वर्ल्ड हेरिटेज डे (विश्व पैतृक संपत्ति का दिन) (World Heritage Day in Hindi) [ Current Affairs ]

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प्रस्तावना: - यूनस्को हर साल वर्ल्ड हेरिटेज डे को हर साल 18 अप्रेल को मनाता है। इस बार की थीम ’हेरिटेज ऑफ स्पोट्‌र्स’ (पैतृक संबंधी खेल) है। ऐतिहासिक स्थलों व स्मारको को खेल के माध्यम पहचान दिलाने व मानव जीवन के सुधार में खेलों के योगदान का जश्न मनाने के लिए इंटरनेशनल काउंसिल ऑफ मॉन्यूमेंट्‌स एंड साइट्‌स ने यह थीम चुना है। इसका मकसद खेलों के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाना व गुम हो रहे पारंपरिक खेलों को बचाना है। ऐतिहासिक स्थलों की तरह खेल भी हमारी विरासत का हिस्सा हैं। तो क्यों न हम खेल-खेल में अपनी धरोहर को बचाएं।

ओलंपिक (ऐश्वर्य युक्त, विशिष्ट महत्व की) मशाल: - खेल का विकास प्राचीन सभ्यताओं से जुड़ा हैं भारत सहित अन्य संस्कृतियों में लिखित इतिहास से पहले के काल की गुफा चित्रों में दौड़, कुश्ती, तैराकी आदि की कलाकृतियां मिली है मिस्र की सभ्यता के स्मारकों में एथंलेटिक्स, नौकायन, कुश्ती के प्रमाण मिले हैं। भारत में खेलों का आयोजन वैदिक काल से ही हो रहा है। लेकिन खेलों को संस्था का रूप सबसे पहले यूनान में मिला, जब वहां प्राचीन ओलंपिक खेलों का आयोजन हुआ। यूनान के ओलंपिया में पहली बार ओलंपिक का आयोजन 776 ई. पू. में हुआ था। वहां इसका आयोजन 393 ई. तक हुआ। लेकिन इसके बाद रोम के सम्राट थियोडोसिस ने इसे मूर्तिपूजा का उत्सव करार देकर प्रतिबंधित कर दिया। हालांकि मध्यकाल में अलग-अलग तरह की प्रतिस्पर्द्धाएं होती रहीं लेकिन उन्हें ओलंपिक का दर्जा नहीं मिला। इसके बाद 19वीं सदी के अंत (1896) में फ्रांस के बैरों पियरे डी कुवर्तेन ने आधुनिक ओलंपिक खेलों की शुरुआत यूनान की राजधानी एथेंस में कराई। ओलंपिक के माध्यम से वे दो लक्ष्य साधना चाहते थे, जो निम्न हैं-

  • पहला खेलों को फ्रांस में लोकप्रियता दिलाना।
  • दूसरा सभी देशों के बीच शांतिपूर्ण स्पर्धा के लिए सबको एकजुट करना था।

कुवर्तेन मानते थे कि खेल युद्ध टालने का सबसे अच्छा माध्यम हो सकते हैं।

महिला पुजारी: - एथेंस के ’टेंपल ऑफ हेरा’ (हेरा नामक मंदिर पर) में ओलंपिक शुरू होने से कुछ माह पहले मशाल को एक दर्पण के माध्यम से सूर्य की रोशनी से प्रज्ज्वलित किया जाता है। इसमें 11 महिला पुजारी हृदय की देवी का प्रतिनिधित्व करते हुए अग्नि देवता की प्रार्थना करती हैं और मुख्य पुजारी मशाल को प्रज्जवलित करती हैं। फिर इसे कलश में रखा जाता है और उस मैदान में ले जाया जाता है जहां पहली बार ओलंपिक खेल हुए थे। मशाल ओलंपिक खेलों के आगाज के दिन अपनी यात्रा खत्म कर मेजबान शहर पहुंचती है। 1900 में भारत पहली बार ओलंपिक में शामिल हुआ। इसमें एक खिलाड़ी गया था। 1920 के ओलंपिक में पहली बार भारत की ओर से आधिकारिक रूप से एक टीम शामिल हुई थी।

