पश्चिमी यूरोप का भूगोल (Geography of Western Europe) Part 10 for CAPF

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प्राकृतिक वनस्पति-

  • टुंड्रा वन- यह प्रदेश आर्कटिक महासागर के तट के साथ विस्तृत है जिसके अंतर्गत आइसलैंड, तथा उत्तरी फिनलैंड आते है। केवल 2-3 महीने मामूली गर्मी पड़ती है, उस समय कही-कहीं काई, लाइकेन व अत्यंत छोटी-छोटी झाड़ियाँ उगा करती हैं।

  • कोणधारी वन/टैगा वन-यह टुंड्रा प्रदेश के ठीक नीचे मिलता है। इसका विस्तार नार्वे, स्वीडन और फिनलैंड तक है। टुंड्रा से नीचे, क्रमश: पहले छोटे-छोटे पेड़ (जैसे-बचे) और तब दक्षिण की ओर बड़े पेड़ (जैसे- रेडवुड) मिलते हैं। इसके अलावा यहाँ स्प्रूस, लार्च, फर, चीड़ या पाडन जैसे पेड़ मिलते हैं।

  • पर्णपाती वन-इस वन प्रदेश के अंतर्गत आयरलैंड, इंगलैंड, फ्रांस, जर्मनी बेल्जियम, नदीलैंड, डेनमार्क, पोलैंड आदि देश आते है। यहाँ चौड़ी पत्ती वाले पर्णपाती वन मिलते हैं। शीत से बचने के लिए जाड़े से पहले ये अपनी पत्तियाँ गिरा देते है। ओक, एम, ऐश, मेपल, आस्पेन, बीच आदि पेड़ उल्लेखनीय हैं।

  • भूमध्यसागरीय वन- ग्र्रीष्म काल शुष्क होते हुए भी यहाँ उगने वाले पेड़-पौधे चिरहरित होते हैं, कारण कुछ पेड़ों की छाल मोटी होती है तो कुछ की पत्तियां मोटी और रोयेंदार तो कुछ पौधे की टहनियों पर कांटे हुआ करते हैं, जिसे वाष्पीकरण अधिक नहीं हो पाता। इस प्रदेश के मुख्य वृक्ष जैतुन, कार्क, ओक, शहतुत, और लॉरेल हैं। नीबूं जाति के फल यहां खूब उगते हैं। संसार में सर्वाधिक अंगूर की उपज इसी क्षेत्र में होती हैं।

वन संपदा और लकड़ी कटाई-

  • स्वीडन में लकड़ी काटने का धंधा मुख्य रूप से प्रचलित है। यहाँ जाड़े में यह कार्य अधिक होता है, क्योंकि उस समय कृषि कार्य रुक जाता हैं। स्टॉकहोम, जोनकोपिंग, माल्मों प्रमुख लकड़ी उद्योग के केन्द्र हैं।

  • नार्वें में भी स्वीडन जैसी सुविधाएँ है। यहाँ लकड़ी से लुग्दी भी बनाई जाती हैं। ओस्लो, बजैन और ट्रोंडहम लकड़ी उद्योग के प्रमुख केन्द्र हैैं

  • फिनलैंड में भी लकड़ी कटाई का काम शीत ऋतु में होता है। यहाँ के समस्त निर्यात का 5/6 भाग लकड़ी और लकड़ी से निर्मित वस्तुएँ है। टेम्पेयर, हेलसिंकी, टुरकु, वासा और पोरी यहाँ के प्रमुख लकड़ी उद्योग के केन्द्र है।

  • पर्णपाती वनों की लकड़ी अपेक्षाकृत कड़ी होती है। दक्षिणी फ्रांस, पश्चिमी जर्मनी तथा आस्ट्रिया इस लकड़ी के प्रमुख उत्पादक है।

मृदा-

पश्चिमी यूरोप में निम्न प्रकार की मिटिवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू टयाँ पाई जाती हैं-

  • टुंड्रा मिटवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू टी-यह टुंड्रा जलवायु क्षेत्र में मिलती है। अत्यधिक ठंड के कारण बर्फ से ढकी रहती है। मिटवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू टी की उपरी तह मात्र 5 से.मी. मोटी होती है। पर भूमि बहुधा दलदली हुआ करती है।

  • पॉडजोल मिटवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू टी-इसका विकास कोणधारी वनों के नीचे हुआ है। यह अम्लीय मृदा है अत: इसमें जीवाणु नहीं रहते। उपरी स्तर में आवश्यक तत्वों की कमी के कारण उर्वरा शक्ति कम रहती है।

  • घूसर भूरा पॉडजोल/पॉडजोलिक मिटवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू टी- इसका विस्तार पॉडजोल के दक्षिण में मिलता है। पॉडजोल से यह इस अर्थ में भिन्न है कि कोणधारी वनों की जगह चौड़ी पत्ती वाले पर्णपाती वनों के नीचे विकास पाने के कारण उपर के स्तर में जीवांश अधिक मिलता है। अपेक्षाकृत दक्षिण में होने के कारण तापमान भी अधिक मिलता है। इसमें पॉडजोल की अपेक्षा निक्षालन कम होता है।

  • उपोष्ण लाल -पीली मिटवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू टी-यह भूमध्यसागरीय क्षेत्र की चुनायुक्त एक विशेष प्रकार की मिटवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू टी है। इस मिटवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू टी पर फलोत्पादन होता है।

  • पर्वतीय मिटवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू टी- इसके क्षेत्र नार्वे स्वीडन और दक्षिण के नवीन मोड़दार पर्वत (आल्टस आदि) है जहां पहाड़ी ढालों पर ये मिलते हैं।

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