दैनिक भास्कर के माध्यम से विश्व ’जल सत्याग्रह’ (Water Satyagraha Effort - Essay in Hindi) [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना: - पानी को पानी की तरह बहाने का ही नतीजा है कि देश के 12 राज्य एक-एक बूंद पानी को तरस रहे हैं। केंद्र सरकार खुद मान रही है कि देश की एक-चौथाई यानी 33 करोड़ की आबादी सूखे की चपेट में है इसलिए पानी को तरस रहे है 33 करोड़ लोग। जलसंकट की ये बोलती बातें पिछले 20 - 22 दिनों के दौरान देशभर से जुटाई गई हैं, जो पूरी स्थिति बयां कर रही हैं। हमारे सामने अब एक ही रास्ता है-पानी चाहिए तो अभी से पानी बचाइए।

झारखंड: - यहां पर 10 साल में धरती का पानी खत्म हो जाएगा।

झारखंड जब राज्य बना था तो वहां 75 हजार कुएं थे। अब सिर्फ 10 हजार बचे हैं। भूजल स्तर 1500 फीट तक गिर चुका है। 15 साल में 18 मीटर तक जलस्तर गिरा है। भूगर्भ विभाग ने तो चेतावनी दे दी है कि महज 10 साल में जमीन के भीतर का पानी खत्म हो जाएगा। राजधानी रांची को पानी पिलाने वाले हटिया बांध में सिर्फ 20 दिन का पानी बचा हुआ है। इसलिए पुलिस की रखवाली में पानी का बंटवारा हो रहा हैं।

झारखंड बोकारो जिले के झगराहीबाद गांव की बात है। यहां चंद्रपुरा-धानबाद रास्ते पर स्थित यह गांव राजधानी से 180 किमी की दूरी पर है। आज भी यहां के लोगों को पीने के पानी के लिए इस रास्ते पर चलने वाले बालू लदे ट्रकों से बूंद-बूंद गिरते पानी पर निर्भर रहना पड़ता है। इस पानी में कीटाणु भी काफी होते हैं। इससे यहां के लोगों में पेट संबंधी बीमारी की चपेट में आ रही है। यहां के लोग कहते है कि झारखंड अलग राज्य बनने के 16 वर्ष बाद भी यहां शुद्ध पेयजल की व्यवस्था नहीं हो सकी।

छत्तीसगढ़: - राज्य के 27 में से 25 जिले सूखाग्रस्त हैं। इनमें से पांच जिले बालोद, बेमेतरा, कवर्धा, राजनांदगांव और बलरामपुर की हालत बहुत खराब है। यहां गांवों में भी टेंकर से पानी पहुंचाया जा रहा है। गरियाबंद सुखतेल नदी सूख गई है। चार-पांच किमी दूर से आई महिलाएं बालू हटाकर गड्‌डे खोदती हैं इसे झिरिया कहते हैं। कुछ देर इंतजार के बाद इसमें पानी उतरता है। जिसे जमाकर गांव ले जाती हैं। मीलों पैदल चलकर आधा घड़ा पानी जुटा पा रही हैं। सौराष्ट्र के राजकोट, जामनगर और अमरेली जिलों के गांवों में 7 से 18 दिन के अंतराल पर पानी दिया जा रहा है। ये वो बातें हैं जो सामने आई हैं। कई गांवों में तो इससे भी भयावह स्थिति है।

महाराष्ट्र: -लातूर में ट्रेन से पानी, राज्य के 20 जिलों में सूखा

20 जिलों में सूखा है। 90 लाख किसानों के पास फसल के लिए पानी नहीं है। हफ्तेभर पहले लातूर को 5 लाख लीटर पानी ट्रेन से पहुंचाया गया। महाराष्ट्र में पहली बार ऐसा हुआ है। यह विदर्भ हैं। गांव से तीन किमी चलने के बाद जमीन के नीचे बूंदभर पानी मिल रहा है। महाराष्ट्र में पानी संकट गहराता जा रहा है। राज्य के सभी जलाशयों में इस समय सिर्फ 17 फीसदी पानी उपलब्ध है। इस बीच, बॉम्बे उच्च न्यायालय की औरंगाबाद खंडपीठ ने शराब कंपनियों को 60 फीसदी और अन्य उद्योगों का 25 फीसदी पानी कटौती करने का महत्वूपर्ण आदेश दिया है। राज्य में पानी का भीषण संकट देखते हुए औरंगाबाद खंडपीठ में याचिका दाखिल की गई थी। महाराष्ट्र के कई हिस्सों में गंभीर जल संकट के मद्देनजर राज्य सरकार ने वहां के 29, 000 से ज्यादा गांवों में सूखा घोषित कर दिया है। इनमें अधिकतर मराठवाड़ा और विदर्भ में आते हैं। सरकार ने बुधवार को एक शुद्धिपत्र जारी कर स्पष्ट किया था कि जहां भी ’सूखे जैसी स्थिति’ का जिक्र किया गया था, उसे ’सूखा’ पढ़ा जाएगा।

आंध्रप्रदेश: - भूजल स्तर दोगुने से ज्यादा नीचे जा चुका है-

सूखे का तीसरा साल है। तेलंगाना के बाद गर्मी से सबसे ज्यादा मौते इस राज्य में हो चुकी हैं। 13 जिलों में धरती के भीतर जलस्तर दुगुनी गहराई में पहुंच चुका है। इसलिए न कुएं और न हीं नलकूप काम कर रहे हैं। यहां अब तक सबसे बड़ा सूखा प्रभावित क्षेत्र घोषित किया गया है।

