ब्रिटिश सरकार की प्रशासनिक एवं सैन्य नीतियाँ (Administrative and Military Policies of British Government) Part 9 for Bank Clerical

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माध्यमिक और प्राइमरी (मुख्य) शिक्षा से संबंधित मुख्य सिफारियों इस प्रकार थीं-

  • हाई (उच्च) विद्यालयों में दो प्रकार की शिक्षा का प्रबंध होना चाहिए। एक प्रवेश परीक्षा के लिए हो, दूसरा विद्यार्थियों को व्यापारिक तथा अन्य व्यवसायों के लिए हो।

  • विद्यालयों में पुस्तकालयों और फर्नीचर आदि के लिए व्यवस्था की जानी चाहिए।

  • राज्य की प्रारंभिक शिक्षा संस्थाओं की स्थापना के लिए स्थानीय सहयोग की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए।

  • प्राथमिक शिक्षा का नियंत्रण स्थानीय प्रशासनिक संस्थाओं को सौंप दिया जाए। इन स्थानीय संस्थाओं को शिक्षा खर्च का एक-तिहाई अनुदान के रूप में दिया जाना निश्चित किया गया। इसका परिणाम प्रारंभिक शिक्षा के प्रसार को अवरुद्ध करना ही हुआ।

अंग्रेजी शिक्षा के विकास के संबंध में एक उल्लेखनीय बात यह थी कि कुलीन वर्ग यद्यपि शिक्षा की आवश्यकता अनुभव करता था लेकिन उसने वैज्ञानिक शिक्षा की ओर ध्यान नहीं दिया। उसे न तो सरकारी नौकरियों की और न पृथक व्यापार अथवा वाणिज्य की आवश्यकता थी। अधिकांश भारतीय जनता निर्धनता और परम्परागत जीवन पद्धति से संतुष्ट थी। मध्यमवर्ग और इसमें भी अपेक्षा क्रत कम धनि वर्ग अंग्रेजी शिक्षा की और झुका और उसने इस शिक्षा को सरकारी नौकरी प्राप्त करने का एक साधन समझा। इसलिए भारत की शिक्षा संस्थान इंग्लेंड की भांती न तो कुलीन वर्गों के आकर्षण का केंद्र बन सकी और न ही बोधिक अनुसंधान और संस्कृति का केंद्र बन सकी। वे केवल नौकरी तलाश करने वालों तथा अंग्रेज प्रशंसकों के लिए प्रमुख केंद्र बनी। 19वी सदी के उत्तराद्ध में अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त करने वालें हिदू विद्यार्थियों की संख्या अधिक रही।

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