आम आदमी पार्टी (Aam Aadmi Party) (Download PDF)

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प्रस्तावना:- आम आदमी पार्टी अर्थात दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जी शुरू से ही दावा करते थे कि इनकी पार्टी औरों से अलग है पर अब दिल्ली में सत्ता संभालने के कुछ समय बाद ही इस दावे में कोई दम नजर नहीं आ रहा है। स्वराज की तर्ज पर लोकतांत्रिक तरीके से पार्टी चलाने की वकालत करने वाले नेता ही अब दो गुटों में बंट गए हैं। संस्थापक रहे दो सदस्यों को पीएसी से बाहर निकाल दिया है। दोनों तरफ के नेता अपने-अपने में लगे हुए हैं। रोज पत्र लीक हो रहे हैं और नए-नए स्टिंग सामने आ रहे हैं। किस और जा रही है वैकल्पिक राजनीति का नारा देने वाली यह पार्टी? दिल्ली में प्रचण्ड बहुमत प्राप्त करने वाली पार्टी में घमासान हो रहा है। ऐसी स्थिति में यह पार्टी कब तक चल पाएगी कुछ कहा नहीं जा सकता है?

विचारधारा:- आम आदमी पार्टी जिसे विचारधारा बताती रही है, वह विचारधारा नहीं होती। वह तो एक छोटा कार्यक्रम होता है, जिसे ’शुगर कोटेड’ भाषा में कह दिया गया। उनका कार्यक्रम यह था कि सेवाओं को लोगों तक सही ढंग से पहुंचाएंगे। इससे जनता खुश रहेगी। बिजली का बिल कम करना, पर्याप्त पानी मुहैया कराना सेवाएं देना है, यह विचारधारा नहीं होती। विचारधारा होती है समाज में क्या-क्या चुनौतियां है, उसके बारे आपके क्या विचार है? किस तरह से आप एक राज्य या देश का निर्माण करेंगे। केजरीवाल की किताब स्वराज में ऐसे कोई प्रश्न नहीं उठाए गए हैं। आप में किसी भी विचारधारा का न होना ही मौजूदा घटनाक्रम की परेशानी का सबब बना है। दिल्ली विधानसभा चुनाव जीत पाने के पीछे कोई विचारधारा या सोच नहीं बल्कि एक वातावरण बड़ा कारक था।

अन्ना जी:- वर्ष 2011 में अन्ना की भ्रष्टाचार के अर्थात(लोकपाल बिल) के खिलाफ मुहिम के बाद देश में बड़ा निराशावाद था। इस आन्दोलन में अन्ना जी का पूरा साथ केजरीवाल ने दिया था। लोग कहने लगे थे कि राजनीति भ्रष्ट है उस समय केवल भ्रष्टाचार मुद्दा बन गया था। केजरीवाल एंड कंपनी ने उसी को मुद्दा बना बनाया और उसे ठिक करने का वादा किया। उस वक्त मीडिया ने भी साथ दिया था। एक आशावाद के बूते ही ये लोग सत्ता में आ गए हैं। अब ये लोग कोई संत-महाराज नहीं हैं। न तो केजरीवाल और न ही योगेंद्र यादव और भूषण परिवार। इन्हें सत्ता की चाहत थी और उसका संघर्ष यह है कि जब केजरीवाल मुख्यमंत्री बन सकते हैं तो हम भी कुछ बनें। यह लड़ाई ’इन साइडर बनाम आउट साइडर’ है।

कुछ अलग नहीं रहा:- यह दव्ंदव् पुराना है। दिल्ली में सरकार छोड़ने के बाद यह सवाल उठा कि सिर्फ एक जगह रहने की बजाए देशभर में पांव पसारे जाएं। इसलिए उस दौरान इन्होंने लोकसभा चुनाव लड़ा। बाद में केजरीवाल बुरी तरह हारकर आए तो उन्होंने कहा कि यह पार्टी का निर्णय था, मेरा नहीं। इसी तरह महाराष्ट्र में जब पांव फैलाए तो मयंक गांधी ने कह दिया कि मैं नगरपालिका का चुनाव लड़ना चाहता हूं। योगेंद्र यादव हरियाणा को बेस बनाकर आगे बढ़ना चाहते थे। यानी पार्टी का निर्णयों पर नियंत्रण की रस्साकशी शुरू हो गई है। सभी पार्टीयों की तरह साम-दाम-दंड-भेद यहां भी शुरू हो रहा है। सब अपनी सत्ता के लिए लड़ने लगे।

