गाँधी युग (Gandhi Era) Part 24 for Bank PO (IBPS)

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नौसैनिक विद्रोह

बंबई में नौ-सैनिकों का विद्रोह अनेक कारणों से हुआ। युद्ध काल में नौ सेना का विस्तार किया गया था। परिणामस्वरूप ”असैनिक वर्ग” के लोगों को भी इसमें भर्ती किया गया। इनमें राजनीतिक चेतना थी। नौ-सैनिकों का युद्ध के दौरान गैर-भारतीयों से संपर्क हुआ। अपनी दयनीय स्थिति देख कर उनमें असंतोष की भावना सुलगने लगी। नौसैनिक प्रजातीय विभेद की नीति से अत्यंत क्षुब्ध थे। आजाद हिन्द फौज के अधिकारियों पर चलाए गए मुकदमें से भी उनमें रोष उत्पन्न हुआ। दव्तीय विश्वयुद्ध के बाद भारत में घटनेवाली प्रमुख राजनीतिक घटनाओं का भी उन पर व्यापक प्रभाव पड़ा। अत: नौसैनिक भी ब्रिटिश साम्राज्य की भेदभावपूर्ण नीति के विरुद्ध आंदोलन के मार्ग पर चल पड़े। 18 फरवरी, 1946 को बंबई में ’तलवार’ नामक जहाज के नाविकों ने खुली बगावत आरंभ कर दी। उन लोगों ने घटिया किस्म के भोजन दिए जाने के विरोध में भूख-हड़ताल आरंभ कर दी। अगले दिन बगावत बंबई के अन्य जहाजों पर भी फैल गई। नाविकों ने अपने-अपने जहाजों पर तिरंगा झंडा एवं चांद और हँसिया-बली से युक्त झंडा लहरा दिया।

अधिकारियों के आश्वासन पर जब सैनिक अपने जहाजों और बैरकों मे ंवापस लौटे तो उन्हाेेने अपने आपकों सुरक्षा प्रहरियों से घिरा हुआ पाया। सैनिकों ने जब इस घेराबंदी को तोड़ने का प्रयास किया तो सुरक्षा प्रहरियों के साथ खुला संघर्ष आरंभ हो गया। नागरिकों और दुकानदारों ने नौ-सैनिकों को उनके संघर्ष में सहयोग दिया। ’तलवार’ से आरंभ हुई बगावत अन्य जहाजों पर भी फैल गई। बंबई के अतिरिक्त कलकता, विशाखापत्तनम, कराची और अन्य बंदरगाहों पर भी नाविकों ने खुली बगावत कर दी। एडमिरल गोडफ्रे ने बंबई में नाविकों को समाप्त करने की धमकी भी दी परन्तु नौसैनिक पीछे नहीं हटे। 22 फरवरी तक सारे नौसैनिक विद्रोह के प्रभाव में आ गए।

सरकार ने इस बगावत को सैनिक शक्ति की सहायता से दबाने का प्रयास किया। सैनिकों को जनसाधारण एवं अनेक राजनीतिक दलों का समर्थन मिला। बंबई में नाविकों के समर्थन में साम्यवादी दल और कांग्रेस समाजवादी दल ने पूर्ण हड़ताल की घोषणा की। हड़ताल के दौरान पुलिस के साथ झड़पे भी हुई जिनमें सैकड़ों व्यक्ति मारे गए एवं हजारों की संख्या में हताहत हुए। इससे भी सैनिकों का मनोबल नहीं टूटा। सरदार वल्लभभाई पटेल के आश्वासन पर 23 फरवरी, 1944 को नाविकों ने अपनी बगावत समाप्त कर दी और बैरकों तथा जहाजों पर लौट गए। नौसैनिकों की बगावत में ब्रिटिश सरकार को गहरा धक्का लगा।

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