Science and Technology: Bio-Fuel, Atomic Energy and Reactor

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जैव ईंधन (Bio-Fuel)

जैव ईंधन वनस्पति तेल है, जिसे परंपरागत डीजल में मिलाकर ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। यह महुआ, करंजा, कुसुम, धूपा, उन्डी, सिमरौबा, साल, जजोबा, तुम्बा, नहोर, कोकुम, रबड़, चेउरा, जंगली खुबानी, तुंग, नीम, आम और रतनजोत आदि पौधों के बीजों में से निकाला जाता है, जिन्हें बंजर और खुरदरी जमीनों पर भी उगाया जा सकता है। डीजल को जैव डीजल में मिश्रित करने के क्षेत्रीय परीक्षणों के लिए प्रारंभिक कदम उठाने शुरू कर दिए गए हैं। अनुसंधान और विकास अध्ययनों से पता चलता है कि जैव डीजल मिश्रित ईंधन से वाहनों के ईंधन की आयु बढ़ती है और इससे अपेक्षाकृत कम प्रदूषण होता है। जैव ईंधन के उत्पादन हेतु एक संयंत्र आंध्र प्रदेश में स्थापित किया गया है।

परमाणु ऊर्जा (Atomic Energy)

भारत में परमाणु ऊर्जा के विकास का आरंभ वर्ष 1945 में ही हो गया था जब सर दोराब जी टाटा न्यास दव्ारा टाटा आधारित अनुसंधान संस्थान (Tata Institute of Fundamental Research, TIFR) की स्थापना की गई थी। संस्थान ने भारत में परमाणु ऊर्जा के विकास की संभावनाओं की खोज की दिशा में कार्य प्रारंभ किये। अत: इसे भारतीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम का उद्गम बिन्दु भी कहा जाता है। इस दिशा में वास्तविक प्रयास वर्ष 1948 में आरंभ किया गया था जब परमाणु ऊर्जा विधेयक अधिनियमित किया गया था। इसके बाद 10 अगस्त 1948 को भारत में परमाणु ऊर्जा के विकास से संबंधित सरकारी नीति के निर्धारण और क्रियान्वयन के उद्देश्य से परमाणु ऊर्जा की स्थापना की गई। इस दिशा में अगला कदम 1956 में परमाणु ऊर्जा विभाग की स्थापना की, जिसके उद्देश्यों में अन्य तथ्यों के साथ निम्न को भी शामिल किया गया:

  • परमाणु ऊर्जा के विकास के लिए आधुनिकतम तकनीकों का प्रयोग।
  • प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग दव्ारा भूमंडलीय आर्थिक प्रतिस्पर्धा में परमाणु ऊर्जा का उत्पादन।
  • परमाणु रिएक्टरों की संस्थापना और रेडियोधर्मी तत्वों का सुरक्षित उपयोग।
  • भारत की प्रतिरक्षा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए परमाणु ऊर्जा का विकास और उत्पादन।
  • आर्थिक विकास में परमाणु ऊर्जा की भूमिका का निरूपण।
  • समस्थानिक और विकिरण तकनीक पर आधारित कार्यक्रमों का क्रियान्वयन।
  • परमाणु ऊर्जा और विज्ञान के अन्य सीमांतीय क्षेत्रों में आधारित अनसुंधानों को प्रोत्साहन।

वास्तव में भारत ने परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम का व्यापक स्तर पर विस्तार अपने आप को आत्मनिर्भर बनाने के लिए किया है। इसके लिए इस कार्यक्रम में न केवल परमाणु रिएक्टरों की स्थापना बल्कि भारी जल के उत्पादन, रेडियो समस्थानिकों के अनुप्रयोग और खजिन अन्वेषण और उनके प्रसंस्करण जैसे कार्यों को भी शामिल किया है। ऐसे कार्यो की विशेषता यह है कि भारत ने स्वदेशी तकनीकों के विकास को प्राथमिकता दी है।

