Science and Technology: Communication Technology and Wired Communication

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संचार प्रौद्योगिकी (Communication Technology)

सूचना और संचार प्रौद्योगिकी, जिसे आम तौर पर आईसीटी (ICT) कहा जाता है, का प्रयोग अक्सर सूचना प्रौद्योगिकी (IT) के पर्यायवाची के रूप में किया जाता है। यह आधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी में दूरसंचार (टेलीफोन लाईन एवं वायरलेस संकेतों) की भूमिका पर जोर देती है। आईसीटी में वे सभी साधन शामिल होते हैं जिनका प्रयोग कम्प्यूटर नेटवर्क एवं हार्डवेयर दोनों और साथ ही साथ आवश्यक सॉफ्टवेयर सहित सूचना एवं संचार का संचालन करने के लिए किया जाता है। दूसरे शब्दों में, आईसीटी के अंतर्गत आईटी के साथ-साथ दूरभाष संचार, प्रसारण मीडिया और सभी प्रकार के ऑडियो और वीडियो प्रक्रमण एवं प्रेषण शामिल होते हैं। यदि यह कहा जाये कि संचार प्रौद्योगिकी मानवीय प्रगति और मानव के सर्वांगीण विकास का केन्द्रीय तत्व है तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं। इस प्रौद्योगिकी ने मानवीय विकास की असीम संभावनाओं के दव्ार खोल दिए हैं। यह प्रौद्योगिकी न सिर्फ व्यक्तियों अपितु राष्ट्रों और सभ्यताओं के बीच संवाद को भी प्रोत्साहन प्रदान करती है। दूरसंचार, संचार प्रौद्योगिकी का मुख्य रूप है, जिसमें सूचनाओं का संप्रेषण विद्यतु चुम्बकीय माध्यमों दव्ारा होता है। दूरसंचार के माध्यम से विभिन्न प्रकार की सूचनाओं-जैसे ध्वनि एवं संगीत, चित्र व वीडियो, कम्प्यूटर फाइलों आदि को संप्रेषित किया जा सकता है।

संप्रेषण विधि के आधार पर संचार को दो भागों में बाँटा जा सकता है- एनालॉग संचार, डिजिटल संचार

  • एनालॉग संचार (Analog Communication) - एनालॉग संचार में सूचना को एनालॉग संकेतों के रूप में संप्रेषित किया जाता है। इन संकेतों में तरंगों के विभव (Potential) और धारा में लगातार परिवर्तन होता रहता है।
  • डिजिटल संचार (Digital Communication) - इसमें तरंगों की धारा व विभव के मान में एक निश्चित अनुपात में ही परिवर्तन होता है। इसका आरंभ और समापन एक स्विच की भाँति होता है। अर्थात डिजिटल सूचना बाइनरी रूप (0 या 1) में होती है। इसकी क्षमता उच्च होती है तथा इसमें त्रुटियाँ भी कम होती हैं।
Communication Technology

संप्रेषण माध्यम के आधार पर भी संचार को दो भागों में बाँटा जा सकता है-तार सहित संचार (Wired Communication) , तार रहित संचार (Wireless Communication)

तार सहित संचार (Wired Communication)

इस संचार में तरंग हमेशा चालक के माध्यम से होने वाले विद्युत प्रवाह से जुडी होती है। इस संचार में भौतिक तारों का प्रयोग किया जाता है, जो मुख्यत: तीन प्रकार के होते हैं-

  • खुले तार युग्म (Open Wire Pair)
  • को -एक्सियल केबल (Co-axial Cable)
  • प्रकाशीय तंतु (Optical Fibre)

Explanation:

