गाँधी युग (Gandhi Era) Part 20 for Bank PO (IBPS)

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क्रिप्स मिशन

युद्धकालीन स्थितियों के बीच 1942 में क्रिप्स मिशन (लक्ष्य/दूतमंडल) भारत आया। इसके उद्देश्य कुछ रियायतों की घोषणा कर युद्ध में भारतीयों का सहयोग प्राप्त करना था। इसने अपने प्रस्ताव पर भारतीय नेताओं से बातचीत की पर कोई समझौता नहीं हो सका। क्रिप्स दव्ारा प्रस्तुत प्रस्ताव निम्न थे-

  • ब्रिटिश राष्ट्रमंडल के अंतर्गत भारत को पूर्ण औपनिवेशिक स्वराज्य का दर्जा दिया जाएगा। भारत को राष्ट्रमंडल से पृथक होने का भी अधिकार होगा।

  • युद्ध के पश्चातवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू राज्य के विधानमंडलों के निम्न सदनों के दव्ारा आनुपातिक प्रणाली के आधार पर एक संविधान सभा का गठन किया जाएगा। उस सभा में देशी रियासतों के प्रतिनिधि भी होंगे। ऐसी संविधान सभा दव्ारा निर्मित संविधान सरकार दव्ारा निम्न शर्तों पर स्वीकार किया जाएगा। जो प्रांत उसे स्वीकार न करे वह अपनी यथावत स्थिति में रह सकता हैं। संविधान सभा और ब्रिटिश सरकार में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए संधि की जाएगी जब तक संविधान सभा का गठन न हो, अंग्रेज ही भारत की सुरक्षा के लिए उत्तरदायी होंगे।

क्रिप्स मिशन के प्रस्ताव 1940 के प्रस्तावों की अपेक्षा अधिक निश्चित तथा ठोस थे। इसमें सभी पक्षों को संतुष्ट करने का प्रयास था। इसमें कांग्रेस के लिए पूर्ण अधिक्षेत्र प्रास्थिति और संविधान सभा, मुस्लिम लीग के लिए मुस्लिम बहुल प्रांतों के लिए नया संविधान एवं देशी रियासतों के लिए भारतीय परिसंघ में शामिल होने अथवा न होने की पूरी छूट थी। इसके बावजूद मिशन का प्रस्ताव सभी पक्षों को संतुष्ट नहीं कर सका। कांग्रेस ने इसे दिवालिए बैंक (अधिकोष) का चेक कहकर अस्वीकार कर दिया।

क्रिप्स प्रस्ताव अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान की मांग को स्वीकार करता था तथा भारत की रक्षा व्यवस्था कांग्रेस के अनुकूल नहीं थी। अत: कांग्रेस ने इसे अस्वीकार कर दिया। मुस्लिम लीग ने इसे इसलिए नहीं माना क्योंकि उसमें पाकिस्तान की मांग को स्पष्ट रूप से स्वीकार नहीं किया गया था।

कांग्रेस का वर्धा प्रस्ताव

14 जुलाई, 1941 को कांग्रेस कार्य-समिति की बैठक वर्धा में हुई, जिसमें एक प्रस्ताव दव्ारा यह मांग की गई कि अंग्रेज भारत छोड़ कर चले जाए। प्रस्ताव में यह भी कहा गया था कि जो परिस्थिति उत्पन्न हो गई है उसका समाधान केवल ब्रिटिश शासन का अंत होने से ही होगा। प्रस्ताव में बताया गया था कि इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए कांग्रेस एक व्यापक संघर्ष चलाएगी। इस प्रस्ताव से जनता में यह भावना जागृत हुई कि कांग्रेस की ओर से शीघ्र ही एक विशाल जन-आंदोलन होने वाला है। अगस्त, 1942 को इलाहाबाद में तिलक दिवस के अवसर पर जवाहरलाल नेहरू ने अपने भाषण में कहा था, ’हम आग से खेलने जा रहे हैं, हम दुधारी तलवार प्रयुक्त करने जा रहे हैं, जिसकी चोट उलटे हमारे ऊपर भी पड़ सकती है, लेकिन हम विवश हैं।’

भारत छोड़ों प्रस्ताव

क्रिप्स मिशन की असफलता से सभी को निराशा हुई। अभी तक कांग्रेस ने ऐसा कार्य नहीं किया था जिससे अंग्रेजों को परेशानी हो। परन्तु अब जबकि जापान लगभग देश के दव्ार पर खड़ा था, कांग्रेस चुप नहीं रह सकती थी। गांधी जी ने अंग्रेजों से सुव्यवस्थित ढंग से भारत से चले जाने को कहा। गहमा-गहमी के इसी माहौल में 7 और 8 अगस्त को कांग्रेस कार्यकारिणाी समिति की बैठक बंबई में हुई, जिसमें भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित हुआ। प्रस्ताव पारित होने के बाद गांधी ने लगभग 70 मिनिट तक भाषण दिया, जिसमें वे उस पैगंबर की तरह बोले जो दैवी शक्ति से प्रेरित होकर बोलता है, उनकी जबान से मानो आग बरस रही थी, जो अपनी ज्वालाओं से सबको पवित्र करती जा रही थी। उन्होंने कहा, ’भारत में ब्रिटिश शासकों का रहना, जापान को भारत पर आक्रमण के लिए आमंत्रण देना है। उनके भारत छोड़ने से यह आक्रमण हट जाएगा। भारत को ईश्वर के हाथों में छोड़ दो अथवा प्रचलित भाषा में अराजकता पर भारत को छोड़ दो। तदंतर सभी दल आपस में या तो दूतों की तरह लड़ेंगे या जब वास्तविक दायित्व उनके सामने होगा तब कोई न्यायोचित समझौता कर लेंगे।’ उन्होंने स्पष्ट कह दिया था ’मैं स्वतंत्रता के लिए इंतजार नहीं कर सकता। मैं जिन्ना साहब के हृदय परिवर्तन की बाट नहीं देख सकता। यह मेरे जीवन का अंतिम संघर्ष है। इस प्रकार, गांधी जी ने ’करो या मरो’ संघर्ष के लिए राष्ट्र का आहृान किया।

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