व्यक्तित्व एवं विचार (Personality and Thought) Part 1 for CAPF Exam

Glide to success with Doorsteptutor material for CTET-Hindi/Paper-1 : get questions, notes, tests, video lectures and more- for all subjects of CTET-Hindi/Paper-1.

महात्मा गांधी

क्या है गांधीवाद? क्या यह एक दर्शन है? इन प्रश्नों का उत्तर सहज नहीं है, गांधी स्वयं अपने विचारों को “गांधीवाद” की संज्ञा नहीं देना चाहते थे। उन्होंने कभी भी मौलिकता का दावा नहीं किया। “दर्शन” शब्द से भी उनके विचारों का समुचित निरूपण हो सकना संभव नहीं है। किसी शास्त्रीय अर्थ में उनके विचारों को दर्शन नहीं कहा जा सकता। वे अत्यंत स्वतंत्र प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। उन्होंने कभी भी अपने विचारों को तर्क -संगत ढंग से संकलित नहीं किया। उनके विचारों को आसानी से संपादित करना भी सहज कार्य नहीं है। उनकी कुछ मौलिक धारणाएं अवश्य थीं और वे जीवन-पर्यन्त उनका अनुगमन करते रहे, किन्तु वे अपने विचारों को विभिन्न संदर्भों के अनुरूप संशोधित भी करते चले गए। उनके कई विचारों में पारस्परिक विरोधाभास भी है। वे उत्तेजित होकर कभी कोई बात नहीं कहते थे। किन्तु जिस व्यक्ति का कर्मक्षेत्र इतना विशाल और विशद हो उसके विचारों में “निरन्तर विकास” के सिद्धांत के अनुरूप परिवर्तनशीलता का होना आवश्यक था। इन्हीं कारणों से जब भी हम उनके “वाद” या “दर्शन” की बात करते हैं, कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

एक महत्वपूर्ण तथ्य और भी है। गांधी के विचारों को उनके जीवन से अलग करके नहीं देखा जा सकता। उनके जितने भी विचार लिखित रूप में उपलब्ध हैं उनके अध्ययन मात्र से गांधी के विचारों का पूर्ण ज्ञान हो पाना संभव नहीं है। उनकी समस्त आस्थाओं का स्त्रोत उनका व्यक्तिगत रूप से जिया हुआ सत्य है। उनकी सारी दार्शनिक अनुभूतियां उनके कर्मयोग की देन हैं। उन्होंने जो कुछ भी कहा, उसको स्वयं करके दिखाया। कदाचित वे दुनिया के पहले व्यक्ति थे जिसकी कथनी और करनी में कभी कोई अंतर नहीं रहा। इसलिए जब भी हम उनके विचारों का अध्ययन करते हैं, हमें उनके दव्ारा संचालित राजनीतिक अथवा सामाजिक गतिविधियों को भी ध्यान में रखना पड़ता है; तभी “गांधी-दर्शन” या “गांधीवाद” की समग्रता का आभास होता है।

Developed by: