जनसंख्या नियंत्रण के लिए कानून बनना उचित है या नहीं

लोग कहते हैं बदलता है जमाना अक्सर

कानून में तो ताकत नहीं जो जमाना बदल दे।

जमाना तो बदला है क्रांतिकारी जुनून से

जरूरत है, ऐसे लोगों की जो इस जुनून को जगा दें।।

माननीय अध्यक्ष महोदय निर्णायक गण, गुरुजन एवं समस्त मित्रगण जनसंख्या बढ़ रही है विश्व की जनसंख्या छ: अरब का आकड़ा पार कर चुकी है और हर छ: में से एक भारतीय है। निश्चित रुप से इस बढ़ते बोझ से धरती कहरा उठी है। क्या? इतनी विकट समस्या को कानून बनाकर निमंत्रित किया जा सकता है। कद्ापि नहीं। हमारे देश में कानून बनाकर जिन भी सामाजिक बुराइयों को नियंत्रित करने की चेष्टा कि गई है क्या वे सफल हुई। आप बाल विवाह नियंत्रण कानून को ही ले लिजिए-आपने देखा होगा अक्षय तृतीया पर गाँवों में बाल विवाह समारोह सम्पन्न होते हैं और शहरों में तो पुलिस की नाक के नीचे घोड़ों पर बैठे किशोर दुल्हों की बारातों के नज़ारे क्या इस कानून का माखौल नहीं उड़ाते। इसी प्रकार आप बाल श्रमिक उन्मूलन कानून को ही ले लिजिए। शहरों में जो ऊँचे-2 भवन बनते हैं वहाँ पर बाल श्रमिक कार्यरत नजर आते हैं। क्या इन भवनों में कानून बनाने वालों एवं उसे लागू करने वालों के भवन नहीं होते! क्या हमने यही कानून बनाए है! जब इनका क्रियांवयन ही असफल रहा है तो जनसंख्या नियंत्रण तो एक व्यापक कार्य क्षेत्र है। चलो कल्पना करो कि कानून बना भी दिया जाता है तो फिर उसमें दण्ड का समावेश भी होगा। क्या सरकार पुलिस के लिए यह संभव होगा कि वह इस कानून की अवहेलना करने वालों को दण्डित कर सकेगी क्या जो बच्चे इस कानून की उपेक्षा करके पैदा होंगे वे भी दंड के भागीदार होंगे। यह तो एक ऐसी स्थिति बन जाएगी कि न दिल्ली बची न दौलतबाद आबाद हुआ। मैं इस विषय के पक्षकारों से यह जानना चाहँूगी कि कानून बनाने से उपजी इन समस्याओं को फिर कितने और कानूनों से नियंत्रित किया जाएगा।

यह एक सहज मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि जब-2 भी कानून बनाकर किसी बात को थोपा गया है तो उसका प्रबल विरोध हुआ है। कानून बनाना तो दूर हमारी संसद तो कई पूर्वाग्रहों से ग्रस्त संस्था है- महिला आरक्षण के बिल की जो स्थिति बन रही है वह तो आप सभी जानते हैं। कानून बनाने मात्र की चर्चा से ही सांसदों, धर्मान्धों एवं रुढ़ीवादियों की छातियों पर साँप लौटने लगेंगे और एक विपल्व सी स्थिति पैदा हो जाएगी। अत: कानून इसमें मददगार सिद्ध नहीं हो सकता।

2001 की जनगणना से यह स्पष्ट हुआ है कि पिछले दशक की तुलना में जनसंख्या में 2.52 % की रिकॉर्ड कती आई है। इसका श्रय मात्र परिवार नियोजन एवं परिवार कल्याण कार्यो को ही जाता है। हमें धर्माचारियों, उपदेशकों एवं सामाजिक कार्यकर्त्ताओं को साथ लेकर घर-2 में ज्ञान की अलख जगानी होगी और इसके प्रति रूचि जाग्रत करनी पड़ेगी। राजनेताओं को अपने निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर इसे एक राष्ट्रीय चुनौती के रुप में स्वीकार कराना होगा। इस समस्या का समाधान तभी संभव है। अंत में मैं यही कहना चाँहूगी-

”वाणि की ताकत अनोखी है तुममें

आओ, मेरे इन शब्दों को अपना स्वर दो,

कानून-वानून न रोकेगा बढ़ती आबादी को,

रोकना है इस बर्बादी को तो इच्छा शक्ति से रोको।

जय हिन्द!