महत्वपूर्ण राजनीतिक दर्शन Part-15: Important Political Philosophies for CISF Examsfor CISF Exams

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जवाहर लाल नेहरू का समाजवाद

नेहरू पर काल मार्क्स और महात्मा गांधी दोनो का गम्भीर प्रभाव था। चूँंकी वे महात्मा गांँधी के घोषित उत्तराधिकारी थे और 17 सालों तक पूरी मजबूती के साथ भारत के प्रधानमंत्री रहे, इसलिए उनकी समाजवादी मानयताएंँ व्यवहारिक स्तर पर भारतीय राजनीति और समाज को काफी हद तक प्रभावित कर सकी।

जवाहरलाल नेहरू के समाजवाद को निम्नलिखित बिंदुओं की मदद से समझा जा सकता है-

1 नेहरू लोकतांत्रिक समाजवादी विचारक थे। वे मार्क्स वाद के कुछ विचारों से प्रभावित थे जैसे-

  • उनका पारंपरिक धर्मों के प्रति वही नज़रिया था जो मार्क्स का था। उन्होंने ’मेरी कहानी’ में लिखा भी है कि पारंपरिक धर्मो ने मानव को नुकसान ज्यादा तथा लाभ कम पहुँचाया हैं।

  • मार्क्स ने ईश्वर और आत्मा जैसी अलौकिक सत्ताओं का खंडन अपनी भौतिकवादी विचारधारा के आधार पर किया था। नेहरू भी भौतिकवादी हैं, अत: ईश्वर या आत्मा जैसी अलौकिक सत्ताओं पर विश्वास नहीं करते हैं।

  • मार्क्स के ऐतिहासिक भौतिकवाद का भी नेहरू ने काफी समर्थन किया है। नेहरू मानते थे कि इतिहास को समझने के लिए अर्थव्यवस्था को ही केन्द्र में रखा जाना चाहिए। उन्होंने ’डिस्कवरी (खोज) ऑफ (की) इंडिया (भारत)’ में भारत के इतिहास की व्याख्या में आर्थिक तत्वों को काफी अधिक महत्व दिया है।

  • सोवियत संघ की आर्थिक आयोजन प्रणाली का प्रभाव भी नेहरू पर था। इन्होंने पंचवर्षीय योजना की अवधारणा सोवियत संघ से ही ली।

  • मार्क्स का मानना था कि औद्योगिक विकास से ही समृद्धि बढ़ेगी और उसी के आधार पर समाजवाद व साम्यवाद का आगमन होगा। नेहरू ने गांधी के विरोध में जाकर भी औद्योगीकरण का समर्थन किया तथा उद्योग धंधों व बांधों को ’आधुनिक भारत का मंदिर’ कहा। इसी प्रकार, उत्पादन के बड़े साधनों का राष्ट्रीयकरण करना भी सोवियत संघ के समाजवाद से प्रेरित था।

2 किन्तु, नेहरू का समाजवाद पूरी तरह मार्क्सवाद से प्रभावित नहीं था। निम्नलिखित बिन्दुओं पर वे मार्क्सवाद से भिन्न विचार रखते हैं-

  • नेहरू ने ’राष्ट्रवाद’ का वैसा विरोध नहीं किया जैसा कि मार्क्स ने किया था। नेहरू ’सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ के समर्थक तो नहीं हैं किन्तु राष्ट्र को एक व्यावहारिक इकाई के रूप में स्वीकार करते है।

  • नेहरू ने वर्ग संघर्ष तथा ’हिंसक क्रांति’ के विचार को स्वीकर नहीं किया। इसके स्थान पर उन्होंने गांधी से प्रभावित होकर अहिंसा और वर्ग सहयोग की धारणाओं को स्वीकार किया।

  • मार्क्स ने ’सर्वहारा की तानाशाही’ का सिद्धांत प्रतिपादित किया था जो नेहरू के समय में सोवियत संघ और चीन में प्रचलित भी था, किन्तु नेहरू ने लोकतांत्रिक माध्यम से ही समाजवाद की उपलब्धि के लक्ष्य को स्वीकारा।

  • नेहरू ने ऐतिहासिक भौतिकवाद में निहित दृष्टिकोण का समर्थन किया, किन्तु स्पष्ट रूप से कहा कि भविष्य के प्रति निर्धारणवादी व्याख्या स्वीकार नहीं की जा सकती।

  • मार्क्स निजी संपत्ति तथा पूंजीवादी प्रणाली के पूर्ण विरोधी थे। नेहरू ने समाजवादी व्यवस्था के अंतर्गत भी निजी संपत्ति और निजी उद्यमशीलता को आंशिक रूप से स्वीकार किया अर्थात मिश्रित अर्थव्यवस्था के मार्ग को चुना।

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