Important of Modern Indian History (Adunik Bharat) for Hindi Notes Exam

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CHAPTE: National Movement by Labors

भारत का मजदूर वर्ग और राष्ट्रीय आंदोलन

19वीं शताब्दी के अंतिम दौर में राष्ट्रवादियों ने मजदूर वर्ग के आंदोलनों से अपना रिश्ता कायम करना शुरू किया।

  • 1878 में सोराबजी शपूरजी बंगाली ने मजदूरों के काम में घंटे सीमित करने के लिए विधेयक रखने की कोशिश-बंबई विधान परिषद् में परन्तु असफल रहे।
  • 1870 बंगाल के शशिपद बनर्जी (बड़ासभाजी समाजसेवी) ने मजदूरों का क्लब ( ‘भारत श्रमजीवी’ पत्रिका निकाली) स्थापित किया।
  • 1880 में नारायण मेघाजी (बंबई में) लो बॉडे ने ‘दीनबंधु’ (अंग्रेजी-मराठी) साप्ताहिक पत्र निकाला और 1890 में ‘बंबई मिल हैंड्‌स एसोसिएशन’ शुरू किया।
  • शुरू में राष्ट्रवादी नेताओं का रूख मज़दूरों के सवाल पर काफी उदासीन था।

कारण-

  • साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन की शुरूआत में नहीं चाहते थे कि संघर्ष कमजोर हो।
  • नहीं चाहते थे कि भारतीय जनता विभाजित हो-क्योंकि मालिक भी भारतीय थे।
  • काम की स्थितियों के बारे में सरकार दव्ारा कानून बनाने को राष्ट्रीय अखबारों ने अस्वीकार किया-भारतीय उत्पादकों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता
  • 1881 तथा 1891 के फैक्टरी अधिनियम का विरोध किया-उद्योगीकरण में खलल नहीं चाहते थे।
  • जी. एस. आगरकर के प्रभाव में- एक राष्ट्रवादी अखबार ‘मराठा’ ने मजदूरों का समर्थन किया तथा मिल-मालिकों से मजदूरों को रियायतें देने को कहा।
  • ब्रिटिश मालिको के होने पर मजदूरों का पूरा समर्थन किया राष्ट्रवादी नेताओ ने।
  • पी. आंनद चारूलू (1891 में कांग्रेस अध्यक्ष) का मानना था कांग्रेस के रूख में बदलाव का कारण था कि मालिक और एक ही देश के अभिन्न अंग नहीं थे।
  • मजदूर वर्ग की पहली संगठित हड़ताल ब्रिटिश स्वामित्व व प्रबंध वाली रेलो में हुई।
  • ग्रेट इंडिया पेनिन्सुलार (जीआईपी) रेलवे में 1899 में सिगनल पर काम करने वालो ने हड़ताल की-काम के घंटो अन्य सेवा शर्तो से संबंद्ध
  • मराठा तथा केसरी ने इसका समर्थन किया-तिलक दव्ारा प्रकाशित
  • फिरोजशाह मेहता, डी. ई. वाचा और सुरेन्द्रनाथ टैगोर ने बंगाल व बंबई में जनसभाएँ कीं व कोष इकट्‌ठा किया-
  • 1903 में जी. सुब्रह्यण्य अय्यर ने मजदूरों को आपस में मिलकर संगठित होना चाहिए।

1903 - 08 की दो मुख्य विशेषताएँ -

  • व्यावसायिक (पेशेवर) आंदोलनकारियों का आविर्भाव
  • औद्योगिक हड़तालें में ‘श्रमिकों के संगठन की शक्ति’ ।
  • स्वदेशी आंदोलन के 4 बड़े नेता-अश्विनी कुमार दत्त, प्रभात कुमार रायचौधरी प्रेमतोष बोस और अपूर्वकुमार घोष (सबसे बड़ी सफलता) ने श्रमिक संगठनों लिए खुद को समर्पित किया।
  • सरकारी प्रेस में काम करने वाले मजदूरों, रेलवे तथा जूट उद्योग में लगे मजदूरों को संगठित किया-विदेशी पूँजी या उपनिवेशवादी दव्ारा संचालन