सुरक्षित: - जब ओलंपिया में 776 ई. पू. में ओलंपिक का आयोजन हुआ तो खेल की सफलतापूर्वक समाप्ति के लिए सूर्य देवता की पूजा सूर्य की रोशनी से मशाल जलाई गई थी। इसी से प्रेरित होकर 1936 में मशाल जलाने की परंपरा फिर से शुरू हुई। इसमें ईंधन के रूप में प्रोपेन का इस्तेमाल होता है। यह 65 किलोमीटर प्रतिघंटा रफ्तार वाली हवा को झेल सकती है। प्रति घंटे 50 मिलीमीटर बारिश हो तो भी यह मशाल नहीं बुझती है। एक मशाल लगभग 15 मिनिट जल सकती हे। फिर इससे दूसरी मशाल जलाई जाती हैं। अत: यह मशाल हर तरह से सुरक्षित हैं।

विरासत: - के पांच के खेल निम्नलिखित हैं-

  • कुश्ती-मिस्र में नील नदी के तट पर स्थित बेंने-हसन की शव-समाधि की दीवारों पर मल्लयुद्ध के अनेक दृश्य अंकित हैं। उनसे प्रतीत होता है कि लगभग 3000 ईसापूर्व मिस्र में इसका पूर्ण विकास हो चुका था। ’रामायण और महाभारत’ में कुश्ती की पर्याप्त चर्चा हुई है। पुराणों में इसका उल्लेख मल्लक्रीड़ा के रूप में मिलता है। प्राचीन ग्रंथ विनयपिटक के अनुसार तो प्राचीन काल में महिलाएं भी इस खेल को खेलती थीं। ऐसा माना जाता है कि अखाड़ा अखंड शब्द का भ्रंश रूप हैंं इनकी शुरुआत हिन्दू संस्कृति की रक्षा के लिए आदि शंकराचार्य ने की थी। शैवपंथी संत प्रारंभ से ही इसे खेलते रहे हैं।
  • शतरंज- ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार शतरंज छठवीं शताब्दी में भारत में ईजाद किया गया खेल है। गुप्त काल में इस खेल का काफी चलन था। फारसियों के प्रभाव के चलते इसे शतरंज कहा जाने लगा। बाणभट्ट रचित हर्षचरित में भी चतुरंग नाम से इस खेल का उल्लेख किया गया है। बाद में ईरान होता हुआ यूरोप पहुंचा और चेस के नाम से जाना गया। 7वीं शती के सुबंधु रचित वासवदता नामक संस्कृत ग्रंथ में भी इसका उल्लेख मिलता है।
  • कबड्‌डी- दक्षिण भारत में इसे चेडुगुडु और पूरब में हु तू तू के नाम से भी जानते हें। विद्धानों के अनुसार एक प्राचीन ताम्रपत्र में उल्लेख है कि महाभारत काल में भगवान कृष्ण और उनके साथियों दव्ारा कबड्डी खेली जाती थी। अभिमन्यु को चक्रव्यूह में फंसाया जाना इसी खेल का एक उदाहरण है। कुछ इतिहासकार इसे 4000 वर्ष पुराना खेल मानते हैं। माना जाता है कि कबड्डी शब्द की उत्पत्ति तमिल शब्द काए (हाथ) और पीडी (पकड़ना) से हुई है।
  • हॉकी- कोलकाता में 1885 - 86 में पहली बार हॉकी क्लब की स्थापना की गई थी। भारत ने 1928 से लेकर 1956 के बीच हुए ओलंपिक खेलों में छह गोल्ड मेडल जीते। इसकी शुरुआत पर विभिन्न मत हैं। अब तक के सबसे पुराने साक्ष्य मिस्र में मिले 4000 वर्ष पुराने भित्ति चित्रों को मान सकते हैं। जिनमें डंडे और गेंद से लोग खेलते दिख रहे हैं। यह खेल लोगों में राष्ट्रीय खेल की छवि है, लेकिन खेल मंत्रालय ने 2012 में एक आरटीआई पर इससे इनकार किया।
  • स्नूकर- स्नूकर की शुरुआत मध्य प्रदेश के जबलपुर में हुई। यहां के नर्बदा क्लब में इसकी विधिवत शुरुआत वर्ष 1875 में हुई। उस समय इसे ऑफिसर्स (अधिकारी) मेस भी कहा जाता था। खेल के लिए तब तैयार की गई टेबल आज भी क्लब (मंडली) की शान बढ़ा रही है। ब्रिटिश सेना के देवनशायर रेजीमेंट के नेवल चेम्बरलेन ने इसकी शुरुआत की। इस खेल का जन्म बिलियड्‌र्स के बोर्ड (तख्ता) पर ही हुआ था। खेल-खेल में कहा - यू आर ए स्नूकर। तब से यही नाम पड़ गया।

