व्यक्तित्व एवं विचार (Personality and Thought) Part 17 for Bank Clerical

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शिक्षा संबंधी विचार

उनके अनुसार शिक्षा का संपर्क हमारे संपूर्ण जीवन आर्थिक, बौद्धिक, सौंदर्यात्मक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक जीवन में होना चाहिए। तत्कालीन शिक्षा प्रणाली के वे पक्षधर नहीं थे। विद्या के आलोक से वे विशिष्ट रूप से आलोकित हुए। वे शिक्षा के माध्यम से आत्मनिर्भर एवं आध्यात्मिक रूप से सुव्यवस्थित व्यक्तित्व का निर्माण करना चाहते थे। वे शिक्षा के दव्ारा अविद्या को समाप्त करना चाहते थे। शिक्षा को टैगोर ने साधना माना है और इसे अविद्या से मुक्त रखने की बात कही है।

शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो आम आदमी के कल्याण से जुड़ी हो और समाज की उन्नति की आधारशिला हो। वे नहीं चाहते थे कि शिक्षा में राजनीति का प्रवेश हो। उनका मन्तव्य था कि व्यक्ति की सच्ची मुक्ति अविद्या से मुक्ति है। शिक्षा एक व्यक्ति को सुसंस्कृत नागरिक बनाती है और उसमें राष्ट्रीय उत्तरदायित्व की भावना जागृत करती है। वर्तमान विद्यालयी शिक्षा उच्च लक्ष्य की प्राप्ति के लिये अनुपयुक्त है; ऐसी उनकी मान्यता थी। यह प्रणाली सुनागरिक तैयार करने में असमर्थ है उनके मन में धन के प्रति मोह है। ”हमें इस संसार में सत्य या श्रेष्ठ को ग्रहण करने का ईश्वर प्रदत्त वरदान प्राप्त है, परन्तु ऐसी श्रेष्ठतापूर्ण गतिविधि, एक ऐसी शक्ति के संदर्भ में उनका विचार है कि विद्यालय में हमें किसी संग्रहालय की निर्जीव मूर्तियों की तरह बैठना होता है तथा हमें पढ़ायें जाने वाले पाठ ऐसे प्रतीत होते हैं; मानो कि फूलों पर ओले गिर रहे हों”। उन्होंने शांति निकेतन में विद्यालय की प्राकृतिक एवं खुले परिवेश में शिक्षा का महत्व दिया। टैगोर का विचार था कि वर्तमान विद्यालयी शिक्षा बच्चों को ऐसे विश्व से, जो ईश्वर के रहस्य से परिपूर्ण है, हठातवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू दूर करती है।

शिक्षा के माध्यम के संदर्भ में उनका विचार था कि विचारों के आदान-प्रदान की ऐसी पद्धति होनी चाहिए, जिसमें बच्चों को अधिक प्रयास करने की आवश्यकता न हो, साथ ही संप्रेषण को शिक्षार्थी ग्रहण कर सकें और इस कार्य को मातृभाषा आसानी से कर सकती है। टैगोर अंग्रेजी को इसका विकल्प नहीं मानते थे। अंग्रेजी शिक्षा को वे अनुचित एवं अपर्याप्त मानते थे। उनका कहना था कि मातृभाषा से संप्रेषणीयता की शक्ति अधिक होती है।

पाठवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू य पुस्तक के संदर्भ में उनका मत था कि पुस्तकें सामाजिक संरचना के अनुकूल होनी चाहिए। बच्चों को पढ़ाये जाने वाले साहित्य में सामाजिक मूल्यों, नैतिक मानदंडो का समावेश आवश्यक है और आधुनिक शिक्षा व्यवस्था इस उद्देश्य की पूर्ति नहीं कर पाती है।