  • खुले तार युग्म (Open Wire Pair) - इसमें कुचालकों के परत चढ़े तांबे के दो तार होते हैं जो दो समान्तर चालकों के रूप में कार्य करते हैं। तांबे के तार की यह समानन्तर व्यवस्था एक ऐसी प्रसारण व्यवस्था को जन्म देती है जो बिजली की चमक जैसी बाधाओं के प्रति कम संवेदनशील होती है। इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह सस्ता होता है और तार बिछाना भी आसानी से संभव हो जाता है। किन्तु इसकी कमी यह है कि इसकी क्षमता सीमित होती है व आँकड़ों के संप्रेषण की दर अत्यंत धीमी होती है। यह संकेतों को बिना रिपीटर के कुछ किलोमीटर तक ही ले जा सकता है। इसका प्रयोग मुख्यत: टेलीफोन सेवा में किया जाता है।
  • को-एक्सियल केबल (Co-axial Cable) - खुले तार युग्म की कमियों को दूर करने के लिए को-एक्सियल केबल प्रयोग में लाया जाता है। इसमें संकेतों में विकिरण हानि बहुत कम होती है और यह बाह्य अवरोधक के प्रति बहुत कम संवेदनशील होता है। को-एक्सियल केबल के केन्द्र में तांबे का तार चालक के रूप में होता है। इसके चारों ओर तार की जाली रहती है, जिसे शील्ड (Shield) कहते हैं। ताँबे के तार व शील्ड के बीच टेफलॉन या पॉलीथिन का प्रयोग कुचालक के रूप में किया जाता है। को-एक्सियल केबल का प्रयोग टीवी सिग्नलों के लिए किया जाता है।
  • प्रकाशीय तंतु (Optical Fibre) - प्रकाशीय तंतु काँच अथवा सिलिका के पतले रेशे होते है, जो प्रकाश के माध्यम से तीव्र और बेहतर संचार स्थापित करने में कदद करते हैं। प्रकाशीय तंतु प्रकाश के पूर्ण आंतरिक परावर्तन (Total Internal Reflection) के सिद्धांत पर कार्य करता है, जिसमें प्रकाश स्वत: परावर्तित होकर संचरण करता रहता है। प्रकाशीय तंतुओं के माध्यम से संदेश भेजने के लिए सबसे पहले संदेश को प्रकाशीय संकेतों में परिवर्तित किया जाता है, फिर प्रेक्षक ट्रांसमीटर इन प्रकाशीय संकेतों को डिजिटल या विद्युत संकेतों में बदला जाता है, जिन्हें कम्प्यूटर/टेलीफोन समझ सकता है।
Optical Fibre

यद्यपि संचार की प्रक्रिया के लिए प्रकाश के प्रयोग के आरंभिक संकेत 1870 ई. में बल के प्रयोगों में ही मिलने लगता है किन्तु प्रकाशीय तंतुओं का सैद्धांतिक ज्ञान 1920 के आस-पास विकसित हुआ तथा इसका तीव्र व्यावहारिक विकास 1960 के पश्चात्‌ प्रारंभ हो गया। इस प्रणाली के कई लाभ हैं, जो इस प्रकार हैं-

  • प्रकाश के संचरण में प्रतिरोध की समस्या पैदा नहीं होती, जो विद्युतधारा आदि के संचरण में होती है।
  • प्रकाश के पूर्ण आंतरिक परावर्तन के गुण के कारण संकेतों को बार-बार तीव्र बनाने की आवश्यकता नहीं पड़ती, जिससे ऊर्जा की खपत कम हो जाती है।
  • प्रकाशीय तंतुओं की क्षमता संचार के अन्य माध्यमों से काफी अधिक होती है। इसकी प्रत्येक केबल में लगभग 24 तंतु होते हैं और प्रत्येक तंतु में प्रसारण के हजारों चैनल स्थापित किये जा सकते हैं।
  • इस पद्धति में किसी भी प्रकार की भूल की गुंजाइश नहीं होती। इसमें न तो जंग लगने जैसी समस्या आती है और न ही लघुपरिपथ (Short Circuit) जैसी समस्या होती है।
  • ये तंतु भार की दृष्टि से काफी हल्के होते हैं। अत: इन्हें स्थापित करना काफी आसान होता है।
  • प्रसारण की व्यवस्था तीव्र गति से होती है क्योंकि प्रकाश की गति विद्युत या ध्वनि की गति से बहुत अधिक तीव्र होती है।

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