खुली पोल :- मेरा मुख्य बिंदू यह है कि इस संघर्ष में कौनसी मूल मान्यताएं निकलीं। आप ने आंतरिक लोकतंत्र की जोर-शोर से बातें की पर सारे पत्र भीतर से ही लीक कर दिए गए। आंतरिक लोकतंत्र की पोल खुल गई। कहा कि पारदर्शिता होनी चाहिए पर टेप स्टिंग हो गए। यहां भी असलियत बाहर आ गई। इस घटनाक्रम में सामने आ गया है कि केजरीवाल का नियंत्रण हावी हो रहा है। ऐसा नहीं कि यह राजनीति में पहली बार हो रहा है। पार्टियों में शीर्ष स्तर पर रस्साकशी के चलते पार्टियां पहले भी बंटी है। 1965 में सीपीआई-सीपीएम बंटी। इंदिरा गांधी ने भी कांग्रेस के भीतर मची उठापटक के बाद एक विचारधारा नारा देकर अलग पार्टी बनाई। उन्होंने कहा कि मैं गरीबी हटाना चाहती हूं और ये(कांग्रसी नेता) मुझे हटाना चाहते हैं तो कांग्रेस ’ओ’ और कांग्रेस ’आई’ बन गई। इंदिरा सत्ता में आई तो उन्होंने बैंको का राष्ट्रीयकरण कर दिया। राजा-महाराजाओं के प्रिवी पर्स बंद कर दिए। लोग खुश हो गए। उनका यह रणनीतिक कदम था पर उन्होंने ऐसा विचारों के आधार पर कहा। आम आदमी पार्टी में दिक्कत यह है कि यहां कोई विचार नहीं है। केजरीवाल खुद को योग्रेन्द यादव और भूषण से अलग बता नहीं सकते। दो समुह हैं, जो जनता के समक्ष बता नहीं सकते कि वे एक-दूसरे से कैसे अलग हैं?

अल्पकालिक प्रयोग:- एक तो मूल सिद्धांत होता है और एक होता है रणनीति सिद्धांत, जिसके बूते इंदिरा गांधी कांग्रेस टूटने के बाद 1970 के लोकसभा चुनाव में 2/3 बहुमत से सत्ता में आ गई थीं। आप में रणनीतिक सिद्धांत भी नहीं है। वे सिर्फ एक आशावाद के बूते सत्ता में आई है। हर एक राजनीतिक परिक्षण का लक्ष्य होता है उसकी परिभाषा होती है पर आप के भीतर तो मूल विचार ही गायब है व न ही कोई उसका लक्ष्य है। 14 फरवरी 2015 को शपथ ग्रहण हुआ। महज 15 दिन के भीतर हुड़दंग शुरू हो गया। सत्ता सघंर्ष ने यह साफ कर दिया कि जो सपने आप वाले लेकर आए हैं, वो धीरे-धीरे टूटने लगेंगे, जिसकी शुरूआत हो चुकी है। राजनीति में सत्ता की चाहत बुरी बात नहीं है। बिना सत्ता कुछ नहीं किया जा सकता है पर इसके साथ विचारधारा होना जरूरी है। विचारधारा के अभाव में आप जैसे राजनीतिक प्रयोग अल्पकालिक ही होते है।

