भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का विकास (Development of Indian National Movement) Part 5for CAPF

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उग्रवादी आंदोलन का विकास

उग्र राष्ट्रवादी आंदोलन का प्रारंभ महाराष्ट्र में तिलक के नेतृत्व में शुरू हुआ। तिलक ने 1880 ई. में केसरी तथा मराठा साप्ताहिक पत्रों का प्रकाशन शुरू किया। पत्रों के माध्यम से तिलक ने जनता में ब्रिटिश सरकार के शोषणकारी कार्यों का खुलासा कर देशभक्ति एवं देशप्रेम की शिक्षा दी। जनता में राजनीतिक चेतना जागृत करने के लिए तिलक ने 1893 ई. में ’गणपति उत्सव’ तथा 1895 ई. में ’शिवाजी उत्सव’ का प्रारंभ किया। तिलक ने महाराष्ट्र की जनता को एक नया जीवन दिया तथा लोगों में उग्र राष्ट्रीयता व देशभक्ति की भावना का संचार किया। 1896-97 ई. में महाराष्ट्र में भीषण अकाल तथा महामारी का प्रकोप हुआ। दैवी प्रकोप से जन धन की बहुत बर्बादी हुई। सरकार की ओर से इस संकट की घड़ी में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। तिलक ने अपने पत्रों में सरकार दव्ारा किए गए कार्यों को अपर्याप्त और असंतोषजनक बताया। चापेकर बंधुओं ने गुस्से में आकर पूना के प्लेग कमिश्नर (आयुक्त) रैण्ड (फाड़ना) तथा उसके सहयोगी लेफ्टिनेन्ट एमहर्स्ट को गोली मार दी। हत्या के लिए चापेकर बंधुओं को फांसी की सजा दी गई तथा तिलक को 18 माह का कठोर कारावास दिया गया। संपूर्ण राष्ट्र की ओर से तिलक की सजा का विरोध किया गया।

बंगाल में उग्र राष्ट्रवादी आंदोलन का प्रारंभ लार्ड कर्जन के बंगाल विभाजन की घोषणा से शुरू हुआ। बंगाल राष्ट्रीय आंदोलन का प्रमुख केन्द्र था। लॉर्ड कर्जन ने सोचा कि यदि बंगाल का विभाजन कर दिया जाए तो इससे राष्ट्रीय आंदोलन अपने आप कमजोर हो जाएगा। साथ ही बढ़ते हुई उग्र राष्ट्रीय आंदोलन पर काबू पाया जा सकता है। बंगाल विभाजन का राष्ट्रवादियों ने घोर विरोध किया। उन्होंने महसूस किया कि ब्रिटिश सरकार इस विभाजन से हिन्दु और मुसलमानों में फूट डालने का प्रयास कर रही है। बंगाल विभाजन के विरुद्ध जन आंदोलन केवल बंगाल में नहीं बल्कि सारे राष्ट्र में फैल गया। 16 अक्टूबर, 1905 ई. को जब विभाजन को व्यावहारिक रूप दिया गया तो सारे बंगाल में राष्ट्रीय शोक मनाया गया। कलकत्ता में सार्वजनिक हड़ताल की गई। वन्दे मातरमवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू के नारों से शहर गूँज उठा। आनंद बोस ने जनता को संगठित होकर आंदोलन करने को कहा। आंदोलन के दौरान विदेशी वस्तुओं की होली चलायी गयी तथा हथकरघे के विकास के लिए राष्ट्रीय संस्था की स्थापना की गयी। स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग पर अधिक जोर दिया गया। लोगों ने प्रतिज्ञा की-’हम ईश्वर को साक्ष्य मानकर प्रतिज्ञा करते हैं कि जहाँ तक संभव और व्यावहारिक हो सकेगा हम अपने देश में बनी हुई वस्तुओं का प्रयोग करेंगे और ब्रिटिश वस्तुओं का प्रयोग नहीं करेंगे।’ अनेक कवियों और लेखकों ने राष्ट्रवादी रचनाएँ करके स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन को बढ़ावा दिया। 1907 ई. में सभा और सम्मेलन पर प्रतिबंध लगाने के उद्देश्य से ’षड़यंत्रकारी सभा अधिनियम’ पास हुआ।