गौरव: - के क्षण: - निम्न हैं-

  • ओलपिंक-मिल्खा सिंह ने 1960 ओलपिंक में 400 मी. दौड़ का रिकार्ड तोड़ा, लेकिन 1 सेकंड से पदक जीतना चूक गए। फ्लाइंग सिख मिल्खा ने 1958 व 1962 के एशियाई खेलों में गोल्ड जीता।
  • हॉकी-1975 में भारत ने पाकिस्तान को हराकर पहली बार हॉकी विश्वकप जीता। समूह के कप्तान अजित पाल सिंह थे। हम अब तक सिर्फ एक बार ही हॉकी विश्वकप जीते हैं।
  • क्रिकेट-1983 में भारत ने वेस्टइंडीज को हराकर पहली बार देश को क्रिकेट विश्व कप का तोहफा दिया। तब कपिल देव समूह के कप्तान थे। 2011 में दूसरी बार धोनी ने हमें विश्वप दिलाया। 2012 में क्रिकेट के भगवान सचिन तेंदुलकर ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में 100 सैंकड़ा बनाकर शतकों का शतक लगाया।
  • ऐशियाई खेल-1986 में द. कोरिया की राजधानी सियोल में एशियाई खेलों में पीटी उषा ने दौड़ व रिप्रंट में चार स्वर्ण व एक रजत पदत जीतकर देश का नाम रोशन किया और उड़नपरी कहलाई।
  • शतरंज-2000 में विश्वनाथन आनंद पहली बार विश्व शतरंज चैंपियन बने। लाइटनिंग किड कहे जाने वाले आनंद ने बड़े-बड़े दिग्गजों को मात देते हुए 5 बार विश्व शतरंज चैंपियनशिप जीत चुके हैं।
  • वेटलिफ्टिंग -सिडनी ओलपिंक, 2003 में कर्नम मल्लेश्वरी ने वेटलिफ्टिंग (वजन उठाने) में कांस्य पदक जीतकर रिकॉर्ड (लेख-प्रमाण) बना दिया। वे ओलपिंक में पदक जीतेन वाली पहली देश की पहली महिला एथलीट बन गई।
  • कबड्डी -2004 में आयोजित पहले कबड्डी विश्व कप में भारत ने सभी समूहों को धूल चटा खिताब अपने नाम किया। भारत अब तक हुए सभी सातों कबड्डी विश्व कप का विजेता रहा है।
  • स्नूकर- 2005 में पंकज आडवाणी ने विश्व बिलियड्‌र्स चैपियनशिप जीतकर सबको चौंका दिया था। अब तक वे 8 बार विश्व चैपियनशिप जीत चुके हैं।
  • राइफल- 2008 बीजिंग ओलपिंक में अभिनव बिंद्रा ने 10 मी. राइफल शूटिंग में गोल्ड मेडल जीता। 2004 ओलपिंक में राज्यवर्धन सिंह राठौर ने सिल्वर मेडल जीता।

अन्य विरासत: -निम्न हैं-

खो-खो- मैदानी खेलों के सबसे प्राचीनतम रूपों में से एक है जिसका उद्भव प्रागैतिहासिक भारत में माना जा सकता है। आत्मरक्षा, आक्रमण के कौशल को विकसित करने लिए इसकी खोज हुई।

