने कहा कि उसने ईरान के साथ दशकों पुराने वित्तीय विवाद का निपटारा करने के लिए जनवरी में 115 अरब रुपए नगद पहुंचाए थे। यह राशि ऐसे कार्गो विमान में रखी गई थी, जिस पर सामान की पहचान सील नहीं थी। इतनी राशि देने की घोषणा तब की गई थी, जब ईरान से परमाणु समझौता हुआ और उसने चार बंधक अमेरिकियो को रिहा किया था। समाजवादी दल ने इस मुद्दे को बड़ी चुनावी बहस में बदल दिया और कहा कि ऐसा कोई पुराना विवाद था ही नहीं, सरकार ने एक तुच्छ देश को फिरौती के तौर पर इतनी राशि अदा की है। यह विषय पहले राजनीतिक विवाद बना, फिर इससे ज्यादा तुल तब पकड़ लिया, जब ’द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ ने इसकी विस्तृत जानकारी छापी। उसने बताया कि पहली किश्त के तौर पर ईरान को 2,720 करोड़ रुपए (400 मिलियन डॉलर) अमेरिकी बंधकों को रिहा करने के बदले चुकाए गए हैं। इससे सरकार का झूठ सामने आ गया।
  • चुनावी वातावरण में उसकी आलोचना होने लगी। समाजवादी नेता डोनाल्ड ट्रम्प भी इस मुद्दे को भुनाने से नहीं चुके। उन्होंने इस भुगतान के लिए तुरंत अपनी प्रतिदव्ंदव्ी हिलेरी क्लिंटन पर हमला बोल दिया। उन्होंने कहा कि इस फिरौती की बातचीत हिलेरी ने ही शुरू की थी और उन्होंने दल का नेतृत्व किया था। हालांकि ’द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ की खबर को व्हाइट हाउस ने खारिज करते हुए कहा कि वह ’छह महीने पुरानी खबर’ हैं।
  • सच- पिछले तीन दशक से अधिक समय में वॉशिगटन और तेहरान के बीच कई तरह का लेन-देन हुआ। लेकिन ईरान में क्रांति के बाद दोनों देशों के संबंध बिगड़ने लगे। जब मो. रजा पहलवी ईरान के शाह कहलाते थे, तब अमेरिका ने उनके साथ 400 मिलियन डॉलर के हथियारों का समझौता किया था। 1979 में क्रांति के दौरान जब उनहें सत्ता से हटा दिया गया, तब अमेरिका ने भी हथियार भेजने बंद कर दिए। ईरान की इस्लामिक सरकार ने अमेरिकियों को बंधक बना दिया, तो मामला इंटरनेशनल लीगल ट्रिब्यूनल (अंतरराष्ट्रीय कानून) में चला गया। अमेरिकी अधिकारियों ने मुद्दे को समाप्त करने के लिए (कुछ अधिकारियों को डर था कि ट्रिब्यूनल का फैसला गलत आ सकता है।) राशि का भुगतान करने पर सहमति जताई।
  • सहमत- ’द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ ने खुलासा किया कि विधि अधिकारियों ने नगद राशि के भुगतान पर आपत्ति की थी, उन्हें अंदेशा था कि यह फिरौती लगेगी। फिर भी उनकी बातों को नजरअंदाज किया गया। विधि विभाग के एक अधिकारी ने कहा कि वह आपत्ति शीर्ष स्तर पर पहुंच ही नहीं पाई थीं और पैसा भेजने का तरीका बताना हमारा काम नहीं है। बाद में विभाग ने अंतिम रूप से इस फेसले पर सहमति दी थी।
  • बैंक- दशकों तक अंतरराष्ट्रीय वित्तीय एवं बैंकिंग प्रतिबंधों के कारण ईरान बंध सा गया था। उसकी यूरोप स्थित एक बैंक ने जनवरी में कहा कि अगर वह 400 मिलियन डॉलर स्थानांतरण करती है, तो यह प्रतिबंधों का उल्लंघन कहलाएगा। प्रशासन के कुछ अधिकारियों ने पहली किश्त बैंक में जमा करने पर सहमति दी, लेकिन व्हाइट हाउस के अधिकरियों ने इससे इंकार कर दिया हैं। उन्होंने पूरे 1.7 अरब डॉलर (ब्याज सहित) नकद भुगतान करने के लिए कहा हैं।
  • विदेश मंत्री-विदेश मंत्री जॉन कैरी ने कहा कि परमाणु समझौते के समय जो भी पूराने विवाद और मुद्दे उठाए गए, सरकार उनका निराकरण करना चाहती है। राष्ट्रपति ओबामा ने भी कहा कि समझौते की यह राशि ईरान दव्ारा मांगी गई राशि से गहुत कम हैं। अच्छा होगा विवाद का निपटारा अभी कर दिया जाए।
  • मुआवजा- ओबामा के साथ-साथ अमेरिकी अधिकारियों ने भी जोर देकर कहा कि अमेरिका ने कोई फिरौती नहीं दी। बंधकों के प्रकरण के कारण परमाणु समझौता की वार्ता का वातावरण बिगड़ने की आशंका थी। जबकि ओबामा प्रशासन के ही एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि यह बातचीत परमाणु समझौता से बिल्कुल अलग और स्वतंत्र थी, लेकिन हमारे लिए बहुत महत्व रखती थीं। आलोचकों ने कहा कि यह संयोग की बात नहीं हो सकती है। प्रतिनिधि सभा के केविन मॅक्कार्थी ने कहा’ मुझे यह फिरौती से कम कुछ नहीं लगती। बंधकों को छुड़ाने के बदले ईरान ने इसी पर सहमति दी होगी और यह उसी की मुआवजा राशि हैं।’ परमाणु वार्ता और बंधकों को छुड़ाने का समझौता एक दूसरे से बिलकुल अलग है। एक संबंध एक देश की राजनीति से हैं, तो दूसरे का फायदे से हैं।
  • आलोचना- ट्रम्प की समाजवादी दल ने अपना फोकस परमाणु समझौता से हटाकर क्लिंटन पर कर लिया है। वे अमेरिकी बंधकों को छोड़ाने के बदले नगद राशि की बातें कह रहे हैं, जो आतंक को बढ़ावा देता है। ट्रम्प ने इस मुद्दे के पहले ही ट्‌वीट में कहा कि हमारी अयोग्य पूर्व विदेश मंत्री ने इस समझौता की बातचीत शुरू की थी। इस बातचीत के दौरान ईरान को 400 मिलियन डॉलर दिए गए। यह घपला नहीं है। राष्ट्रपति चुनाव के प्रचार में अन्य मुद्दों के बीच यह तय है कि समाजवादी दल पैलेट्‌स ऑफ कैश को फिरौती के रूप में बताकर उछालेगी।

