जीएसएलवी मार्क-3 (GSLV Mark-3 in Hindi ) (Download PDF)

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प्रस्तावना: -अंतरिक्ष असीम है। अनंत संभावनाएँ हैं। भारत ने स्वतंत्रता के बाद से अंतरिक्ष के क्षेत्र में कदम रखना शुरू किया। आज हम अंतरिक्ष के विस्तार में अपने भविष्य को तलाश रहे हैं। 5 जून को भारत अपना अब तक का सबसे वजनी यानी 640 टन के रॉकेट (अग्नि बाण) जीएसएलवी मार्क-3 का प्रक्षेपण करेगा। इसका वजन लगभग 200 हाथियों के बराबर है। गौरवशाली बात है कि स्वदेशी क्रायोजनिक इंजन वाले जीएसएलवी मार्क-3 के जरिए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) अपनी गाथा में एक और अध्याय जोड़ेगा।

भारत: - भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने कम समय में ही बहुत कामयाबी हासिल की है। इसरों की स्थापना का वह वक्त था जब अंतरिक्ष में अमरीका और रूस के बीच ही होड़ बनी रहती थी, जिसे स्पेस रेस के नाम से जाना गया। लेकिन, अब भारत ने भी अंतरिक्ष में अपनी शक्ति का लोहा मनवाया है। 19 अप्रेल, 1975 में स्वदेश निर्मित उपग्रह आर्यभट्‌ट के प्रक्षेपण के साथ अपने अंतरिक्ष सफर की शुरुआत करने वाला भारत आज अंतरिक्ष के क्षेत्र में उन चुनिंदा देशों में शामिल है जिनके पास बड़ी संख्या में संचार उपग्रह हैं। कम संसाधनों और कम बजट के बावजूद भारत आज अंतरिक्ष में कीर्तिमान स्थापित करने में लगा हुआ है।

  • भारतीय प्रक्षेपण रॉकेटों (अग्नि बाण) की विकास लागत ऐसे ही विदेशी प्रक्षेपण रॉकेटों की विकास लागत के एक तिहाई भर है। भारतीय उपग्रह अपनी क्षमता के लिए दुनियाभर में मशहूर हैं। इसरों का बजट अन्य देशों की अंतरिक्ष एजेंसियों (अभिकरण) की तुलना में काफी कम है। इसके बावजूद इसरों विश्व स्तरीय रॉकेट और उपग्रह तकनीक विकसित करने में आगे है। इसरों पूर्व अध्यक्ष माधवन नायर ने एक बार कहा था 20 वर्ष बाद अंतरिक्ष में सफर करना ऐसा हो जाएगा जैसे आज हवाई जहाज में सफर करना है। उस समय हम दूसरे देशों के अंतरिक्ष यान के टिकट लेना पसंद नहीं करेंगे। इसरो की अब तक की सफलताओं को देखते हुए कहा जा सकता है कि माधवन नायर की बात सही साबित होगी। लेकिन इसके पीछे भारतीय वैज्ञानिकों का अथक परिश्रम और लगन भी शामिल है।

बाजार: - देश की जरूरतों को पूरा करने के साथ ही इसरो ने अंतरिक्ष बाजार में भी अपनी धाक जमाई है। इसरों का मानना है कि उसका व्यापार सबसे ज्यादा मुनाफे वाला है क्योंकि हर एक रुपए के निवेश पर उसको दो रुपए वापस मिलते हैं।

  • वर्तमान मेें अमरीका सहित यूरोपीय यूनियन (संघ) और रूस के पास सैटेलाइट (उपग्रह) लॉन्चिंग (प्रक्षेपण) के बाजार में 80 प्रतिशत हिस्से पर कब्जा है। सक्सेट (सफलता) रेट (कीमत) इसरो लॉचिंग 95 प्रतिशत है। अन्य एजेंसियों से इसरो की लॉचिंग 11 गुना सस्ती है। 14 लाख करोड़ रुपए का ग्लोबल (विश्वव्यापी) सैटेलाइट (उपग्रह) मार्केट (बाजार) । 12 सैटेलाइट हर साल लॉन्च करने का है इसरो का लक्ष्य। 46 भारतीय सैटेलाइट (उपग्रह) पहुंचा चुका है पीएसएलवी। 180 विदेशी सैटेलाइट पहुंचा चुका है भारतीय पीएसएलवी। 200 सैटेलाइट भेजने का लक्ष्य है वर्ष 2023 तक। 05 हजार किग्रा सैटेलाइट भेजेगा जीएसएलफ-3। 9, 093 करोड़ रुपए है वर्ष 2017 - 18 में भारतीय अंतरिक्ष विभाग का बजट। गत वर्ष की तुलना में 1, 048 करोड़ अधिक है। अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए 4, 155 करोड़ आवंटित किए है। विदेशी सैटेलाइट के प्रक्षेपण से इसरो ने 200 करोड़ रुपए कमाए।