स्वदेशी आंदोलन के दौर की विशेषता थी-

  • मजदूरों के आंदोलन में राजनीतिक मुद्दे भी शामिल हो गए।
  • राष्ट्रवादी नेताओं के समर्थन से संगठित हड़ताल होने लगे।
  • ब्गाांल विभाजन (16 अक्टूबर, 1905) के दिन बंगाल के मजदूरों ने भी हड़ताल किया।
  • हावड़ा के बने कंपनी के शिपयार्ड में मजदूरों ने हड़ताल (स्वदेशी नेताओं के फेडरेशन हाल की सभा में जाने की छुट्‌टी नहीं की (कलकता) किया।
  • फरवरी-मार्च, 1908 में सूती मिल में सुब्रह्यण्य शिव ने हड़ताल के पक्ष में अभियान चलाया-तमिलनाडु की तुतिकोरिन में विदेशी स्वामित्व वाली।
  • शिव तथा स्वदेशी नेता चिंदबरम पिल्लै को गिरफ्तार किया गया तो हड़ताल हुई।
  • 1907 में लाला लाजपतराय और अजीत सिंह को निर्वासित किया गया जिस कारण रावलपिंडी (पंजाब) में हथियार गोदाम तथा रेलवे के इंजीनियरिंग विभाग के मजदूरों ने हड़ताल की।
  • रूस के प्रभावशाली राजनीतिक विरोध प्रदर्शन के रूप में मजदूरों का आंदोलन ने भारतीय मजदूरों को प्रभावित किया।
  • 1908 में मजदूर आंदोलन में शिथिलता आई।
  • 1919 - 1922 के बीच मजदूर आंदोलन दुबारा उठा।
  • मजदूर वर्ग ने निजी अखिल भारतीय स्तर (वर्गीय अधिकारों की रक्षा के लिए) का संगठन बनाया।
  • मजदूर वर्ग राष्ट्रीय आंदोलन में काफी हद तक शामिल हुआ।
  • 1920 में अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक) की (प्रेरित किया) स्थापना हुई।
  • बंबई के मजदूरों के साथ तिलक के काफी नज़दीकी संबंध थे।
  • लाला लाजपतराय पहले अध्यक्ष और दीवान चमन लाल महामंत्री बने।
  • अपने अध्यक्षीय भाषण में लाल लाजपतराय ने भारतीय श्रमिकों को राष्ट्रीय स्तर पर संगठित होने की बात कही।
  • एटक ने जो घोषणापत्र जारी किया उसमें राष्ट्रीय राजनीति में हस्तक्षेप की बात भी कही गई।
  • लाला लाजपत राय पहले व्यक्ति ये जिन्होंने पूँजीवाद को साम्राज्यवाद से जोड़कर देखा।
  • एटक के दूसरे सम्मलेन में दीवान चमनलाल ने कहा स्वराज पूँजीपतियों के लिए नहीं, मजदूरों के लिए होगा।
  • तीसरे व चौथे अधिवेशन की अध्यक्षता चितरंजन दास ने की।
  • अन्य में-सी. एफ. एंड्रूज, जे. एम. सेनगुप्त, सुभाषचंद्र बोस, जवाहर लाल नेहरू और सत्यमूर्ति थे-एटक से संबंधित
  • 1922 के छाया अधिवेशन में कांग्रेस ने एटक के बनने का स्वागत किया व काम में मदद के लिए एक समिति बनाई- कांग्रेस के नेता शामिल थे।
  • गया कांग्रेस के अध्यक्षीय भाषण में चित्तरंजन दास ने कहा- “मजदूरों और किसानों को कांग्रेस को अपने हाथ में ले लेना चाहिए।”
  • प्जाांब में दमन और गाँधी जी की गिरफ्तारी के बाद 1919 में गुजरात (अहमदाबाद) मजदूर वर्ग ने हड़ताल (28 मरे, 123 घायल हुए) कर दी।
  • नवंबर, 1921 में प्रिंस ऑफ वेल्स के भारत आगमन पर संपूर्ण देश में मजदूरों ने हड़ताल किया।
  • 1918 में अहमदाबाद में अहमदाबाद ‘टेक्सटाइल लेबर एसोसिएशन (टी. एल. ए.) ’ की स्थापना गाँधी जी ने की-सबसे बड़ी ट्रेड यूनियन सदस्य-14,000
  • टेक्सटाइल लेबर एसोसिएशन ने 1918 में एक विवाद के दौरान मजदूरों में 27.5 प्रतिशत बढोतरी कराई।
  • गाँधी जी- “मिलों के वे ही असली मालिक है और यदि ट्रस्टी यानी मिल-मालिक वास्तविक मालिक के हितों के लिए काम नहीं करता है, तो मजदूरों को अपने अधिकार पाने के लिए सत्याग्रह करना चाहिए।”
  • जे. बी. , कृपलानी- “ट्रस्टी पद का अर्थ ही यह है कि वह मालिक नहीं है। इसका मालिक वह है जिसके हितों की रक्षा के लिए उसे जिम्मेदारी दी गई है।”
  • 1922 के बाद मजदूर वर्ग के आंदोलन में शिथिलता आई।

