भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का विकास (Development of Indian National Movement) Part 2for Bank Clerical

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उदारवादी राजनीति की कमियाँ

  • ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति मिथ्या धारण : उदारवादी नेता यह समझ नहीं सके कि भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का वास्तविक आधार क्या है। उसकी क्या प्रवृत्ति है। शासक और शासित के स्वार्थ परस्पर विरोधी होते हैं। उदारवादियों का यह गलत अनुमान था कि अंग्रेजों और भारतीयों के हित परस्पर विरोधी न होकर एक दूसरे से जुड़े हैं। एक आधुनिक लेखक का यह कहना है कि उदारवादियों को अंग्रेजों पर विश्वास था और वे समझते थे कि अंग्रेजों की शान प्रक्रिया ही सबसे अच्छी है। वे भूल गए थे कि ब्रिटिश सरकार का मूल उद्देश्य भारत का आर्थिक शोषण और राजनीतिक पराधीनता है।

  • राष्ट्रीय तत्वों का अभाव : कांग्रेस की स्थापना का आधार शिक्षित भारतीयों का सहयोग था। जनसाधारण के बीच उनकी पैठ नहीं थी। लाला लाजपत राय ने लिखा है- प्रारंभ में कांग्रेस आंदोलन में राष्ट्रीय आंदोलन के तत्वों की कमी थी। यह आंदोलन न तो जनता दव्ारा संयोजित था और न ही उसके दव्ारा अनुप्राणित।

  • जन आंदोलन का अभाव : जनता में पैठ न होना तथा जनता की शक्ति में आस्था न हो पाने के कारण ये जन आंदोलनों को जन्म देने में असफल रहे।

उदारवादी राजनीतिक की सफलताएँ

उदारवादियों को अपने उद्देश्य में विशेष सफलता नहीं मिली, जिसके चलते उनके महत्व को नजरअंदाज कर दिया जाता है। वे तत्कालीन परिस्थिति से विवश थे। फिर भी जो सेवा उन्होंने भारत के लिए की उसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता है। उन्हीं के प्रयास से औपनिवेशक स्वशासन तथा प्रशासनिक सुधार की मांग की जाने लगी। भारतीयों को राजनीतिक प्रशिक्षण दिलाने की दिशा में उनका योगदान प्रशंसनीय था। उदारवादियों के राजनीति पर प्रभाव से एक लाभ अवश्य हुआ- राष्ट्रवादियों के हृदय में आत्मविश्वास तथा आत्म सम्मान की भावना जागृत हुई। वे धीरे-धीरे समझने लगे कि ब्रिटिश शासन उनका कल्याण करना नहीं चाहती।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की नींव इन्हीं उदारवादियों के प्रयास से डाली गई। डॉ. सीतारमैया ने उदारवादियों के कार्यो की प्रशंसा में यह विचार व्यक्त किया है- प्रारंभिक राष्ट्रवादियों ने ही आधुनिक स्वतंत्रता की इमारत की नींव डाली। उनके प्रयत्नों से ही इस नींव पर एक-एक मंजिल करके इमारत बनती चली गई। पहले उपनिवेशों के ढंग का स्वशासन, फिर साम्राज्य के अंतर्गत होमरूल, इसके ऊपर स्वराज्य और सबसे ऊपर पूर्ण स्वाधीनता की मंजिलें बन सकी हैं।

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