कदम-

  • अमरीका का पिछलग्गू बना लेकिन- वर्ष 1961 में पाक ’सुपारकों’ नाम स्पेस (अंतरिक्ष) एजेंसी (संस्था) का गठन किया। अमरीका की मदद से वर्ष 1962 में पाकिस्तान ने रहबर रॉकेट (अग्नि बाण) का प्रक्षेपण किया। पाक एशिया में इजरायल और जापान के बाद रॉकेट लॉन्च करने वाला तीसरा देश बना।
  • पिटा और पिटता चला गया-आठ साल बाद अंतरिक्ष एजेंसी इसरो का 1969 में गठन हुआ। इसरो ने पाकिस्तान को ऐसा पछाड़ा कि पाकिस्तान आज अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत से कई प्रकाश वर्ष पीछे है। भारत ने वर्ष 1975 में अपना सैटेलाइट आर्यभट्‌ट प्रक्षेपित किया। पाकिस्तान ने वर्ष 1990 में अपने सहयोगी देश चीन की मदद से अपना पहला सैटेलाइट बढ्र-1 लॉन्च (प्रक्षेपण) किया।
  • मेड (बनना) इन (अंदर) चाइना को मात-इसरों का वर्ष 2015 - 16 में बजट जहांँ 43 मिलियन (दस लाख) डॉलर (अमरीकी मुद्रा) था वहीं चीन का बजट 110 मिलियन डॉलर था। इसके बावजूद भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम चीन से किसी दर्जे में कम नहीं। भारत मंगल ग्रह की परिधि में पहली बार में ही सफलतापूर्वक पहुंचने वाला पहला देश बना जबकि चीन को अभी ये खिताब हासिल नहीं है। चीनी अंतरिक्ष कार्यक्रम सैन्य जरूरतों को ध्यान में रख बनाया है। भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम शांतिपूर्ण कार्यक्रमों के लिए है।

जीएसएलवी मार्क-3: -खासियत निम्न हैं-

  • 25 वर्ष की मेहनत से तैयार किया वैज्ञानिकों ने इसरो द्वारा तैयार ये अब तक का सबसे वजनी रॉकेट।
  • 640 टन वनज, मुख्य विशेषता स्वदेशी तकनीक से निर्मित क्रायोजनिक इंजन। 43, 43 मीटर लंबाई और 4 मीटर की परिधि है जीएसएलवी मार्क-3 की। रॉकेट के साथ छोड़ा जाने वाला संचार उपग्रह जीसैट-19 लगभग 3.2 टन वजनी है।
  • इस रॉकेट से आठ टन वजनी पेलोड को लो अर्थ ऑरबिट में प्रक्षेपित किया जा सकता है। ये भारत का पहला फली फंक्शनल (क्रियाशील) रॉकेट (अग्नि बाण) है, इसके क्रायोजनिक इंजन में तरल ऑक्सीजन व तरल हाइड्रोजन का उपयोग किया है।
  • इस रॉकेट के विकास के क्रम में वैज्ञानिकों ने 11 फ्लाइट्‌स (उड़ान) और 200 से ज्यादा परीक्षण किए हैं।
  • जीएसएलवी के अपर स्टेज (मंच) सी-25 का इसरो ने 18 फरवरी, 2017 में सफल परीक्षण किया था।
  • चार टन के सैटलाइट को जीओसिन्क्रोनस ट्रांसफर (स्थानातंरण) ऑरबिट (परिक्रमा करना) (जीटीओ) में लॉन्चिंग में सक्षम है।

भारत और चीन: - दशकों तक अंतरिक्ष में रूस व अमरीका का दबदबा रहा। लेकिन अब इसमें जो दो बड़े प्लेयर (खिलाड़ी) बनकर उभरे हैं, वो हैं-भारत और चीन। इसी साल फरवरी माह में भारत ने 104 सैटेलाइट एक रॉकेट पर लॉन्च कर न सिर्फ सबको चौंका दिया बल्कि ज़मीन से आसमां तक अपनी धाक जमा दी। सबसे दिलचस्प बात यह थी कि 100 सैटेलाइट्‌स में से भारत के सिर्फ 03 ही थे। इस तरह भारत ने कम लागत सैटेलाइट (उपग्रह) लॉन्च (प्रक्षेपण) कर अमरीका को पीछे छोड़ और चीन को भी भारतीय सेवाओं के लिए लुभा लिया।

