Automated Teller Machine, Check Transaction, Check and Bank Draft

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ऑटोमेटेड टेलर मशीन (Automated Teller Machine)

  • ऑटोमेटेड टेलर मशीन एक कंप्यूटरीकृत मशीन है जो कि बैंक के ग्राहकों को बैंक शाखा जाने की जरूरत के बिना ही नकदी निकालने एवं अन्य वित्तीय और गैर वित्तीय लेनदेन के लिए अपने खाते तक पहुँचने (accessing) की सुविधा प्रदान करती है। बैंकों दव्ारा जारी (एटीएम डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड और प्रीपेड कार्ड) जिनमें नकद आहरण की अनुमति है, विभिन्न लेनदेनों के एटीएम में उपयोग किए जा सकते हैं।

  • नकदी निकालने के साथ-साथ एटीएम में मालिक (owning) बैंक दव्ारा उपलब्ध करायी गयीं अनेक सेवाएं/सुवधािएंँ हो सकती है जैसे खाता संबंधी जानकारी, नकद जमा, नियमित बिल भुगतान, मोबाइलों के लिये रिलोड वाउचरों की खरीद, छोटा/लघु विवरण, ऋण खाते पूछताछ आदि।

  • एटीम में लेनदेन के लिए, कार्ड को ग्राहक एटीम में प्रवेश/स्वाइप करता है और बैंक दव्ारा जारी अपना व्यक्तिगत पहचान संख्या (पिन) दबाता (enters) है।

  • पिन संख्यात्मक पासवर्ड है जिसे बैंक दव्ारा ग्राहकों को कार्ड जारी करते समय अलग से भेज दिया जाताहै/सुपुर्द कर दिया जाता है। अधिकतर बैंकों के ग्राहकों को प्रथम प्रयोग के बाद पिन बदलने की आवश्यकता होती है।

  • बैंकों दव्ारा भारत में जारी कार्डो का प्रयोग भारत में किसी भी बैंक एटीएम में किया जा सकता है। किन्तु बचत बैंक खाता धारक अन्य बैंक के एटीएम में माह में अधिकतम पांच लेनदेन मुफ्त कर सकता है, जिसमें वित्तीय और गैर वित्तीय सभी प्रकार के लेनदेन शामिल हैं। इससे अधिक लेनदेनों के लिए ग्राहक का बैंक उससे प्रभार ले सकता है।

  • ग्राहक को कार्ड जारीकर्ता बैंक से संपर्क करना चाहिए और नये पिन या उसे फिर से प्राप्त करने/नया कार्ड जारी करने के लिए आवेदन करना चाहिए।

  • कार्ड खोने की जानकारी होने पर ग्राहक को कार्ड जारीकर्ता बैंक से तत्काल संपर्क करना चाहिए ताकि बैंक कार्ड ब्लॉक कर सके।

चेक ट्रांसजेक्शन (Check transaction)

  • ट्रांसकेशन वह प्रक्रिया है जिसमें आहरणकर्ता दव्ारा जारी किए गए भौतिक (मूल) चेक को चेक के प्रस्तुतीकरण वाले बैंक से अदाकर्ता बैंक शाखा तक की यात्रा नहीं करनी पड़ती है। चेक के स्थान पर क्लियरिंग हाउस दव्ारा इसकी इलेक्ट्रॉनिक फोटो अदाकर्ता शाखा को भेज दी जाती है जिसके साथ इससे संबंधित जानकारी जैसे कि माइकर बैंड के डेटा, प्रस्तुति की तारीख, प्रस्तुत करने वाला बैंक इत्यादि भी भेज दी जाती है। इस तरह से चेक ट्रांसजेक्शन के माध्यम से समाशोधन के प्रयोजनों हेतु कुछ अपवादों को छोड़कर, लिखतों की एक शाखा से दूसरी शाखा में जाने की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। यह प्रभावी ढंग से चेक के एक स्थान से दूसरे स्थान जाने में लगने वाली लागत को समाप्त करता है, उनके संग्रहण में लगने वाले समय को कम करता है और चेक प्रोसेसिंग की समस्त प्रक्रिया को बेहतर बनाता है।

