ब्रिटिश सरकार की प्रशासनिक एवं सैन्य नीतियाँ (Administrative and Military Policies of British Government) Part 6 for CAPF

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अंग्रेजो की शिक्षा नीति

1813 ई. के पश्चातवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू बंगाल में भारतीयों का अंग्रेजी शिक्षा की मांग करने का मुख्य उद्देश्य लौकिक क्षेत्र की अज्ञानता के करने तथा प्रशासन में भाग लेने योग्य बनना था। ईसाई मिशनरी भी अंग्रेजी शिक्षा को लौकिक ज्ञान तथा उदार शिक्षा के विकास सहायक समझते थे। साथ ही उनका विचार यह भी था कि इस ज्ञान से भारतीय विद्यार्थी अपने पुराने धर्मो के अंधविश्वासी होने पर सहज यकीन कर सकेंगे और ईसाई धर्म को सुविधापूर्वक पूर्वक ग्रहण कर लेंगे। कुछ अंग्रेज प्रशासक भी इस विचार से सहमत थे। मैंने स्वयं अपने पिता को लिखा था: ’यह मेरा दृढ़ विश्वास है कि यदि हमारी शिक्षा योजनाओं पर कार्य किया गया तो तीस वर्ष पश्चातवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू बंगाल के सम्मानित वर्गो में एक भी मूर्तिपूजक नहीं बचेगा’ आरंभ में अंग्रेजी शिक्षा के प्रति इसलिए भी आकर्षण था कि इससे कंपनी (संघ) के अधीन नौकरी सरलता से मिल सकती थी।

1823 ई. में कंपनी ने शिक्षा से संबंधित एक जनरल कमेटी (समिति) का गठन किया। जेम्स मिल के प्रभाव में 1824 ई. में संचालक समिति ने आदेश भेजे कि कंपनी को उदार शिक्षा को प्रोत्साहित करना चाहिए। उपयोगिता के आधार पर संचालकों ने पश्चिमी शिक्षा के महत्व पर बल दिया। 1826 ई. से 1835 ई. तक संचलाकों ने कंपनी सरकार का ध्यान कई बार इस ओर आकर्षित किया। बेंटिक ने प्रशासन का खर्च कम करने के लिए अंग्रेजो की बजाए कुछ निम्न पदों पर भारतीयों को नियुक्त करना आरंभ किया। इससे अंग्रेजी शिक्षा के पक्ष में जनमत और अधिक बढ़ा। बेंटिक स्वयं बेंथम के प्रभाव में था और उपयोगिता से प्रभावित होकर अंग्रेजी शिक्षा को फैलाना चाहता था। भारतीय नेता भी अंग्रेजी शिक्षा के पक्ष में थे। 1834 ई. में मैकाले गवर्नर (राज्यपाल) जनरल की कौंसिल में विधि सदस्य बना उसी समय बैंटिक ने अंग्रेजी शिक्षा के पक्ष में नीति-निर्धारित करने का निश्चय किया।

मैकाले स्वयं वेंथम के उपयोगितावाद तथा ईसाई मिशनरियों से प्रभावित था। वह अंग्रेजी शिक्षा का समर्थक था और यह समझता था कि समस्त ज्ञान पश्चिमी दर्शन तथा साहित्य में भरा हुआ था। कुछ अंग्रेज अधिकारियों ने मैकाले की नीति का समर्थन नहीं किया। वाद-विवाद इतना बढ़ा कि मैकालें ने त्यागपत्र की धमकी दी। बेंटिक ने मैकाले का समर्थन किया और 7 मार्च, 1835 ई. के प्रस्ताव में उसने घोषणा की ’अंग्रेजी सरकार का महान उद्देश्य भारत के निवासियों में यूरोपीय साहित्य तथा विज्ञान को प्रोत्साहन देना चाहिए इसलिए शिक्षा के उपलब्ध समस्त धनराशि का उत्तम उपयोग अंग्रेजी शिक्षा मात्र पर खर्च करना होगा।’

कंपनी दव्ारा अंग्रेजी शिक्षा मात्र पर ही धनराशि खर्च करने के निर्णय की काफी आलोचना हुई। प्राच्यवेत्ताओं ने संचालक समिति को विरोध पत्र भेजकर असंतोष व्यक्त किया। एशियाटिक सोसायटी (समाज) ऑफ (के) बंगाल और लंदन की रॉयल (राजसी) एशियाटिक (एशियावासी) सोसायटी (समाज) ने भी इस नीति का विरोध किया। उनका मुख्य तर्क था कि इससे प्राच्य विद्याओं का विकास नहीं हो सकेगा। वे अंग्रेजी शिक्षा को सरकारी भाषा बनाए जाने के विरुद्ध में नहीं थे। उनका विरोध मैकाले दव्ारा प्राच्य विद्याओं के संबंध में कही गई अपमानजनक बातों से था। वे मैकाले के उस लक्ष्य से भी सहमत नहीं थे जिसके अनुसार वह भारतवासियों को चिंतन और रुचि से अंग्रेज बना देना चाहता था। कालांतर में मैकाले का कथन कुछ अंशों में सही सिद्ध होता दिखाई पड़ा क्योंकि अंग्रेजी पढ़े-लिखे नवयुवक अपने साधारण देशवासियों के चिंतन और रुचि से अलग-थलग पड़ गए।

1835 ई. के पश्चातवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार में तीव्रगति से वृद्धि हुई। इसका सबसे अधिक प्रभाव बंगाल पर पड़ा। 1844 ई. में लार्ड हार्डिंग ने यह घोषणा की कि सार्वजनिक सेवाओं में केवल उन लोगों को ही नौकरी दी जाएगी जिन्होंने पश्चिमी शिक्षा संस्थाओं में शिक्षा प्राप्त की थी।

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