Important of Modern Indian History (Adunik Bharat) for Hindi Notes Exam Part 1

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CHAPTER: Kisan Movement

किसान आंदोलन और राष्ट्रीय स्वाधीनता संघर्ष उ. प्र. मालाबार और बारदोली

अवध में किसान सभा-

  • 1859 में अवध पर अंग्रेजों के कब्जे के बाद तालुकदारों (पहले लगान का हि हिस्सा अब जमीन के मालिक) और बड़े जमींदारों दव्ारा किसानों का शोषण बढ़ गया।
  • अवध में होम रूल कार्यकर्ता किसानों को संगठित करने लगे व नाम दिया ‘किसान सभा’ ।
  • गौरीशंकर मिश्र, इंद्रनारायण दव्वेदी और मदनमोहन मालवीय के प्रयासों से फरवरी 1918 उ. प्र. किसान सभा गठित हुई।
  • उस समय नए संविधान की बात हो रही थी, इंद्रनारायण दव्वेदी ने किसानों के हितों का ख्याल रखने की याचिका दी।
  • 1919 के अंतिम दिनों में किसानों का संगठित विद्रोह खुलकर सामने आया।
  • प्रतापगढ़ में ‘नाई-धोबी बंद’ सामाजिक बहिष्कार पहली संगठित कार्यवाई।
  • अवध में किसान बैठकों में महत्वपूर्ण भूमिका झिंगुरी सिंह और दुर्गपाल सिंह ने निभाईं।
  • इसके बाद बाबा रामचंद्र (1920 के मध्य में किसान नेता के रूप में उभरे) ने आंदोलन को मजबूत और जुझारू बनाया।
  • ज्नूा, 1920 में बाबा रामचंद्र, जौनपुर व प्रतापगढ़ के किसानो को लेकर इलाहाबाद पहुँचे, वहाँ गौरीशंकर मिश्र व जवाहरलाल नेहरू से मिले।
  • प्रतापगढ़ के डिप्टी कमिश्नर मेहता ने किसानों को शिकायते सुनने व उन्हें दूर करने का आश्वासन दिया।
  • फीस एक आना-प्रतापगढ़ जिले का रूर गाँव किसान सभा (एक लाख किसानो ने शिकायत दर्ज कराई) का मुख्य केन्द्र बना।
  • गौरीशंकर मिश्र प्रतापगढ़ में काफी सक्रिय थे और किसानो की बेदखली तथा नजराना की शिकायतों को लेकर मेहता से समझौता करने वाले थे, पर अगस्त 1920 में मेहता छुट्‌टी पर चले गए।
  • 28 अगस्त, 1920 को चोरी के आरोप में बाबा रामचंद्र और 82 किसान गिरफ्तार कर लिए गए।
  • 10 दिन बाद अफवाह फैली बाबा को छुड़ाने गांधी जी आ रहे है।
  • किसान प्रतापगढ़ में इकट्‌ठा हो गए, जब बाबा को कल छोड़ने का आश्वासन दिया गया तब माने।
  • स्थिति को संभालने मेहता को वापस बुलाया गया।
  • मेहता ने चोरी का मामला रफा-दफा कर जमींदारों पर दबाव डाला।
  • असहयोग आंदोलन को लेकर राष्ट्रवादी नेताओं में मतभेद हुए।
  • असहयोग आंदोलन कारियो ने अवध किसान सभा (17 अक्टूबर, 1920 प्रतापगढ़ में एक सामांतर संगठन) का गठन किया।
  • 20 व 21 दिसंबर को अवध किसान सभा की विशाल रैली हुई, जिसके बाबा रामचंद्र रस्सी से बंधे हुए आए-अयोध्या में
  • किसानों की गतिविधियों के प्रमुख केन्द्र रायबरेली, फैजाबाद, सुल्तानपुर थे।
  • लूटपाट व पुलिस से संघर्ष ही किसानों की गतिविधियाँ थी।
  • अदालती लड़ाई चलती रही-जनवरी, 1921 में आंदोलन समाप्तप्राय हो गया।
  • अवध मालगुज़ारी (रैट) (संशोधन) अधिनियम पारित हुआ।
  • 1921 के अंत में किसान आंदोलन फिर भड़का एक (एकता) आंदोलन के नाम से-50 फीसदी ज्यादा लगान वसूला जा रहा था।
  • केन्द्र थे हरदोई, वहराइच और सीतापुर-खिलाफत व कांग्रेस नेता ने साथ दिया।
  • बैठक के शुरू में एक गड्‌डे में पानी भर उसे गंगा माना जाता फिर उसकी कसम खाई जाती।
  • आंदोलन का नेतृत्व पिछड़ी जाती के हार जाने से राष्ट्रवादी अलग-अलग पड़ गए।
  • किसान सभा आंदोलन काश्तकारों का आंदोलन था पर इस आंदोलन में छोटे-मोटे जमींदार शामिल थे।
  • मार्च, 1922 में दमन दव्ारा आंदोलन खत्म कर दिया गया।