  • सीटीएस, चेक प्रसंस्करण और समाशोधन की समस्त गतिविधि को अर्थ प्रदान करता है। चेक धोखाधड़ियों को सीटीएस 2010 में निर्धारित न्यूनतम सुरक्षा मानकों जैसे पहले से ही उपलब्ध निरीक्षण सुविधाओं जैसे कि बार कोड, एन्क्रिप्टेड कोड, लोगो, वॉटरमार्क, होलोग्राम आदि के माध्यम से काफी कम किया जा सकता है और इसके चलते बदले गए/जाली लिखतो को शुरुआत में ही पकड़ा जा सकता है। मूल चेकों के हस्तांतरण की आवश्यकता न होने के कारण सीटीएस समाशोधन में लागत और समय की बचत होती है।

सीटीएस से होने वाले लाभ संक्षेप में निम्नलिखित हैं:-

  • छोटा समाशोधन चक्र।

  • बेहतर सत्यापन और समाधान की प्रक्रिया।

  • क्षेत्राधिकार के संबंध में कोई भौगोलिक प्रतिबंध नहीं।

  • बैंकों और ग्राहकों को एक जैसी परिचालनात्मक दक्षता।

  • परिचालनात्मक जोखिम और कागजी चेक के समाशोधन के साथ जुड़े हुए जोखिम में कमी।

चैक एवं बैंक ड्राफ्ट (Check and bank draft)

  • चैक एवं बैंक ड्राफ्ट के अंतर संबंधों को लेकर ग्राहकों के मन में बहुत सारी भ्रांतियां हैं। चैक एवं बैंक ड्राफ्ट के प्रकार एवं इसे जारी करने के तरीके के बारे में जानना बेहद आवश्यक है। यह माना जाता है कि वित्तीय फर्जीवाड़े में चैक का इस्तेमाल सबसे अधिक किया जाता है।

  • आरबीआई ने पिछले दिनों इन फर्जी गतिविधियों को रोकने के मद्देनजर चैक एवं ड्राफ्ट की वैधता की समय सीमा को घटाकर तीन महीना कर दिया है। पाठकों की जिज्ञासाओं के मद्देनजर हम इस लेख के जरिए चैक एवं बैंक ड्राफ्ट की पूरी प्रक्रिया पर नजर डाल रहे हैं।

चैक

चैक दरअसल एक ऐसा वाउचर होता है जिसे व्यक्ति या संस्थान कैश के बदले इस्तेमाल करते हैं। इसे पेमेंट का सबसे सुरक्षित माध्यम माना जाता है। इसके तहत खाता धारक अपने दस्तखत के साथ आवश्यक रकम का जिक्र करते हुए संबंधित व्यक्ति को जारी करता है। संबंधित व्यक्ति इसके जरिए बैंक से रकम प्राप्त करता है। बैंक जारीकर्ता के खाते में पहले से जमा रकम से ही उस व्यक्ति को पेमेंट करना है। चैक के कई प्रकार हैं। आइए, हम इसकी विस्तार से चर्चा करते हैं।

  • ओपन चैक- वह चैक ओपन चैक कहलाता है जिसके जरिए बैंक के काउंटर से तुरन्त कैश लिया जा सकता है। इस तरह के चैक के जरिए ग्राहक को बैंक के काउंटर से तुरन्त पेमेंट मिल सकता है एवं वह इसे अपने खातें में जमा भी करा सकता है। चैक के पीछे हस्ताक्षर कर इसे दूसरे व्यक्ति को भी दिया जा सकता है।

  • क्रॉस्ड चैक-चूंकि ओपन चैक के चोरी होने का डर हमेशा बना रहता है इसलिए इसे जारी करना जोखिम भरा होता है। हालांकि इस खतरे में क्रॉस्ड चैक के जरिए बचा जा सकता है। इस तरह के चैक से आपको हाथों हाथ पैसे नहीं मिलेगा। इस चैक के जरिए पैसे सिर्फ उस व्यक्ति के खाते में ही आता है जिसके नाम पर यह जारी हुआ है। इस तरह के चैक के बायीं तरफ कोने में लिखा होता है एकाउंट पेई या नॉट नेगोशिएबला इसके जरिए पैसे सिर्फ उसी व्यक्ति के एकाउंट में पैसे जमा होंगे जिसके नाम से यह जारी हुआ है।

