जी-20 सम्मेलन (G-20 Meeting Dealing with Various Issues -Essay in Hindi) (Download PDF)

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प्रस्तावना: -तुर्की के अंताल्या शहर में जी-20 देशो की महत्वपूर्ण बैठक हो रही है। इस बैठक के मुख्य विषय है, पर्यावरण और आर्थिक सहयोग। लेकिन पेरिस आतंकी हमले ने बैठक के एजेंडे में आतंकवाद को केंद्र में ला दिया है। अब तक इस मामले से कन्नी काटते रहे विकसित देशों को लगने लगा है कि आतंकवाद को कुचले बिना विश्व में आर्थिक विकास को सुनिश्चित नहीं किया जा सकता है। कुछ मसले ऐसे होते हैं, जिन पर सहमति और निर्णय लेने में जितनी देरी होती है, वे उतनी ही बेकाबू होते जाते हैं। जैसे क्लाइमेट चेंज (जलवायु परिवर्तन) और आतंकवाद विकसित और विकासशील देशों के तमाम मंचो पर इन दोनों मसलों पर इस दौर में जितनी चर्चाएं हुई हैं, उतनी किसी दूसरे मसले पर नहीं । फिर भी सहमति और निपटने की रणनीति आज तक देखने को नहीं मिली।

सम्मेलन: - तुर्की में चल रहे जी-20 देशों के सम्मेलन में तयशुदा कार्यक्रम के मुताबिक चर्चा होनी थी लेकिन मामला आतंकवाद पर केंद्रित होता चला गया। सम्मेलन से अलग अन्य राष्ट्रों के प्रतिनिधियों की बैठके भी इसी विषय के इर्दगिर्द होने लगी। इसका सबसे कारण था पेंरिस पर आतंकी हमला। पूर्व में 9/11 की घटना के बाद इटली में हुए जी-7 सम्मेलन में भी आर्थिक विषयों की बजाय सुरक्षा का मुद्दा केंद्र में आ गया था। इस परिस्थिति में 15 दिनों के बाद पेरिस में पर्यावरण बदलाव पर होने वाले सम्मेलन में भी आतंक का मुद्दा हावी रह सकता है। अब इस विषय में बात करना बहुत ही महत्वपूर्ण हो गया है।

सीसीआईटी: - भारत ने 1996 में संयुक्त राष्ट्र में प्रस्ताव रखा था जिसे कॉम्प्रिहेंसिव कन्वेंशन ऑन इंटरनेशनल टेररिज्म (सीसीआईटी) कहा जाता है। इसमें समस्या यह थी कि बहुत से देश आतंक को स्वाधीनता की लड़ाई भी बता दिया करते है। केवल पाकिस्तान ही नहीं बल्कि ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक को ऑपरेशन (ओआईसी) देश भी इस कन्वेंशन पर हस्ताक्षर करने के मामले में नकारात्मक रवैया अपनाते रहे हैं। हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी साल 2015 सितम्बर में इस बात को दोहराया था कि भारत सीसीआईटी प्रस्ताव पर सदस्य देशों के हस्ताक्षर की इच्छा रखता है। उन्होंने हाल भी ब्रिटेन यात्रा के दौरान भी पेरिस में हुए आतंकी हमले पर प्रतिक्रिया देते हुए इसी बात को एक बार फिर उठाया। उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र की 70 वीं वर्षगाठ के समय तो भारत द्वारा प्रस्तावित सीसीआईटी तैयार होनी ही चाहिए। इस माहौल में भारत के लिए मौका है इस मामले में नेतृत्व करने का। चूंकि भारत इस मामले में 1996 में ही पहल कर चुका है और मोदी जी अब दुनिया के अन्य देशों के लिए नए नहीं है ऐसे में यदि वे अपनी बात रखते हैं तो उनकी बात का असर होगा। यह नेतृत्व हाथ में लेने का सही समय है। यही मोदी जी के लिए चुनौती भी है। क्या वे ऐसा कर पाएगें यही देखना दिलचस्प होगा।

आतंकवाद: - इस बात से तो अब आम सहमति बन चुकी है कि पेरिस जैसे हादसे को लोग आतंकी घटना कहने लगे हैं? ऐसी घटना को अंजाम देने वालों को आतंकी कहा भी जाने लगा है। लेकिन, अब तक आतंकवाद को पारिभाषित करना समस्या बना हुआ है। भारत इस मामले में बहुत निष्पक्ष तरीके से अपने विचार रखता रहा है। वह न तो आतंकवाद का जनक है और ना ही आतंकी घटनाओं को लेकर उसका नजरिया नकारात्मक रहता है। भारत हमेशा से कहता रहा है कि आतंकवाद को अच्छे या बुरे आतंकवाद से परिभाषित नहीं किया सकता। इसने जी-20 देशों के सम्मेलन की दिशा बदलने का काम किया है। अंतराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का केंद्र आतंकवाद है और भारत इस मामले में नेतृत्व की भूमिका में है।

राष्ट्र: -विश्व के बीस प्रमुख राष्ट्रों के इस ग्रुप में विकसित और विकासशील देश दोनों है। इन देशों की विश्व की अर्थव्यवस्था में 85 प्रतिशत की भागीदारी है। ऐसे महत्वपूर्ण ग्रुप का यह सम्मेलन दौरे में हो रहा है जब पेरिस में आतंकी हमला हुआ है। दूसरी और यह दौर वैश्विक अर्थव्यवस्था में नरमी का भी है। चाहे अमरीका हो या फ्रांस और या फिर भारत से सब देश घटनाओं का सामना कर चुके हैं। इसलिए सम्मेलन में आतंकवाद का मुद्दा ही प्रमुख रहा होगा। इसलिए आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए साझा प्रयासों के इस अवसर का फायदा उठाना चाहिए।

