1947 − 1964 की प्रगति (Progress of 1947 − 1964) for Bank Clerical Part 5 for Bank Clerical

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भारत-चीन युद्ध 1962

1947 में देश की आजादी के बाद से ही भारत ने अपने पड़ोसी देशों के साथ शांतिपूर्ण सहयोग की नीति अपनाई। इसने एक-दूसरे के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप न करने एवं पारस्परिकता तथा समानता पर आधारित संबंधों पर बल दिया। 1954 में भारतीय प्रधानमंत्री नेहरू ने चीन के प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई के साथ पंचशील समझौते पर हस्ताक्षर किया। यह एक-दूसरे की प्रादेशिक अखंडता और सर्वोच्च सत्ता के लिए पारस्परिक सम्मान की भावना पर आधारित थी।

इस मैत्री संबंध में छिद्र तब प्रकट हुआ जब जुलाई, 1958 मे ंचीन ने ऐसे मानचित्र प्रकाशित किए, जिसमें लद्दाख से लेकर असम सीमा तक हिमालय क्षेत्र के 1,32,090 वर्ग किमी भारतीय भू-भाग को चीनी सीमा के अंतर्गत दिखाया गया। 1959 में तिब्बत ने चीन के विरुद्ध खुला विद्रोह कर दिया। फलस्वरूप चीन ने तिब्बत को रौंद डाला एवं वहां पर आतंक का राज्य कायम कर दिया। परिणामस्वरूप तिब्बत के धार्मिक नेता दलाई लामा को बहुसंख्यक तिब्बतियों के साथ भारत में शरण लेनी पड़ी। चीन ने इस घटना के लिए भारत को दोषी ठहराया एवं 20 अक्टूबर, 1962 को भारत पर आक्रमण कर दिया। लगभग 30,000 चीनी सैनिक लद्दाख एवं अरूणाचल की सीमा में घूस आए। दिसंबर 1962 के पूर्व की स्थिति में वापस लाने को एक स्पष्ट और सीधा संदेश भेजा ताकि शांतिपूर्ण एवं अपेक्षित वातावरण का निर्माण किया जा सके।

भारत-चीन विवाद को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाने के लिए कुछ एशियाई एवं अफ्रीकी देशों ने श्रीलंका की राजधानी कोलंबो में एक सम्मेलन आयोजित किया, जिसे कोलम्बो सम्मेलन के नाम से जाना जाता है। यद्यपि भारत ने इस सम्मेलन में पारित प्रस्तावों को स्वीकार कर लिया, किन्तु चीन ने न केवल इसे मानने से इनकार कर दिया बल्कि उसने भारत के लद्दाख क्षेत्र में सात सैनिक चौकियां भी स्थापित कर ली। आज भी लद्दाख का 36,260 वर्ग किमी भू-भाग चीन के कब्जे में है।

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