Science and Technology: Mini Satellite Program and Scientific Objective

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स्चाांर, नौवहन/नौसंचालन तथा मौसमविज्ञानीय उपग्रह प्रणाली (Communication and Meteorological Satellite System)

यूथसैट (YOUTHSAT)

यूथसैट अप्रैल 20,2011 से भौमिक आयनमंडल तथा तापमंडल पर अभिप्रेत मापन निरंतर रूप से प्रदान कर रहा है। भारत-रूसी सहयोग-यूथसैट, भारत का पहला लघु उपग्रह है जो संपूर्ण रूप से सूर्य तथा भूमि के ऊपरी वायुमंडल के वैज्ञानिक अन्वेषण हेतु समर्पित हैं। यूथसैट पर रखे तीन वैज्ञानिक नीतभारों में से, आर. ए. बी. आई. टी. (आयनमंडलीय आकृतिविज्ञान के लिए रेडियो बीकन) तथा LiVHySI (लिंब दृशीय अति स्पेक्ट्रमी प्रतिबिंबित्र) नामक नीतभार भारत के हैं जबकि तीसरा नीतभार एस. ओ. एल. आर. ए. डी. मॉस्को स्टेट विश्वविद्यालय, रूस का है। LiVHySI तथा आर. ए. बी. आई. टी. नीतभारों के संयोजन का इस प्रकार चयन किया गया है कि दोनों क्रमश: तटस्थ तथा प्लाज्मा प्राचलों पर मापन प्रदान करते हुए एक दूसरे के अनुपूरक हो। ये दोनों परीक्षण अपनी तरह के पहले हैं और स्वदेशी रूप से विकसित किये गये हैं।

आयनमंडलीय आकृतिविज्ञान के लिए रेडियो बीकन (Radio Bikan for Ion System Morphology) (RABIT)

एक एस. पी. एल. वी. एस. एस. सी. उद्यम, एक ऐसा रेडियो बीकन है जो 818 कि. मी. , की अपनी कक्षा से 150 तथा 400 में ह. की आवृत्तियों का उत्सर्जन करता है जिसका भूमि पर अनुवर्तन, विशिष्ट रेडियो अभिग्राही का उपयोग करते हुए तथा ऊपर उल्लिखित आवृत्यािं में प्राप्त रेडियो संकेतों के अपेक्षित चरण परिवर्तन के जरिये आयनमंडल के कुल निहित इलेक्ट्रान का अनुमान लगाते हुए भारत के ऊपर अक्षांश (अर्थात 760 पूर्व) के आस-पास किया जाता है। भू अभिग्राही केन्द्रों के लिए त्रिवेन्द्रम, बेंगलूर, हैदराबाद, भोपाल तथा दिल्ली का चयन किया गया है। इस प्रकार लगभग एक साथ अनुमान लगाये गये टी. ई. सी. को लेकर टोमोग्राम तैयार किया गया, जो हमें आयनमंडलीय इलेक्ट्रान घनत्व के अभिवृत्ति -तुंगता वितरण देता है। इस मामले मं यह टोमोग्राम त्रिवेन्द्रम के दक्षिण में कुछ डिग्री (5 - 60) से लेकर दिल्ली के उत्तर में लगभग 3 - 40 तक, उपग्रह के उत्थापन के आधार पर आयानमंडल को आवृत्त करता है। इस बात का उल्लेख किया जाना चाहिए कि उच्च आकाशीय विभेदन ‘आयानमंडलीय टोमोग्राफी’ के अलावा भूमि अथवा अंतरिक्ष आधारित कोई तकनीक आयानमंडील इलेक्ट्रॉन घनत्व का अभिवृत्ति-अक्षांश वितरण प्रदान नहीं कर सकती। RaBIT टोमोग्राफी नेटवर्क मिशन में विद्यमान नेटवर्कों में सबसे लंबा नेटवर्क है और इसलिये अदव्तीय है।

लिंब दृशीय अति स्पेक्ट्रमी प्रतिबिंबित्र (Limb Scene Reflect Ultra-Spectral) (LIVHYSI)