1927 के शुरू में देश के अलग-अलग भागों में विभिन्न कम्यूनिस्ट दलों ने अपने को वर्कर्स एंड पीजेंट्‌स पार्टी (WPP, कामगारों और किसानों की पार्टी) के रूप में संगठित किया।

  • इसके नेता- श्रीवाद अमृत डांगे, मुजफ्फर अहमद, पूरनचन्द जोशी तथा सोहन सिंह ओश।
  • कामगार किसान पार्टी कांग्रेस के अंदर वामपंथी के रूप में काम करती थी।
  • ट्रेड यूनियन आंदोलन में कम्युनिस्टों का असर 1928 के अंत तक काफी अधिक शक्तिशाली हो गया।
  • बंबई के सूती मिलों मजदूरों से 6महीने की हड़ताल की जिसके बाद कम्युनिस्टों के नेतृत्व वाली गिरनी कामगार यूनियन ने महत्वपूर्ण स्थिति हासिल कर ली-अप्रैल-सितंबर, 1928
  • ‘एटक’ की अध्यक्षता जब जवाहरलाल नेहरू कर रहे थे, एन. एम. जोशी के नेतृत्व में कुछ लोग इससे अलग हो गए।
  • मजदूर आंदोलन में अर्थवाद (इकोनोमिज्म) की प्रवृत्ति शुरू हुई।
  • नवंबर, 1927 में ‘एटक’ ने साइमन कमीशन के बहिष्कार का निर्णय लिया।
  • सरकार ने मजदूर आंदोलन पर दुतरफा आक्रमण किया-
  • दमनकारी कानून बनाए- (पब्लिक सेफ्टी ऐक्ट तथा ट्रेड डिस्ब्यूट ऐक्ट) तथा क्रांतिकारी नेताओं को गिरफ्तार कर षड़यत्र (मेरठ षड़यत्र केस) का मुकदमा चलाया।
  • कुछ रियायते दे कर आंदोलन को तोड़ने की कोशिश की।
  • 1928 में कम्युनिस्टों ने राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्यधारा से जोड़ने और उसके भीतर रहकर काम करने की नीति बदल दी, तो राष्ट्रीय आंदोलन से अलग-अलग पड़ गए।
  • एटक के भीतर भी यह अलग-अलग पड़ गए तथा 1931 में उनको निकाल दिया गया-विभाजन
  • सविनय अवज्ञा आंदोलन में देशभर में मजदूरों ने हिस्सा लिया।
  • 7 और 16 मई के बीच शोलापुर में पुलिस ने ब्रिटिश विरोधी जुलूस को रोकने के लिए गोली चलाई, सूती मिल मजदूरों हिंसा पर उतारू हो गए।
  • सरकार ने मार्शल लॉ की घोषणा की व कुछ मजदूरों को फाँसी दी गई।
  • सविनय अवज्ञा आंदोलन में कांग्रेस (बंबई) का नारा- “मजदूर और किसान कांग्रेस के हाथ-पाँव है।”
  • 1930 में 4 फरवरी को 20000 मजदूरों (अधिकांश जी आई पी रेलवे के) ने काम बंद कर दिया, बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियों के प्रति विरोध जताने के लिए कांग्रेस कार्यकारिणी ने 6 जुलाई को गाँधी जी दिवस घोषित किया।
