कब आएगी वह सुबह

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कब आएगी वह सुबह!

प्रदूषित जीवन की संध्या जब

बनेगी की हरियाली की भोर बेला

नृशंस मानव के हाथों से

जब कटते वन बच पावेंगे

सुरभित जीवन की आशा से

पुष्प पादप खिल जाएँगे

कब आएगी वह सुबह!

नदियों का प्रदूषण मिट जाएगा

जब उज्जवल जल लहराएगा

उज्जवल जल की उज्जवलता में

जल चर जीवन उत्साहित होगा

आहलादित जीव तब डोलेंगे

लौट आएगी स्वर्णिम बेला

कब आएगी वह सुबह!

स्वर्णिमता का रास लिए

मधुरता की चाह लिए

नव जीवन का उत्साह लिए

स्वछंंदता का विश्वास लिए

थल चर, नभचर रह पावेंगे

सहचर्य जीवन की मस्ती में

कब आएगी वह सुबह!

जब प्रफुल्लित जन मानस होगा

पुलकित सबका तन मन होगा

हर आँगन में हरियाली होगी

घर-घर दियों की लाली होगी

नष्ट होगी विध्वंस की लीला

रह न पावेगी मृत्यु विभीषिका।

कब आएगी वह सुबह!

Author: Manishika Jain

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