जापान:-

  • जापान में उच्च सदन के लिए हुए 121 सीटों पर चुनाव हुए हैं। ऐसा समझा जा रहा है कि प्रधानमंत्री शिंजो आबे की लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (एलडीपी) के उम्मीदवार अधिकतर सीटें जीत जाएंगे। चुनाव बाद के सर्वेक्षण के परिणाम भी इस बात की पुष्टि कर रहे हैं कि खुद प्रधानमंत्री शिंजो आबे भी दावा कर रहे हैं कि एलडीपी, उच्च सदन में दो तिहाई बहुमत हासिल कर लेगी। जापान के उच्च सदन में 242 सीटें हैं और वर्तमान में एलडीपी के पास 77 सीटें है। संभावना है कि इस बार वह 70 से 77 और सीटे हासिल कर सकती है। यदि एलडीपी ऐसा कर पाती है तो दोनों सदनों में उसके पास दो तिहाई बहुमत हो जाएगा। शिंजों आबे अपनी जीत के दावे के साथ यह बात भी कह रहे हैंं कि उनकी जीत का अर्थ उनकी आर्थिक नीतियों का समर्थन हैं। लेकिन एक महत्वपूर्ण बात यह है कि वे जापान के शांतिवादी संविधान में संशोधन के पक्षधर रहे हैं। समझा जा रहा हैं कि उन्हें दोनों ही सदनों में दो तिहाई बहुमत हासिल हो जाएगा तो वे संविधान बदलाव की बात सोच सकते हैंं। इसी संभावना के मद्देनजर यह कहा भी जाने लगा है कि शिंजो आबे की जीत का अर्थ केवल उनकी आर्थिक नीतियों को समर्थन देना ही नहीं बल्कि शांतिवादी संवािधान में संशोधन की बात को समर्थन देना भी है।
  • चुनाव के दौरान यह एक मुद्दा भी रहा हैं। पूर्व में दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत के अभाव में उनके लिए ऐसा सोच पाना भी कठिन भी हो रहा हैं कि संविधान में संशोधन की बात सोचना फिलहाल जल्दबाजी ही होगी। उल्लेखनीय है कि दव्तीय विश्वयुद्ध के बाद अमरीका ने जापान पर शांतिवादी संविधान थोपा था। जापान के संविधान का अनुच्छेद नौ उसे दूसरे देशों में सेनाएं भेजने से रोकता है। लेकिन, एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव से जापान चिंतित है और इसलिए वहां पर संविधान के इस अनुच्छेद में बदलाव की बातें उठने लगी हैं। यह सही है कि जापान लोकतांत्रिक पंरपराओं वाला देश है लेकिन चुनाव में यदि संभावनाओं के अनुसार एलडीपी जीतती भी है तो इसका अर्थ संविधान में संशोधन का समर्थन बिल्कुल भी नहीं है। यद्यपि संविधान में संशोधन को लेकर शिंजो आबे अब खुलकर बात कर सकेंगे। इतना बड़ा फैसला सरल नहीं होता। इसके लिए उन्हें जनमतसंग्रह करना पड़ सकता है। केवल दो तिहाई बहुमत के आधार पर वे इस दिशा में कदम उठा लेंगे ऐसा कहना ठीक नहीं लगता हैं। जनता की आवाज उन्हें सुननी ही होगी।