  • डा. भाभा दव्ारा निरूपित कार्यक्रम में तीन चरण हैं। पहले चरण में यूरेनियम आधारित, दूसरे चरण में प्लूटोनियम तथा तीसरे चरण में थोरियम आधारित रिएक्टरों की स्थापना संकल्पित की गई। यूरेनियम आधारित रिएक्टरों में भारी अथवा सामान्य जल का प्रयोग किया जाता है जबकि प्लूटोनियम अथवा थोरियम आधारित रिएक्टरों में द्रवीभूत सोडियम जैसे शीतलक प्रयोग में लाये जाएंगे। कार्यक्रम के दूसरे चरण का आरंभ वर्ष 2004 में कलपाक्कम में देश के पहले द्रुत प्रजनक रिएक्टर (Fast Breeder Reactor, FBR) की आधारशिला रखने के साथ आरंभ किया गया है। उल्लेखनीय है कि वर्तमान में कामिनी नामक रिएक्टर को केवल अनुसंधान कार्यो के लिए ही प्रयोग में लाया जा रहा है। इस नये संयंत्र में तकनीकी पक्षों के अध्ययन का कार्य भारतीय विद्युत निगम (Bhartiya Vidyut Nigam, BHAVINI) दव्ारा किया जा रहा है। भारत सरकार ने हाल ही में यह घोषणा की है कि वर्ष 2012 तक 12,000 तथा वर्ष 2050 तक 200,000 मेगावाट परमाणु ऊर्जा के उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित हैं। ऐसी नीतियों का उद्देश्य निश्चित रूप से ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने में परमाणु ऊर्जा की भूमिका का विस्तार करना है। वर्तमान में भारत की कुल ऊर्जा उत्पादन क्षमता का लगभग 3 प्रतिशत परमाणु ऊर्जा से प्राप्त होता है। हांलाकि अन्य एशियाई देशों की तुलना में यह अत्यंत कम है लेकिन सरकार ने आशा व्यक्त की है कि आगामी वर्षों में इस क्षेत्र में तीव्र प्रगति होगी। वर्तमान में कार्य करने वाले कुल 20 रिएक्टरों में 2 क्वथन जल रिएक्टर तथा 18 भारी जल रिएक्टर शामिल हैं। इन रिएक्टरों की ऊर्जा उत्पादन क्षमता 4,780 मेगावाट है। रूस के सहयोग से 1000 - 1000 मेगावाट की क्षमता वाले 4 सामान्य जल रिएक्टरों की स्थापना तमिलनाडु के तिरूनल्वेली जिले में कूडनकुलम में की जा रही है।
  • इस बीच, 12 सितंबर, 2005 से तारापुर स्थित परमाणु संयंत्र की चौथी इकाई ने कार्य करना आरंभ कर दिया है। भारतीय परमाणु ऊर्जा निगम के अनुसार, यह भारत की अब तक की सबसे बड़ी इकाई है तथा इसकी ऊर्जा उत्पादन क्षमता 540 मेगावाट है। इस संयंत्र से उत्पादित होने वाली ऊर्जा की बिक्री महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीगढ़ तथा गोवा के अतिरिक्त दमन और दीव को जी जाएगी।

परमाणु रिएक्टर (Atomic Reactor)

  • परमाणु रिएक्टर सामान्यत: ताप ऊर्जा उत्पादित करने वाला स्रोत होता है जो विद्युत उत्पादन के लिए टर्बाइन को गतिशील बनाने के लिए आवश्यक है। मानक रिएक्टर (क्वथन जल (Boiling Water) ) अथवा भारी जल (Deuterium Oxide D2O) रिएक्टर में यूरेनियम 235 का प्रयोग श्रृंखलाबद्ध अभिक्रिया बनाये रखने के लिए ईंधन के रूप में किया जाता है। उल्लेखनीय है कि इसकी उपलब्धता प्रकृति में सदैव यूरेनियम 238 के साथ होती है। वस्तुत: यूरेनियम के इस सम्मिश्रण में यूरेनियम -238ए 99.3 प्रतिशत तथा शेष यूरेनियम 235 पाया जाता है। ईंधन के रूप में इसका प्रयोग करने के पूर्व इस सम्मिश्रिण का संवर्द्धन किया जाता है जिसके अंतर्गत यूरेनियम 235 की मात्रा को बढ़ाकर 2.35 प्रतिशत अथवा 3 प्रतिशत तक किया जाता है। ऐसे यूरेनियम को संवर्द्धित यूरेनियम (Enriched Uranium) कहते हैं।
  • सामान्यत: परमाणु रिएक्टर नाभिकीय विखंडन (Nuclear Fission) के सिद्धांत पर कार्य करता है। श्रृंखलाबद्ध अभिक्रिया के दौरान जब धीमी गति वाला न्यूट्रॉन (थर्मल न्यूट्रॉन) यूरेनियम 235 के परमाणु से टकराता है तब इसके नाभिक के विखंडन से 2 या 3 न्यूट्रॉन तथा ताप ऊर्जा विमुक्त होती है। इन न्यूट्रॉनों को भारी जल अथवा सामान्य जल से धीमा किया जाता है जिसे मंदन (Thermalisation) कहते हैं। यह अभिक्रिया निरंतर चलती रहती है। तकनीकी रूप से यू-235 दव्ारा न्यूट्रॉनों का अवशोषण किया जाता है जिससे यू-236 का निर्माण होता है। इस परमाणु का नाभिक विखंडित होकर पुन: न्यूट्रॉनों को विमुक्त करता है। श्रृंखलाबद्ध अभिक्रिया से उत्पन्न ताप से वाष्प का निर्माण किया जाता है, जो टर्बाइन को गतिशील बनाकर ऊर्जा का उत्पादन करता है।

