कुटियट्टम लोसर महोत्सव लद्दाख (Koodiyattam Losar Festival Ladakh – Culture)

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• कुटियट्टम प्राचीन काल से प्रचलित रंग मंत्र कला का एक रूप है इसकी उत्पत्ति को दो हजार वर्ष पूर्व खोजा जा सकता है भारत के प्रख्यात संस्कृत नाटकों से भी इसकी उत्पत्ति को संबद्ध किया जा सकता है।

• हाल ही में, कुटियट्टम को यूनेस्कों दव्ारा ”मानवता के मौखिक और अमूर्त विरासत की कृतियों में उत्कृष्ट” के रूप में घोषित गया है।

• कुटियट्टम पुरुष अभिनेताओं जिन्हें चकयार तथा महिला कलाकारों जिन्हें नागिआर कहा जाता है के एक समुदाय दव्ारा किया जाता है। इस कला में ढ़ोल बजाने वालों को नाम्बियार्स कहा जाता है, रंगशालाओं को कुट्टमपालम कहा जाता है।

• कुटियट्टम संस्कृत के शास्त्रीय स्वरूप और केरल की स्थानीय प्रकृति के संश्लेषण का प्रतिनिधित्व करता है।

• अभिनेताओं को इस कला में महारत प्राप्त करने के लिए दस से पंद्रह वर्ष के कठोर प्रशिक्षण से गुजरना होता है तभी वे अपनी श्वास पर नियंत्रण तथा चेहरे और शरीर की पेशियों में सूक्ष्म भावों की प्रस्तुति को रंग मंच के अनुसार परिवर्तित करने में समर्थ हो पाते हैं।

• एक अभिनेता की क्षमता किसी प्रकरण के सभी पक्षों को विस्तृत रूप में प्रदर्शित करने में मानी जाती है अत: इस कला के अंतर्गत किया जाने वाला प्रदर्शन कभी-कभी 40 दिनों तक चलता रहता है।

लोसर महोत्सव लद्दाख (Losar Festival Ladakh – Culture)

• लोसर महोत्सव लद्दाख/तिब्बत में नववर्ष की शुरुआत के रूप में मनाया जाता है और यह इस क्षेत्र का सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार है।

• यह दिसंबर में आता है और लद्दाखी बौद्धजन घरेलू धार्मिक स्थलों में या गोम्पा में अपने देवताओं से समक्ष धार्मिक चढ़ावा चढ़ाते हैं।

• इस महोत्सव के दौरान पारंपरिक प्रदर्शन, सांस्कृतिक कार्यक्रम और प्राचीन रस्मों का प्रदर्शन किया जाता है।

• तेज़ संगीत और नृत्य के साथ और रिश्तेदारों के साथ भोजन करके उत्सव मनाया जाता है।