नेपाल:-

  • की राजनीति में एक बार फिर यह बात स्पष्ट हो गई कि यहां निरंतर अस्थिरता ही केवल एक ’स्थिरता’ है। कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी) ने ज्यों ही सत्तारूढ़ गठबंधन से नाता तोड़कर अपना समर्थन वापस लेने का निर्णय किया तो नेपाली प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली (सीपीएन-यूएमएल) की सरकार अल्पमत में आ गई। यहि दिलस्प है कि महज दो दिन पहले ही प्रधानमंत्री ओली ने मंत्रिमंडल विस्तार की शेखी बघारी थीं। वैसे नैतिक तौर पर तो ओली ने पद पर बने रहने का अधिकार खो दिया है पर वैधानिक आधार पर उन्होंने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया है। उन्होंने संसद के फेसले के इंतजार का निर्णय लिया है। इस तरह नई सरकार बनने में दिक्कतें आएंगी, जिसमें कई सप्ताह लग सकते हैं। हालांकि, अविश्वास प्रस्ताव पारित होने के लिए संख्या में कोई बड़ी अड़चन नहीं होगी क्योंकि माओवादी-नेपाली कांग्रेस की प्रस्तावित गठबंधन सरकार को सदन के पटल पर बहुमत साबित करने के लिए अन्य दलों से महज 10 मत ही चाहिए। मधेशवादी दलों ने पहले ही घोषणा कर रखी है कि वे सरकार में शामिल हुए बगैर बाहर से समर्थन देने को तैयार हैं। इसलिए पीएम इन वेटिंग पुष्प कम दहल ’प्रचंड’ के लिए मंत्रिमंडल मंत्रालयों का वितरण आसान हो जाएगा। सीपीएन (यूएमएल), दूसरी सबसे बड़ा दल कानूनी खामियों का फायदा उठाकर जब तक चाहे शासन में बनी रहने की रणनीति अपनाए तो सत्ता परिवर्तन की यह प्रक्रिया मुश्किल हो सकती है।
  • समझौता- प्रधानमंत्री ओली की सरकार मधेश आधारित राजनेता बिजय कुमार गच्छेदार के संगठन के साथ नेपाली कांग्रेस, यूएमएल, माओवादियों के साथ हुए 16 सूत्री समझौते का परिणाम थी। यह समझौता 8 जून, 2015 को हुआ था, जिसके चलते सितंबर में संविधान लागू हुआ। इस समझौते के अनुसार राष्ट्रपति पद नेपाली कांग्रेस को, सरकार के मुखिया का पद यूएमएल को और माओवादियों दव्ारा नामित व्यक्ति को संसद का अध्यक्ष नियुक्त करना था। इस समझौता का दूसरा-तीसरा पक्ष तो लागू हो गया जबकि नेपाली कांग्रेस अपने हाथ मलते रह गई। यह समझौता संवैधानिक मुद्दों को तय किए बिना खत्म हो गया। नेपाली कांग्रेस ने पलटवार करने में थोड़ा समय लगाया पर उसने इस साल मई में माओवादियों के साथ नौ सूत्री समझौता किया।
  • बताया जाता है कि चीन को देखते हुए दहल ने एन मौके पर पांव खींच लिए और यह समझौता मुकाम तक नहीं पहुंच पाया। तब प्रधानमंत्री ओली ने माओवादियों के साथ सरकार में बने रहने के लिए नौ सूत्रों का समझौता किया। पर शायद ओली का इस समझौते को लागू करने का इरादा नहीं था। अब राजनीतिक वादों का एक और दस्तावेज सामने आया है। इसका भी कोई निश्चित भविष्य नहीं है।
  • नया संविधान-मधेशी और जनजाति नेपाल दव्ारा अपनाए गए नए संविधान में कुछ बुनियादी सुधारों के लिए विरोध जताते रहे हैं। बताया जा रहा है कि 11 जुलाई को नेपाली कांग्रेस और माओवादियों के बीच हुए सात सूत्री समझौते में मधेशियों और जनजातियों व दलितों की चिंताओं का ख्याल रखा गया है। संविधान में संशोधन के लिए दो तिहाई बहुमत की जरूरत होगी। इस दिशा में यूएमएल का समर्थन अत्यंत आवश्यक होगा, पर यह इसके विरोधियों को शायद ही नसीब हो पाएगा। प्रशासन में भी सुधार को बहुत ज्यादा गुंजाइश नहीं है क्योंकि ओली ने अपने नौ माह के कार्यकाल में पूरी सरकारी मशीनरी को यूएमएल वफादारों की नियुक्ति से भर दिया। इसलिए नई सरकार के लिए यूएमएल के वफादारों के साथ काम करना टेढ़ा काम होगा।
  • चुनौती-ओली के हवाई वादों का पूरा करना भी नई सरकार के लिए अड़चने पैदा करेगा। ओली की बचकानी योजना, चीन से कोयला लाकर पेनाल में इसे पेट्रोल में बदलकर बेचने की थी। यानी ओली के हटने के बाद नई सरकार के लिए चुनौतियां कम नहीं होगी। मानसून के दिनों में भी रोज सात-आठ घंटे बिजली कटौती होना, काठमांडू जैसे शहर में ही पानी की अनियमित आपूर्ति होना। मुद्रास्फीति का दो अंकों में बने रहना, सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा का बेहाल होना, किसी भी सरकार के लिए सिरदर्द होगा। मौजूद जानकारी के अनुसार दोनों दलों में हुए समझौते के अनुसार सरकार बनने पर प्रचंड नौ से दस माह ही प्रधानमंत्री की कुर्सी पर रहेंगे, उसके बाद वे नेपाली कांग्रेस के शेर बहादुर देउबा को कमान सौंप देंगे।
  • नई सरकार -से भी बहुत उम्मीदे बढ़ेगी। नेपाल के लिए राजनीतिक अस्थिरता कोई नई बात नहीं है। अब तो यह अस्थिरता ही एक तरह की स्थिरता हो चली है। ओली के नेतृत्व में बंद लोगों तक सिमटी सत्ता ने नेपाल में व्यापार पर बुरा असर डाला था। इससे निवेश प्रभावित हुआ था। अगर नई सरकार गोरखा क्षेत्र में पिछले साल के भूकंप से हुए नुकसान की भरपाई के लिए पुननिर्माण शुरू कर दे तो यह अवसरवादी गठबंधन के बाहर होने के लिए पर्याप्त होगा। ओली सरकार के गलत कार्यो की सूची लंबी है पर इसका सबसे बड़ा अपराध बताए जाए तो वह गोरखा क्षेत्र में भूकंप प्रभावित लोगों के प्रति लापरवाही है।