गुजरात: - सौराष्ट्र के कई जिलों में 7 से 18 दिन बाद मिल रहा पीने का पानी।

राज्य के 33 में से 14 जिले प्रभावित है। सौराष्ट्र के राजकोट, जामनगर, अमरेली सहित कई जिलों में पानी 7 से 18 दिन के अंतराल में पहुंच रहा है, नदी, तालाब, सूख चुके हैं। टेंकरों की मदद ली जा रही है। तीसरे साल भी फसल बरबाद हो चुकी है। जगोला नामक गांव में लोग खाली घड़े लेकर कई घंटों तक इंतजार करते रहते हैं। अमरेली नल छोड़िए, अगर बूंद-बूंद पानी रिसे तो बांध को खाली होने में ज्यादा समय नहीं लगता है। सौराष्ट्र का शेलदेदुमल बांध लीकेज (रिसने) की वजह से खाली हो गया है। 7 करोड़ घन मीटर की क्षमता का यह बांध दो साल से भरा जा रहा था। सिंचाई विभाग के अधिकारी एम. एस. हाला के मुताबिक नहर में पानी छोड़ने के दरवाजे में लगी रबर के खराब होने से यह खाली हो गया। 4 महीनों से रिसाव जारी था। इससे 14 गांव संकट में आ गए हैं।

तेलगांना: - 30 साल में पहली बार हैदराबाद सूखा।

तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद। 30 सालों में पहली बार यहां पानी का संकट भयानक हो गया है। इस शहर पानी सप्लाई (आपूर्ति करना) करने वाले प्रमुख चार बांध सूख चुके हैं। गांवों में संकट और भी भीषण है। पीने का पानी लाने के लिए लोगों को 5 से 10 किमी तक जाना पड़ रहा है। राज्य के 10 में से 6 जिलों में सूखा घोषित किया जा चुका है। कर्नाटक के बेलगाम जिले के तरिहाल गांव में सिर्फ एक कुएं में पानी बचा हैं।

मध्यप्रदेश: - सूखाग्रस्त घोषित हो चुके 51 में 40 जिले हैं। टीकमगढ़, सागर, पन्न, छतरपुर, दमोह की हालत सबसे खराब है। यहां 3 से 4 किमी चलकर पानी लाना पड़ता है। तालाबों की सुरक्षा में निजी गार्ड भी लगाए गए हैं।

मध्यप्रदेश के रतलाम जिले से 35 किमी दूर आदिवासी बाहुल्य गांव खाखराकुड़ी है। गांव के हैंडपंप और कुएं सूख चुके हैं। अब बारिश आने तक यह तालाब ही उनकी आखिरी उम्मीद है। इस तालाब से मवेशी प्यास बुझाते हैं। पानी काफी गंदा है। पानी को छानने के लिए गांव के लोगों ने तालाब के आसपास गड्‌डे खोद दिए। इसमें तालाब से रिसकर पानी आता है और फिर गांव के लोग भरकर ले जाते हैं। पानी इतना कम आता है कि एक घड़ा भरने में एक घंटे से ज्यादा समय लगता है। म. प्र. के कई गांवों में गहरी गुफाओं में एक-एक मटका पानी ढूंढा जा रहा है।

राजस्थान: - राज्य के 33 में से 19 जिले सूखे हैं। 15 हजार गांवो में तो टेंकरो से पानी पहुंचाया जा रहा है। भीलवाड़ा को पानी पहुंचाने के लिए तो अभी से ही पानी की रेल चलने लगी है। पहले मई से चलती थी। बांसवाड़ा के कटुंबी गांव के लोग सूखी नदी के पेट से पानी निकाल रहे हैं।

नोट: - नलगोंडा (तेलंगाना), बुंदेलखंड (यूपी), बीड़ (महाराष्ट्र) -यहां खाली कुओं में बाल्टी नहीं, बच्चे डालकर निकालना पड़ता है पानी।

अकाल: -आज की हकीकत हैं कि देश का पानी सूख रहा है। धरती पर भी और धरती के नीचे भी। 12 राज्यों में तो अकाल जैसे हालात हो रहे हैं। मराठावाड़ा के परभणी कस्बे में पानी के लिये झगड़ा न हो इसलिये अप्रैल के पहले हफ्ते में धारा 144 लगा दी गई। मराठवाड़ा के ही कई क्षेत्रों में सूखे गड्‌डों में पानी की बूंदे तलाशी जा रही हैं। दूसरी और दक्षिण में कावेरी नदी का उद्रम स्थल तालकावेरी तक सूख चुका है।

देशभर से जुटाई गई भयावह जलसंकट की तथ्य और आकंड़े नियत है। साथ में जल विशेषज्ञों से बात कर रोजमर्रा की जिंदगी में पानी बचाने के आसान तरीके बताए गए हैं।

विवरण- एक विवरण बताती है कि 2040 तक देश में पीने का पानी खत्म हो जाएगा। लेकिन सच्चाई यही है। केंद्र की रिपोर्ट भी कह रही है कि देश के 91 बड़े जलभंडारों में सिर्फ 22 प्रतिशत पानी बचा है। यह कुल 34.08 अरब घन मीटर के बराबर बैठता है। हर भारतीय औसतन 90 लीटर पानी हर दिन उपयोग करता है। लातूर में 5 लाख लीटर पानी रेल से भेजा गया है। किसी छोटे शहर की आबादी 5 से 10 लाख होती है। हर व्यक्ति यहां कम से कम 1 लीटर पानी तो बर्बाद करता ही होगा। चाहे शेविंग हो या ब्रश या गाड़ी धोने में। यानी जितना पानी एक छोटा शहर रोज बर्बाद कर देता है, उतना पानी एक शहर की प्यास बुझाने को ट्रेन से भेजना पड़ रहा है। हम चेते नहीं तो कल हमारे शहर को भी यही दिन देखना होगा।

