महत्वपूर्ण राजनीतिक दर्शन Part-14: Important Political Philosophies for Bank Clericalfor Bank Clerical

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राममनोहर लोहिया

राममनोहर लोहिया भी जयप्रकाश नारायण की तरह स्वाधीनता संग्राम के संक्रिय नेता थे। इन पर भी महात्मा गांधी का प्रभाव था। साथ ही समाजवाद का प्रभाव होने के कारण ये कांग्रेस के भीतर समाजवादी गुट में शामिल थे। स्वाधीनता के बाद ये अंग्रेजी विरोधी आंदोलन के प्रमुख नेता रहे। इन्होने पूंजीवाद और मार्क्सवाद दोनो विचारधाराओं की कमिया बताते हुए एक ऐसे समाजवाद की संकल्पना प्रस्तुत की जो विशिष्ट तौर पर भी भारतीय प्ररिस्तिथियों के अनुरूप था। आज भी उत्तर प्रदेश में सक्रीय समाजवादी पार्टी (दल) घोषित तौर पर ’लोहयािवाद’ को अपनी विचारधारा बताती है।

लोहिया के प्रमुख समाजवादी विचार निम्नलिखित है-

  • लोहिया के अनुसार पूंजीवाद और समाजवाद दोनो ही विचार भारत के लिए अपर्याप्त हैं क्योंकि ये दोनो व्यवस्थाएं औद्योगिक अर्थव्यवस्था और केंद्रीकरण की व्यवस्था पर टिकी हैंं। भारतीय समाज के लिए ऐसा समाजवाद चाहिए जिसमें औद्योगीकरण न हो और सत्ता का विकेंद्रीकरण ज्यादा से ज्यादा हो।

  • इनके अनुसार इतिहास की प्रक्रिया में वर्ग और जाति व्यवस्थाओं का संघर्ष होता है। वर्ग व्यवस्था खुली व्यवस्था है जिसमें व्यक्ति अपने प्रयास से उपर नीचे आ जा सकता हैै। इसके विपरीत, जाति व्यवस्था एक बंद तथा रूढ़ व्यवस्था है जिसमें गतिशीलता की संभावना नही है। भारतीय समाज की मूल समस्या यह है कि यह लम्बे समय तक जाति व्यवस्था से बंधी रहने के कारण स्वतंत्रता जैसे मूलों से वंचित हो गया है। इसलिए सच्चे समाजवाद का बुनियादी संघर्ष जाति व्यवस्था से होना चाहिए, न की पूंजीपतियो से।

  • राजनीतिक संरचना के स्तर पर अधिकाधिक विकेंद्रीकरण होना चाहिए। जिलाधीश के पद को समाप्त कर देना चाहिए क्योंकि यह जिले के स्तर पर सारी प्रशासनिक शक्तियों के केंद्रीकरण का प्रतीक है।

  • राज्य की संरचना चार इकाईयों के स्तर पर होनी चाहिए- गाँंव, जिला, प्रांत, राष्ट्र। इस व्यवस्था को लोहिया ने ’चौखंबा राज्य’ कहा।

  • राजनीतिक व्यवस्था संघवाद के नियम पर आधारित होनी चाहिए जिसे लोहिया ने कार्यात्मक संघवाद कहा। इसका अर्थ है कि शक्ति निचली इकाई से उपर की ओर जाएगी और उतनी ही जाएगी जितनी अनिवार्य हो। यही व्यवस्था विश्व सरकार तक आगे बढ़ती जाएगी।

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