प्रधानमंत्री ओली और उनके मंत्रिपरिषद मंत्री मधेशियों का मजाक उड़ाया करते थे। नई नियुक्त सरकार से भी मधेशियों, जनजातियो और दलितों की चिंताओं को निपटाने की कोई ज्यादा उम्मीद नहीं है। सिवाय कोरी बातों के।

                                                                                                     सी. के. लाल, वरिष्ठ पत्रकार, नेपाल

पाकिस्तान और संयुक्त राष्ट्र:-

  • मानवधिकार उल्लघंन की दुहाई देते हुए पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के मंच का इस्तेमाल किया है। ऐसा करना उसकी फितरत में हैं। पाकिस्तान की शुरू से ही यह नीति रही है कि जब भी मौका मिले भारत के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश करे ताकि दूसरे देशों में उसके प्रति सहानुभूति का वातावरण बन सके। कश्मीर में हिजबुल आतंकी की मौत व उसके बाद वहां भड़की हिंसा को लेकर पाकिस्तान की दूत मलीहा लोदी ने वानी को कश्मीरी नेता बता उसकी मौत को ’न्यायोत्तर हत्या’ बताया है। यूएन में भारत के राजदूत अकबरूद्दीन ने इसका करारा जवाब भी दिया है। आतंकियों को पनाह देने वाले पाकिस्तान के लिए उनका गुणगान करना मजबूरी बन गया है। क्योंकि उस पर सेना सहित कई अन्य स्थानीय आतंकी संगठनों का दबाव रहता है। भारत शुरू से ही कहता रहा है कि कश्मीर का मसला दव्पक्षीय बातचीत से ही हाल होगा इसमें किसी तीसरे का दखल नामंजूर है। कश्मीर में लोकतांत्रिक सरकार है। कानून-व्यवस्था उसकी जिम्मेदारी है। ऐसे में पाकिस्तान केवल दुनिया का ध्यान बंटाने के लिए यूएन में ऐसी बातें उठाता रहता है। पाकिस्तान साफ तौर से अपनी नीतियों को इस तरह से बनाता है जिससे जब भी उस पर आतंकियों को प्रश्रय देने का आरोप लगता है वह खुद को पाक साफ बताने लगता है।
  • उसका एक ही लक्ष्य है कि किसी भी तरह से आतंकियों को प्रश्रय देकर भारत में अशांति फैलाना। ऐसे में शांति प्रयासों की बातों को धक्का लगना स्वाभाविक है। हम यह भी जानते हें कि 1772 के शिमला समझौते में यह साफ उल्लेख है कि कश्मीर संबंधी विवादों का समाधान दव्पीक्षीय वार्ता के दौरान बिना शस्त्रों का इस्तेमाल किए होगा। लाहौर में 1999 में भी इस बात को दोहराया गया। 9/11 के बाद आतंकवाद दुनिया भर के लिए बड़ा इश्यू बना है। पाकिस्तान इस मसले पर दुनिया के दूसरे देशों से अलग-थलग पड़ गया हैं यूएन न तो इस तरह की बातों के लिए उपयुक्त मंत्र हैं और न ही पाकिस्तान अपने इन प्रयासों से दुनियों के दूसरे देशों की सहानुभूति हासिल करने में सफल हो पाएगा। आज के दौर में संचार माध्यम जिस तरह से सक्रिय है उसमें ऐसे मुद्दों को अनावश्यक तुल देना आसान हो गया है भारत को भी कश्मीर के माहौल से निपटने के समुचित प्रयास करने चाहिए। हालात फिलहाल जिस तरीके से हो रहे हैं उससे लगता है कि कश्मीर में अलगाववादी सक्रिय हैं। इन्हें सोमापार से शह मिल रही है।

मनीष दाभाड़े, जेएनयू नई दिल्ली, जेएनयू के अंतरराष्ट्रीय अध्ययन संस्थान में शिक्षण कार्य से जुड़े दाभाड़े विदेश मामलों के जानकार हैं।