  • 1932 - 34 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में मजदूरों ने हिस्सा नहीं लिया।
  • 1934 तक साम्यवादी फिर से राष्ट्रवादी राजनीति की मुख्यधारा में आए।
  • 1935 में वे ‘एटक’ में मिल गए।
  • वामपंथी प्रभाव तेजी से फिर से बढ़ना शुरू हो गया।
  • 1937 में कांग्रेस के चुनावी घोषणापत्र में लिखा कि कांग्रेस श्रमिकों के झगड़ो को निपटाने के लिए कदम उठाएगी तथा उनके यूनियन बनाने एवं हड़ताल करने के अधिकार की सुरक्षा के उपाय करेगी। इस काल में हुई हड़ताले अधिकांशत: सफलतापूर्वक समाप्त हुई।
  • 2 अक्टूबर, 1939 को बंबई के मजदूरों ने हड़ताल किया।
  • साम्यवादियों ने तर्क दिया युद्ध साम्राज्यवादी युद्ध से जनता के युद्ध में बदल गया है, तो मजदूर फासीवाद को हटाने में मित्र राष्ट्रों का समर्थन करे।
  • साम्यवादी दल ने अगस्त 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन से खुद को अलग दिया पर भारत छोड़ो आंदोलन में मजदूर शामिल हुए।
  • 9 अगस्त 1942 को गाँधी जी व अन्य के गिरफ्तारी के बाद देशभर में मजदूरों ने हड़ताले की-लगभग एक सप्ताह तक
  • टाटा स्टील प्लांट 13 दिन व अहमदाबाद सूती कपड़ा मिल साढ़े तीन महीने हड़ताल पर रही।
  • 1945 - 47 के दौरान मजदूरों की गतिविधियाँ फिर शुरू हुई।
  • 1945 की समाप्ति तक गोदी मजदूरों सेना की रसद को इंडोनेशिया तक पहुँचाने वाले जहाजों पर माल लादने (द. पू. एशिया के राष्ट्रीय युक्ति संग्राम का दमन होता) से इंकार किया-बंबई और कलकता
  • 1946 में नौसैनिकों के समर्थन में बंबई मजदूरों ने हड़ताल किया।
  • 22 फरवरी को साम्यवादियों व समाजवादियों के कहने पर 200 से 300 मजदूरों ने हड़ताल की।
  • सेना की 2 टुकड़ियाँ आई 250 आंदोलनकारी मारे गए।
  • अंतिम वर्षों में आर्थिक मुद्दो (युद्ध काल में आर्थिक शिकायतों पर बंधन लागू था) को ले हड़ताल हुई-डाक विभाग के कर्मचारी की हड़ताल अधिक विख्यात
  • युद्ध के समाप्त होने के बाद कीमतों का बढ़ना जारी रहा, जिससे मजदूर वर्ग की सहनशक्ति खत्म होने लगी।
  • फिर भी मजदूर संघर्ष में शामिल थे क्योंंकि उनको उम्मीद थी कि “सवतंत्रता मिलने पर यह चीजें उन्हें अधिकार के रूप में मिलेगी।”

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