पिछले सालों से यह होता आया है कि भारत जब सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता की बात करता है उसे टाल दिया जाता है और यह बात सच भी है क्योंकि सुरक्षा परिषद आतंकवाद की रोकथाम के लिए कारगर प्रयास करने में विफल रही है। ऐसा कोई भी तंत्र नहीं बना है जो संयुक्त राष्ट्र के जरिए आतंकी घटनाओं पर काबू करने के साझा प्रयास हो पाए।

अर्थव्यवस्था: - जी-20 देशों की वर्तमान वैश्विक अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका है। इस फोरम में शामिल देश दुनिया की 85 फीसदी अर्थव्यवस्था, 75 फीसदी ग्लोबल ट्रेड और दो-तिहाई आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं। भारत आज दुनिया की सबसे तेजी से उभरती हुई अर्थव्यवस्था है। एवं जी-20 के माध्यम से भारत अपनी आर्थिक स्थिति को और अधिक मजबूत कर सकता है। इसके लिए मोदी जी की फ्लैगशिप प्रोजेक्ट जैसे ’मेक इन इंडिया’ व ’डिजिटल इंडिया’ को भी बूस्ट मिल सकता हे। इन दोनों के विकास के लिए विदेशी निवेश की आवश्यकता है और इन्हें इस प्रकार के वैश्विक मंचों से ही आमंत्रित किया जा सकता है। इससे पहले भी पूर्व के प्रधानमंत्री मनमोहन जी ने यह प्रयास जी-20 के मंच में कर चुके है।

समेकित विकास: -भारत की विकास दर अन्य सभी ब्रिक देशों में बेहतर रही है। मोदी जी ने अपने ब्रिटेन की यात्रा के दौरान भी निवेश के लिए सभी को खुला आमंत्रण दिया है। फिर वह ब्रिटिश निवेशक हो या कोई भारतीय दुनियाभर में समेकित विकास को समग्र विकास की कुंजी माना गया है। पिछले साल ब्रिसबेन में हुए जी-20 सम्मेलन में भी इसी बात पर जोर दिया गया था। देश में संचालित जन-धन जैसी योजनाएं इसी का परिणाम हैं इसके लिए सबसे पहले भारत को आधारभूत ढांचे का ओर अधिक विकास करना होगा। दूसरा जीएसटी बिल पास होने से वैश्विक निवेश डस्टिनेशन के रूप में और अधिक अनुकूलता मिल सकती है। इस सम्मेलन में कालेधन पर अकुंश और आईएमएफ में भागीदारी बढ़ाने के मुद्दे भी रखे जाने चाहिए।

कालाधन: - कालेधन को वापस लाने की चर्चा भारत में जोर-शोर से हुई है। मोदी सरकार ने इस दिशा में प्रयास किए भी हैं लेकिन उसके नतीजे खास नहीं दिख रहे। कारण, दुनिया के देशों में आर्थिक मामलों से जुड़े ऐसे नियम है जिसमें कालाधन विदेशी बैंकों में जमा रखना आसान हो गया है। ग्रुप-20 सम्मेलन में विश्व समुदाय पर इस बात के लिए दबाव बनाए कि वे कालाधन का पता लगाने में सहयोग करें। सबसे बड़ी चिंता इस बात की है कि दुनिया के सभी देशों में कालाधन ही अंतराष्ट्रीय आतंकवाद को बढ़ाने व वित्तीय पोषण में बड़ी भूमिका निभाता है। इसलिए सभी देशों का इस समस्या के समाधान में सहयोग आवश्यक है। वैश्विक सहयोग मिले बिना कोई भी देश अन्य देशों में जमा कालाधन का आसानी से न तो पता लगा सकता और न ही उसे वापस लाने के प्रयास कर पाता। सब देशों की अलग-अलग कर प्रणाली भी इसमें बाधा रहती है। ग्रुप में जो देश हैं उसमें विकसित देशों की रूचि निश्चित ही विकासशील देशों में रहती आई है। सबसे बड़ा संकट यह है कि विकासशील देशों के कुशल मानव संसाधन का वीजा के सख्त नियमों के चलते बेहतर उपयोग नहीं हो पाता। इसलिए अमेरिका जैसे देश अपने वीजा नियमों में शिथिलता दें। इससे उनको कुशल मानव संसाधन मिलने में आसानी रहेगी। इस सम्मेलन में इस बात की भी चर्चा होनी चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं द्वारा दीर्घावधि के कर्ज के लिए जलवायु संबंधित मापदंड तय करने से भी भारत व अन्य विकासशील देशों को समस्या ज्यादा हो रही हे। ऐसे देशों के लिए कुछ मापदंडों की पालना पूरी करना मुश्किल होता है इसलिए इस बात की चर्चा भी इस सम्मेलन में उठानी चाहिए।

उपसंहार: -ऐेसे सम्मेलन आम तौर पर विचारों के आदान-प्रदान का फोरम है। भारत के लिए यह सम्मेलन इसलिए अहम है क्योंकि उसको भी 2018 में जी-20 की सम्मेलन की मेजबानी का मौका मिलने वाला है। ऐसे में सभी प्रमुख मुद्दों को विश्व समुदाय के बीच प्रमुखता से रखना चाहिए। ताकि भारत को इस सम्मेलन के माध्यम से विश्व में आगे आना का मौका मिल सके। ऐसे सम्मेलन समय -समय पर जरूर होने चाहिए जिससे हर देश की समस्या को सुनकर उसे दूर करने का प्रयास किया जा सके।

- Published/Last Modified on: December 16, 2015

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