Important of Modern Indian History (Adunik Bharat) for Hindi Notes Exam Part 1

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CHAPTER: Division of Congress

कांग्रेस विभाजन तथा क्रांतिकारी आतंकवाद का उदय

  • 1907 में कांग्रेस विभाजित हुई व बंगाल में क्रांतिकारी आतंकवाद का उदय हुआ।
  • 1907 तक नरमपंथी राष्ट्रवादियों की ऐतिहासिक भूमिका समाप्त हो गई।
  • नरमपंथी आंदोलन की आम जनता में न आस्था थी ना ही पहुँच, यह कारण था कि स्वदेशी आंदोलन व बहिष्कार आंदोलन का नेतृत्व (अपवाद बंगाल) उनके हाथ में नहीं था। इनका विश्वास था कि वे हुकूमत पर दबाव डालकर राजनीतिक व आर्थिक सुधार लागू करवा लेगे।
  • नरमपंथी आंदोलनकारियों की असफलता का मुख्य कारण था कि राजनीतिक घटनाक्रमों के अनुरूप वे अपनी रणनीति में आवश्यक बदलाव नहीं ला पाए।
  • वे युवा पीढ़ी को अपने साथ नहीं ले सके।
  • शुरू में कांग्रेस के प्रांत अंग्रेजों का रवैया गरम था पर जैसे ही कांग्रेस का दायरा बड़ा वे इसके आलोचक हो गए।
  • राष्ट्रवादियों को ‘गद्दार’ , ब्राह्यण, ‘आईमक खलनायक’ और कांग्रेस को ‘राजद्रोह का कारखाना’ बताया गया।
  • “ये कुर्सी न पाने में विक्षुब्ध कुछ लोग तथा कुछ असंतुष्ट वकील है, जो अपने सेवा किसी और का प्रतिनिधित्व नहीं करते” --कांग्रेसी के बारे में
  • वाइसराय डफ़रिन-कांग्रेस मुट्‌ठी भर संभ्रात लोगो का नेतृत्व कर रही है।
  • जॉर्ज हैमिल्टन (यह सचिव) - कांग्रेस को राजद्रोही व दोहरे चरित्र वाला कहा।
  • कर्जन की नीति- नरमपंथियों के नेतृत्व में कांग्रेस काफी कमजोर है, अत: ऐसे मौके पर इसे खत्म किया जा सकता है-जार्ज हैमिल्टन ने समर्थन किया।
  • कर्जन (1900) -कांग्रेस अब लड़खड़ा रही है और जल्द ही गिरने वाली है। मेरा सबसे बड़ा मकसद भी यही है कि मेरे भारत प्रवास के दौरान ही इस पार्टी का अंत हो जाए।
  • कर्जन (1903) - जब से मैं भारत आया हूँ, मेरी नीति यही रही है कि किसी भी तरह कांग्रेस को नपुसंक बना दूँ।
  • 1904 में कर्ज़न ने कांग्रेस अध्यक्ष के नेतृत्व में कांग्रेसी प्रतिनिधिमंडल से मिलने से इंकार कर दिया।
  • जॉन मॉरले दव्ारा बनाई-स्वदेशी व बहिष्कार के समय अंग्रेजों की नीति थी-दमन, समझौता व उन्मूलन
  • गरमपंथियों का दमन, नरमपंथियों को कुछ रियायत देकर समझौता कर गरमपंथियों से अलग करना, फिर दोनों को खत्म करना।
  • कांग्रेसियों को फँसाने के लिए 1906 में ‘लेजिस्लेटिव काउंसिल’ में सुधारों पर कांग्रेस के नरमपंथी नेतृत्व से बातचीत शुरू की।
  • गरमपंथी व नरमपंथी को अलग करने की कोशिश बाद में भी जारी रही।
  • नरमपंथी बहिष्कार आंदोलन को बंगाल तक सीमित कर केवल विदेशी माल का बहिष्कार करना चाहते थे, परन्तु गरमपंथी देशव्यापी असहयोग चाहते थे व अंग्रेजी हुकुमत को किसी भी तरह के सहयोग के खिलाफ थे।