घटनाक्रम:-

  1. 14 फरवरी 2015 दिल्ली विधानसभा चुनाव में 70 में से 67 सीटें जीतकर अरविन्द केजरीवाल दूसरी बार मुख्यमंत्री बने।
  2. 26 फरवरी आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारणी की बैठक हुई, जिसमें केजरीवाल नहीं गए। योगेन्द्र यादव और केजरीवाल समर्थको के बीच खबरें लीक करने को लेकर विवाद हुआ। केजरीवाल ने पार्टी संयोजक पद छोड़ने की पेशकश की।
  3. 27 फरवरी एक और बैठक। यादव व भूषण नहीं आए। अन्य नेताओं ने केजरीवाल से संयोजक पद पर बने रहने की मांग की और कहा कि पीएसी का पुनर्गठन किया जाए। इसी दिन पार्टी लोकपाल एडमिरल रामदास का वह पत्र लीक हुआ जिसमें उन्होंने एक व्यक्ति-एक पद का हवाला दिया था।
  4. 28 फरवरी संजय सिंह ने पार्टी की भीतरी बातों को लीक करने वाले नेताओं पर कार्रवाई की मांग की।
  5. 1 मार्च पार्टी की सेहत पर प्रश्न उठाते कुछ और पत्र सार्वजनिक हुए। दोनों खेमों के बीच बयानबाजी बढ़ गई। दिलीप पांडे ने यादव व भूषण के खिलाफ पत्र लिखा।
  6. 02 मार्च पार्टी ने इस मसले पर कार्यकारणी बैठक बुलाई। साथ ही संजय सिंह ने आरोप लगाया कि पिछले 6 या 7 महीने से कुछ नेता केजरीवाल को हटाने का षड़यंत्र रचा रहे हैं। केजरीवाल के सहायक विभव कुमार की पत्रकार चन्दर सुता डोगरा के बीच बातचीत सार्वजनिक की गई, जिसमें डोगरा का कहना था कि उन्हें जानकारी योगेन्द्र यादव से मिली थीं।
  7. 03 मार्च केजरीवाल ने ट्वीट कर कहा कि वे पार्टी में मचे घमासान से दुखी हैं। दूसरी ओर उनके समर्थक आशीष खेतान ने कहा कि शांति भूषण व प्रशांत भूषण पार्टी को अपनी जागीर बनाकर रखना चाहते हैं।
  8. 04 मार्च राष्ट्रीय कार्यकारणी की बैठक में केजरीवाल नहीं गए। प्रशांत और यादव को बहुमत के आधार पर पीएसी से निकाल दिया गया।
  9. 05 मार्च मुम्बई के संयोजक मयंक गांधी ने अपने ब्लॉग पर लिखा कि केजरीवाल की जिद पर यादव और भूषण को निकाला गया हैं। उन्होंने इस कार्रवाई को नाजायज भी ठहराया। केजरीवाल स्वास्थ्य लाभ के लिए बेंगलुरू में प्राकतिक चिकित्सा केन्द्र में गए जहां उनका ईलाज चल रहा है।
  10. 08 मार्च पंजाब से पार्टी सांसद भगवन्त मान और आशुतोष ने यादव एवं भूषण पर पार्टी विरोधी गतिविधयों का आरोप लगाया।
  11. 10 मार्च दिल्ली के मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया सहित 5 नेताओं ने यादव व भूषण के खिलाफ बयान जारी किया। साथ ही पार्टी विधायकों से उनके खिलाफ बयान पर हस्ताक्षर का अभियान शुरू किया गया।
  12. 11 मार्च विधानसभा चुनाव से पहले का एक स्टिंग सार्वजनिक हुआ जिसमें केजरीवाल अपने एक विधायक से कांग्रेसी विधायकों को तोड़कर सरकार बनाने की बात कर रहे हैं। महाराष्ट्र की अंजली दामनिया ने पार्टी छोड़ दी। 12 मार्च को एक और स्टिंग सामने आया।

