भारत में नए वर्ग का उदय (The rise of the new class in India) Part 3 for Bank Clerical

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पूंजीपति वर्ग का उदय

19वीं शताब्दी के उतरार्द्ध में भारत में एक पूंजीपति वर्ग का उदय हो चुका था। हालांकि यह वर्ग काफी शक्तिशाली नहीं था, और तब के भारतीय पूंजी बाजार में इसकी भूमिका भी कोई महत्वपूर्ण नहीं थी, पर इस आधार पर इसके अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता। वामपंथी विचारकों ने तो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका की चर्चा की है। उन्होंने तो यहां तक कहा है कि पूंजीपति वर्ग के स्वार्थों की रक्षा के लिए ही कांग्रेस की स्थापना हुई। हो सकता है इन बातों में पूरी सच्चाई न भी हो, तो भी इतना तो स्वीकार किया ही जा सकता है कि 19वीं शताब्दी के उतरार्द्ध में पूंजीपति एक ताकतवर वर्ग के रूप में उभरने लगे थे। एक बात और, भारत में प्रारंभ से ही पूंजीपतियों की रुचि राजनीति में भी थी। यह औपनिवेशिक संरचना में आवश्यक ही था। इस प्रकार भारत में पूंजीपति वर्ग अपने धन पर केवल लाभ कमानेवाला वर्ग ही नहीं था बल्कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के संघर्ष में यह भी सहभागी था। इस अर्थ में भारतीय पूंजीपति वर्ग की भूमिका अन्य देश के पूंजीपतियों से भिन्न थी।

भारत में कई व्यावसायिक वर्ग का अस्तित्व था, जैसे-मारवाड़ी, गुजराती और पारसी। ये समुन्नत व्यापारी थे और इनके पास काफी पूंजी भी थी। पर ये वर्ग प्रांतीय स्तर तक ही क्रियाशील थे। बंगाल में भद्रलोक समाज था। इस वर्ग के हाथ में काफी पूंजी थी, परन्तु व्यापार और व्यवसाय के प्रति इस वर्ग में कोई अभिरुचि नहीं थी। इस वर्ग ने अपनी पूंजी जमीन खरीदने में लगाई। भारत में जो व्यावसायिक वर्ग था उसने अधिकतर अपने पैसे सूद पर लगाए।

इस काल में मध्य भारत, उत्तरी भारत और पश्चिमी भारत में मारवाड़ी वर्ग का अस्तित्व था। परन्तु यह वर्ग मुख्य रूप से ब्रिटिश उद्योग धंधों में उत्पादित वस्तुओं का क्रय-विक्रय करता था। 19वीं शताब्दी के अंतिम चरणों में पश्चिम भारत में और खासकर बंबई और अहमदाबाद में भारतीयों ने अपनी पूंजी को वस्त्र उद्योग में लगाया। भारत में वस्त-उद्योग मूलत: भारतीयों के पैसे से ही फले-फूले।

आंरभ में भारत में पूंजीपति वर्ग के सशक्त रूप में न उभरने का एक कारण यह था कि जिस भी क्षेत्र में भारतीय पूंजी लगी हुई थी, अंग्रेजों ने उस क्षेत्र को प्रोत्साहन नहीं दिया। इसी कारण से अंग्रेजों ने भारतीय वस्त्र पर कई तरह के सीमा शुल्क लगाए। इससे भारतीय वस्तुएं विदेशी प्रतियोगिता में पिछड़ गई। भारतीय पूंजीपतियों को भी आगे का मौका नहीं मिला।

स्वदेशी आंदोलन भारतीय पूंजीवादी वर्ग के विकास के लिए वरदान साबित हुआ। इसके कारण भारत में पूंजीवादी वर्ग का पहले की अपेक्षा अधिक तेजी से विकास हुआ। इस आंदोलन में स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग पर बल दिया गया। इसके साथ ही विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का भी कार्यक्रम था। भारतीय मध्यवर्ग के ऐसे लोगों ने जिनके पास पूंजी थी, छोटे पैमाने पर उद्योग धंधों का आरंभ किया-साबुन, दियासलाई, कैंडील (मोमबत्ती) आदि के फैक्ट्री (कारखाना) स्थापित हुए। बीमा कंपनियां (संघों) भी खोली गई। छोटे पैमाने पर ऐसे उद्योगों के स्थापित होने से ग्रामीण इलाके के लोगों को काम मिला।

महायुद्ध का काल भी भारतीय पूंजीपतियों के लिए सहायक रहा। युद्ध में ब्रिटेन की संलग्नता के कारण ब्रिटेन से वस्तुओं का आना बंद हो गया। फलत: इस काल में कई भारतीय उद्योग स्थापित हुए।

इस प्रकार भारत में पूंजीपति वर्ग का विकास उद्योगों के विकास से जुड़ा हुआ है। भारत में पूंजीपति वर्ग का विकास 1914 के बाद ही हुआ। यही काल भारत में उद्योगों के वास्तविक विकास का भी है।

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