एनसीईआरटी कक्षा 11 अर्थशास्त्र अध्याय 2: भारतीय अर्थव्यवस्था 1950 − 1909 यूट्यूब व्याख्यान हैंडआउट्स for Bank PO (IBPS)

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एनसीईआरटी कक्षा 11 अर्थशास्त्र अध्याय 2: भारतीय अर्थव्यवस्था 1950-1990

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योजना का उद्देश्य?

  • जीवन स्तर को बढ़ाने के लिए विकास शुरू करें|

  • नए मौके लाना |

  • 1947 के बाद, सभी की सलामतीके लिए आर्थिक व्यवस्था का निर्माण

  • नेहरू – समाजवादका प्रस्ताव रखा(लेकिन जमीन की मालिकी के स्वरूपको बदलना नहीं चाहते थे|)

  • भारत – मिश्रित अर्थव्यवस्था - सार्वजनिक क्षेत्र और निजी संपत्ति और लोकतंत्र के साथ समाजवादी राष्ट्र – 1948 के औद्योगिक नीति संकल्प और संविधान के निर्देशक सिद्धांतों में प्रतिबिंबित होता है|

आर्थिक व्यवस्था के प्रकार

  • बाजार अर्थव्यवस्था या सम्पत्तिवाद – जरूरत पर आधारित नहीं बल्कि खरीद शक्ति पर; अगर परिश्रम कम दाम पर है – श्रमके लिए काम करना - तेज़ वयवसाय – इस बहुमतिने लोगोको पीछे छोड़ दिया है|

  • समाजवादी अर्थव्यवस्था – सरकार फैसला करती है कि कौन से सामानों का उत्पादन और वितरण किया जाना चाहिए| – जरूरत आधारित अर्थव्यवस्था – क्यूबा और चीन

  • मिश्रित अर्थव्यवस्था – सरकार और बाजार बलों का एक साथ जवाब – क्या उत्पादन करना है? कैसे उत्पादन करें? वितरित कैसे करें?

योजना क्या है?

  • उद्देश्य 5 साल में प्राप्त किया जायेगा (परिप्रेक्ष्य योजना के लिए आधार) और 20 वर्षों में क्या हासिल किया जाना चाहिए (परिप्रेक्ष्य योजना)

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पीसी महालानोबिस

  • दूसरी 5 साल की योजना उनके विचारों पर आधारित थी|

  • भारतीय योजना के वास्तुकार के रूप में सम्मानित

  • प्रेसीडेंसी कॉलेज, कोलकाता और बाद में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी, इंग्लैंड में शिक्षित हुए|

  • ब्रिटेन की रॉयल सोसाइटी के अध्येता सदस्य

  • भारतीय सांख्यिकी संस्थान की स्थापना की (ISI), कोलकाता

  • संख्य नाम की पत्रिका शुरू की|

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योजना आयोग

  • 1950 में स्थापित हुआ|

  • अध्यक्ष: प्रधान मंत्री

  • 5 साल की योजना का लक्ष्य - विकास, आधुनिकीकरण, आत्मनिर्भरता और निष्पक्षता

  • विकास: माल और सेवाओं का उत्पादन करने के लिए देश की क्षमता में वृद्धि – पूंजी या सेवाओं का बड़ा भंडार– GDP में वृद्धि ( GDP सकल घरेलू उत्पाद वर्ष के दौरान देश में उत्पादित सभी वस्तुओं और सेवाओं का बाजार मूल्य है – कृषि, व्यवसाय, सेवा)

  • आधुनिकीकरण: नई तकनीक को अपनाना और सामाजिक दृष्टिकोण में परिवर्तन(महिलाए काम पर )

  • आत्मनिर्भरता: अपने संसाधनों का उपयोग करके और मुख्य रूप से भोजन के लिए विदेशी देशों पर निर्भरता को कम करें – हमारी नीतियों में विदेशी हस्तक्षेप से बचना|

  • निष्पक्षता: गरीब वर्गों तक पहुंचने के लिए आर्थिक समृद्धि के लाभ दिए जायेंगे|

कृषि

  • HYV बीज को बढ़ावा देना

  • जमीनमे सुधार लाना – बिचौलियोंने बिना सुधार किए टिलर्स से भूमिकर एकत्र किया था – कम उत्पादकता और संयुक्त राज्य अमेरिका से अनाज का आयात किया था – मध्यस्थों को रद्द करना और टिलरों को प्रोत्साहन देना और 200 लाख किरायेदार सरकार के साथ सीधे संपर्क में आए (अभी भी सबसे गरीब मजदूर को लाभ नहीं मिलता है)

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  • मालिकी बढ़ने वाले उत्पादन से लाभ प्राप्त करने में सक्षम बनाती है(मालिकी की अनुपस्थिति निष्फलताकी ओर ले जाती है – जैसा सोवियत संघ में है|)