विश्वविद्यालयीय शिक्षा को वे दोषपूर्ण एवं प्रयोजन में असफल मानते थे। उनका विचार था कि विद्यार्थीयों को भारतीय इतिहास, दर्शन, साहित्य एवं धर्म की शिक्षा दी जानी चाहिए और भारतीयता का विशेष रूप से संपोषण होना चाहिए। उनका कहना था कि सच्ची शिक्षा राष्ट्रीय जीवन का मार्ग प्रशस्त करती है और हमें चेतना प्रदान करती है। शिक्षा संस्कृति, ललित कला एवं आर्थिक विकास से संदर्भित होनी चाहिए। उनका कहना था कि अब समय आ गया है कि हम अपने पूर्वजों का ताला खोलें और अपने जीवन को समृद्धि के लिये प्रयुक्त करें। वे पश्चिम के अंधानुकरण के विरुद्ध थे, पूर्वी सभ्यता का संबंध उन्होंने यहाँ के निवासियों की अस्थित-मज्जा से बताया।

ललित कला को वे सभ्यता का अंग मानते थे। संगीत को राष्ट्रीय अभिव्यक्ति का सर्वोच्च अंग उन्होंने माना है। शिक्षा का आधार आर्थिक होना चाहिए। अर्थातवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू शिक्षा जीवन का एक हिस्सा है। वे चाहते थे कि आर्थिक जीवन से घनिष्ट संबंध रखना चाहिए। शैक्षिक संस्थाओं का अस्तित्व सहकारिता के सिद्धांत पर संचालित होना चाहिए।

धार्मिक दृष्टिकोण

आध्यात्मिकता उन्हें विरासत में मिली थी। परन्तु रवीन्द्र नाथ टैगोर बाह्याडम्बर के विरोधी थे। वे कर्मकांड एवं दिखावों में विश्वास नहीं रखते थे। धर्म के संबंध में उनकी राय थी, ”हमारा धर्म केवल सैद्धांतिक धर्म मात्र नहीं है, न ही वह राजनीति से परित्यक्त है, एवं न ही वह दैनिक व्यवहारों और क्रियाकलापों से ही युक्त है। यह स्वयं को समाज किसी विशिष्ट भाग के दायरे में सीमित नहीं करता है और न ही काव्य तथा साहित्य, विज्ञान तथा कला आदि मनोरंजन तथा मनोविनोद के अतिक्रमण को रोकने के लिये किसी भी प्रकार की सीमाएँ आदि आरोपित करता है। इस विश्व में, जीवन में धर्म को पूर्णरूप से समाविष्ट करने के लिये ब्रह्यचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ आदि विभिन्न अवस्थाएं हैं। धर्म केवल हमारी आंशिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये ही नहीं है, बल्कि संपूर्ण विश्व इसके परिपूर्ण किए जाने के लिये अस्तित्व में है।

टैगोर कर्म में आस्था रखते थे। त्याग का पलायन मानते थे और संन्यास को वैराग्य की शक्ति का अपमान। उनके धार्मिक चिंतन में मोक्ष जैसी प्रकल्पना नहीं थी। टैगोर ने लिखा है कि इस भजन, गायन तथा घंटे आदि के बजाने को छोड़ो। आप बंद मंदिर के गहरे अंधेरे कोने के इस एकांत में किसकी पूजा करते हो। आंखों पर हल्का आवरण हटाकर देखिए कि क्या ईश्वर तुम्हारे सामने नहीं है।

टैगोर की मान्यता थी कि ईश्वर पृथ्वी पर कठोर कर्म करने वाले, पत्थर तोड़ने वाले श्रमिकों के हृदय में वास करता है। मोक्ष के संदर्भ में उनकी मान्यता थी कि मोक्ष जैसी कोई वस्तु नहीं है। क्योंकि ईश्वर ने हमारा सृजन किया है और वह सदैव हमारे साथ आबद्ध है। प्रकृति एवं विश्व के प्रत्येक तत्व में उन्हें परमात्मा की अनुभूति होती थी। प्रेम को ही वे सर्वश्रेष्ठ धर्म मानते थे। उनका मत था कि धर्म की कोई भौगोलिक सीमा नहीं हैं।

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