बढ़ते कदम का सफर: - पिछले कुछ वर्षो में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र (इसरो) ने कामयाबी की पताका फहरायी है।

रिकॉर्ड लान्च (प्रमाण प्रक्षेपण)

  • फरवरी 2017-इसरो ने एक साथ 104 सैटलाइट का सफल लान्च किया। लान्च में जो 101 छोटे सैटेलाइट्‌स का वजन 664 किलो ग्राम था। इन्हें कुछ वैसी ही अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया गया जैसे विद्यालय बस बच्चों को क्रम से छोड़ती है।
  • 2016-आईआरएनएसएस-भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (इसरो) ने 28 अप्रैल 2016 भारत का सातवां नेविगेशन (नौसंचालन) उपग्रह (इंडियन (भारतीय) रीजनल (क्षेत्रीय) नेविगेशन (नौसंचालन) सैटेलाइट (उपग्रह) सिस्टम (प्रबंध) ) लॉन्च (प्रक्षेपण) किया। इसरो ने अपनी नाविक सैटेलाइट नेविगेशन प्रणाली स्थापित किया।
  • 2013 मंगलयान- मंगल की परिधि तक पहुंचने में पहले प्रयास में सफल रहने वाला भारत दुनिया का पहला देश बना। जबकि अमरीका, रूस और यूरोपीय स्पेस (अंतरिक्ष) एजेंसियों (संस्थाओं) को कई प्रयासों के बाद ही मंगल ग्रह पहुंचने में सफलता मिल पाई थी।
  • 2010-जीएसएनपी एम के जेड- जीएसएलवी मार्क-2 का सफल प्रक्षेपण बड़ी कामयाबी थी, क्योंकि इसमें भारत में निर्मित क्रायोजनिक इंजन लगाया था। इसके बाद भारत को सैटेलाइट लान्च करने के लिए दूसरे देशों पर निर्भर नहीं रहना पड़ा। राजस्व में काफी बचत हुई।
  • 2008 चंद्रयान- इसरो ने चंद्रयान से इतिहास रचा था। अक्टूबर, 2008 को स्वदेश निर्मित इस मानव रहित अंतरिक्ष यान को चांद पर भेजा गया था। इससे पहले ऐसा सिर्फ छह देश ही कर पाए थे चंद्रयान ने कई अभिनव आंकड़े भी भेजे।
  • 1990 पीएसएलवी-इसरो ने 1990 में ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पीएसएलवी) को विकसित किया था। वर्ष 1993 में इस नई विकसित तकनीक से यान से पहला उपग्रह अंतरिक्ष की कक्षा में भेजा गया। इससे पहले यह सुविधा केवल रूस के पास थी।
  • 1983 इनसेट-प्रसारण के क्षेत्र में इसरो का बड़ा कदम। सैटेलाइट की पूरी सीरीज (श्रृंखला) ने भारत में टीवी-रेडियो ब्रॉडकास्टिंग (प्रसारण) में नई क्रांति। मौसम पूर्वानुमानों में मदद। सीरीज के 9 सैटेलाइट अब भी कार्यरत हैं।
  • 1975 आर्यभट्‌ट-देश का पहला उपग्रह आर्यभट्‌ट अंतरिक्ष में भेजा गया। इसे भारतीय खगोलशास्त्री के नाम पर नामित किया गया है। इसको कॉसमॉस-3 एम प्रक्षेपण वाहन से कास्पुतिन यान से प्रक्षेपित किया था।
  • रूस, अमरीका और चीन के बाद भारत अंतरिक्ष में अपनी जमीन से मानव भेजने वाला चौथ देश बनेगा।
  • 1984 में सोवियत मिशन में भारत के राकेश शर्मा अंतरिक्ष में जाने वाले पहले भारतीय।

लागत: -

  • 300 रू. करोड़ की लागत आई है जीएसएलवी मार्क-3 के निर्माण में। अमरीका, जापान और यूरोप की तुलना में 60 - 65 गुना कम भारत की। रूस की तुलना में 4 गुना कम कीमत पर सैटेलाइट लॉन्च करता है भारत
  • 5 जून 2017 को होगा पहला प्रक्षेपण, जीसेट-19 सैटेलाइट को ये लेकर जाएगा।
  • इसरो ने अंतरिक्ष में मानव मिशन (दूतमंडल) के लिए 12, 500 करोड़ रुपए का बजट बनाया है।

Table contain shows the ISRO budget of Rs. 12, 500 crore for the human mission in space