गिल्ली-डंडा- लकड़ी की एक 5 - 7 इंची गिल्ली और एक हाथ का डंडा। भारत के गली-मोहल्लों में देखा जा सकता है। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि गिल्ली-डंडा से ही प्ररित होकर गोल्फ (गेंद और डंडे का खेल) का आविष्कार हुआ था।

सितोलिया- गिल्ली-डंडे की तरह ही देशभर के गली-मोहल्लों में खेला जाने वाला खेल सितोलिया है। बिहार में इसे पिट्‌टो कहते हैं। बच्चे दो समूह में बंट जाते हैं, जो टीम 5 - 7 पत्थरों के ढेर को बॉल (गेंद) फेंककर गिराती है फिर उन पत्थरों को एक के ऊपर एक रख कर उसे वापस खड़ा करती है तो वह उस टीम का सितोलिया कहलाता हैं। इसी प्रकार जो समूह सबसे अधिक सितोलिया बना पाती है वह विजेता कहलाती है।

पोलो- घोड़ों पर खेला जाने वाला यह खेल 34 ई. में मणिपुर में खेला जाता था। लेकिन पहला टूर्नामेंट 600 ई. पू. तुर्कोमन और पर्सियन के बीच हुआ था। राजस्थान में घोड़ों के साथ हाथी व ऊंट पोलो का प्रचलन रहा है।

कंचा- कंचा हमारा परंपरागत खेल है। इस खेल में, कुछ मार्बल्स की व कुछ कांच की गोलियां होती थीं। एक गोली से दूसरी गोली पर निशाना लगाना होता था, और निशाना लग गया तो वह गोली आपकी हो जाती थीं।

तीरंदाजी- भारत में सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़े स्थलों में कई मुहरों में तीर-धनुष बने मिले हैं। इतिहासकार इसकी शुरुआत प्रागैतिहासिक काल से मानते हैं। वेद, रामायण और महाभारत में इसके कई किस्से हैं।

सांप-सीढ़ी- इसे मोक्ष-पट भी कहते हैं। इसका आविष्कार भारत में हुआ है। खेल का वर्तमान स्वरूप 13वीं शताब्दी में कवि संत ज्ञानदेव दव्ारा तैयार किया गया था। 17वीं शताब्दी में यह खेल थंजावर में प्रचलित हुआ।

लट्‌टू- इसमें लकड़ी के एक गोले में एक लोहे की कील होती थी। इसके चारों ओर एक सुतली को लपेटकर, उसे जमीन पर चलाना होता था। लगभग समाप्त हो चुका यह खेल कभी कभार गांव-कस्बों में दिखता है।

पतंगबाजी- ग्रीक इतिहासकारों के अनुसार पतंगबाजी 2500 वर्ष पुरानी है जबकि चीन में पतंगबाजी का इतिहास दो हजार साल पुराना माना गया है। भारत में इसे मकर संक्राति के समय उड़ाने की परंपरा रही हैं।

घर के अन्य खेल: - प्रस्तुत खेलों के अलावा कुछ अन्य खेल भी है जो हमारे जीवन व परंपरा से जुड़े हुए है जैसे छिपनछिपाई, चर-भर, दही दोटा, गो, किकली (रस्सीकूद), गोल-गोलधानी, पकड़मपाटी, आंचा मिचौनी, अष्टाचक्कन, केरम आदि ऐसे कई खेल जो हर बच्चे घर-घर में खेलते हैं।

उपंसहार: -प्रस्तुत सभी प्रकार के खेलों से हमें बहुत कुछ सीखने भी मिलता है और इन खेलों से हमारा मनोरंजन भी होता है साथ इन खेलों से शारीरिक व मानसिक विकास दोनों होता हैं। इसलिए इन खेलों को चाहे वे देश के हो या विदेश के हो हम सबको मिलकर इन खेलों को बचाये रखना है इनका वजुद सुरक्षित रखना है ताकि आगे आने वाली पीढ़ी भी इन खेलों को समझकर खेल सके।

- Published on: May 12, 2016