1857 के बाद भारत का संवैधानिक विकास (Constitutional Development of India after 1857) Part 3 for Bank PO (IBPS)

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1919 का मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार

प्रथम महायुद्ध की समाप्ति पर ब्रिटिश सरकार ने पुन: संवैधानिक परिवर्तन लागू करने का प्रयास किया। 1917 ई. की मांटेग्यू घोषणा के आधार पर भारत में स्वशासन स्थापित करने के लिए ब्रिटिश संसद ने 1919 ई. का भारत सरकार अधिनियम पारित किया जिसके महत्वपूर्ण बिन्दु निम्न थे-

  • इस अधिनियम दव्ारा ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों की भावना को देखते हुए ’उत्तरदायी सरकार’ की स्थापना की ओर प्रयास शुरू कर दिया।

  • इस अधिनियम के दव्ारा गृह-सरकार के लिए भी कुछ उपलब्ध थे, जिनके तहत भारत-सचिव के भारतीय शासन में नियंत्रण को शिथिल किया गया और भारत के लिए ब्रिटेन में एक उच्चयुक्त की नियुक्ति की गई।

  • कार्यकारिणी में भारतीय सदस्यों की संख्या बढ़ाकर तीन कर दी गई।

  • इस अधिनियम दव्ारा सांप्रदायिकता को और बढ़ावा दिया गया इसके दव्ारा मुसलमानों के साथ-साथ सिक्खों को भी सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व दिया गया और प्रतिनिधित्व देकर एक अस्वस्थ परंपरा की शुरूआत कर दी गई।

  • विषयों को पहली बार केन्द्रीय और प्रांतीय भागों में बांटा गया। राष्ट्रीय महत्व के विषय पर गवर्नर जनरल परिषद की सहायता से कानून बना सकता था। यह केंद्रीय सूची का विषय था। प्रांतीय महत्व के विषयों पर गवर्नर कार्यकारिणी तथा विधान मंडल की सहमति से कानून बनाता था।

  • केन्द्र में दव्सदनीय व्यवस्था लागू की गई। पहला सदन राज्य परिषद था, दूसरा केन्द्रीय विधान सभा। केन्द्रीय विधान सभा का कार्यकाल तीन वर्ष का था, जिसे गवर्नर जनरल बढ़ा भी सकता था।

  • प्रांतों में दव्ैध शासन लागू किया गया। इसके तहत प्रांतीय विषयों को दो भागों में बांट दिया गया-आरक्षित एवं हस्तांतरित। आरक्षित विषयों का प्रशासन गवर्नर जनरल अपने दव्ारा मनोनीत पार्षदों दव्ारा करता था तो हस्तांतरित विषयों का प्रशासन उन मंत्रियों की सहायता से गवर्नर करता था, जो विधान मंडल के निर्वाचित सदस्य थे। परन्तु इनकी पदस्थापना व पदच्युति गवर्नर की इच्छा पर आधारित थी। हस्तांतरित एवं आरक्षित विषयों का विभाजन भी दोषपूर्ण था।

दव्ैध शासन प्रणाली 1 अप्रैल, 1937 तक चलती रही। इस अधिनियम की महत्वपूर्ण बुराई थी-प्रांतों में दव्ैध शासन की स्थापना एवं सांप्रदायिकता निर्वाचन पद्धति का विस्तार।

कांग्रेस ने 1919 के वार्षिक अधिवेशन में इन सुधारों को अपर्याप्त, असंतोषजनक तथा अत्यंत निराशाजनक कहकर इसकी निंदा की। इन सुधारों का मुख्य तौर पर कांग्रेस के कुछ मध्यमवर्गीय नेताओं ने स्वागत किया जिसके चलते कांग्रेस में विभाजन भी हो गया।

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