1947 − 1964 की प्रगति (Progress of 1947 − 1964) for CDS Exam Part 2 for CDS Exam

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भूमि सुधार

स्वतंत्रता के समय भारत में भू-धारण की तीन पद्धतियां थी-जमींदारी, रैयतवाड़ी एवं महालवाड़ी। जमींदारी व्यवस्था कार्नवालिस दव्ारा स्थापित की गई थी और इसे स्थायी बंदोबस्त के रूप में भी जाना जाता था। स्थायी बंदोबस्त के अंतर्गत लगान को स्थायी रूप से निर्धारित कर दिया जाता था, जिसमें भविष्य में कोई परिवर्तन नहीं होता था। इस व्यवस्था के अंतर्गत जमींदार को भूमि का स्वामी मान लिया गया था। जमींदार किसानों से बेगार कराता एवं तरह-तरह के अन्य कर भी वसूल करता था। इस कारण यह व्यवस्था किसानों के लिए अधिक पीड़ादायी थी।

राष्ट्रीय आंदोलन के दिनों से ही किसान इस व्यवस्था में बदलाव की मांग कर रहे थे। किसान सभा ने जमींदारी उन्मूलन के लिए आंदोलन भी चलाया। कांग्रेस एवं राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े अन्य नेता भी जमींदारी व्यवस्था के समाप्त करने की मांग से सहमत थे। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत सरकार ने आर्थिक सुधार की जो नीति अपनाई, उसमें भूमि सुधार संबंधी कार्यक्रम भी शामिल था। सरकार दव्ारा भूमि सुधार के क्षेत्र में निम्नलिखित उपाय किए गए-

  • मध्यस्थों का उन्मूलन एवं जमींदारी प्रथा की समाप्ति।
  • काश्तकारी सुधार।
  • कृषि का पुनर्गठन।

जमींदारी उन्मूलन के संबंध में भारत सरकार ने राज्यों को यह निर्देश दिया कि वे इस संबंध में कानून पारित करें। जमींदार उन्मूलन का पहला कानून 1948 में मद्रास राज्य दव्ारा पारित किया गया। अन्य राज्यों ने भी कानून बनाकर इस व्यवस्था को समाप्त कर दिया। पर व्यावहारिक रूप में जमींदार व्यवस्था अब भी बनी हुई है। इसका एक मुख्य कारण इन कानूनों को लागू करने की राजनीतिक इच्छा शक्ति का अभाव है, क्योंकि भूमि से जुड़ा हुआ अधिपति वर्ग राजनीतिक वर्ग के लिए एक प्रभावी वोट (मत) बैंक (अधिकोष) है।

काश्तकारी सुधार के अंतर्गत तीन प्रकार के उपाय किए गए-लगान का निर्धारण, काश्त अधिकार की सुरक्षा एवं काश्तकारों का भूमि पर मालिकाना अधिकार। स्वतंत्रता के बाद काश्तकारों की सुरक्षा के लिए बंबई, पंजाब और मध्य प्रदेश में कानून बनाए गए। पंजाब, हैदराबाद तथा राजस्थान में कानून बनाकर काश्तकारों दव्ारा जमींदार को दिए जाने वाले लगान की अधिकतम सीमा निर्धारित कर दी गई। कुछ राज्यों ने काश्तकारों को भूमि पर मालिकाना हक देने के लिए भी कानून बनाए। नागालैंड, मिजोरम और मेघालय को छोड़कर सभी राज्यों में काश्तकारी कानून लागू किए गए।

कृषि के पुनर्गठन के संबंध में दो प्रकार के उपाय किए गए-जोतों की सीमाबंदी एवं जोतो की चकबंदी। जोतो की उच्चतम सीमा जल की उपलब्धि वाले क्षेत्रोंं में 54 एकड़ तथा असिंचित क्षेत्रों में 130 एकड़ तक सीमित कर दिया गया। जोतों के उपविभाजन एवं उप-विखंडन को रोकने के लिए चकबंदी व्यवस्था को लागू किया गया। भारत में सबसे पहले चकबंदी 1924 में बड़ौदा रियासत में लागू की गई थी।

कृषि पुनर्गठन के अंतर्गत कृषि फसलों के उपज बढ़ाने की ओर विशेष ध्यान दिया गया। 1966 में नार्मन बोरलाग तथा डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन के नेतृत्व में हरित क्रांति का आरंभ हुआ। इससे खाद्यान खासकर गेहूं के उत्पादन में गुणात्मक वृद्धि हुई। इस कारण भारत में खाद्य संकट का हल हो सका। कृषि के विकास के लिए सहकारी साख समितियों की स्थापना कर कृषि के लिए ऋण एवं अन्य कृषि आदान उपलब्ध कराए गए।

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