परमाणु/नाभिकीय विखंडन (Nuclear Fission)

जब किसी अस्थायी भारी नाभिक (जैसे यूरेनियम-235, प्लूटोनियम-239 और यूरेनियम-233) पर उच्च ऊर्जा वाले न्यूट्रॉन की बौछार की जाती है, तब यह भारी नाभिक दो हल्के नाभिकों में विभक्त हो जाता है तथा इस अभिक्रिया में विशाल मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न होती है। खंडित होता हुआ नाभिक दो या तीन न्यूट्रॉन तथा साथ में बहुत कम तरंगदैर्ध्य का प्रकाश भी उत्सर्जित करता है। इस प्रकाश को प्राय X किरणें तथा संपूर्ण प्रक्रिया को ‘नाभिकीय विखंडन’ कहते हैं। इस प्रक्रिया को निम्न समीकरण से प्रदर्शित किया जा सकता है।

परमाणु/नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion)

जब दो बहुत हल्के नाभिक एक दूसरे में विलीन होकर एक ऐसा नाभिक बनाते हैं जिनका भार दो विलीन होने वाले नाभिकों के संयुक्त भार से कम होता है और भार की इस क्षति के कारण असीमित ऊर्जा विमोचित होती है तो इस संपूर्ण प्रकिया को ‘नाभिकीय संलयन’ कहते हैं। सूर्य से निकलने वाली ऊर्जा का कारण नाभिकीय संलयन ही है। हाइड्रोजन के आइसोटोप ड्‌यूटीरियम के नाभिक सूर्य के अंतरंग में परस्पर टकाराते हैं तथा हीलियम उत्पन्न करते हैं। इस अभिक्रिया में उत्पन्न असीमति ऊर्जा सूर्य को प्रदीप्त करती है। जिससे अंतत: विभिन्न तरंगदैर्ध्य के प्रकाश का विकिरण होता है। इन तरंगदैर्ध्य में सम्मिलित अवरक्त तरंगदैर्ध्य के प्रकाश से पृथ्वी गर्म होती है। इस संलयन अभिक्रिया में नाभिकों का उच्च वेग से टकराना आवश्यक है तथा इस उच्च वेग के लिए अत्यधिक उच्च तापमान (107 - 108 डिग्री के) होना चाहिए।

Nuclear Fusion

संलयन अभिक्रिया का उपयोग अभी मात्र हाइड्रोजन बमों के निर्माण में ही व्यापक रूप से किया जा सका है। इस कार्य के लिए हाइड्रोजन के आइसोटोपों के नाभिकों का संलयन कराया जाता है। इस प्रक्रिया के लिए ड्‌यूटेरियम एवं टीटियम आइसोटोपों के निभिकों को लगभग 107 डिग्री तक गर्म करना पड़ता है। इस ताप पर केवल धन आवेश वाले नाभिक शेष रह जाते हैं, जिन्हें प्लाज्मा कहते हैं। वैज्ञानिक इस प्रयास में लगे हैं कि प्रयोगशाला में इतना उच्च ताप उत्पन्न कर सकें ताकि सूर्य के समान संलयन अभिक्रियायें प्रेरित की जा सके। परन्तु इन अभिक्रियाओं को केवल कुछ क्षणों के लिए ही संपन्न करने में सफलता मिल सकी है।

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