विश्व बैंक की विवरण के अुनसार भारत जैसे जल संकट वाले देशों का 2050 तक जीडीपीवी में 6 फीसदी तक ही हानि हो सकती है। भारत विश्व की 18 फीसदी आबादी है पर पानी के स्त्रोत सिर्फ 4 फीसदी हैं। अगर हम बढ़ती आबदी पर नियत्रण पर असफल रहे हैं तो पानी के प्रबंधन के नए तरीके अपनाने ही होंगे। एनसीएईआर की विवरण के अनुसार पानी के बेहतर प्रबंधन से खाद्य पदाथों के उत्पादन में दो फीसदी वुद्धि होने के साथ सिंचाई में 33 एमएच की बढ़ोतरी हो सकती है। इससे 34, 000 मेंगावाट जल-विद्युत का अतिरिक्त उत्पादन होने के साथ रोजगार में भी 4 फीसदी की बढ़ोतरी की संभावना है। इससे ग्रामीण समाज में एक नई कृषि क्रांति हो सकती है।

दुर्लभ: - वर्ल्ड वॉच इंस्टिट्‌यूट की वाइस प्रेसिडेंट (व्यसन अध्यक्ष) सेंट्रा पोस्टल कहती हैं पानी को पानी की तरह बहाना बंद करना होगा। यदि समाज पानी को एक दुर्लभ वस्तु नहीं मानेगा, तो आने वाले समय में पानी हम सबके लिए दुर्लभ हो जाएगा। इस स्थिति को अगर कोई संभाल सकता है तो सिर्फ हम। क्योंकि हम पानी बना नहीं सकते, सिर्फ बचा सकते हैं।

दैनिक भास्कर: - पानी बचाने की सोच के साथ आज 25 अप्रैल 2016 से अपने करोड़ों पाठकों के साथ मिलकर ’जल सत्याग्रह; जल है तो कल है’ शुरू कर रहा है। मकसद सिर्फ ये है कि आने वाले कल के लिए पानी बचाइए। आज जिसे हम सबसे व्यर्थ और सस्ती चीज समझ रहे हैं वो शायद कल सबसे ज्यादा और सबसे महंगी चीज होगी।

देश: - देश के 91 जलभंडारो में सिर्फ 22 प्रतिशत पानी बचा।

सीख: - पानी के विचार में महात्मा गांधी जी की सीख प्रस्तुत हैं-

महात्मा गांधी: - इलाहाबाद गए। मेजबानी जवाहर लाल नेहरु ने की थी। उनके घर आनंद भवन में ही ठहरे थे। एक सुबह हाथ-मुंह धोने के लिए बापू के सामने एक लोटा पानी लाकर रखा गया उठाते समय लोटा हाथ से छूट गया और सारा पानी ढुलक गया। इस पर बापू जी अफसोस जताने लगे, तो वहीं खड़े नेहरु जी ने कहा कि ’बापू आप इलाहाबाद में हैं। संगम की नगरी। आप एक लोटे पानी का पछतावा क्यों कर रहे हैं? दूसरा मंगवा लेते हैं।’ इस बापू ने कहा हां ’यहा बहुत पानी हैं इसका मतलब यह नहीं कि सब मेरा हैं। सबको सिर्फ अपने हिस्से का पानी इस्तेमाल करना चाहिए दूसरे का नहीं।’