दिल्ली:-

  • सरकार राष्ट्रीय राजधानी के हर घर को डिजिटल (अंको दव्ारा संख्या/मात्राा व्यक्त करना) तौर पर जोड़ने का काम कर रही है। यह ऑप्टिकल फाइबर (दृष्टि विषयक संबंधी रेशे) संपर्क के दव्ारा संभव होगा। सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि ऑप्टिकल फाइबर संपर्क दव्ारा हर घर तक ब्रांड ( उत्पाद) इंटरनेट, केबल टीवी और लैंडलाइन टेलीफोन (दूरसंचार) की पहुंच हो। इस दिशा में पहला कदम उठाते हुए सरकार ने घोषणा कर दी है कि इस साल के अतं तक पूर्वी दिल्ली के 500 स्थानों पर मुक्त वाई-फाई की सुविधा मुहैया कराई जाएगी। इन स्थानों पर एक निश्चित सीमा में वाई-फाई का रोज नि:शुल्क लाभ लिया जा सकेगा।
  • यह घोषणा संवाद एवं विकास आयोग के सहायक मुखिया आशीष खेतान ने की। नि:शुल्क इंटरनेट सेवा के पीछे उद्देश्य दिल्लीवासियों की इंटरनेट की जरूरत को पूरा करना है। राजधानी में इस सेवा के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी सूचना तकनीक विभाग (डीआईटी) की होगी। खेतान बताते हैं कि दिल्ली के सभी घरों को ऑप्टिकल फाइबर संपर्क से जोड़ने का काम भी जल्द ही किया जाएगा, ताकि राजधानीवासी ’गीगाबाइट स्पीड’ में इंटरनेट का आनंद उठा सकें। इसके लिए सरकार जल्द ही निविदाएं आमंत्रित करेगी। खेतान ने बताया ’इन निविदाओं में मुक्त डेटा यूज (आकंड़े समाचार) की विस्तृत जानकारी होगी। एक दिन में एक व्यक्ति दव्ारा औसत डाटा (आंकड़ा) उपयोग के संदर्भ में ट्राई (प्रयोग) की गाइडलाइन (साधारण/सामान्य नियम) ही मानक होगी।’ उन्होंने बताया कि लोक सेवा आयोग ऑप्टिकल फाइबर योजना जो कि स्मार्ट सिटी योजना के लिए भी जरूरी होगा, के लिए नोडल एजेंसी (पातिक, ग्रंथिल कार्यस्थान) होगी। खेतान इस ’फाइबर टू होम’ (घर पर रेशे) योजना से काफी हाई-स्पीड (उच्च गति) इंटरनेट का दावा करते हैं। उनका कहना है कि ये योजना शिक्षा, स्वास्थ्य, ऊर्जा, जल, नागरिक परिवहन और सुरक्षा के क्षेत्र में काफी उपयोगी साबित होगा। गौरतलब है कि पूरे दिल्ली में मुक्त वाई-फाई प्रदान करना दिल्ली विधानसभा चुनाव में आप के प्रमुख वादों में से था। इसी वादे को पूरा करने और दिल्ली के हर घर को मुक्त वाई-फाई सेवा दिलाने के लिए सरकार प्रतिबद्ध है। चुनाव के वक्त दिल्ली सरकार के इस वादे को लोगों ने खूब सराहा था, क्योंकि मुक्त वाई-फाई का वादा अब तक किसी अन्य राज्य की सरकारों या फिर नेताओं ने चुनावी भाषणों में नहीं किया गया था।
  • शुरूआत-इस योजना की शरूआत पूर्वी दिल्ली से होगी। एक व्यक्ति दव्ारा एक दिन में औसत इंटरनेट उपयोग के संदर्भ में गाइडलाइन (साधारण/सामान्य नियम) ट्राई देगी। पूर्वी दिल्ली में तीन एक्सेस पाइंट (रास्ता/प्रवेश मार्ग/कुछ प्रयोग करने या किसी विशेष स्थान या क्षेत्र तक पहुँचने का अवसर या अधिकार ) से करीब हजार हॉट (विस्फोटक) स्पॉट (स्थान-विशेष) जोन जोड़े जाएंगे। 1 लाख 20 हजार लोग एक साथ करेंगे वाई-फाई का मुक्त उपयोग।

अफ्रीका भाग-2:-

  • पिछले साल नई दिल्ली में तीसरा भारत-अफ्रीका फोरम सम्मिट आयोजिक किया था। इसमें 40 से अधिक अफ्रीकी देशों के प्रमुख और प्रतिनिधि भारत आए थे। इसके बाद अफ्रीकी देशों की यात्रा पर उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी गए। उपराष्ट्रपति के बाद राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी अफ्रीकी देशों की यात्रा पर गए। और अब, प्रधानमंत्री मोदी जी अफ्रीका की चार देशों की यात्रा पर गए। दरअसल मोदी के नेतृत्व में भारत की विदेश नीति में बहुत अधिक सक्रियता देखने को मिल रही है और उनकी यह यात्रा भी इसी सक्रियता को दर्शाती है। इस बार उनके फोकस में अफ्रीका है और वे अफ्रीकी देशों के साथ दव्पक्षीय संबंधें को प्रगाढ़ बनाने के लिए प्रयासरत है। भारत के रिश्ते अफ्रीका के साथ ऐतिहासिक, पारंपरिक और सांस्कृति भी हैं। इन रिश्तों को और बेहतर बनाने की दिशा में आगे बढ़ते हुए उन्होंने मोजांबीक पहुंच कर कई आर्थिक समझौते किए। मोजांबीक अफ्रीका का पूर्वी तट है और हिंद महासागर के किनारे बसा हुआ है। वहां पर प्रधानमंत्री भारत के लिए लिक्विफाइड नेचुरल गैस (एलएनजी) आयात के लिए समझौता किया है।
  • एलएनजी- दरअसल भारत अपनी जरूरत की 90 फीसदी एलएनजी कतर से आयात करता रहा हैं और मध्यपूर्व के इस देश में जबरर्दस्त अस्थिरता का माहौल रहा है। ऐसे में देश के लिए जरूरी था कि परेशानी के दौर में किसी और देश से भी एलएनजी के लिए सौदा किया जाए। इसके लिए मोजांबीक भारत के लिए बेहतर देश है। इस समझौते से हमें कतर से आनी वाली एलएनजी पर असमंजस की स्थिति से छुटकारा मिलेगा। हमें एक नया देश मिल गया है, जिससे हम आवश्यकता नुसार एलएनजी मंगा सकते हैं।
  • इसके बाद एक महत्वपूर्ण सौदा दलहन की पैदावार के लिए किया गया हैं दालों के मामले मेें भारत लंबे समय से आयात पर ही निर्भर रहा है। बढ़ती घरेलु मांग और भारत में दालों की पैदावार कम होने से दालों के भाव आसमान छू रहे हैं। तुअर की दाल 200 रुपए प्रति किलो के स्तर को छू चुकी है। इस दाल की पैदावार भारत अब मोजांबिक से जमीन खरीदेगा।