फंसना:- आप आदमी पार्टी में जिन लोगों के बीच झगड़ा चल रहा है, वे सभी अपने आप में एक संस्था हैं। सबकी अपने सोच व विचार हैै, जबरन से सब एक मंच के नीचे आए है। केजरीवाल खुद हावी होने लगे। वे सभी को विश्वास में लेकर काम नहीं करते थे। पहले वे जितने सहज अंदाज में हमसे मिले थे बाद में हमसे नजरे चुराने लगे। इस पार्टी की कोई विचारधारा ही नहीं है बस सरकार में आने के लिए सब इकट्ठा हो गए है व कई तरह के वादे कर लिए है। सत्ता को मकसद नहीं बताया, अब सत्ता के लिए भीतरी लड़ाई लड़ रहे है। केजरीवाल तमाम विधायको को कतपुतली बनाए रखना चाहते है। केजरीवाल का मिजाज अकसर परेशानी का सबब बना जाता है। मौजूदा घटनाक्रम से तो जाहिर तौर पर दिल्ली में नकात्मक संदेश गया है। सरकार में आने के बाद भी परिपक्वता का अभाव बना हुआ है। इस समय समझदार दृष्टिकोण की जरूरत है लेकिन आपस में उलझ गए हैं।

सपना:- दिल्ली में प्रचंड विजय के बाद आप पर देशभर में लोगों का भरोसा बढ़ा था। देश के अन्य राज्यों में भी आप अन्य दलों के विकल्प के रूप में उभरेंगी, ऐसी अपेक्षा होने लगी थी। लेकिन, सत्ता में आने के एक महीने के भीतर ही आम आदमी पार्टी में जिस तरह का भूचाल आया, उससे यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या आप देश में व्यापक स्तर पर वैकल्पिक राजनीति के रूप में अपने पांव पसार पाएगी?

शपथ समारोह के दिन अपने भाषण में केजरीवाल ने यह कहकर सबको चौंका दिया था कि वह केवल 5 साल दिल्ली की सेवा करेंगे। इसका सीधा अर्थ यह निकाला गया कि केजरीवाल 5 सालों तक दिल्ली के बाहर पांव नहीं पसारेंगे। शायद यही वजह झगड़े की जड़ बन गई। आप का एक गुट उसे दिल्ली में शासन के बाद देश के अन्य राज्यों में जाने का पक्षधर था और दूसरा गुट उसे दिल्ली से आगे राजनीति में देश व्यापी विकल्प के तौर पर इस पार्टी को आगे ले जाने का सपना देख रहा था। लेकिन, दुर्भाग्य से यह पार्टी वर्चस्व की लड़ाई में उलझकर रह गई है। केजरीवाल समर्थको आरोप है कि यादव व भूषण दिल्ली में आम आदमी पार्टी की हार देखना चाहती थी व इसका जिम्मेदार केजरीवाल को बनाना चाहती थी। लेकिन जब ऐसी बात थी तो उन दोनों को पार्टी से क्यों नहीं हटाया गया? यह सवाल आज तक हो रहा है।

उपसंहार:- आप की मौजूदा हालत को देखकर ऐसा लगता है कि यह वैचारिक लड़ाई नहीं बल्कि पार्टी में वर्चस्व रखने की लड़ाई ज्यादा है, जिसका अक्स केजरीवाल के शपथ समारोह के भाषण में देखा जा सकता है। कहीं ना कहीं यह डर, केजरीवाल और उनके समर्थकों में समाया हुआ है कि यदि आप अभी अन्य राज्यों में जाती है और चनाव लड़ती है तो वहां पर राज्य स्तर के केजरीवाल पैदा हो जाएगें। फिर भी, इतना अवश्य है कि योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण के छोड़ने से आप पार्टी को अपूर्णनीय क्षति होगी अर्थात थोड़ी बहुत क्षति होगी। इसलिए केजरीवाल को यह समझना होगा कि देश केवल दिल्ली ही नहीं है। बल्कि जटिलताओं से भरा राष्ट्र है, इसे समझने में ये दोनों ही उनके लिए महत्वपूर्ण हैं। तभी यह पार्टी कायम रह पाएगी।

- Published/Last Modified on: July 23, 2015

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