  • 1906 कलकता में अध्यक्ष को लेकर विभाजन की नौबत आ गई, परन्तु दादाभाई नौरोजी के अध्यक्ष बनने पर विभाजन टल गई।
  • स्वदेशी आंदोलन, बहिष्कार आंदोलन, राष्ट्रीय शिक्षा और स्वशासन से संबंद्ध प्रस्ताव पारित हुए, जिसे दोनो दलों ने अपने-अपने ढंग से परिभाषित किया और विभाजन के लिए कमर कसने लगे।
  • नरमपंथी दल के नेता फीरोजशाह मेहता व गरमपंथी दल के नेता अरविंद घोष थे।
  • नरमपंथियों को- गोखले (1907) -आप सत्ता की ताकत को महसूस नहीं करते। यदि कांग्रेस आपके सुझावो पर चलेगी, तो सरकार को इसे खत्म करने में पाँच मिनट भी नहीं लगेंगे।
  • नरमपंथियों का प्रशासन में हिस्सेदारी का सपन पूरा होने जा रहा था और उन्हें लगा गरमपंथियों से दोस्ती महँगी पड़ेगी।
  • नरमपंथी और गरमपंथी दोनों के सोच व अनुमान गलत थे, पारस्परिक मतभेद के दृष्टिकोण से भी और राष्ट्रवादी दृष्टिकोण से भी।
  • तिलक (गरमपंथी) और गोखले (नरमपंथी) राष्ट्रवादियों में कूट के खतरे को अच्छी तरह समझते थे। दोनो ने विभाजन को टालने का प्रयास किया पर वे असफल रहे।
  • एक मित्र को लिखा- गोखले (1907) - “विभाजन का मतलब विनाश होगा और नौकरशाही के लिए दोनो वर्गो को दबाने में कोई विशेष कठिनाई नहीं होगी।”
  • 26 दिसंबर 1907 को ताप्ती नदी के किनारे सूरत अधिवेशन हुआ।
  • अफवाह थी नरमपंथी कलकता अधिवेशन के चारो प्रस्तावों को निष्प्रभावी बनाना चाहते है, गरमपंथी चारो प्रस्ताव के स्वीकार की गारंटी चाहते थे।
  • किसी अज्ञात व्यक्ति ने मंच पर जूता फैका, जो फीरोजशाह मेहता व सुरेन्द्रनाथ बनर्जी को लगा। पुलिस आई और सभागार खाली कर दिया गया।
  • मॉरले को लिखा-मिंटो- “सूरत में कांग्रेस का पतन हमारी बहुत बड़ी जीत है।”
  • तिलक ने इस दरार को पाटने की बहुत कोशिश की पर फीरोजशाह मेहता नहीं माने।
  • इस घटना के बाद आतंकवादियों का दमन किया गया।
  • तिलक को 6 वर्ष की जेल हुई (मांडले जेल) , अरविंद घोष राजनीति को त्याग पांडिचेरी चले गए, बिपिनचंद्र ने अस्थायी संयास ले लिया, लाला लालपत राय 1908 में ब्रिटेन चले गए।
  • नरमपंथियों के लिए मैदान साफ था, गरमपंथियों के एकता के सभी प्रस्तावों को रद्दी में डाल उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया गया।
  • कांग्रेस के पुननिर्माण की बात सोची- “पुनर्जीवित, नए रूप में सजी सँवरी कांग्रेस” -फीरोजशाह मेहता
  • कांग्रेस की शक्ति समाप्तप्राय हो चुकी थी।
  • केवल गोखले ‘सवैट्‌स ऑफ इंडिया सोसाइटी’ के सहयोगी के साथ डटे रहे।
  • (जेल से बाहर आने पर) अरविंद घोष (1909) - “जब मैं जेल जा रहा था, तो समूचा देश एक नए राष्ट्र की परिकल्पना संजोए जीवंत दिख रहा था, लाखो सुप्त दिलों में नई राजनीतिक चेतना हिलोरे लेने लगी थी, लेकिन जब मैं जेल से बाहर आया तो पूरा देश स्तब्ध मौन था।”
  • 1914 में जेल से छूटने पर तिलक में आंदोलन शुरू किया।