तरीका: - 9 तरीके से घर में पानी बचाने के उपाय हैं-

  • घर का 75 प्रतिशत बाथरूम (नहाने का कमरा) में खर्च होता हैं। लीकेंज (गैस/रिसना) रोकें तो महीने में बचेगा 250 लीटर पानी-
  • मामूली लीकेज से ही हर महीने 250 लीटर पानी बर्बाद हो जाता है। पढ़ाई के मुताबिक लीकेज में एक नल से हर मिनिट 45 बूंद पानी टपकता है। यानी तीन घंटे में 1 लीटर से ज्यादा पानी बह जाता है। अक्सर शौचालय टैंक लीक करता रहता है। इसके रोक लिया जाए तो 5 हजार लीटर पानी हर महीने बच जाएगा। फ्लश (पानी का बहाव) के बदले बाल्टी का इस्तेमाल कर रोज करीब सौ से सवा सौ लीटर पानी बचा सकते हैं।
  • ब्रश करते समय नल बंद कर बचाएंगे 700 लीटर पानी- ब्रश करते समय वॉश बेसिन (हाथ धोने की जगह) का नल खुला है तो एक बार में 4 से 5 लीटर पानी बह जाता है। यानी महीने में 150 लीटर। चार लोगों के परिवार में 600 से 700 लीटर पानी ऐसे ही बर्बाद हो जाता है।
  • आरओ मशीन है तो साल में 14 हजार लीटर पानी बर्बाद हो रहा है, इस पानी का इस्तेमाल करें- घर में लगे मशीन से 1 लीटर पीने निकालने में 3 से 4 लीटर तक पानी बर्बाद हो जाता है। यानी 60 प्रतिशत से 75 प्रतिशत पानी की बर्र्बादी। इस हिसाब से अगर घर में रोज 10 लीटर पानी खपत हो रहा है तो 30 से 40 लीटर पानी हम बिना इस्तेमाल किए फेंक देते हें। यानी महीने में 1200 लीटर और साल में 14, 400 लीटर। इसका इस्तेमाल पेड़-पौधों को सींचने में, शौंचालय और गाड़ी धोने में किया जा सकता है।
  • वॉशिग मशीन (कपड़े धाने का यंत्र) -कपड़े दो जोड़ी धोएं या 10 जोड़ी, पानी उतना ही लगता है। इसलिए वाशिंग मशीन तभी उपयोग करें जब बहुत से कपड़े धोने हों। इससे हर महीने करीब 4500 लीटर पानी बच सकता है।
  • नहाने में शॉवर का प्रयोग न करें- एक बाल्टी पानी से नहाने लगें तो नहाने में पानी उपयोग 80 प्रतिशत बच जाएगा। देश की आजादी का 20 प्रतिशत भी ऐसा करे तो रोजाना 625 करोड़ लीटर पानी बचा सकते हैं।
  • बर्तन-नल के नीचे बर्तन धोने के बदले अगर बाल्टी या टब से पानी लेकर धोने से चार लोगों के परिवार में रोजाना करीब 20 से 25 लीटर पानी बच जाता है। बस आदत बदलने की बात है।
  • शेविंग- करते समय नल खुला दोड़ने से 5 से 7 ली. पानी बर्बाद होता है। इसके बजाय मग में पानी लेकर शेविंग करें। ऐसा करने से एक महीने में करीब 200 ली. पानी बचाया जा सकता है।
  • पाइप- से कार धोने में एक बार में डेढ़ सौ लीटर पानी खर्च होता है। जबकि बाल्टी में पानी लेकर कार साफ करें, तो महज 20 लीटर खर्च होगा। यानी हर बार आप करीब 130 लीटर पानी बचा सकते हैं।

पानी बचाने के पांच प्रकार के सिद्धांत: -1 रिस्पेक्ट ऑफ वाटर (पानी का आदर) 2 रिडियुश ऑफ वाटर 3 रिट्रिट ऑफ वाटर 4 रिसाइकल ऑफ वाटर 5 रियुश ऑफ वाटर (पानी का बार-बार प्रयोग करना)

नोट: - पानी का दो जगह अधिक उपयोग होता है। किचन व बाथरूम (रसोई व नहाने के कमरे में)

सामाजिक जिम्मेदारी: - शहरों में और अब सूखाग्रस्त इलाकों के गांवों में घरों तक पानी पहुंचाने का काम सथानीय निकायों के जिम्मे है। लेकिन पुरानी पाइपलाइन और तकनीकी के कारण 30 प्रतिशत से 40 प्रतिशत तक पानी पहुंचाने के दौरान बरबाद हो जाता है।

दिल्ली जैसे शहर में लीकेज के कारण रोज 35 करोड़ लीटर पानी बरबाद हो जाता है। इससे सालाना जल बोर्ड (पट्‌टा) को 1000 करोड़ रु. का नुकसान होता है। इसे ठीक कर लिया जाए तो 40 लाख लोगों की प्यास बुझाई जा सकती है।

हालात: - 2.65 लाख गांव ऐसे जिनके पास सुरक्षित पेयजल नहीं है। आजादी के समय ऐसे 225 गांव थे। देश के पास 40 वर्ष पहले तक 5 साल का पानी होता था ।

प्रयोग: - पानी की हर बूंद का महत्व समझने के लिए उत्कृष्ट विद्यालय के शिक्षक लोकेंद्र सिंह चौहान ने सामान्य लेकिन महत्वपूर्ण प्रयोग किया है। वे तीन घंटे तक नल के सामने बैठे रहे और पानी की बूंदो का आकलन किया। एक मिनिट में कुल 45 बूंद गिरी और इसी तरह तीन घंटे में जमा हुआ एक लीटर पानी। यानी 24 घंटे में 8 लीटर, 30 दिन में 240 लीटर और 365 दिन में 2920 लीटर पानी। प्रयोग का उद्देश्य विद्याार्थियों को केवल इतना बताना था कि घर में नल खराब होने से कितने लीटर पानी व्यर्थ बह जाता है। इसी प्रयोग को 8 विद्यार्थियों ने भी अपने घर पर किया। हालांकि उनके प्रयोग में बूंदो का आकार और उनके गिरने की गति भिन्न-भिन्न थी लेकिन परिणाम एक ही था।

आकलन: - प्रयोग मे जो आकलन किया गया उसके अनुसार सालभर में एक नल से 2920 लीटर पानी व्यर्थ बह जाता है। एक व्यक्ति को रोज की जरूरतें पूरी करने के लिए रोजाना औसतन 70 लीटर पानी चाहिए। इस लिहाज से 2920 लीटर पानी से 41 दिन की जरूरत की पूरी की जा सकती है।

लोकेंद्र सिंह का कहना है कि पानी का मोल समझने के लिए घर में बच्चों से यह प्रयोग कराना चाहिए। ताकि वे भविष्य के लिए पानी को सहेज सकें। घर में यदि नल से पानी टपक रहा है तो उसे दुरुस्त कराएं। बच्चों को भी अभी से पानी का महत्व समझाएंगे तो बच्चे इसके इस्तेमाल में भी सतर्क होंगे। जहां पानी का बहुत उपयोग हो रहा है, उसके खिलाफ आवाज उठाएंगे।