Table contain shows the ISRO budget of Rs. 12, 500 crore for the human mission in space

देश

रॉकेट (अग्नि बाण)

लागत

भारत

पीएसएलवी

100 करोड़

रूस

प्रोटोन

455 करोड़

अमरीका

फॉल्कन-9

381 करोड़

यूरोप

एरियन-5

6692 करोड़

अमरीका

एटलस-5

6692 करोड़

वैज्ञानिक: - विचार निम्न हैं-

1. नए रॉकेट की सफलता से अंतरिक्ष में मानव भेजने की क्षमता हासिल हो सकेगी, वो भी स्वदेशी तकनीक से।

पल्लव बागला, डेविड पर्लमैन अॅवार्ड (पुरस्कार) विजेता साइंस (विज्ञान) एडिटर (संपादक)

  • जीएसएलवी मार्क-3 भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम में मील का पत्थर का साबित हो सकता है। यह भारत का अब तक का सबसे भारी रॉकेट है। जीएसएलवी मार्क-3 के सफल होने से भारतीय उपग्रह प्रक्षेपण की लागत लगभग आधी हो सकती है। अभी भारत को भारी उपग्रहों के प्रक्षेपण दूसरे देशों से करवाना पड़ता है जिसमें भारी खर्चा आता है। मार्क-3 की क्षमता 4 टन तक के उपग्रह भेजने की है। अभी तक हम 2 से 2.5 टन वजन तक के उपग्रह ही प्रक्षेपित कर पाते हैं। यह बिल्कुल नया रॉकेट, नया सैटेलाइट है। इसमें स्वदेशी क्रायोजनिक (तुषार-जनिक) इंजन का इस्तेमाल हुआ है। यह इंजन इसरो द्वारा बनाया गया सर्वाधिक अपर (ऊपरी) स्टेज (मंच) वाला इंजन है। इसमें ईंधन के रूप में तरल ऑक्सीजन और तरल हाइड्रोजन का इस्तेमाल हुआ है। नए क्रायोजेनिक इंजन की डिजाइन (रूपरेखा) भी अच्छी है। सबसे महत्वपूर्ण बात है कि इसके जरिए अंतरिक्ष में यात्री भेजने की क्षमता हासिल की जा सकती है। भारतीय धरती से भारतीय लोगों को भारतीय यान से अंतरिक्ष में भेजा जाना चाहिए। यह संभावना जीएसएलवी मार्क-3 पूरी कर सकता है। यह अपने सफल परीक्षणों के बाद भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम में ’गेमचेंजर’ (खेल बदलना) साबित होगा।
  • इसमें साथ छोड़े जानें वाला संचार उपग्रह जीसैट-19 जो 3.9 टन वजन का है। यह स्वदेश निर्मित रॉकेट से छोड़े जाने वाला अब तक का सबसे वजनी उपग्रह होगा। यह रॉकेट पृथ्वी की कम ऊंचाई वाली कक्षा तक 8 से 10 टन वजन ले जाने में सक्षम है जो भारत के चालक दल को ले जाने के लिहाज से पर्याप्त है। इसरो की दो तीन चालक दल सदस्य भेजने की योजना है। इसलिए आधा दर्जन प्रक्षेपणों के बाद इस रॉकेट का उपयोग अंतरिक्ष में मानव भेजने के उपयुस्त विकल्प के रूप में किया जा सकता है। उपग्रह प्रक्षपण का अरबों डॉलर का अंतरराष्ट्रीय बाज़ार है। इस बाज़ार में बड़ा हिस्सा भारी वजन के उपग्रह प्रक्षेपण का है जिसमें भारत की भागीदारी कम है। मार्क-3 से अरबो डॉलर के में भारत की भागीदारी तो बढ़ेगी ही साथ ही खुद के भारी उपग्रह दूसरे देशो से प्रक्षेपित कराने में होंने वाला खर्चा भी बचेगा। अभी भारत की क्षमता हल्के उपग्रह प्रक्षेपित करने की ही है। हम अपने हल्के उपग्रहो के साथ ही दूसरे देशे में भी हल्के उपग्रह प्रक्षेपित कर रहे है। हम कम कीमती में हल्के उपग्रह भेजने में सक्षम है। हल्के उपग्रह प्रक्षेपण बाज़ार में भारत की उपस्थिति अच्छी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि जीसएसएलवी मार्क-3 के सफल होने के बाद भारत भारी उपग्रह प्रक्षेपण बाज़ार में स्थिति मज़बूर बनाएगा।