मॉरले-मिंटो सुधार-

  • ′ इंडियन काउंसिल ऐक्ट 1909 ′ के तहत ′ इंपीरियल लेजिस्लेटिप काउंसिल ′ और ′ प्रोविशियल काउंसिल में निर्वाचित प्रतिनिधियों की संख्या बढ़ाई गई।
  • अधिसंख्या प्रतिनिधियों का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से ही होना था।
  • गवर्नल जनरल की ‘एग्जिक्यूटिव काउंसिल’ में एक भारतीय की नियुक्ति का प्रावधान था।
  • ‘इंपीरियल लेजिस्लेटिप काउंसिल’ में 36 सरकारी और 5 गैर सरकारी व 27 निर्वाचित (6 का चुनाव बड़े जमींदार 2 का अंग्रेजी पूँजीपति) -कुल 68 प्रतिनिधि
  • प्रस्ताव रखने और सवाल करने का अधिकार दिया, पर व्यवहारिक रूप से नहीं।
  • पार्लियामेंट में घोषणा-मॉरले- “अगर कुछ लोग यह समझते है कि नए सुधारों के चलते प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हिन्दुस्तान में संसदीय लोकतंत्र की स्थापना हो जाएगी, तो वे गलतफहमी में है।”
  • निर्वाचन क्षेत्रों को धार्मिक आधार पर बांट कर फूट डालने की कोशिश की गई।
  • मुसलमानो के लिए सुरक्षित सीटें बनाई गई।
  • 1907 की समाप्ति तक गरमपंथी राजनीति मौत के कगार पर थी और 19वीं सदी के समाप्ति के साथ नरमपंथी से युवाओं का मोह भंग हो चुका था।
  • विक्षुब्ध बंगाल के युवकों ने व्यक्तिगत वीरता और क्रांतिकारी आतंकवाद की राह पकड़ ली।
  • ′ ′ बम की राजनीति ′ के लिए गरमपंथी भी जिम्मेदार थे, जनता को सही नेतृत्व नहीं दे सके।
  • बारीमाल सम्मेलन में लाठीचार्ज -युगांतर (अप्रैल 1906) - अंग्रेजी हुकूमत के दमन को रोकने के लिए भारत की 30 करोड़ जनता अपने 60 करोड़ हाथ उठाए। ताकत का मुकाबला ताकत से किया जाएगा।
  • युवकों ने आयरलैंड राष्ट्रवादियों और रूसी निहिलिस्टों (विनाशवादियों) व पापुलिस्टों के संघर्ष के तरीकों को अपनाया।
  • बदनाम अंग्रेजी अफसरों की हत्या की योजना बनी।
  • वी. डी. सावरकर (1904) में ‘अभिनव भारत’ क्रांतिकारियों का गुप्त संगठन बनाया।
  • 1907 में बंगाल में लेफ्टेिनेंट गवर्नर की हत्या का असफल प्रयास किया गया।
  • खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी (अप्रैल 1908) में मुजफ्फर के जज किंग्सफोर्ड की बग्घी पर बम फेंका पर दो अंग्रेज महिलाएँ मारी गई।
  • चाकी ने खुद को गोली मार ली व लुदीराम बोस को फाँसी दे दी गई।
  • ज्यादा दिन चलने वाले संगठन- ‘अनुशीलन समिति’ और ‘युगांतर’ क्रांतिकारियों के गुप्त संगठन थे।

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