  • बियरर चैक-इस चैक के माध्यम से कोई भी व्यक्ति बैंक के काउंटर पर जाकर पेमेंट प्राप्त कर सकता है। हालांकि बियरर चैक सुरक्षा के लिहाज से जोखिम भरा होता है। क्योंकि यदि इस तरह का चैक गुम हो गया तो जिसे यह प्राप्त होगा वह बैंक में जाकर पैसे ले सकता है।

  • ऑर्डर चैक- यह चैक व्यक्ति विशेष को दिया जाता है। इस तरह के चैक में बियरर की जगह ऑर्डर लिखा जाता है। पेई (प्राप्तकर्ता) चाहे तो इस तरह के चैक को किसी और को भी ट्रांसफर कर सकता है। इसके लिए उसे संबंधित व्यक्ति का नाम चैक के पीछे लिखना होगा।

  • एंटी डेटेड चैक-ऐसा चैक जो जिस दिन बैंक में जमा किया जा रहा है उससे पहले की तिथि में जारी किया गया हो, एंटी डेटेड चैक कहलाता है।

  • पोस्ट डेटेड चैक-ऐसा चैक जो उस तारीख को जारी किया गया है जो अभी आने वाला है उसे पोस्ट डेटेड चैक कहते हैं।

  • स्टैल चैक-ऐसा चैक जो अपनी वैध समय सीमा (तीन महीने) के बाद बैंक में जमा किया जाए उसे स्टेल चैक कहा जाता है। हालांकि इस तरह के चैक को बैंक क्लियर नहीं करते है।

बैंक ड्राफ्ट

  • बैंक ड्राफ्ट एक तरह का चैक है जिसे जारी करने वाले बैंक दव्ारा इस बात की गारंटी दी जाती है कि संबंधित ग्राहक के खाते में रकम उपलब्ध है। प्राय: बैंक ड्राफ्ट के लिए आग्रह करने वाले ग्राहक के खाते की जांच करते हैं कि चैक क्लियर करने के लिए खाते में पर्याप्त रकम है या नहीं। आमतौर पर बैंक ड्राफ्ट बड़े रकम के ट्रांजैक्शन आदि में इस्तेमाल किया जाता है।

  • बैंक ड्राफ्ट का इस्तेमाल प्राय: दूसरे बैंक के साथ डील करने के लिए किया जाता है या फिर उस केस में किया जाता है जहां विक्रेता या प्राप्तकर्ता (किसी दूसरे शहर या देश का हो) किसी साधारण चैक को लेने से मना कर देता है। हालांकि लोकल ट्रांजैक्शन में सर्टिफायड चैक या कैशियर चैक भी उतना ही विश्वसनीय होता है।

बैंक ड्राफ्ट के तीन रूप होते हैं-कैशियर चैक, सर्टिफायड चैक एवं मनी ऑर्डर।

  • कैशियर चैक- कैशियर चैक एक तरह से बैंक ड्राफ्ट ही होता है। आप बैंक को उतना रकम दे दें जितने के लिए चेक जारी करना है। उसके बाद बैंक यह पैसा अपने खातें में जमा कर लेगा एवं इस सेवा के बदले आप से चार्ज भी लेगा। अब यह बैंक की जिम्मेदारी होगी कि वह सुनिश्चित करे कि चैक के जरिए पैसा निकालते समय खाते में कैश उपलब्ध हो। कैशियर्स चैक ग्राहक उस बैंक से भी प्राप्त कर सकते हैं जहाँं उनका खाता नहीं है।

  • सर्टिफायड चैक-यह बैंक ड्राफ्ट का एक दूसरा रूप है। सर्टिफायड चैक सिर्फ उसी बैंक से प्राप्त किया जा सकता है जहाँं आपका एकाउंट उपलब्ध हो। इस तरह के बैंक ड्राफ्ट के लिए आग्रह तभी कर सकते हैं जब आपके खाते में इससे संबंधित रकम मौजूद हो। सर्टिफायड चैक जारी करने के लिए आपका बैंक कुछ चार्ज लेगा।

मल्टीसिटी चैक, पे-ऑर्डर एवं ड्राफ्ट में अंतर

बैंकर्स चैक हमेशा स्थानीय तौर पर जारी किए जाते हैं उसी तरह पेऑर्डर जो कि बैंकर्स चैक की की तरह ही होता है वह भी स्थानीय तौर पर ही जारी किया जाता है। पे ऑर्डर के मामले में एक मात्र अंतर यह होता है कि इसमें बैंक, प्राप्तकर्ता के बैंक को निर्देश देता है कि वह व्यक्ति/संस्थान को पेऑर्डर में लिखित रकम अदा करे।