1907 ई. के कांग्रेस के सूरत अधिवेश में कांग्रेस में फूट पड़ी। इस अधिवेशन में उग्र राष्ट्रवादी लोकमान्य तिलक को सभापति पद पर आसीन करना चाहते थे। किन्तु उदारवादियों ने अपने बहुमत से डॉ. रासबिहारी घोष को सभापति निर्वाचित किया। परिणामस्वरूप अध्यक्ष के भाषण के पहले हंगामा हो गया और अधिवेशन स्थगित करना पड़ा। श्रीमती एनी बेसेन्ट ने सूरत की घटना को कांग्रेस के इतिहास में सर्वाधिक शोकपूर्ण घटना कहा था। उग्र राष्ट्रवादी कांग्रेस से अलग हो गए।

1908 ई. में ’केसरी’ में प्रकाशित लेखों के आधार पर तिलक तथा लाला लाजपतराय को काला पानी की सजा दी गयी। इसका विरोध पूरे भारतवर्ष में किया गया। ब्रिटिश सरकार उग्रवादी आंदोलन को बलपूर्वक दबाने पर लगी हुई थी। सनवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू 1911 ई के ’षड़यंत्रकारी सभा अधिनियम’ दव्ारा सरकार के विरुद्ध सभाएँ करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। जिन उग्र राष्ट्रवादी नेताओं को बिना मुकदमा चलाये या जबरदस्ती कैद में डाल दिया गया था उन्हें देश निकाला दे दिया गया।

तिलक 6 वर्षो की सजा काटकर 1914 ई. में माडले जेल से लौटे तो इससे राष्ट्रीय संगठन मे ंपुन: नयी प्रेरणा एवं शक्ति का संचार हुआ। 1915 ई. में गोपाल कृष्ण गोखले तथा फिरोजशाह मेहता की मृत्यु हो जाने से कांग्रेस नेतृत्वविहीन हो गयी। ऐसी स्थिति में श्रीमती ऐनी बेसेन्ट ने मध्यस्थता का कार्य किया तथा 1916 ई. के लखनऊ अधिवेशन में दोनों दलों में मेल हो गया। तिलक तथा एनी बेसेन्ट ने 1916 ई. में होमरूल आंदोलन का श्रीगणेश किया। कांग्रेस ने भी होमरूल आंदोलन को स्वीकार किया और साथ मिलकर राष्ट्रीय आंदोलन को तीव्र करने का निर्णय लिया।

होमरूल आंदोलन को यद्यपि उदारवादियों ने अपना पूर्ण समर्थन दिया किन्तु फिर भी उदारवादियों एवं उग्र राष्ट्रवादियों की विचारधाराएँ एक नहीं हो पायी। मॉण्टफोर्ड सुधार योजना के प्रकाशित होने पर उग्र राष्ट्रवादियों ने डटकर उसका विरोध किया। उदारवादी उस योजना में कुछ सुधार लाकर स्वीकार करने के पक्ष में थे। 1917 ई. में कलकत्ता तथा 1918 ई. में बंबई कांग्रेस अधिवेशन में उदारवादियों को आमंत्रित करने के बावजूद उन्होंने अपने को अधिवेशन से अलग रखा और उदारवादियों ने कांग्रेस से अलग एक संगठन ’राष्ट्रीय उदार संघ’ बनाया। 1918 ई. के बाद गांधीजी ने भारतीय राजनीति में प्रवेश किया तथा उन्होंने 1919 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का नेतृत्व किया, धीरे-धीरे उदारवादियों तथा उग्र राष्ट्रवादियों के बीच विवाद समाप्त हो गया।

निष्कर्ष के रूप में हम कह सकते हैंं कि उग्र राष्ट्रवादियों ने राष्ट्रीय आंदोलन को संक्रिय रूप प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। इन्होंने भारतीय नवयुवकों को संगठित करने में , उनमें राजनीतिक चेतना जागृत करने में सराहनीय कार्य किया। उग्र राष्ट्रवादियों ने अपने उद्देश्य की पर्ति के लिए जिन कार्यक्रमों को अपनाया, उनमें से बहुत से कार्यक्रम को बाद में गांधी जी ने भी अपनाया। इस समय भी राष्ट्रीय आंदोलन मध्यम वर्ग तक ही सीमित था जिसके परिणामस्वरूप उग्र राष्ट्रवादी आंदोलन जन आंदोलन का रूप धारण नहीं कर सका।

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