LIVHYSI, एस. पी. एल. सैक के प्रयास का एक और भारतीय नीतभार है। यह एक वेडज स्यंदक आधारित कैमरा है जिसमें हर 1.1 ने. मी. में 430 - 950 ने. मी की तरंगदैर्ध्य रेन्ज के बीच पृथ्वी के पार्वो (लिंब) के आस-पास पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल में उत्सर्जित वायुदीप्ति नामक वायुमंडलीय उत्सर्जन के प्रतिबिंबन के लिए 90x180 का दृश्य क्षेत्र है। इस संरूपण में, 80 - 600 कि. मी. के तुंगता क्षेत्र के पृथ्वी के पाव में LIVHYSI दव्ारा भौमिक वायुदीप्ति का प्रतिबिंब लिया जाता है। LIVHYSI भौमिक वायुदीप्ति के प्रतिबिंब दोनों संरूपणों में लगा, अर्थात्‌ पृथ्वी के पा वो (लिंब) का समानांतर कक्षा तथा सामान्य कक्षा में दृश्यनं LIVHYSI विव्र में अपनी तरह का एक ही और अदव्तीय उपकरण है क्योंकि यह अत्यन्त उच्च स्पेक्ट्रमी निभेदन के दृशीय तथा निकट अवरक्त में सभी वायुमण्डलीय वायुदीप्ति उत्सर्जनों का एक साथ मापन करता है। इस बहु-स्पैक्ट्रमी सूचना के कारण प्राप्त प्रतिबिंब महत्वपूर्ण हो जाते हैं और पूर्व संसाधन की आवश्यकता होती है।

लघु उपग्रह कार्यक्रम (Mini Satellite Program)

एक्स-किरण ध्रुवीय मापी परिक्षण (पोलिक्स) (X-Ray Polarity Test (Polys) )

एक्स किरण ध्रुवीयमापी परीक्षण (पोलिक्स) इसरों के “लघु उपग्रह के कार्यक्रम” का भाग है जिसकी सिफारिश इसरो की अंतरिक्ष विज्ञान सलाहकार समिति (एड्‌कोस) ने की थी। थामसन्‌ के एक्स किरण के प्रकीर्णन के सिद्धांत पर आधारित एक्स किरण ध्रुवीयमापी का निर्माण रामण अनुसंधान संस्थान (आर. आर. आई.) में किया जा रहा है। फिलहाल, प्रयोगशालायी मॉडल का विकास और इंजीनियरी मॉडल का डिज़ाइन पूरा किया गया है। इंजीनियरी मॉडल का संविरचन प्रगति पर है।

वैज्ञानिक उद्देश्य (Scientific Objective)

एक्स-किरण ध्रुवीयमापी उच्च ऊर्जा खगोल भौतिकी का अछूत क्षेत्र है। कर्क निहारिका ही एक मात्र एक्स-किरण स्त्रोत है, जिसके लिए एक निश्चित ध्रुवीकरण मापन विद्यमान है। एक्स- किरण ध्रुवीकरण मापन निम्न के बारे में बहुमूल्य अंतदृष्टि प्रदान कर सकता है।

  • स्त्रोतों में चुंबकीय क्षेत्रों का विस्तार एवं बल
  • स्त्रोतों में रेखागणितीय विषमदैशिक
  • दृष्टि की रेखा के संबंध में उनका रेखीकरण
  • विकिरण एवं प्रकीर्णन में भाग लेने वाले इलेक्ट्रॉनों को ऊर्जावान बनाने हेतु उत्तरदायी त्वरित्र की प्रकृति।

एस. ई. एन. एस. ई. (S. E. N. S. E.)

  • एस. ई. एन. एस. ई. पृथ्वी के निकट अंतरिक्ष क्षेत्र के विद्युतचुंबकीय पर्यावरण को वेधने हेतु युगल उपग्रह मिशन है। अंतरिक्ष मौसम संबंधी अध्ययनों हेतु लगभग 500 कि. मी. की निम्न भू कक्षा में दो लधु उपग्रहों को उच्च आनति (-800) पर एक तथा निरन्तर आनति (-300) पर अन्य को प्रमोचित करने का प्रस्ताव रखा गया है।
  • एस. ई. एन. एस. ई. इसरो की अंतरिक्ष विज्ञान सलाहकार समिति (एड्‌कॉस) दव्ारा संस्तुत “लधु उपग्रह कार्यक्रम” का भाग है। एस. ई. एन. एस. ई. का उद्देश्य, निम्न आक्षांशों में निकट अंतरिक्ष पर्यावरण की आयनमण्डल-तापमण्डल प्रणाली तथा मौसम की स्थिति के निर्धारण प्रमुख बृहत्‌ पैमाने के प्रेरकों दव्ारा निभायी जाने वाली भूमिका को उजागर करना है। एक गैर-चुंबकीय ई. एम. आई. ई. एम. सी. जो अति निम्नआवृत्तियाँ (< 50फि. ह.) पर फैरेड केज (पिंजरे) के रूप में अनुकूल सुरक्षा प्रदान करता है, को हाल ही में ई. जी. आर. एल. में तैनात किया गया है। इसमें प्रेरक चुंबकत्वमापियों के लिए अत्याधुनिक अंशांकन प्रणाली है। यह एक महत्वपूर्ण परिक्षणात्मक सुविधा है और भावी अंतरिक्ष मिशनों की महत्वपूर्ण संपत्ति है और साथ ही, यह संस्थान में अंतरिक्ष वाहित उपकरण के विकास के लिए निर्माण की जा रही अवसंरचना में बहुमूल्य वृद्धि है। एस. ई. एन. एस. ई. मिशन के लिए चयन किये गये विद्युत एवं चुंबकीय क्षेत्र प्रोब के इंजीनियरी मॉडलों की प्रयोगशाला में जाँच की जा चुकी है और उनकी आवृत्ति प्रतिक्रिया का अध्ययन किया गया है।