डिमांड ड्राफ्ट

  • डिमांड ड्राफ्ट या डीडी एक ऐसा इंस्ट्रूमेंट है जिसका इस्तेमाल आमतौर पर पैसे ट्रांसफर के लिए किया जाता है। यह एक मोलभाव के जरिए अंजाम देने वाली प्रक्रिया है। बैंक से डीडी बनवाने के लिए ग्राहक को एक आवेदन फार्म भरना होता है जिसें पैसे भेजने वाले का नाम, प्राप्तकर्ता का नाम, कहां भेजना है, उस जगह का पता, नामों की सही स्पेलिंग, रकम आदि की जानकरी उपलब्ध करानी होती है। 10,000 रुपये से ज्यादा की रकम का डिमांड ड्राफ्ट बनवाने के लिए पैन नंबर का जिक्र करना अनिवार्य हो गया है। इसे सिर्फ स्थानीय तौर पर जारी करने की अनिवार्यता नहीं होती।

  • मल्टीसिटी चैक-इस सुविधा के अंतर्गत ग्राहक दव्ारा बैंक के मूल ब्रांच में डाले गए चैक की रकम को किसी दूरस्थ स्थान के प्राप्तकर्ता को उपलब्ध कराया जाता है। इस तरह के चैक को स्थानीय चैक की तरह ही देखा जाता है। आंध्रा बैंक को छोड़कर बाकी सारे बैंक इस तरह का चैक जारी करते हैं। इस पर कोई चार्ज नहीं लगता है एवं उसी दिन पेमेंट कर दिया जाता है।

बैंक इंश्योरेंस

  • बैंक इंश्योरेंस मॉडल के तहत बैंक बीमा कंपनियों के उत्पाद बेचते हैं। मौजूदा कानून के तहत बैंक किसी एक कंपनी के बीमा उत्पाद एजेंट के रूप में बेच सकते हैं। इससे पहले रिजर्व बैंक ने कहा था कि इरडा दव्ारा जारी दिशानिर्देशों के मसौदे से बैंकों की प्रतिष्ठा को जोखिम हो सकता है।

  • हालांकि, कुछ बैंक मौजूदा एजेंट की भूमिका के बजाय ब्रोकर बनना चाहते हैं। ऐसा होने पर वे एक से ज्यादा बीमा कंपनियों के उत्पाद बेच सकेंगे।

बैंकिंग लोकपाल योजना (Banking ombudsman scheme)

  • बैंकिंग लोकपाल भारतीय रिज़र्व बैंक दव्ारा नियुक्त वह व्यक्ति है जो बैंकिंग सेवाओं में कतिपय कमियों के संबंध में ग्राहकों की शिकायतों का समाधान करता हे। बैंकिंग लोकपाल अर्द्ध न्यायिक प्राधिकारी है विचार-विमर्श के माध्यम से शिकायतों के समाधान को सुविधाजनक बनाने के लिए इसे दोनों पक्षों बैंक और ग्राहक को बुलाने का अधिकार है।

  • आज की तारीख तक 15 बैंकिंग लोकपालों की नियुक्ति की गई है जिनके कार्यालय अधिकांशत: राज्यों की राजधानियों में स्थित है बैंकिंग लोकपाल कार्यालयों के पते भारतीय रिर्ज़ बैंक की वेबसाइट पर उपलब्ध हैं।

  • इस योजना के अंतर्गत सभी अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक और अनुसूचित प्राथमिक सहकारी बैंक शामिल हैं।

  • नई योजना का विस्तार और क्षेत्र 2002 की पूर्व योजना से व्यापक है। नई योजना में शिकायतों का ऑनलाइन प्रस्तुतिकरण भी उपलब्ध है। नई योजना लोकपाल दव्ारा पारित अधिनिर्णय के विरुद्ध अपील हेतु बैंक तथा शिकायतकर्ता दोनों के लिए अतिरिक्त रूप से ’अपीलीय प्राधिकार’ नामक एक संस्था भी उपलब्ध कराती है।

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