नोट-इसके विषय में पूर्व में इसका विस्तार बता चुके हैं जिसका विस्तार 10.8.2016 के निबंध में हो गया है।

  • उल्लेखनीय है कि अफ्रीका 54 देशों का समूह है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ये देश बहुत से मामलों में सामूहिक फेसले करते हैं। भारत के अफ्रीकी देशों से सामूहिक और दव्पक्षीय संबंधें का भी संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में समर्थन जैसे अन्य मुद्दों के लिए भी मिल सकता हैं। इन हालात का चीन पर भी असर पड़ेगा जब भारत अफ्रीका से सीधे बात करेगा।

अमरीका और चीन:-

  • दक्षिण चीन सागर यह प्रशांत महासागर का एक हिस्सा है। 35 लाख वर्ग किमी में फैला है। चीन के दक्षिण से ताइवान दव्ीप और मलेशिया के उत्तर पश्चिम से ब्रनेई तक, इंडोनेशिया के उत्तर में मलेशिया और सिंगापुर के उत्तर-पूर्व और वियतनाम के पूर्व तक है। दक्षिण चीन सागर के विवाद पर इंटरनेशनल ट्रिब्यूनल (अंतरराष्ट्रीय विशेष न्यायालय) ने चीन के एकाधिकार के दावे को खारिज कर दिया। न्यायालय ने कहा कि ’इस इलाके में चीन का अवैध कबजा है। यहां उसका कोई ऐतिहासिक हक नहीं हैं। चीन ने आइलैंड के स्कारबरो शोल (उथल पानी) स्प्रैटली आईलैंड पर एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक (अतिरिक्त अर्थशास्त्र/व्यापार) जोन बनाने का भी कोई हक नहीं है।’ चीन दक्षिणी चीन सागर की तथाकथित डैश लाइन (उत्साह/जोश रेखा) के अंदर आने वाले संसाधनों पर कोई काूननी दावा नहीं कर सकता है।
  • फैसला- फेसले के बाद अमरीका ने फेसले के स्वागत करते हुए इसे अंतिम और कानूनी रूप से बाध्य बताया है। वहीं चीन ने कहा है कि इस फेसले का कोई कानूनी आधार नहीं है। चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने इसे ढोंग बताया हैं, जबकि फिलीपींस ने फेसले का स्वागत किया हैं।
  • विवरण के अनुसार अमरीका ने चीन के खिलाफ और फिलीपीन्स के पक्ष में आए अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अदालत के फेसले को मानने की बात कही है अमरीका विदेश विभाग के प्रवक्ता जॉन किर्बी ने कहा, ट्रिब्यूनल के फैसले का चीन और फिलीपीन्स दोनों ही पालन करेंगे।
  • हालांकि चीन ने सुनवाई से ये कहते हुए हाथ अलग कर लिया कि इस मुद्दे पर फैसला सुनाना हेग के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा, चीन कभी समझौता नहीं करेगा और धमकी दी कि उनका देश मुसीबतों से नहीं डरता। हेग स्थित पांच -सदस्यीय जजों के फेसले के खिलाफ अपील नहीं की जा सकती। हालांकि अब फेसले को मनवाना उसके लिए मुमकिन नहीं है। इसका पालन संबंधित पक्षों की इच्छा पर निर्भर करता है।
  • विरोध- भारत, जापान अमरीका संयुक्त सैन्य अभ्यास के दौरान चीन ने विरोध जताया था। उसके विरोध करने के बाद तीनों देशों ने विरोध किया था।
  • पाकिस्तान- रेडियो पाकिस्तान के विवरण के अनुसार, पाक सरकार की तरफ से जारी बयान में कहा कि दक्षिण चीन सागर के मुद्दे पर पाकिस्तान चीन के साथ हैं। विदेश विभाग के प्रवक्ता नफीस जकरिया ने कहा, पाकिस्तान इस बात पर कायम है कि इस विवाद को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझना चाहिए।
  • समर्थन- भारत का पड़ोसी चीन अब खुलकर घुसखोरी पर उतर आया है। समुद्र कबजाने की उसकी नीयत उसे जैसे बेईमानी के पाताल की ओर ले जा रही हे। चीन पहले से ही नकली टापू बना रहा था, लेकिन अब उसने अपने पक्ष में 60 देशों को कर लिया हैं।
  • स्पार्टली आईलैंड -चीन ने फिलीपींस के स्कारबोरों शाल पर मछली मारने के पारंपरिक अधिकारों में दखल दिया। स्पार्टली आईलैंड के इलाके में 200 नॉटिकल मील के विशेष आर्थिक जोन का अधिकार चीन को नहीं। नकली दव्ीप बनाकर चीन ने कोरल रीफ को बेहद नुकसान पहुंचाया।
  • दावा-चीन यहां 90 प्रतिशत हिस्से पर अपना दावा करता रहा है। फिलीपींस ने चीन के खिलाफ पिटीशन दायर की थी। फिलीपींस का आरोप था कि इस इलाके में चीन ने रिसोर्सेस (संसाधन) का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल किया है। चीन लगभग समूचे दक्षिण चीन सागर पर अपना दावा करता रहा है। लेकिन वियतनाम और अन्य देशों के साथ हक जताने के बाद दक्षिण चीन सागर मेें बढ़ते विवाद को सुलझाने अमरीका भी कूद पड़ा था।
  • आधार- इंटरनेशनल कोर्ट (अंतरराष्ट्रीय न्यायालय) ने अपने फेसले में यूएन कन्वैंशन ऑन लॉ ऑफ द सी (कानूनी सभा में देख) को आधार बनाया। 1982 में बने यूएन कन्वेंशन ऑन लॉ ऑफ द सी के अनुसार कोई भी देश अपनी टेरिटोरियल (राज्यक्षेत्र -विषेयक) सोवेरिनटी बरकरार रखते हुए समुद्री सीमा के अंदर एक्टिविटी (तैयार) कर सकता है।
  • तेल और गैस-वियतनाम सरकार ने भारतीय कंपनी ओएनजीसी के साथ एक समझौता किया। इसके अनुसार ओएनजीसी वियतनाम के छोटे दव्ीपों में तेल और गैस की खोज करेगी। भारत ने एससीएस पर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के फेसले पर चुप्पी साध ली है। उसने कहा कि वह बहुत बारीकी से इसका अध्ययन कर रहा है।

