परिन्दा

छोटे से घरौंदे में कर रात्रि बसेरा

आता बाहर जैसे ही होता सवेरा।

उन्मुक्त रुप से विचरण करता

स्वछंद जीवन की चाह से जीता

उद्धेलित मन से तृण-तृण लेकर

करता है-निर्माण नीड़ का।

नील गगन में परीहीन करता

अपना भोजन स्वंय खोजता

जो पाता उसमें संतोष जताता

संदेश हमें निरंतर देता

श्रम का, आत्मनिर्भरता का, आजादी का

और लालच से, तृष्णा से स्वंय को बचाने का।

Author: Manishika Jain