बहुराष्ट्रीय कंपनियों का प्रभुत्व ही बढ़ते हुए सांस्कृतिक प्रदूषण का एकमात्र कारक है (विपक्ष)

अविनाशी कीर्ति विखण्डित हो, टुकड़ों में नहीं बंटा करती

तलवारों से बहते पानी की धारा नहीं कटा करती

सम्मानित मंच एवं प्रबुध श्रोतागण,

बहुराष्ट्रीय कंपनियों का प्रभुत्व ही बढ़ते हुए सांस्कृतिक प्रदूषण का एकमात्र कारक है। विषय के विपक्ष में अपने विचार व्यक्त करते हुए सर्वप्रथम उक्त पंक्तियों में प्रस्तुत उद्गार स्पष्ट करना चाहूँगी कि तलवार रुपी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भी हमारी संस्कृति की बढ़ती हुई धारा को रोक नहीं सकती। भारतीय संस्कृति एक ऐसा कोरा कागज है जो विभिन्न संस्कृतियों के अभिलेखों को आत्मसात्‌ करते हुए अपने मूल स्वरुप को स्पष्ट एवं उज्जवल बनाए हुए है। एक ऐसा कागज जिस पर सांस्कृतिक प्रदूषण रुपी स्याही अपना रंग इतना गहरा न कर सकी कि वह अपना मूल स्वरुप ही खो दे। मुझे तो इस विषय का चुनाव करने वालों पर आश्चर्य होता है जिन्होंने इस बात को जोड़ा है। सांस्कृतिक प्रदूषण की कहानी तो मुगल साम्राज्य से ही आरम्भ हो गई थी जब Vaso Degama ने प्रथम बार हमारी धरती पर कदम रखा था। हम उसे अपनी रगो में अपना चुके थे, उसे अना एक रंग बना चके थे, अंग ही नहीं एक आदर्श मानने लगे थे। तब हमारी बहती हुई सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों का उदय हुआ-पिछली शताब्दी के अंतिम दशकों में ही और तब एक नए ऐतिहासिक घटनाक्रम का आवाह्‌न, आवाह्‌न जिसने हमारी संस्कृति के पंखों को उड़ते हुए विदेशों में पहुँचाया, उन्हें हमारी संस्कृति से अवगत कराया और आश्चर्य कि बात तो तब हुई जब वहाँ हमारी सांस्कृतिक धरोहर का तहेदिल से स्वागत हुआ। वे हमारी संस्कृति को अपनी संस्कृति से जोड़ने के लिए विवश हो गए और आज- मैं नहीं, आप नहीं हम सभी उन्हीं विदेशी दूरसंचार माध्यमों से हमारी संस्कृति को फलता-फूलता देख रहे हैं। हम देख रहे हैं कि इन्हीं कंपनियों के माध्यम से हमारी संस्कृति की उन गहराईयों को जिन्हें हम भूल गए थे परन्तु उन्होंने हमें याद दिलाया। भारत कि ’अतिथ देवों भव’ की पद्धति को विदेशों में स्वीकृति ही नहीं किया अपितु प्रत्येक प्रोग्राम में भारतीय अंदाज में, भारतीय तहजीब में अतिथियों का स्वागत होने लगा, भारतीय व्यंजनों की शाही पेशकश की गई, भारतीय लिबाजों में स्वंय को सजाया गया, व विदेशी airlines ने भी भारतीय तहजीब को अपने में अंतकरण में शामिल किया।

भगवान गणेश कि सिद्धियों का भी विदेशों में खुब परचम लहराया जब यह सिदव् हुआ कि भगवान गणेश ने दूध धारण किया है। भारत ही नहीं बल्कि विदेशों कि आम जनता ने, बड़े-2 वैज्ञानिकों ने घटना को देख दाँतों तले अंगुलियाँ दबा ली। हमारी संस्कृति कि दुहाई हमसे ज्यादा विदेशी करने लगे और आश्चर्य कि बात तो हुई जब बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपने annual statement में श्री गणेश का चित्र अंकित किया। यही नहीं अपने लाभ सीमांत प्रतिशत से भव्य गणेश मंदिरों का भी निर्माण करवाया। वे हमारी संस्कृति के इतने करीब आ गए कि इस वर्ष Washington ds White house में Diwali का समारोह भी मनाया गया और हास्य का विषय तो तब होता है जब फिर भी विपक्षी कहते है कि इन कंपनियों ने हमारी संस्कृति को कलुषित किया है। इन कंपनियों के दूरसंचार माध्यमों से ही आज विश्व में ऊँ Clinics जीवन जीने की कला, योग, प्राणायाम आदि का विस्तार एक अकल्पनीय तीव्रता से हुआ है। यदि आप 15 दि. 2003 के Economic Times पृष्ठ 7 पर निगाह डाले तो एक शीर्षक है- ‘West now follows east child rearing practises’tks स्वत- ही हमारी सांस्कृतिक संरचना की पुष्टि करता है। 2004 के Athevs olympics की ज्योति मशाल प्रथम बार भारत (दिल्ली) से गुजरेगी- 10 जून, 2004 को और यह जान कर आपको अतिशयोक्ति जरूर होगी कि इसका पूर्ण Sponsor एक बहुराष्ट्रीय कंपनी Cococola ने किया है ‘Pass the flarve, Unite the World स्लोगन के साथ। आप जो बात करते हैं कि विदेशी Cake तो हमको याद रहा, पर देशी लस्सी भूल गए’ तब कहना चाहूँगी कि शायद आपने विज्ञान की उन गहराइयों में नहीं झांका जहाँ यह स्पष्ट प्रमाणित होता है कि Carbonatid beverages का सिद्धांत सर्वप्रथम आयुर्वेद में मिलता है। विदेशियों ने तो मात्र Brand name ‘cake’ दिया है। और अंत में कोई (भाषण बाजी नारेबाजी) विवाद नहीं, अपितु एक अपील करना चाहूंगी-जो सदैव आप सभी के हृदय में गुंजायमान रहेगी और हर बुराई के समय आपको चेतना का एक स्वर प्रदान करेंगी-

हम वतन के नौजवां है, हमसे जो टकराएगा

वो हमारी ठोकरो से खाक में मिल जाएगा

वक्त के तुफान में बह जाएंगे जुलमों सितम्‌

असमां पर यह संस्कृति उम्र भर लहराएगी।