नोट-इसका भी पहले विस्तार पूर्वक वर्णन 6.3.2016 के निबंध में हो चुका हैं।

  • एससीएस -दुनिया के एक तिहाई व्यापारिक जहाज यहीं से गुजरते हैं। भारत का 55 प्रतिशत समुद्री व्यापार यहीं से होता हैं। विश्व कारोबार के लिए अहम जहाज मार्ग एससीएस से गुजरता हैं। इस रास्ते पर करीब 700 अरब डॉलर का कोराबार निर्भर है। चीन विवादित दव्ीप पर फाइटर बेस (लड़ाकू तल/आधार) मान रहा हैं। यहां अमेरिका कई बार युद्धपोत भी भेज चुका हैं। जबकि, अंतरराष्ट्रीय लॉ (कानून) किसी भी देश को 12 नॉटिकल मील तक के क्षेत्र में जाने का हक देता है। फिर सीमा शुरू हो जाती हैं।
  • फिलीपींस- ने अपने तट से 140 मील के क्षेत्र पर चीनी कब्जे को खारिज करने की मांग की थी। 1940 के दशक के एक चीनी नक्शें के आधार पर वह इस क्षेत्र का अपना हिस्सा बताता है।

विवाद के कारण-निम्न हैं-

  • इस क्षेत्र में कई छोटे-बड़े दव्ीप हैं, जिन पर अधिकार को लेकर इलाके के देशों में विवाद चल रहा हैं।
  • स्प्रातली और पारासेल दव्ीप को लेकर चीन और अन्य 5 देशों के बीच तनाव हैं।
  • पारासेल पर 1974 तक चीन और वियतनाम का कब्जा था। 1974 में चीन काबिज हो गया।
  • 1970 में वियतनाम ने गैस भंडार का पता लगाया था, तब से चीन की नियत डोली।

तनाव- द हेग स्थित न्यायाधिकरण के फेसले पर चीन के विदेश मंत्रालय अमान्य हैं और बाध्यकारी नहीं हैं। हालांकि फेसले का अनुपालन संबंधित पक्षों की इच्छा पर निर्भर हैं और चीन इसे मानने से मना कर रहा है। इसलिए उसका सीधा असर चीन पर पड़ते हुए नहीं दिख रहा हैं। इसे लागू करवाना अदालत के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। अब देखना यह है कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति इस विषय को किस रूप में लेती हैं और चीन को अलग-थलग करने का प्रयास करती है। वैश्विक दल चीन दव्ारा अंतरराष्ट्रीय के फैसले को लागू नहीं करा सकती और न ही कोई सीधी कार्रवाई हो सकती है। हां उस पर आर्थिक व कूटनीतिक प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं जिससे चीन को आर्थिक नुकसान अवश्य होगा। ईयू और अमेरिका की तरफ से अभी तक ऐसी कोई प्रतिक्रिया नहीं आयीं हैं, इसलिए यह कहना मुश्किल है कि यह चीन पर कोई प्रतिबंध लगाएंगे। चीन की महत्वाकांक्षा ही तनाव की जड़ हैं।