आबिद सुरती: - मशहुर कार्टुनिस्ट और चित्रकार आबिद सुरती अब लोगों को पानी बचाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। आप उन्हें मुंबई में टपकते नलों को ठीक करते हुए देखे सकते हैं। एक-एक बूंद बचाने के लिए उन्होंने ’ड्रॉप डेड’ नाम से एक संस्था भी बनाई है। वे बताते हैं ’ जब कभी वे दोस्त से मिलने उनके घर जाते और एक भी नल टपकता देखते तो उन्हें बहुत बुरा लगता है। दोस्त बताते है कि इतने छोटे से काम के लिए कोई प्लम्बर (नल वगैरह ठीक करने वाला व्यक्ति) नहीं आना चाहता है। अर्थाम नल ठीक करने वाला इसलिए उन्होंने ये मुहिम शुरू कर दी थी।

पानी बचा: - 97.5 प्रतिशत खारा पानी दुनिया में है। और 2.5 प्रतिशत पानी पीने लायक है। इसका 1.5 प्रतिशत हिस्सा ग्लेशियर के रूप में है। यानी लोगों के इस्तेमाल के लिए बचा सिर्फ 1 प्रतिशत पानी।

समवर्ती सूची: -सरकार राहत के लिए धन देती है। बचाव के लिए उपाय करती है। सिफारिश के मुताबिक केंद्र की भूमिका तभी ज्यादा कारगर हो सकती है, जब जल को समवर्ती सूची का हिस्सा बना दिया जाए। लोकसभा की जल संबंधी स्थायी समिति 2012 - 13 में भी ऐसी सिफारिश कर चुकी है। कई राज्यों के विरोध के चलते पहले से यह विषय विवाद में है।

केंद्र: - अगर पानी पर राज्यों के बदले केंद्र का हक कायम हो जाए तो बाढ़ और सूखा जैसी आपदाओं से बेहतर ढंग से निपटा जा सकेगा। यह सिफारिश लोकसभा की जलसंबधी स्थायी समिति ने की है। समिति का मानना है कि पानी को संविधान की समवर्ती सूची में शामिल किया जाना चाहिए। हाल ही सूखा संकट पर राज्यसभा में चर्चा के दौरान जदयू के शरद यादव सहित कई सांसदों ने यह मांग की थी। जल संसाधन मंत्री उमा भारती ने भी इसका समर्थन किया था। राजस्थान व गुजरात सहित कुछ राज्यों को भी इस बात से कोई आपत्ति नहीं है। कि पानी पर केंद्र का हक हो। राज्य बस ये चाहते है कि उनका भी ध्यान रखा जाना चाहिए। लेकिन बिहार ने साफ तौर पर कहा कि पानी का हक राज्य के ही पास होना चाहिए।

स्थायी समिति ने अपनी सिफारिश में बाढ़ और सूखे पर खास चिंता जताई है। समिति का कहना है कि पानी के राज्य सूची में शामिल रहने के कारण बाढ़ प्रबंधन में केंद्र की भूमिका सीमित हो जाती है। केंद्र और राज्य के बीच बेहतर समन्वय स्थापित कर बाढ़ को रोकने या क्षति कम करने के कदम उठाने जैसी सिफारिश भी इसमें शामिल है। बाढ़ के दौरान केंद्र की भूमिका को और अधिक कारगर बनाने की बात कही गई है। फिलहाल बाढ़ के दौरान केंद्र सरकार सिर्फ मदद करती है।

राजस्थान सहित कुछ राज्य सहमत, कुछ विरोध में-

पक्ष में: -

  • राजस्थान- जल संसाधन मंत्री डॉ. रामप्रताप ने कहा-यूं तो इस मसले पर मुख्यमंत्री ही निर्णय लेने में सक्षम हैं। लेकिन मंत्री होने के नाते मेरी राय है कि पानी पर केंद्र का हक बेहतर रहेगा। इससे राज्यों के आपसी जल बंटवारें के विवाद समाप्त होंगे।
  • गुजरात- जल संसाधन मंत्री बाबूभाई बोखीरिया ने कहा कि राज्यों को समान पानी मिलने पर समान विकास के अवसर मिलेंगे। हालांकि फिर साधा जवाब देते हुए बोले-केंद्र के विरोध या समर्थन का फैसला मेरे अकेले का नहीं हो सकता है। यह गुजरात सरकार का निर्णय होगा।
  • हरियाणा- कृषि-सिंचाई मंत्री ओमप्रकाश धनखंड ने कहा -हमारी तो मांग ही यही है कि पानी पर केंद्र का हक होना चाहिए। अभी पानी को लेकर दो या दो से अधिक राज्यों में विवाद रहता है। केंद्र के हक के बाद ऐसे विवाद अपने आप ही समाप्त हो जाएंगे।
  • छत्तीसगढ़- जल संसाधन मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने कहा- केंद्र की अच्छी योजनाओं कोई आपत्ति नहीं है, बशर्ते राज्य के हित सुरक्षित बने रहें।

