1857 के बाद भारत का संवैधानिक विकास (Constitutional Development of India after 1857) Part 4 for CAPF

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1935 का भारत शासन अधिनियम

1919 ई. से 1936 ई. के बीच देश के राजनीतिक जीवन में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। इस अवधि में कांग्रेस ने दो जन आंदोलनों को चलाया। इसके अतिरिक्त 1923 ई. में स्वराज दल का गठन, 1928 ई. में सर्वदलीय सम्मेलन एवं साइमन कमीशन का आगमन, परन्तु इन सारे प्रयासों के बावजूद स्वशासन की प्राप्ति नहीं हो पायी और न भारतीय संविधान का कोई ढांचा बन सका। देश में राजनीतिक गतिरोध पूर्ववत बना रहा। इस गतिरोध को दूर करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने 1935 ई. में भारत सरकार अधिनियम पारित किया जिसके महत्वपूर्ण प्रावधान निम्न थे-

  • भारतीय संविधान के निर्माण में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। संविधान लागू होने तक (1950 तक) इसी अधिनियम के प्रावधानों से भारत का शासन चलता रहा।

  • 1935 का अधिनियम 1919 के अधिनियम से बस एक मामले में विशिष्ट था कि इसमें अखिल भारतीय परिसंघ की परिकल्पना की गई थी, इसमें रियासतों की सहभागिता ऐच्छिक मानी गयी थी, इसलिए यह परिसंघ अस्तित्व में ही नहीं आया। अंग्रेज भी यही चाहते थे।

  • विधायी शक्तियों का वितरण केन्द्र एवं प्रांत के बीच तीन सूचियों- केन्द्रीय, प्रांतीय एवं समवर्ती में किया गया था एवं अवशिष्ट शक्तियां गवर्नर जनरल में निहित थी।

  • प्रांतों में दव्ैध शासन समाप्त कर दिया गया था और पूर्ण स्वायत्त शासन की स्थापना की गई थी। लेकिन अब केन्द्र में दव्ैध शासन आरक्षित एवं हस्तांतरित शुरू कर दिया गया था।

  • केन्द्रीय एवं प्रांतीय विधान मंडलों के सदस्यों की संख्या बढ़ा दी गई थी, मतदाताओं की संख्या भी बढ़ गई थी।

  • कांग्रेस में इस बात पर सर्वसम्मति थी कि 1935 के अधिनियम का विरोध किया जाए और यह भी कि इसके बावजूद 1937 के चुनाव में भाग भी लिया जाए।

  • इस अधिनियम ने सांप्रदायिक निर्वाचन पद्धति को 1919 से भी अधिक घृणित बना दिया। मुसलमानों को एक तिहाई स्थान दिया गया।

  • दलितों के लिए भी पृथक निर्वाचन की व्यवस्था की गई।

  • मूल, अपीलीय तथा परामर्शदाता क्षेत्राधिकार वाले एक संघीय न्यायालय की स्थापना का प्रावधान किया गया था। इसके निर्णयों की अपीलें लंदन में प्रीवी काउंसिल (परिषद) में की जा सकती थी।

  • अधिनियम ने गवर्नरों को विशेषाधिकार तथा ’उत्तरदायित्व’ प्रदान किए। मंत्रियों के अधिकार और प्रांतीय स्वायत्तता पंगु बनकर रह गई। गवर्नर के पास विभिन्न प्रकार की विधायी शक्तियां भी थीं।

कांग्रेस में इस अधिनियम के प्रति विभिन्न प्रतिक्रियाएँ हुई। कांग्रेस के दक्षिणपंथी सदस्य इससे संतुष्ट थे। वे चुनाव में भाग लेने को इच्छुक थे तथा पदों को स्वीकार करने के पक्ष में थे। परन्तु वामपंथी विचार वाले कांग्रेसी जैसे-नेहरू, सुभाष आदि दक्षिणपंथी विचार के विपरीत विचार रखते थे। वास्तव में इस अधिनियम के चलते कांग्रेस संगठन में सैद्धांतिक मतभेद पैदा हुआ। फिर भी 1936 ई. के फैजपुर अधिवेशन में कांग्रेस ने इस अधिनियम को स्वीकार कर लिया।

इस अधिनियम के दव्ारा गवर्नर एवं गवर्नर जनरल के अधिकारों में वृद्धि कर दी गई। इसके तहत संघीय शासन व्यवस्था दोषपूर्ण थी क्योंकि इसमें भारतीय राजाओं को अधिक स्थान दिया गया था एवं संघीय न्यायालय को अंतिम न्यायालय नहीं माना गया था। सांप्रदायिक निर्वाचन प्रणाली को और भी बढ़ा दिया गया था। इस अधिनियम में कहने को तो प्रांतीय स्वायत्ता की बात की गई थी पर वास्तविक रूप से अब भी समस्त अधिकार गवर्नर के पास ही थे।

इन कमियों के बावजूद भारत शासन अधिनियम 1935 भारतीय शासन व्यवस्था का मुख्य आधार बना। स्वतंत्रता प्राप्ति तक भारत की शासन व्यवस्था इसी आधार पर संचालित की जाती रही। यहां तक कि स्वतंत्र भारत के संविधान में भी इसके कई प्रावधान शामिल कर लिए गए।

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