न्यूयॉर्क और चेन्नई:-

  • स्थापना-इंफोस्पेस जनसमूह की स्थापना 2010 में अंतरिक्ष मामलों के विशेषज्ञ डॉ. बॉब रिसड्‌र्स, नवीन जैन और उद्यमी व अंतरिक्ष तकनीक के जानकार डॉ. बार्ने पेल ने मिलकर की थीं। अमरीका सरकार के संघीय विमानन प्रशासन ने अंतरिक्ष में यान भेजने और उसे चंद्रमा पर उतारने के लिए अनुमति मिल गई है।
  • मोक्ष व मून एक्सप्रेस (चंद्रमा विशेष उद्देश्य) - पवित्र गंगा के बाद अब चांद पर भी मोक्ष मिलेगा। अमरीका में रह रहे भारतीय नागरिकयों की इच्छा है कि उनकी अस्थियां चांद पर भेजी जाएं। भारतीय -अमरीकी जनसमूह मून एक्सप्रेस (चांद विशेष उद्देश्य) इस अस्थियों को अपने कमर्शियल (रेडियों पर विज्ञापन दव्ारा) अंतरिक्ष से चांद तक पहुंचाएगा। जनसमूह को अमरीका के फेडरेल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन (संघ विमानचालक संचालन) से लाइसेंस (अनुमति) भी मिल चुका हैं।
  • संस्थापक-मेरठ के रहने वाले एक भारतीय मूल के अमेरिकी जनसमूह के सह संस्थापक नवीन जैन बताते हैंं कि 2017 में चांद पर यान भेजा जाएगा। यह कमर्शियल सर्विस (सेवा) कार्गो की तरह काम करेगी। नवीन का इरादा चांद से हीलियम लाने का है। नवीन ने बताया कि चांद पर अस्थियां भेजने की मांग लगातार आ रही हैं। पहली बार किसी निजी जनसमूह को चांद पर मानवरहीत अंतरिक्ष यान भेजने की अमेरिका से अनुमति मिली हैं। अभी तक विभिन्न देशों के वैज्ञानिक ही जाते थे। पहली बार निजी संस्था चांद पर जाएगी।
  • शुल्क- 30 लाख अमरीकी डॉलर यानी 19 करोड़ 80 लाख रुपए प्रति किग्रा शुल्क लेंगे। जनसमूह का कहना है कि जो चीजें संभव होंगी, उन्हें चांद पर ले जाया जाएगा। इसके अलावा अगर कोई चांद पर मिलने वाले धातु या अन्य संसाधन की मांग करता हैं तो वहां से उन्हें लोगों के लिए धरती पर लाया जाएगा। हर पदार्थ के लिए अलग शुल्क तय होगा। मून एक्सप्रेस के लिए अब आकाश की सीमा नहीं रही। यह शुरुआत हैं। भविष्य में वहां से बहुमूल्य संसाधन, धातु और चंद्रमा के पत्थरों को यहां धरती पर लाने का सपना नवीन जी देखते है।
  • व्यापार- उत्तर प्रदेश (मेरठ) के सामान्य से परिवार में जन्में नवीन जैन का सपना धरती को छोड़ चांद पर व्यापार करना है। इससे पहले यह सिलिकॉन वैली नाम की एक सॅाफ्टवेयर जनसमूह में काम कर चुके हैं।
  • पहला रोबोटिक यान- अमरीका के इस महत्वपूर्ण नीतिगत फेसले के बाद मेरठ के नवीन जैन की मून एक्सप्रेस को चंद्रमा की सतह पर पहला रोबोटिक यान भेजने का अधिकार मिल गया हैं। इससे पहले कोई भी निजी अंतरिक्ष यान धरती की कक्षा से बाहर नहीं भेजा गया हैं। बाह्य अंतरिक्ष में अभी तक जो भी अंतरिक्ष यान गए हैं वे सरकारी एजेंसियों (कार्यकताओ) की ओर से ही भेजे गए हैं।

वियतनाम:-

  • पिछली 20-25 सालों में एशिया के कौन-से देश ने ज्यादा तरक्की की, किस देश के लाखों लोग गरीबी रेखा से बाहर आए? ज्यादातर लोग इन सवालों का जवाब चीन और भारत को मानते होंगे। लेकिन इसके उत्तरों में एक ऐसे देश का नाम भी हैं, जिसने न केवल अच्छी तरक्की हासिल की, बल्कि अब वह उज्जवल भविष्य के सपने संजो रहा है।
  • यह वियतनाम है, 9 करोड़ की आबादी वाला देश। 1990 के बाद उसकी प्रति व्यक्ति ग्रोथ रेट (विस्तार कीमत) विश्व में चीन के बाद दूसरे नंबर पर रही है। अगर यह अगले दशक में 7 फीसदी की ग्रोथ रेट बनाए रखता है, तो यह अर्थव्यस्था के ’एशियन टाइगर’ कहलाने वाले दक्षिण कोरिया और ताइवान के रास्ते पर चल पड़ेगा। कारखानों के आधुनिकीकरण से इसे उन परिस्थितियों से उबरने में मदद मिली, जहां कभी विनिर्माण क्षेत्र मानव पर निर्भर था। वियतनाम ने वैश्विक अर्थव्यवस्था के खुलेपन का भी लाभ उठाया। यह देश खुशनसीब हैं कि वह चीन के प्रवेश दव्ार पर स्थित है, जहां जनसमूह कम लागत के विकल्प तलाशती हैं। विदेशी जनसमूहों को आकर्षित करने के लिए उसने कारोबार नियम आसान किए। इससे विदेशी जनसमूहों को कम लगात पर निर्माण ईकाईया स्थापित करने में सुविधा हुई। ऐसी राहत मिलने के चलते वियतनाम में विदेशी जनसमूहों की भरमार हो गई और निर्यात दो-तिहाई बढ़ गया।
  • वहां की सरकार ने सभी 63 राज्यों को प्रतिस्पर्धा के लिए आगे कर दिया। इससे हो ची मिहृ सिअी ने उद्योग पार्क में बाजी मारी, तो दानांग ने हाई-टेक सिटी (उच्च शहर) का दर्जा हासिल किया। इसी तरह उत्तरी राज्यों ने माल बनाने में समृद्धि हासिल की है। इस तरह की विविध अर्थव्यस्था के परिणामस्वरूप पूरे देश में समृद्धि आई और 2011 से ही देश के संपत्ति बाजार में उछाल आ गया। यह भी संयोग हैं कि यह देश शिक्षा के क्षेत्र में भी उतना ही ध्यान दे रहा है। 15 वर्षीय वियतनामी किशोर अपने जर्मन समकक्ष के बराबर ही गणित और विज्ञान जानता है। वियतनाम विद्यालयों पर भी दूसरे समकक्षों के बराबर राशि खर्च करता है। उसका पूरा ध्यान बेसिक्स पर है, यानी ज्यादा से ज्यादा बच्चों का विद्यालयों में प्रवेश और अध्यापकों का समय-समय पर प्रशिक्षण में।

- Published on: September 7, 2016