विपक्ष में-

  • बिहार- जल संसाधन मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह ने कहा कि जल पर राज्य का अधिकार किसी सूरत में नहीं माना जाएगा। हम समिति की सिफारिश का विरोध करेंगे। अगर पानी के मुद्दे पर केंद्र ज्यादती करेगा तो न्यायालय जाने से भी नहीं हिचकेंगे।
  • मध्यप्रदेश- जल संसाधन मंत्री जयंत मलैया ने पहले कहा- पानी को समवर्ती सूची में शामिल किया जाना चाहिए, फिर बचते हुए कहा कि इस बारे में जब तक अध्ययन नहीं कराया जाता है, तब तक कुछ भी नहीं कहा जा सकता।
  • झारखंड- पेयजल व जलसंसाधन मंत्री प्रकाश चौधरी ने कहा कि अभी यह सिफारिश ही है। अगर सिफारिश राज्य के हित में नहीं हुई या इससे कोई अहित दिखा तो केंद्र सरकार से बात करेंगे।

सरकार: - देश के 256 जिलों के 33 करोड़ से अधिक सूखे से पीड़ित लोगों के कल्याण हेतु सरकार की चेतना को जागृत करने के लिए प्रबुद्ध समाजसेवियों दव्ारा देशव्यापी जल सत्याग्रह का है। संविधान के अनुच्छेद -262 और केंद्र सूची की प्रविष्टि-56 में दिए गए अधिकार के बावजूद पानी और नदी पर केंद्र सरकार का कोई अधिकार नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले की गंभीरता 30 वर्ष पहले 1986 में ही समझते हुए भू-जल पर केंद सरकार के अधिकार पर जोर दिया था। संसद की लोक लेखा समिति की 2014 - 15 की 8 वीं रिपोर्ट में जल-प्रदुषण की चर्चा करते हुए पानी को समवर्ती सूची में लाने की बात की गई है। भाजपा तथा टीआरएस के कुछ सांसदों ने पानी को समवर्ती सूची में लाने के लिए निजी बिल भी पेश किए हैं। अगर शिक्षा, बिजली, व चिकित्सा जैसे विषय संविधान की समवर्ती सूची में है तो उसी तर्ज पर पानी भी संविधान की समवर्ती सूची में लिया जाना चाहिए।

राज्य: -जल अभी राज्य का विषय है। समवर्ती सूची में शामिल होने के बाद राज्य के साथ केंद्र सरकार भी पानी से जुड़े कानून बना सकती है। कानून के विषय सामान्य हुए तो केंद्र का कानून ही मान्य होता है। केंद्र के कानून के अस्तित्व में आने के साथ ही राज्य सरकार का पहले से बना कानून स्वत: ही समाप्त हो जाता है। केंद्र पर पानी का हक होने पर इसका बंटवारा भी वही करेगा। हालांकि राष्ट्रीय हित के नाम पर अभी भी केंद्र सरकार को समवर्ती सूची के विषयों में कानून बनाने का हक है। लेकिन, राज्यों के विरोध के चलते वह ऐसा नहीं कर पा रही है।

आपदा से निपटने के लिए न्यायालयों को हस्तक्षेप तभी करना पड़ता है जब सरकारें अपनी जिम्मेदारी से दूर भागने लगती हैं।

पानी बचा: - 97.5 प्रतिशत खारा पानी दुनिया में है। और 2.5 प्रतिशत पानी पीने लायक है। इसका 1.5 प्रतिशत हिस्सा ग्लेशियर (हिमनदी) के रूप में है। यानी लोगों के इस्तेमाल के लिए बचा सिर्फ 1 प्रतिशत पानी।

भू-जल स्तर: - बढ़ती आबादी के कारण भू-जल स्तर खतरनाक तरीके से नीचे गिर रहा है। नदियां सिकुड़ती जा रही है। देश में 6.607 ब्लॉक्स हैं जिनमें 2, 000 ब्लॉक्स में पानी के अत्यधिक शोषण से हालत गंभीर हो गई है। बढ़ती आबादी और उपभोग से आजादी के 70 साल बाद देश में पानी की प्रति व्यक्ति उपलब्धता एक-चौथाई ही रह गई है। पिछले साल लगभग 2015 में 1879 अरब घन मीटर सालाना पानी उपलब्ध था, जिसमें सिर्फ 1123 अरब घन मीटर का ही इस्तेमाल हो पाया था। बकाया पानी के बेहतर प्रबंधन एवं इस्तेमाल के लिए देशव्यापी नजरियेे की जरूरत है। क्योंकि पानी राज्यों की सीमाओं के राजनीतिक भूगोल को नहीं समझता है। प्रगतिशील राज्यों ने इस बात को पहले ही समझ लिया था। जिस कारण बांध सुरक्षा विधेयक 2010 हेतु बंगाल और आंध्र प्रदेश की सरकारों ने केंद्र सरकार को पानी के बारे में कानून बनाने का अधिकार दे दिया था। सुखे पर केंद्र सरकार की मदद मांगने वाले राज्य पानी को समवर्ती सूची में लाने का विरोध कैसे कर सकते हैं? अभी हाल ही में 2016 में 10 राज्यों ने सूखे से निपटने के लिए केंद्र सरकार से 42.143 करोड़ रुपए मांग की है। पंजाब दव्ारा सतलज जल संधि के उल्लंघन पर हरियाणा ने केंद्र सरकार और सर्वोच्च न्यायालय के सम्मुख अधिकारों के संरक्षण की गुहार लगाई थी, जिससे पानी पर केंद्र सरकार के अधिकारों के सरंक्षण का तर्क संगत मामला बनता है।

