समाज एवं धर्म सुधार आंदोलन (Society and Religion Reform Movement) Part 6 for Bank PO (IBPS)

Doorsteptutor material for UGC is prepared by world's top subject experts: Get detailed illustrated notes covering entire syllabus: point-by-point for high retention.

Download PDF of This Page (Size: 156K)

जाति व्यवस्था की आलोचना

हिन्दू समाज में जाति व्यवस्था शताब्दियों से प्रचलित रही है। एक ओर इस प्रथा को हिन्दू धर्म की प्रतिरक्षा का श्रेय है, दूसरी ओर इसको हिन्दुओं के राजनीतिक और सामाजिक पतन के लिए भी उत्तरदायी माना जाता है। 19वीं सदी में जन्म पर आधारित जाति व्यवस्था प्राचीन वर्ण व्यवस्था में भिन्न थी। वर्ण व्यवस्था जन्म पर आधारित न होकर स्वभाव एवं कार्यों के आधार पर गठित थी। योग्यता तथा क्षमता के आधार पर एक वर्ण के लोग दूसरे वर्ण को अपना सकते थे। स्वामी दयानंद ने जन्म पर आधारित जाति व्यवस्था की कटु अलोचना की। उनके अनुसार समाज में प्रत्येक व्यक्ति को समान अवसर उपलब्ध होना चाहिए। यह संभव है कि कुछ लोग अपनी शारीरिक अथवा मानसिक दुर्बलताओं से उच्चतम स्थान तक पहुंच न सके, लेकिन उन्हें जन्म से ही ऐसे अवसरों से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। दयानंद ने वर्ण व्यवस्था को उचित ठहराते हुए जाति व्यवस्था का खंडन किया।

स्त्रियों की स्थिति में सुधार

वैदिक काल के सामाजिक ढांचे तथा संगठन की प्रशंसा से स्त्रियों को समाज में उच्च स्थान दिलवाने के लिए स्वाभाविक प्रयत्न हुए। वैदिक काल में स्त्रियों को उच्च शिक्षा तथा सामाजिक जीवन में पूरी तरह से भाग लेने का अधिकार था। आर्य समाज ने स्त्री शिक्षा की ओर सबसे अधिक ध्यान दिया। स्त्रियों की गिरी हुई दशा के लिए बहु-विवाह प्रथा तथा बाल विवाह प्रथाएं उत्तरदायी थीं। वैदिक युग में ये दोनों प्रथाएं प्रचलित नहीं थी। इसलिए आर्य समाज आंदोलन ने बाल विवाह का विरोध और स्त्री शिक्षा पर बल दिया और 16 वर्ष से कम आयु की लड़कियों का विवाह बंद करने की बात कही।

शुद्धि, संगठन और शिक्षा प्रसार

शुद्धि से अभिप्राय उस संस्कार से है जिससे गैर-हिन्दुओं, अछूतों, दलित वर्गों तथा धर्म परिवर्तित हिन्दुओं को पुन: हिन्दु धर्म में स्वीकार कर लिया जाता था।

संगठन का अभिप्राय हिन्दुओं को अपनी रक्षा के लिए संगठित करना था। ये दोनों आंदोलन 20वीं सदी के आरंभ में प्रमुख बन गए। लेकिन शिक्षा प्रसार का कार्य स्वामीजी की मृत्यु के तुरन्त बाद ही आरंभ कर दिया गया। स्वामीजी ने सबसे अधिक बल वेदों के अध्ययन पर दिया और भारत के पिछड़ेंपन का एक प्रमुख कारण व्यापक अज्ञानता बताया। आर्य समाज के 10 सिद्धांतों में से एक ज्ञान प्रसार और अज्ञानता के दूर करने के प्रयत्न से संबंधित था। आर्य समाज के इस क्षेत्र में कार्य का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि अंग्रेजी सरकार के अतिरिक्त पंजाब, उत्तर प्रदेश में अन्य किसी भी संस्था ने छात्रों और छात्राओं की शिक्षा के लिए इसके समान प्रयत्न नहीं किया। आर्य समाज दव्ारा दो प्रकार की शिक्षा संस्थाएं स्थापित की गई

  • वे शिक्षा संस्थाएं जो सरकारी शिक्षा पद्धति से संबंधित थीं (डी.ए.वी. संस्थाएं)।

  • वे शिक्षांं संस्थाएं जो सरकारी नियंत्रण से मुक्त थीं (गुरुकुल संस्थाए)।

1886 ई. में लाहौर में डी.ए.वी. विद्यालय की स्थापना की गई और लाला हंसराज ने अपनी अवैतनिक सेवाएं इसे दी। 1902 में मुन्शीराम के नेतृत्व में हरिदव्ार में गुरुकुल की सथापना हुई। डी.ए.वी. संस्थाएं अन्य प्रान्तों में तेजी से फैलीं, जबकि गुरुकुल पद्धति इतनी लोकप्रिय नहीं हुई।

Developed by: