कलमकारी कला (Artificial art – Culture)

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• इस शब्द की उत्पत्ति फ़ारसी शब्द कलम तथा कारी (शिल्प कौशल) से हुई है, जिसका आशय ’कलम से चित्रकारी करना’ है।

• आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले में पेड्‌दाना कस्बा अपनी कलमकारी के लिए विख्यात है।

• इन चित्रों को कपड़ों पर उकेरा जाता है। ये चित्र कपड़ों पर हाथ से बनाए जाते हैं तथा कपड़ों पर वेजिटेबल डाई (वनस्पति रंग) का प्रयोग कर ब्लॉक (ढांचा) प्रिंटिंग (छपाई) भी की जाती है।

• कपड़ों पर वानस्पतिक रंगों का उपयोग करने वाली यह चित्रकला पद्धति भारत के कई भागों में प्रचलित है लेकिन कलमकारी कला का विकास मुख्यत: कलाहस्ती और मसुलीपटनम में हुआ है।

• वस्तुत: 15वीं सदी में विजयनगर के शासकों के संरक्षण में विकसित इस कला के अंतर्गत मंदिरों के आंतरिक भागों को चित्रित कपड़ों के पट्टिकाओं से सजाया जाता था।

• ये चित्र अत्यधिक टिकाऊ, आकार में नम्य और विभिन्न विषयों के अनुसार बनाये जाते हैं।

• इसके विषय मुख्यत: रामायण, महाभारत और हिन्दू पौराणिक कथाओं पर आधारित होते हैं।

• इनमें कपड़ों पर चित्रकारी की प्रक्रिया में कोई रासायनिक उत्पाद प्रयुक्त नहीं होता और इनके धोने से नदियों में प्रवाहित होने वाले रंग भी जल को प्रदूषित नहीं करते।

दो विशिष्ट शैलियाँ

• भारत में कलमकारी कला की दो विशिष्ट शैलियाँ प्रचलित हैं। प्रथम, श्रीकलाहस्ती शैली और दव्तीय मसुलीपटनम शैली। दोनों शैली की निर्माण प्रक्रियाओं में अंतर पाया जाता है।

• कलमकारी की मसुलीपटनम शैली फ़ारसी कला से प्रभावित है। इसमें सामान्यत: पेड़-पौधे, पत्तियाँ, फूल आदि को ठप्पों दव्ारा मुद्रित किया जाता है।

• श्रीकलाहस्ती शैली का विकास अधिकतर मंदिरों में हिन्दू शासकों के संरक्षण में हुआ है। इस प्रकार यह मुख्यत: धार्मिक पहचान रखती है। इस शैली में कलम के प्रयोग से मुक्तहस्त चित्र बनाये जाते हैं और उनमें हाथ से रंग भरे जाते हैं।