नदियां: - सर्वोच्च न्यायालय के सम्मुख 2002 में एक रोचक मामला आया, जिसमें नदियों के राष्ट्रीयकरण की बात करते हुए उन्हें आपस में जोड़ने की बात थी। नदियों को जोड़ने की योजना कांग्रेस के शासन काल में के. एल. राव ने 1972 में बनाई थी। इस योजना को अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने मूर्तरूप देते हुए टास्कफोर्स (कार्य सेना) का गठन किया, जिसके मुखिया सुरेश प्रभु बनाए गए थे। जनहित याचिका में दस साल की लंबी सुनवाई के बावजूद 2012 के आदेश में सर्वोच्च न्यायालय ने नदियों के राष्ट्रीयकरण के बारे में कोई भी स्पष्ट ओदश नहीं पारित किया। क्रियान्वयन में क्लिंब से प्रोजेक्ट (स्तंभ से योजना) की लागत कई गुना बढ़कर 11 लाख करोड़ से अधिक पहुंच गई है। और इसका क्रियान्वयन इसलिए नहीं हो पा रहा है। क्योंकि राज्य पानी की अधिकता को मानने के लिए तैयार नहीं है। पर्यावरण, विस्थापन एवं अन्य कारणों से इस योजना के खिलाफ आशंका व्यक्त की जा रही है। विरोध के आधार पर योजना रोकने के बजाय समस्याओं का निराकरण होना आवश्यक है। योजना में क्लिंब से बुंदेलखंड, विदर्भ, कालाहांडी और मराठवाड़ा जैसे इलाकों में भयानक मानवीय त्रासदियां पैदा हो रही हैं। जिस कारण से देश में पानी का आपातकाल लागू करने की बात होने लगी है। अर्थव्यवस्था के फेलाव में जैसे खनिज पदार्थों का स्थानान्तरण होता है वैसे ही मानवीय समाज को बचाने के लिए पानी का नदियों से स्थानांनतरण हमारे अस्तित्व के लिए जरूरी ही नहीं बल्कि मजबूरी भी है।

राजनेता: - सूखती नदियों की बड़ी जवावदेही राजनेताओं की है, जो राज्यों में संगठित तौर पर अवैध माइनिंग करवाते हैं। सूखाग्रस्त इलाकों में पानी के कारोबार से भी राजनेता संपन्न हो रहे हैं। राज्यों के बीच पानी की लड़ाई से किसानों की फसल को फायदा हो या न हो पर दलों की चुनावी फसल जरूर अच्छी हो जाती है। पानी राष्ट्रीय संपत्ति है, इसके लिए बेहतर उपयोग के लिए केंद्रीय नियमन होना ही चाहिए। संसद में कई महत्वपूर्ण विषयो पर गतिरोध है पानी को समवर्ती सूची में लाने के बारें संविधान संशोधन कानून को सभी दलों का समर्थन मिलेगा, यह उम्मी तो प्यासा देश ही कर सकती है। राजनीतिक मतभदों को भूलाकर पानी के कानून को पारित करके क्या राजनेता देश को जोड़ पाएंगे? पानी के आपातकाल के इस भयानक दौर में सामूहिक विमर्श और सहमति ही देश के पानी और खुशहाली को बचा सकती हैं।।

पत्रकार: - ’एव्हरीबडी लव्स ए गुड ड्राउट’ पत्रकार पी. साईनाथ की ग्रामीण गरीबी पर कुछ वर्षों पूर्व लिखी किताब है। इसका शीर्ष जिज्ञासा जगाता है कि सूखा कैसे हर किसी को प्रिय हो सकता है? पिछले कुछ हफ्तों में प्राइम (प्रधान) टेलीविजिन ने भी जलसंकट और किसानों की आत्महत्याओं की समस्याएं ’खोज’ निकाली हैं, वरना ग्रामीण भारत के लिए तो इसमें बहुत कम गुंजाइश होती है। इसका कारण है आईपीएल मैच जिसके प्रत्येक मैदान के रखरखाव के लिए 40 से 60 लाख लीटर पानी खर्च होगा। क्या इस पानी का उपयोग विदर्भ और मराठवाड़ा के सूखा प्रभावितों को राहत देने नही किया जाना चाहिए। एक समय ऐसा भी जब बीसीसीआई सूखा और बाढ़ राहत के लिए चैरिटी मैच कराता था। इसलिए यह सोचने वाली बात है कि आईपीएल के कर्ताधर्ताओं की ज्यादा रुचि अपने संस्था कर्तव्यों की बजाय यह तय करने में है कि कमेंट्री बॉक्स (किसी जगह घटना का आंखों देखा हाल या वर्णन करना) में कौन होना चाहिए। इसमें अन्य कारण में गन्ने पर भारी निर्भरता वाले महाराष्ट्र के फसलों के पैटर्न (नमूना) को ही लें। राज्य का आधा से ज्यादा सिंचाई जल उस फसल में जाता है, जो सिर्फ छह फीसदी सिंचित क्षेत्र में है। कुछ अनुमानों के मुताबिक गन्ने को ’180 एकड़ इंच’ पानी लगता है या कहें कि प्रति एकड़ 1.80 करोड़ लीटर पानी, जो गांवों में तीन हजार परिवारों की महीने भर की जरूरत के लिए काफी है। कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी सरकार ने पिछले दशक में सिंचाई के लिए 70, 000 करोड़ रुपए का बजट रखा था, लेकिन इस अवधि में सिर्फ 0.1 फीसदी जमीन सिंचित हो पाई है। भाजपा इस आश्वासन के साथ सत्ता में आई कि राज्य के सिंचाई विभाग में भ्रष्टाचार करने वालों को जवाबदेह ठहराया जाएगा। अब तक तो मुख्य दोषियों में से किसी को छुआ भी नहीं गया है। बीड के पास गांव पोई टांडा में पिछले साल 20 से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की अच्छे इरादे से लाई गई जलयुक्त शिवार योजना को अभी यहां पहुंचना है।

