महत्वपूर्ण राजनीतिक दर्शन Part-22: Important Political Philosophies for CAPFfor CAPF

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माओ का मार्क्सवाद

माओ-त्से-तुंग चीन के मार्क्सवादी नेता थे जिन्होंने 1949 ई. में जनवादी क्रांति की। इन्होंने पारंपरिक मार्क्सवाद के कई सिद्धांतों में संशोधन किया और लेनिन व स्टालिन के कई विचारों को भी बदला।

माओ के प्रमुख मार्क्सवादी विचार इस प्रकार हैं-

ढवस बसेेंत्रष्कमबपउंसष्झढसपझ माओ के अनुसार क्रांति का अनिवार्य संबंध पूंजीवाद के चरम स्तर से नहीं है। उसने कृषक क्रांति पर अधिक बल दिया क्योंकि तत्कालीन चीनी अर्थव्यवस्था मूलत: कृषि पर टिकी हुई थी। उसने सैनिकों को भी क्रांति की प्रक्रिया में अत्यधिक महत्व दिया क्योंकि उसे सेना से काफी समर्थन हासिल था। उसका यह कथन कि ”सत्ता बंदूक की नली से निकलती है” भी सेना के महत्व को ही रेखांकित करता है।

  • माओ ने ’सांस्कृतिक क्रांति’ का नारा दिया। उसने कहा कि उत्पादन के साधनों का सार्वजनिक स्वामित्व में आ जाना ही पर्याप्त नहीं है, विचारों व मूल्यों के स्तर पर जनवाद को स्थापित करना जरूरी है। वास्तविक समाजवाद या जनवाद तब आएगा जब समाज के सभी लोगों की सोच जनवादी हो जाएगी।

  • माओ ने ’निरंतर क्रांति’ का सिद्धांत प्रस्तुत किया। उसने कहा कि क्रांति एक घटना नहीं बल्कि लंबे समय तक चलने वाली प्रक्रिया है। क्रांति का अर्थ समाज में उन मूल्यों को स्थापित कर देना है जो जनवादी मानसिकता को संभव बनाते हैं। इस कार्य में लंबा समय लगेगा।

  • राज्य एक झटके में समाप्त नहीं होगा। उसकी जरूरत तब तक बनी रहेगी जब तक सांस्कृतिक क्रांति की प्रक्रिया पूरी न हो क्योंकि राज्य के अभाव में ’प्रति-क्रांति’ के कारण यह प्रक्रिया विफल हो सकती है। सर्वहारा क्रांति के बाद राज्य की भूमिका ’सर्वहारा की अग्रपंक्ति’ के रूप में होती है। हो सकता है कि राज्य का विलोपन कई शताब्दियों तक भी न हो सके

  • माओ ने मार्क्सवाद और राष्ट्रवाद में समन्वय किया। उसने लेनिन से आगे बढ़ते हुए दावा किया कि राष्ट्रवादी हितों को मार्क्सवाद के नाम पर छोड़ा नहीं जा सकता। उसने तिब्बत तथा अन्य दिशाओं में राष्ट्रीय सीमाओं को बढ़ाने की चेष्टा भी की।

  • अंतरराष्ट्रीय संबंधों के मामले में माओ शांतिपूर्ण सहअस्तित्व’ का समर्थक नहीं है। उसका मानना है कि साम्राज्यवाद तथा पूंजीवाद का पूर्ण विनाश किए बिना आदर्श समाजवाद की स्थापना नहीं हो सकती। इस उद्देश्य के लिए वह युद्ध को आवश्यक मानता है। उसे विश्वास था कि तीसरा विश्व युद्ध साम्राज्यवाद को पूरी तरह नष्ट कर देगा। गौरतलब है कि खुश्चेव के शासन काल में सोवियत संघ शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की वकालत कर रहा था जिसे माओ ने ’संशोधनवाद’ कहकर खारिज कर दिया। उसने भारत जैसे उन देशों की भी आलोचना की जो पूंजीवादी और समाजवादी गुटों से अलग होकर तटस्थता की नीति पर चल रहे थे।

  • माओ ने भी लेनिन की तरह ’लोकतांत्रिक केन्द्रवाद’ का सिद्धांत स्वीकार किया। चीन में इस सिद्धांत का प्रयोग साम्यवादी दल तथा प्रशासन दोनों स्तरों पर किया गया।

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