माप्पिला विद्रोह-

  • अगस्त, 1921 में मालाबार जिले (केरल) में काश्तकारों का विद्रोह।
  • जमींदार मनमाना लगान वसूलते और बेदखल कर देते।
  • 19वीं सदी में माप्पिल किसानों ने जमींदारों के खिलाफ विद्रोह किया और 1921 में काश्तकारों ने-खिलाफत आंदोलन भी साथ में चला।
  • अप्रैल, 1920 में मालाबार ज़िला कांग्रेस सम्मेलन (मंजेरी) में खिलाफत आंदोलन का समर्थन किया व जमींदार-काश्तकारों के संबंध को तय करने हेतु कानून बनाने की मांग की गईं
  • कोझीफोड में काश्तकारों का एक संगठन बनाया गया।
  • गाँधी जी, शौकत अली और मौलाना आजाद ने इन इलाकों का दौरा कर आंदोलन का समर्थन किया।
  • 15 फरवरी, 1921 को सरकार ने निषेधाज्ञा लागू कर खिलाफत आंदोलन से संबंधित बैठक पर रोग लगा दी।
  • तर्क-बैठको के माध्यम से मप्पिलाओं को सरकार व हिन्दू जमींदारों के खिलाफ भड़काया जाएगा।
  • 18 फरवरी को खिलाफत आंदोलन तथा कांग्रेस नेताओ याकूब हसन, थू. गोपाल मेनन, पी. मोइद्दीन फोया एवं के माधवन नायर को गिरफ्तार किया गया-नेतृत्व माप्पिला नेताओं के हाथ चला गया।
  • एरनाड का-20 अगस्त 1921 मजिस्ट्रेट ने सेना व पुलिस जवानों को लेकर अली मुसलियार (खिलाफत आंदोलन के नेता) गिरफ्तार करने निरूरांगड़ी की मस्जिद पर छापा मारा। मुसलियार के ना मिलने पर खिलाफत आंदोलन के 3 नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया।
  • सेना के मसजिद में छापा मारने की खबर से अन्य जगहों से माप्पिला तिरूरांगड़ी में इकट्‌ठा हो नेताओं की रिहाई की मांग करने लगे।
  • पुलिस ने निहत्थी भीड़ पर गोली चलाई तो विद्रोह पूरे एरनाड में फैला।
  • जिलाधिकारी कोझीकोड भाग गया।
  • विद्रोह नेता जैसे कुनहम्मद हाजी इस बात का ध्यान रखते की हिन्दुओं को सताया ना जाए।
  • हुकुमत ने माशॅल लॉ (सैनिक शासन) की घोषणा कर हिन्दुओं को जबरदस्ती साथ देने को कहा, जिससे संघर्ष में सांप्रदायिक रंग फुले।
  • हिंसा व सांप्रदायिकता के कारण माप्पिला सबसे अलग हो गए, फिर सरकार ने दमन का रास्ता अपनाया-2337 मारे (सरकारी) 1652 घायल (आंकड़े)
  • दिसंबर, 1921 तक विद्रोह पूरी तरह खत्म हो गया और माप्पिला इसके बाद आजादी की लड़ाई में कहीं शरीक नहीं हुए।

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