गाँधी युग (Gandhi Era) Part 19 for CAPF

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अगस्त प्रस्ताव

8 अगस्त, 1940 को वायसराय लिनलिथगो ने एक घोषणा की। इसे ही अगस्त प्रस्ताव के नाम से जाना जाता है। इसमें निम्न प्रावधान थे-अंग्रेज किसी ऐसी संस्था को शासन नहीं सौंपेगे, जिसमें अल्पसंख्यकों का हित सुरक्षित न हो, युद्ध के बाद एक संविधान सभा का गठन, संविधान निर्माण का अधिकार भारतीयों को तथा एक युद्ध सलाहकार परिषदवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू का गठन जिसमें भारतीय भी शामिल होगे। उक्त आधार पर भारतीय युद्ध में सरकार का सहयोग करेंगे।

एक तरह से अगस्त प्रस्ताव भारत की वैधानिक समस्या को सुलझाने की दिशा में एक सराहनीय प्रयास था। इस प्रस्ताव में युद्ध के बाद भारत को औपनिवेशिक स्वराज्य की स्थापना का वचन दिया गया था और इसके लिए संविधान बनाने की शक्ति भी भारतीयों को दिए जाने की बात की गई थी। आलोचनात्मक दृष्टि से देखने पर ये प्रस्ताव असंतोषजनक थे। कांग्रेस की अस्थायी सरकार की स्थापना तथा उसे रक्षा एवं अन्य मामलों का नियंत्रण देने की मांग का इसमें जिक्र तक नहीं किया गया था। इसमें अल्पसंख्यकों को भविष्य में भारत के संवैधानिक विकास में रोक लगाने का पूरा अधिकार दे दिया गया। इसमें बहुमत को अल्पमत की दया पर छोड़ दिया गया था। यह राष्ट्रीय हितों के प्रतिकूल था।

कांग्रेस ने अगस्त प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया, मुस्लिम लीग ने भी इसे स्वीकार नहीं किया क्योंकि इसमें संयुक्त भारत की ओर संकेत किया गया था तथा इसमें पाकिस्तान की स्थापना के लिए कोई प्रस्ताव नहीं था।

वस्तुत: अगस्त प्रस्ताव भारत की वैधानिक समस्या को हल करने की बजाए उसे टालने, वैधानिक गतिरोध के लिए कांग्रेस को उत्तरदायी ठहराने और भारत की राजनीतिक समस्या को सांप्रदायिक समस्या का रूप देने का प्रयास था।

पाकिस्तान प्रस्ताव

मुसलमानों में पृथकृतावादी तत्व बहुत पहले से ही सक्रिय थे जो मुसलमानों के लिए अलग देश की मांग कर रहे थे। इस मांग को रखने वाले कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त कर रहे कुछ भारतीय मुसलमान थे जिनके अगुआ चौंधरी रहमत अली थे। उनकी अध्यक्षता में पाकिस्तान राष्ट्रीय मूवमेंट (पल) लंदन में चलाया जा रहा था। लीग ने खुद ही 1937 ई. में मुस्लिम लीग के लाहौर अधिवेशन में एक प्रस्ताव पास किया जिसे हम पाकिस्तान प्रस्ताव के नाम से जानते हैं। पाकिस्तान प्रस्ताव पास हो जाने एवं विशेषकर 1940 ई. से जिन्ना अधिक उत्साही दिखाई देने लगे। वे अब पृथकतावादी भाषण देने लगे। उन्होंने मांग की कि भावी संविधान में कांग्रेस और लीग को समान अधिकार होना चाहिए।

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