राष्ट्रीय अंतरिक्ष विज्ञान संगोष्ठी (एन. एस. एस. एस. -2012) (National Space Science Seminar (NSSS-2012) )

  • 17वीं राष्ट्रीय अंरिक्ष विज्ञान संगोष्ठी फरवरी 14 - 17,2012 के दौरान श्री वेंकटे वर विश्वविद्यालय, तिरुपति, आंध्रप्रदेश में आयोजित की गई। इस संगोष्ठी में समानान्तर सत्र, विशेष पूर्ण सत्र, अन्तर-विषयक व्याख्यान तथा एक लोकरूची के व्याख्यान शामिल थे। पाँच समानान्तर सत्र (पी. एस) इस प्रकार है: अन्तरिक्ष आधारित मौसमविज्ञान, महासागर विज्ञान तथा भू-मण्डल जैवमण्डल अन्योन्यक्रिया: मध्यवायुमण्डल, युग्मन, गतिकी एवं जलवायु परिवर्तन, आयन मण्डल, चुंबकत्वमण्डल, तापमण्डल, अंतरिक्ष मौसम तथा सूर्य पृथ्वी संबंध, खगोलिकी एवं खगोल भैतिकी और ग्रहीय प्रणाली सहित और मण्डल के पिण्ड। पूर्ण सत्र के विषय: खगोलिकी में उन्नति, मेघा-ट्रॉपिक्स तथा ध्रुवीय अनुसंधान रहे।
  • युवा वैज्ञानिकों, विद्यार्थियों एवं अनुसंधानों के विदव्ानों को प्रोत्साहित करने की दृष्टि से दो सर्वश्रेष्ठ मौखिक प्रस्तुतिकरण पुरस्कार एवं दो सर्वश्रेष्ठ पोस्टर प्रस्तुतिकरण पुरस्कार प्रत्येक समानानतर सत्र को विशेष निर्णयकों के निर्णय पर दिये गये, जिसमें नकद पुरस्कार तथा एक प्रमाण पत्र दिया गया है।

39वीं कॉसवार वैज्ञानिक सभा (कॉसपार-2012) ( 39th Koswar Scientific Assembly (Kospar - 2012)

  • अंतरिक्ष अनुसंधान समिति (कॉसपार) एक अंतर -विषयक वैज्ञानिक संगठन है, जिसका सरोकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अंतरिक्ष यानों रॉकेटों तथा बलून के साथ आयोजित सभी प्रकार के वैज्ञानिक अनुसंधान में वृद्धि करने और उसकी प्रगति करने से है। कॉसपार वैज्ञानिक सभा, विश्व के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों की सबसे बड़ी सभा है। यह दव्वार्षिक होती है जो विश्व के भिन्न-भिन्न देशों में आयोजित की जाती हैं।
  • इस सभा में अंतर-विषयक सत्र, पूर्ण सत्र तथा समान्तर सत्र शामिल हैं। इस सभा में निम्न भी शामिल हैं- वैज्ञानिक परिणामों की प्रस्तुति के पोस्टर सत्र, भिन्न-भिन्न अंतरिक्ष एजेंसियों तथा कॉसपार विद्यार्थी कार्यक्रम की अंतरिक्ष प्रदर्शनी, जो अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष शिक्षा बोर्ड के सदस्यों दव्ारा विकसित की गई और उसे उनका समर्थन प्राप्त था, विश्वभर के अंतरिक्ष उद्योग जगत, शैक्षणिक संस्थान एवं सरकारी निकायों के सदस्यों के बारे में जानना और उनसे मिलना।
  • 39वीं कॉसपार वैज्ञानिक सभा (कॉसपार-2012) का 14 - 22 जुलाई 2012 के दौरान भारत के नारायण मूर्ति उत्कृष्टता केन्द्र, मैसूर में होना निर्धारित है। यह कॉसपार सभा भारत में तीन दशकों के बाद आयोजित की जाएगी। इस सभा में भारत तथा विश्व के भिन्न-भिन्न देशों से 3000 अधिक भागीदारों के भाग लेने की संभावना हैं। इस सभा के सफल आयोजन के लिए लॉक-कॉसपार-2012 का गठन अध्यक्ष, इसरो तथा अध्यक्ष के रूप में प्रो. यू. आर. राव के साथ गठन किया गया है।

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