अमृत कलश: - पूरा मध्य भारत तेज गर्मी की चपेट में है। मई-जून में भीषण लू चलने की चेतावनी मौसम विभाग ने दी है। यानी अगले दो महीने कष्ट भरे होने की आशंका है। राहत की बात है तो बस इतनी कि इस बार मानसून सामान्य से अधिक रहने वाला है। भारतीय मौसम विभाग की भविष्यवाणी के अुनसार इस बार दक्षिण एशिया में पिछले दो साल से सूखे का मुख्य कारण अलनीनों कम जोर पड़ रहा है। और इसके ठीक विपरत यानी अच्छी वर्षा का कारण ला-लीना प्रबल हो रहा है। मानसून के दौरान 106 फीसदी वर्षा होने की उम्मीद है जो कि सामान्य 94 - 104 फीसदी से ज्यादा है। पिछले सालों में वर्षा औसत (89 प्रतिशत) या उससे कम ही रही। कारण देश के 14 से ज्यादा राज्य सूखे की चपेट में आ गए। सैकड़ों किसान कम उपज और बढ़ते कर्ज के कारण आत्महत्या करने को मजबूर हो गए है। अब अच्छे मानसून ने किसान ही नहीं, आम आदमी, व्यापारी, बाजार और सरकार को भी अच्छे दिनों की उम्मीद जगाई है। लेकिन ये अच्छे दिन आएंगे कैसे? इसके लिए अभी से सबको प्रयास करने होगें। राज्य सरकारों को अभी से कमर कस लेनी होगी कि आसमान में बरसने वाला अमृत कहीं वयर्थ ही नालों, नदियों से होता समुद्र में न चला जाएं। भयंकर बाढ़ और आपदा का कारण न बन जाए। बल्कि हम कैसे ज्यादा से ज्यादा जल सहेज सके।

हालांकि राज्य सरकारें राजनेताओं और रसूखदारों के आगे बेबस दिखाई देती है। पिछले साल में हुई कम वर्षा से अनेक जल स्त्रोत, बांध सूख कर अतिक्रमणों के शिकार हो गए। सुप्रीम न्यायालय ही नही उच्चन्यायालय के आदेशों के बावजूद सरकारें अभी तक इन ’अमृत कलशों’ को अपने मूल रूप में नहीं ला पाई हैं। कहीं मत आड़े आए तो कहीं भ्रष्ट तंत्र और कहीं रसूखदारों की मनमानी। लोकतंत्र में ऐसा नहीं होना चाहिए।

उपाय: -यदि सरकारें और नगरीय निकाय अभी से राज्यों में बाधों, तालाबों, पोखरों, बावड़ियों, कुओं और एनिकटों को मरम्मत कर तैयार कर लें। ताकि एक बूंद भी वर्षाजल व्यर्थ न जा सके। नगरीय निकाय शहरों की लालियों, लानों की साफ-सफाई कर लें। जल पुनर्भरण ढांचे जहां बने है इन्हे दुरुस्त करवा लें। जहां नए बनने है वहां पहली बारिश से पूर्व तैयार करवा लें ताकि मानसून जब झूमकर बरसे तो किसी के लिए हादसे का सबब न बन जाए।

बजट: - पेयजल संकट से निपटने के लिए हर राज्यों में हर साल करोड़ों-अरबों रुपए खर्च होते हैं। कहीं बड़े-बड़े बांध बनते हैं तो कहीं नहरों और तालाबों का निर्माण कराया जाता है। सूखे की सर्वाधिक मार झेल रहे महाराष्ट्र में पिछले डेढ़ दशक में सैंकड़ों बांध-जलाशय बनाए गए हैं। लेकिन कई तो कागतों में ही बनकर रह गए और जो वाकई बने वे खाली पड़े हैं। इसे पीछे दोषी कौन है? नेता और अफसरों की मिलीभगत से खेले जाने वाले खेलों का नुकसान आखिर जनता को ही भुगतना पड़ता है। आकलन कराए बिना बनने वाले बांधों पर लगात तो लग जाती है लेकिन उसका उपयोग हो नहीं पाता है।

उपसंहार: -अगर सरकारे जनता के दुख-दर्द को समझकर उसके अनुरूप कार्य करें तो न्यायालयों को ऐसे मुद्दों पर दखल देने की जरूरत ही न परें। सरकारों में सभी अधिकार निहित है। इनका प्रयोग हो। जल स्त्रोतों की राह खुले। अतिक्रमण पूरे दम से हटाएं जाएं। अधिकाधिक पौधारोपण हो ताकि भविष्य में भी अच्छा मानसून आता रहे। पर्यावरण शुद्ध रहे। मानसून इस बार अच्छा रहा और सभी बांध तालाब लबालब हो गए तो फिर खेत भी लहलनाएगें, वनों में स्थाई हरियाली होगी। तब किसान, बाजार और उद्योग ध्धों ही नहीं पूरे देश के अच्छे दिन आ जाएंगे। मौका अच्छा है, इच्छाशक्ति दिखा दें।

- Published on: June 10, 2016