  • जमीनकी अधिकतम सिमा– अधिकसे अधिक जमीनका विस्तार व्यक्तिगत मालिकी के द्वारा लगाया जाता है – कुछ हाथोने एकाग्रताको कम कर दिया है बड़े मकान मालिकों ने अमलमें देरी से इसे चुनौती दी और कानूनसे बचने के लिए उन्होंने अपने रिश्तेदारोके नाम लिखवा दिए (कई खामियां देखी गईं)

  • केरल और पश्चिम बंगाल में भूमि सुधार सफल रहे – सरकार के रूप में टिलर को जमीन की नीति के लिए वचनबद्ध किया था|

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हरित क्रांति

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  • अभी तक – पुरानी तकनीक, बुनियादी ढांचे की अनुपस्थिति, बारिशकी अनियमितताओं के कारण कम उत्पादकता होती है|

  • गेहूं और चावल के बीज में HYV को लाया गया – पानी के साथ उत्पादक और कीटनाशकों

  • पहला चरण: HYV बीज पंजाब, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे समृद्ध राज्यों तक सीमित हैं और मुख्य रूप से गेहूं के बढ़ते क्षेत्रों को लाभान्वित करते है|

  • दूसरा चरण: अन्य राज्यों और अन्य फसलों के लिए फैल गया – अनाज में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने में मदद करता है|

  • कृषि उत्पादन किसानों द्वारा बाजार में बेचा गया – अतिरिक्त भागको बेचना– सक्षम सरकार खानेकी कमी के लिए भण्डार बनाने के लिए अच्छी मात्रा में अनाज के उत्पादनको बढ़ा रही है|

  • नुकसान

  • HYV फसलों बीमारियों से ग्रस्त थे|

  • बड़े किसान और छोटे b/wकी असमानता बढ़ी

  • बेरोजगारी के कारण यंत्रीकरण बढ़ा

  • जंगलीघास के नियंत्रण की आवश्यकता है|

  • सरकारी हस्तक्षेप

  • कम ब्याज दर पर ऋण

  • छोटे किसानों को आर्थिक सहयतासे उत्पादक प्राप्त

  • अनुसंधान संस्थानों की सेवाएं

सहायिकी

  • किसानों को नई तकनीक का परीक्षण करने के लिए प्रोत्साहित करें|

  • एक बार तकनीक उपयोगी हो जाने के बाद, सहाईकिको धीरे धीरे हटाना चाहिए|

  • उत्पादक सहायिकी किसानोंको और उत्पादकके व्यवसायमे लाभ देती है|

  • सहायिकी को खत्म करने से अमीर और गरीबमे मतभेद बढ़ेगा|

  • सहायिकीको निकालें क्योंकि इससे लक्ष्य समूह को फायदा नहीं होता है और सरकार पर भारी बोझ है। आमदनी

  • 1990 में 65% जनसंख्या कृषि में कार्यरतहै – GDP कृषि से 1950 में 67.5% से घटकर 1990 में 64.9% हो गया– उद्योग और सेवा क्षेत्र ने कृषि क्षेत्र में लोगों को अवशोषित नहीं किया|

  • कीमतें – अगर माल दुर्लभ हो जाता है, कीमतें बढ़ती हैं|

  • उत्पादक और कीटनाशक का सहायिकी के परिणामस्वरूप संसाधनों का अधिक उपयोग होता है जो पर्यावरण के लिए हानिकारक हो सकता है|

  • सहायिकी संसाधनों के अपर्याप्त उपयोग के लिए एक प्रोत्साहन प्रदान करती है।

उद्योग और व्यापार

  • कृषि से अधिक स्थिर रोजगार

  • आधुनिकीकरण को बढ़ावा देता है|

  • कुल मिलाकर समृद्धि

  • शुरुआत में केवल लोहा और फ़ौलाद(जमशेदपुर और कोलकाता); सूती कपडा और जूट

  • औद्योगिक आधार का विस्तार बाद में शुरू हुआ

  • सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों – राज्य ने शुरुआत में एक व्यापक भूमिका निभाई क्योंकि शुरुआत में उद्योगपति के पास पूंजी नहीं थी और न ही बाजार उद्योगपति को प्रोत्साहित करने के लिए काफी बड़ा था|

  • महत्वपूर्ण उद्योगों पर राज्य का पूर्ण नियंत्रण होगा|

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औद्योगिक नीति संकल्प, 1956

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समाज के समाजवादी स्वरूप के लिए दूसरी पंचवर्षीय योजना के लिए तैयार आधार