2. भारत की संचार प्रणाली में भारी परविर्तन आएगा और हमारी अन्य देशों पर से संचार के क्षेत्र में निर्भरता खत्म हो पाएगी।

प्रो. आर. सी. कपूर (रि. ) इंडियन (भारतीय) इंस्टियूट (संस्था) ऑफ (का) एस्ट्रोफिजिक्स (खगोल भौतिकी) , बेंगलुरु

  • भारत के लिए 5 जुन का दिन ऐतिहासिक होगा। इसी दिन जीएसएलवी मार्क-3 अपनी ऐतिहासिक उड़ान भरेगा। इस उड़ान के ऐतिहासिक होने का कारण है। इसका विकासमान उड़ान का होना यह जीसैट-19 नामक संचार उपग्रह को समुद्र तल से 35 हजार 786 किमी ऊंची भू-स्थिर कक्षा में स्थापित किया जाएगा। अभी हमारी संचार व्यवस्था के लिए पर्याप्त संख्या में भू-ट्रांसपोंडर नहीं हैं। हमें अन्य देशों से भू-ट्रांसपोंडर लीज (पट्टा) पर लेने पड़ते हैं। जीएसएलवी सीरीज इस कमी को पूरा करने में महत्वपूर्ण कदम है। इसके ट्रांसपोंडर एक चौड़े या बड़े क्षेत्र में सिग्नल (संकेत) भेजने की बजाए कई तंग क्षेत्रों में सिग्नल भेजकर उसे वापस प्राप्त करेंगे और फिर एक बार वापस पृथ्वी को प्रक्षेपित करेंगे। यह विधि डेटा (आधार सामग्री) स्पीड (गति) को वर्तमान 1 जीबी प्रति सैंकड (क्षण) से 4 जीबी प्रति सैंकड तक कर देगा यानी इंटरनेट के लिए बहुत बड़ी सुविधा। जीसैट-19 में एक विशेष स्पैक्ट्रोमीटर (वर्णक्रममापी) रखा गया है जिसका कार्य अंतरिक्ष से आते हुए ऊर्जावन आयनित कणों का अध्ययन। यह किस प्रकार अंतरिक्ष या उपग्रह में रखे उपकरणों को प्रभावित करते हैं, इस बात का अध्ययन करने में मदद मिलेगी। इसरों की योजना जनवरी 2018 में जीसैट-11 छोड़ने की है। इसके बाद डेटा स्पीड 14 जीबी प्रति सैंकड तक हो जाएगी।
  • जिसएसएलवी मार्क-3 रॉकेट का वज़न 200 हाथियों के बराबर और ऊंचाई 42 मीटर है। यह अब तक का सबसे भारी रॉकेट है। इसलिए इसरो ने इसे ’फैट (मोटा) बॉय’ कहा है। इसमें दो सोलिड (टकराना) स्टेट (स्पष्ट करना) बूस्टर (समर्थक) हैं। यह सहायक रॉकेट होते हैं। इसमें एक ठोस ईंधन की स्टेज (मंच) और एक द्रव ईंधन की स्टेज है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण सी-25 क्रायोजनिक इंजन है। वर्ष 1998 में भारत के पोकरण में परमाणु परीक्षण के बाद अमरीका ने भारत पर कई तरह के तकनीकी प्रतिबंध लगाए। तब तक रूस के सहयोग से इसरो को क्रायोजनिक इंजन की तकनीक मिल रही थी। रूस पर दबाव डालकर अमरीका ने उस पर रोक लगा दी। इसरो को 15 साल लगे पर यह इसी तकनीकी में महारत हासिल कर चुका है। इस तकनीक में द्रव अवस्का में ऑक्सीजन और हाइड्रोजन-150 डिग्री किलोग्राम सेंटीग्रेट पर संचित रहते हैं। इस तकनीक के फलस्वरूव मार्क-3 4 हजार किलोग्राम वजन के उपग्रह भू -स्थिर कक्षा में पहुंचा सकता है। भविष्य में यह इसरो की अंतरिक्ष में यात्रियों को ले जाने की योजना का हिस्सा बन सकता है। सरकार से स्वीकृति मिलने के बाद इसरो इस पर कार्य करेगा। वह दिन दूर नहीं है जबभारत में बने रॉकेट से भारतीय अंतरिक्ष यात्री उड़ान भर सकेंगे।

उपसंहार: - देश की संचार व्यवस्था में यह बहुत बड़ा कदम होगा। इससे देश की संचार व्यवस्था का स्वरूप ही बदल जाएगा। जिससे भारत देश को बहुत अधिक फायदा होगा।

- Published/Last Modified on: July 21, 2017

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