महत्वपूर्ण राजनीतिक दर्शन Part-2: Important Political Philosophies for CAPFfor CAPF

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आधुनिक या सकारात्मक उदारवाद

उदारवाद का दूसरा चरण आधुनिक या सकरात्मक उदारवाद है जिसे मोटे तौर पर 1850 ई. से 1950 ई. के मध्य माना जाता है। इस विचारधारा के उदय के पीछे कुछ ठोस परिस्थितियाँ जिम्मेदार थीं। नकरात्मक उदारवाद में अहस्तक्षेप तथा अनुबंध की स्वतंत्रता पर आधारित जिस मुक्त बाजार प्रणाली का समर्थन किया गया था, उसमें मजदूरों को औपचारिक रूप से चाहे समानता व स्वतंत्रता मिली हों किन्तु वास्तविक रूप से पूंजीपति उनका शोषण करने में समर्थ थे। मजदूरों की दयनीय स्थिति का परिणाम यह हुआ कि बहुत सारे विचारक समानता व स्वतंत्रता के सकरात्मक विचार प्रस्तुत करने लगे जिसका तात्पर्य था कि समानता और स्वतंत्रता के वास्तविक वितरण के लिए राज्य को पर्याप्त स्थितियाँ जुटानी चाहिए ताकि साधारण व्यक्ति भी इन आदर्शों का लाभ सचमुच उठा सके। इस समय समाजवाद के आरंभिक विचारक सेंट साइमन, चाल्स फ्यूरिए तथा रॉबर्ट ओवन भी अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। इन्होंने मजदूरों की दुर्दशा दूर करने के लिए पूंजीपतियों की अंतरात्मा से अपील की। ये तीनों विचार ’स्वप्नदर्शी समाजवादी’ कहलाते हैं। इनके तुरंत बाद समाजवाद का आक्रात्मक रूप सामने आया जिसे मार्क्सवाद कहते हैं। मार्क्सवाद ने मजदूरों को पूंजीपतियों के विरुद्ध हिंसक क्रांति करने के लिए प्रेरित किया। इन स्थितियों में उदारवादी चिंतकों को महसूस हुआ कि मुक्त बाजार प्रणाली पर आधारित उनकी विचारधारा अब नहीं चल सकती है। इसलिए उदारवाद में कुछ नए विचारकों ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कुछ सीमित करते हुए नई व्याख्या प्रस्तुत कीं। यही व्याख्याएं सम्मिलित रूप में आधुनिक या सकारात्मक उदारवाद कहलाती हैं। इस विचारधारा के प्रमुख समर्थक थे-जे.एस. मिल (अंतिम दौर में) तथा लास्की।

सकारात्मक उदारवाद की प्रमुख मान्यताएँ इस प्रकार हैं-

  • ये चिंतक भी व्यक्ति के स्वतंत्रता के समर्थक हैं, किन्तु ये व्यक्ति को निरपेक्ष स्वतंत्रता नहीं देते है। जे.एस. मिल ने स्पष्ट किया कि व्यक्ति की स्वतंत्रता उसके स्व-विषयक कार्यो तक ही सीमित है। उसके जो कार्य अन्य व्यक्तियों को प्रभावित करते हैं, उनमें वह पूर्णत: स्वतंत्र नहीं है।

  • स्वतंत्रता और समानता सिर्फ औपचारिक रूप से दिए जाने वाले सिद्धांत नहीं हैं। इनका वास्तविक महत्व तभी है जब इनके लिए अनुकूल परिस्थितियाँ भी विद्यमान हों।

  • समाज के वंचित वर्ग ’तात्विक’ रूप से समानता और स्वतंत्रता को उपलब्ध कर सकें, इसके लिए आवश्यक है कि उनके लिए संरक्षंणात्मक भेदभाव की नीति अपनाई जाए। इस नीति को ’सकारात्मक कार्यवाही’ भी कहा जाता है और इसी से सामाजिक न्याय की स्थिति उत्पन्न होती है।

  • स्वतत्ववमूलक व्यक्तिवाद का सिद्धांत इन्हें पूर्णत: स्वीकार्य नहीं है। इसका मानना है कि व्यक्ति अपनी सभी क्षमताओं को स्वयं अर्जित नहीं करता, इसलिए वह अपनी क्षमताओं से उत्पन्न होने वाले संपूर्ण लाभ का अकेला स्वामी नहीं हो सकता।

  • अर्थव्यवस्था के संबंध में इन्होंने ’अहस्तक्षेप सिद्धांत’ का विरोध किया और ’न्यूनतम हस्तक्षेप’ का सिद्धांत प्रस्तुत किया। बाजार अर्थव्यवस्था को ’नियमित’ करने हेतु स्वतंत्र है, किन्तु वह उसे ’नियंत्रित’ नहीं करेगा। राज्य इतना हस्तक्षेप अवश्य करेगा कि मुक्त बाजार के नियम वंचित वर्ग की मानवीय गरिमा का उल्लंघन न कर सकें।

  • संपत्ति के अधिकार को इन्होंने भी महत्व दिया किन्तु उतना नहीं जितना नकारात्मक उदारवादियों ने। जे.एस.मिल ने कहा कि संपत्ति का अधिकार सीमित होना चाहिए; विशेष रूप से भू-संपत्ति के स्वामित्व पर सीमा आरोपित की जानी चाहिए। मिल और लास्की दोनों ने संपत्ति के हस्तांतरण पर भारी कर लगाने की वकालत की।

  • जहाँ तक राज्य का प्रश्न है, इन विचारकों ने ’रात्रिरक्षक राज्य’ के स्थान पर ’कल्याणकारी राज्य’ की धारणा प्रस्तुत की। इससे राज्य की शक्तियाँ बढ़ गई। इनके अनुसार, राज्य का कार्य सिर्फ कानून व्यवस्था बनाए रखना नहीं है बल्कि विभिन्न वर्गों के मध्य अंतराल कम करना, वंचित वर्गों को बुनियादी जरूरतें मुहैया कराना इत्यादि भी है। यहाँ राज्य की सकारात्मक भूमिका है।

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