  • श्रेणी -1: विशेष रूप से राज्य के अंतर्गत व्यवसाय

  • श्रेणी -2: निजी क्षेत्र राज्य क्षेत्र के प्रयासों को पूरा करेगा – राज्य नई इकाइयों के लिए एकमात्र जिम्मेदारी ले रहा है|

  • श्रेणी -3: निजी क्षेत्र में उद्योग (अनुज्ञापत्र के माध्यम से राज्य नियंत्रण के तहत)

  • रियायतों, कर लाभ और बिजली के लिए कम दर सूची के साथ विकास को बढ़ावा देने के लिए पिछले क्षेत्र में अनुज्ञापत्र आसान था – क्षेत्रीय समानता को बढ़ावा देने का लक्ष्य था|

  • उपज या विविधीकरण के उत्पाद का विस्तार करने के लिए अनुज्ञापत्र होना चाहिए|

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  • 1955 – गांव और लघु उद्योग समिति (कर्वे समिति) – लघु उद्योगों का उपयोग करें (एक भाग की संपत्ति पर अधिकतम निवेश पर परिभाषित किया गया है) ग्रामीण विकास के लिए – शुरुआत में कपालिका 5 लाख थी और अब यह सेवा के लिए 2 करोड़ और निर्माण के लिए 5 करोड़ है – अधिक श्रम गहन, उच्च रोजगार, उत्पाद शुल्क और ऋण पर रियायतें|

व्यापार नीती

  • पहली सात योजनाओं में – व्यापार की तलाश आंतरिक व्यापार रणनीति द्वारा की गई थी (आयात प्रतिस्थापन) – उन्हें आयात करने के बजाय भारत में उत्पादन और उद्योगों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से 2 तरीकों से संरक्षित किया गया था|

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  • टैरिफ़: आयात सामानों पर कर (उन्हें महंगा बना दिया)

  • भाग हिस्सा: मात्रा निर्दिष्ट करें जिसे आयात किया जा सकता है|

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  • विचार – अगर घरेलू व्यवसाय सुरक्षित हैं तो वे प्रतिस्पर्धा करना सीखेंगे|

  • GDP औद्योगिक क्षेत्र से 1950-51 में 11.8% से बढ़कर 1990-91 में लगभग 6% वार्षिक वृद्धि दर के साथ 24.6% हो गया|

  • उद्योगों का विकास अब विविधतापूर्ण हो गया|

  • विदेशी प्रतिस्पर्धा से संरक्षण इलेक्ट्रॉनिक्स और ऑटोमोबाइल में भारतमे उद्योग सक्षम हो गया है|

  • कुछ क्षेत्रों जो सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित थे, 1990 तक दूरसंचार थे जहां लोगों को सम्पर्क पाने के लिए लंबे समय तक इंतजार करना करना पड़ता था|

  • राजयमे अभी भी बचाव है|

  • राज्य को उन क्षेत्रों से बाहर निकलना चाहिए जो निजी क्षेत्र का प्रबंधन कर सकते हैं और सरकार महत्वपूर्ण सेवाओं पर अपने संसाधनों पर ध्यान केंद्रित कर सकती है, जो निजी क्षेत्र प्रदान नहीं कर सकता है|

  • कुछ सार्वजनिक क्षेत्रों में भारी नुकसान हुआ (इसका मतलब यह नहीं है कि निजी क्षेत्र लाभदायक है – इनमें से कुछ श्रमिकों की नौकरी की रक्षा के लिए राष्ट्रीयकृत हैं)

  • परमिट लाइसेंस राज – कुछ व्यवसाय-संघ को और अधिक कुशल बनने से रोका – सुधार करने के बजाय लाइसेंस प्राप्त करने के तरीके पर अधिक समय बिताया गया|

  • माल की गुणवत्ता में सुधार करने के लिए उत्पादकों को कोई प्रोत्साहन नहीं था – पर्तिस्पर्धासे आयात की कर्यक्ष्मता बढ़ी|

  • हमे हमारे उत्पादकोकी विदेशी पर्तिस्पर्धासे रक्षा करनी चाहिए जैसे समृद्ध राष्ट्र करते है – हमारी नीतिमे परिवर्तन लानेकी जरूरत है – 1991 में नई आर्थिक नीति

हमे इससेये सबक मिला|

  • उद्योग विविध थे|

  • हरित क्रांति के साथ भोजन में आत्मनिर्भरता

  • जामिनदारी पद्धतिकी समाप्ति

  • सार्वजनिक क्षेत्र के प्रदर्शन के साथ असंतोष – अत्यधिक नियमों ने विकास को रोका|

  • नीतिया आंतरिक उन्मुख थी|

  • मजबूत निर्यात क्षेत्र स्थापित करने में असफल

  • 1991 में शुरू किए गए सुधार – LPG में सुधार

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