भारत का आर्थिक इतिहास (Economic history of India) Part 4 for Bank Clerical

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आधुनिक उद्योगों का विकास

अंग्रेजों ने भारत में औद्योगीकरण का आरंभ बागान उद्योग से किया, जैसे-नील, चाय, कॉफी आदि। इसके बाद अंग्रेजों ने वस्त्र उद्योग पर ध्यान दिया। 1850 ई. और 1855 ई. के बीच कपास के कारखाने, पटसन की मिलों और कोयला खानों की शुरूआत हुई। 19वीं शताब्दी के दूसरे भाग में बंबई में सूती कपड़ों के कारखाने खुले और पहली बार एक भारतीय कावसजी नाना भाई ने एक कपड़ा का कारखाना खोला। भारत में पहला जूट मिल 1855 ई. में जार्ज एलान नामक एक अंग्रेज ने बंगाल में स्थित रिशरा नामक स्थान में खोला।

1880 ई. से 1895 ई. के बीच कोई नया महत्वपूर्ण उद्योग स्थापित नहीं हुआ, लेकिन पुराने उद्योगों ने काफी तरक्की की। सूती कपड़ों का उद्योग विशेष तेजी से बढ़ा। 1894- 95 ई. में सूती मिलों की संख्या 144, जूट मिलों की संख्या 29 और कोयला खानों की संख्या 123 हो गई। इस औद्योगिक विकास से रानाडे जैसे राष्ट्रवादी अर्थशास्त्री काफी प्रभावित थे और उन्होंने भारत के लिए औद्योगीकरण का सपना देखा।

1905 ई. स्वदेशी आंदोलन के प्रारंभ हो जाने से भारतीय उद्योगों की पुन: प्रोत्साहन मिला और युद्ध काल में इसके विकास में काफी वृद्धि हुई, क्योंकि उस समय अंग्रेजों का सारा ध्यान युद्ध सामग्रियों को जुटाने में ही थी, जो इंग्लैंड से नहीं लाए जा सकते थे। फलस्वरूप भारतीय वस्त्र उद्योग और पटसन उद्योग में बहुत वृद्धि हुई। 1913-14 ई. तक कपास मिलों की संख्या बढ़कर ’264’ हो गई और जूट मिलों की संख्या ’641’ हो गई।

1890 ई. और 1914 ई. के बीच पेट्रोलियम, अबरख और मैंगनींज जैसे नये खनिजों का आरंभ हुआ और इसके उद्योग पनपे। लकड़ी की कई मिले (कारखानें) भी खोली गई। इसके अतिरिक्त लोह और पीतल के ढलाई घर भारत में खुले। परन्तु ऐसी प्रगति के बावजूद भी भारतीय औद्योगिक विकास का स्तर बहुत ही निम्न रहा और गति काफी धीमी रही। भारी उद्योगों का लगभग अभाव था। धातु और मशीन (यंत्र) उद्योग किसी भी देश की औद्योगिक विकास के लिए आवश्यक हैं। परन्तु ऐसे उद्योग भारत में लगभग नही ंके बराबर थे। चूँकि देश के उद्योगों के लिए आवश्यक मशीन, रसायन आदि पदार्थो की कमी थी, इसलिए भारी उद्योगों का विकास संभव नहीं था। इस उद्योग में एक मात्र भारतीय उद्योगपति जे.एन. टाटा थे, जिन्होंने जमशेदपुर में 1907 ई. में इस्पात कारखाना खोला और उसका उत्पादन कार्य 1911 ई. से प्रारंभ हुआ। औद्योगिक कमीशन (आयोग) की मुख्य सिफारिश थी कि सरकार देश के औद्योगिक विकास में रुचि लें। 1925 ई. में फिस्कल कमीशन ने सिफारिश की कि सरकार उद्योगों को विवेकपूर्ण संरक्षण और सहायता देने की नीति अपनाये।

लेकिन इन सबके बावजूद भारतीय उद्योग के स्वतंत्र विकास की बुनियादी शर्तें पूरी नहीं हुई। 1939 ई. में दव्तीय महायुद्ध शुरू होने पर भारतीय उद्योगों के विकास की रफ्तार पहले की तुलना में कुछ तेज हुई, लेकिन नवपरिवहन तथा वायुयान क्षेत्र में शायद ही कोई प्रगति हुई। भारी उद्योगों का विकास भारत में इस समय नहीं हो पाया। युद्ध काल में जो प्रगति हुई वह सब उपभोक्ता उद्योग में थी। बड़े उद्योगों की काफी उपेक्षा हुई। युद्ध के कारण देश की जो औद्योगिक प्रगति हुई, वह अस्थायी एवं कृत्रिम थी, वास्तविक और स्थायी नहीं।

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