व्यक्तित्व एवं विचार (Personality and Thought) Part 14 for Bank PO (IBPS)

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विश्व मानववाद

टैगोर की दृष्टि विश्व एकता की अनुभूति से अनुप्राणित थी। उनका मंतव्य था कि राष्ट्रीयता के कारण विश्व प्रेम विकसित नहीं हो पाता है। उन्होंने ’वसुधैव कुटुंबकम’ का समर्थन किया और भारत तथा विश्व की समस्याओं के समाधान के लिये उन्होंने अंतरराष्ट्रीयवाद की धारणा को प्रतिपादित किया।

वे समूचे विश्व को एक राष्ट्र की डोर में बाँधना चाहते थे। उन्होंने कहा कि, ’अब हम यह जानने लगे हैं कि हमारी समस्या विश्व व्यापी है तथा संसार का कोई भी राष्ट्र दूसरी से पृथक रहकर अपना कल्याण नहीं कर सकता। या तो हम सब सुरक्षित रहेंगे या साथ-साथ ही विनाश के गर्त में आ गिरेंगे।

वे जाति उच्चता की प्रतिस्पर्धा को समाप्त करके मानव एकता की गरिमा की संस्थापना करना चाहते थे। अंतरराष्ट्रीय एकता, विश्व बंधुत्व और विश्व परिवार की उनकी कल्पना में कभी विरोधाभास नहीं उत्पन्न हुआ। उपनिषदों के इस वाक्य- ’सर्वे भवन्तु सुखिन:’ का वे बहुत सम्मान करते थे। इसी के आधार पर उन्होंने सार्वभौमवाद का संदेश दिया।

प्रजातांत्रिक व्यवस्था

टैगोर प्रजातंत्र के प्रबल पक्षधर थे और राजनीतिक प्रभुसत्ता में जनता की भागीदारी के हिमायती थे। उनकी मान्यता थी कि सच्चा प्रजातंत्र केवल इसी स्थिति में संभव है जबकि राजनीति, नैतिकता पर आधारित हो और सरकार स्वार्थी नेताओं के चंगुल से मुक्त हो। उनका विचार था कि प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व है कि वह अपनी सेवाएं सामाजिक हित में अर्पित करे। उनका कहना था कि प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व है कि कोई व्यक्ति राष्ट्र के प्रति सेवा के महान दायित्व को, जो ईश्वरीय देन है, छीन नहीं सकता है।

मानव अधिकार

टैगोर प्राकृतिक अधिकारों के समर्थक थे और व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकारों में राज्य के हस्तक्षेप को वे अनुचित ठहराते थे। उनका कहना था कि मनुष्य को दूसरे व्यक्तियों के साथ आत्मीय एकता का अनुभव करना चाहिए। इससे अधिकारों का संघर्ष मिट जाता है।

टैगोर का मत था कि कोई भी शासन अन्याय एवं अत्याचार के बल पर नहीं टिक सकता उन्होंने आत्म शक्ति पर विशेष बल दिया। वी.पी. वर्मा ने लिखा है कि, रवीन्द्र नाथ की संवदेनशील आत्मा ने इस स्थिति के विरुद्ध विद्रोह किया और इंग्लैंड के वैयक्तिक संबंधों से शून्य शासन के प्रति भारी रोष व्यक्त किया। यही कारण था कि वे भारत की राजनीतिक स्वाधीनता के समर्थक थे। उन्होंने इस बात को बड़ी तीक्ष्णता के साथ व्यक्त किया कि राजनीतिक स्वाधीनता के अभाव में जनता का नैतिक बल क्षीण हो जाता है और आत्मा संकुचित हो जाती है।

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