उत्तर प्रदेश में भाजपा महिला निष्कासित (April 2016 - UP BJP Minister Suspended in Hindi) (Download PDF)

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प्रस्तावना: - भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश की महिला मोर्चा की अध्यक्ष मधु मिश्रा को जातिसूचक बयान देने पर पार्टी से 6 साल के लिए निष्कासित कर दिया है। लंबे समय से राजनीतिक दलों की ओर से इस तरह की र्कारवाई का इंतजार होता रहा है। लेकिन, बयानबाजों को दंडित करने की बजाय प्रश्रय देने का काम अधिक हुआ है। इस मायने में भाजपा के इस कदम को अनुकरणीय शुरुआत कहा जाएगा सवाल यह है कि महज दिखावा है या सचमुच सभी राजनीतिक दल इस तरह के बयानबाजियों पर लगाम कसने के लिए ठोस कदम उठाएंगे। राजनीतिक दल से संबद्ध हों या दूसरे नेता से सभी से मर्यादित आचरण की उम्मीद तो की ही जानी चाहिए।

प्रकरण: - उत्तर प्रदेश भाजपा महिला मोर्चा की प्रदेश अध्यक्ष मधु मिश्रा ने अलीगढ़ में आयोजित कार्यक्रम में कहा कि ”आज तुम्हारे सिर पर संविधान के सहारे बैठकर जो राज कर रहे हैं, याद करो वे कभी तुम्हारे जूते साफ किया करते थे आज तुम्हारे हुजूर हो गए हैं।” भाजपा प्रदेश नेतृत्व ने इस बयान को गंभीरता से लेते हुए पार्टी से 6 साल के लिए निष्कासित भी कर दिया। हालांकि बयान पर विवाद उठने के बाद मधु मिश्रा ने माफी मांग ली और कहा कि मेरे कहने का आशय था कि संविधान में मिले हक के कारण ही ऐसा हो सकता है। मैंने आपत्तिजनक कुछ नहीं कहा।

भाजपा: - उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की महिला मोर्चा अध्यक्ष मधु मिश्रा की दलितों के संदर्भ में की गई बयानबाजी के बाद जितनी तेजी से उन पर र्कावाई हुई, वह काबिले तारीफ है। इसकी सराहना की जानी चाहिए। कहा जा सकता है कि छोटे स्तर पर ही सही लेकिन जहरीली जुबान पर लगाम लगाने को लेकर शुरुआत तो हुई। अन्य राजनीतिक दलों को भी इस तरह की अनर्गल बयाबाजी को रोकने के लिए कदम उठाने ही चाहिए। राजनीति में कुछ वर्षों के दौरान ही इस तरह की बयाबाजी देखने को मिल रही है। संसद में हो-हल्ला हो रहा है। कामकाज ठप करके सांसद बैठ जाते हैं। एक-दूसरे पर आरोप लगाते रहते हैं। पूर्व में भी आरोप लगाये जाते थे लेकिन उसमें भाषा का संयम बना रहता था। याद नहीं पड़ता भाषा की कोई सीमा किसी ने लांघी हो। अब तो लगता है कि भाषा की कोई लक्ष्मण रेखा रह ही नहीं गई है। पार्टियों को भी ऐसी भाषा के इस्तेमाल को लेकर विशेष आपत्ति नजर नहीं आती है। यदि कोई बड़ा नेता कुछ आपत्तिजनक कह दे तो पार्टी उसे उनका निजी बयान कहकर पल्ला झाड़ लेती हे। किसी के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं होती है।

चुनाव: -भारतीय जनता पार्टी के किसी नेता ने अनर्गल बयानबाजी पहली बार की हो, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। पूर्व में भी इस तहर की बयानबाजी होती रही है और देशभर में ऐसी बयानबाजी की आलोचना भी हुई है। लेकिन, पिछले कुछ समय से माहौल कुछ बदला हुआ है। देश में फिर से चुनावी दौर में बयान हो रहे है लेकिन भाजपा के लिए 2016 के चुनाव से अधिक महत्वपूर्ण हैं 2017 के चुनाव यानी जब उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होंगे। उत्तर प्रदेश में चुनाव ही यह तय करेंगे कि भाजपा की स्थिति 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान क्या हो सकती है।? महतवपूर्ण बात यह है कि उत्तर प्रदेश के चुनाव के मद्देनजर पार्टी ने अभी से तैयारियां शुरू कर दी हैं। इसलिए पार्टी की ओर से भारत माता की जय और राष्ट्रवाद के मुद्दे को जोर-शोर से उठाया जा रहा है। उत्तर प्रदेश के चुनाव तक इस तरह के मुद्दे उठाये जाते रहेंगे।

दलित वोट बैंक: - 2014 के लोकसभा चुनाव में माना जाता है कि भाजपा को स्वर्ण जातियों के अलावा दलितों ने बड़े पैमाने पर मत दिया। उत्तर प्रदेश के चुनाव में दलित मत बैंक जीत-हार में बड़ी भूमिका निभा सकता है। लेकिन, हैदराबाद में रोहित वेमुला प्रकरण और फिर जेएनयू मामला उछला तो भाजपा को लगने लगा कि उत्तर प्रदेश में दलित मत बैंक उसके हाथ से छिटक सकता है। वरना, पूर्व में भाजपा के बड़े और मंत्री स्तर तक के नेता भी इसी तरह की बयानबाजियां करते रहे लेकिन उनके विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं हो सकी लेकिन, भाजपा को पता है कि उत्तर प्रदेश में दलित उसके लिए कितने महत्वपूर्ण हैं, यही कारण है कि उसने डॉ. भीमराव अंबेडकर की जयंती मनाने का फैसला किया। लेकिन, उत्तर प्रदेश महिला मोर्चे की अध्यक्ष के बयान से भाजपा सतर्क हो गई और उसने तेजी से कार्रवाई करके, यह बताने की कोशिश की है कि वह दलितों के पक्ष में खड़ी है। यह जरूर है कि भाजपा ने बेहतर कदम उठाया है और इसमें राजनीति भी छिपी हुई है इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है। लेकिन, इस राजनीति में एक अच्छाई भी छिपी हुई है। उम्मीद की जानी चाहिए कि भाजपा भविष्य में बड़े नेताओं के साथ इसी तहर की सख्ती से पेश आएगी।

बयान: - सत्ता के सपनों ने राजनेताओं की बोली को भी बेलगाम कर दिया है। राजनीतिक दल कोई सा भी हो उसके नेता किसी भी तरह के विवादित बयान देते रहते हैं। खास तौर से चुनाव के मौकों पर तो नहीं थमने वाले बयानों और आरोप-प्रत्यारोपों का दौर चलता है।

चुनावों का मौका आते ही नेता एक दूसरे के खिलाफ बोलना शुरू हो जाते हैं। जैसे ऐसा करेंगे तो ही उनकी लोकप्रियता का अधिक ऊपर पहुंचेगी। नेताओं के बिगड़े बोल ने देश में सौहार्द का माहौल बिगाड़ने में भी कसर नहीं रखी। राजनीति के पुराने दौर को अब भी याद किया जाता है जब वैचारिक मतभेद के बावजूद नेतागण शब्दों की मर्यादा का ध्यान रखते थे। आज तो सब उल्टा होने लगा हैं।

बयानवीरों में हमारे मौजूदा प्रधानमंत्री से लेकर राज्यों के मुख्यमंत्री, मंत्री तथा अहम पदों पर रह चुके कई नेताओं के नाम शुमार है। कभी कोई किसी को पाकिस्तान का एजेंट (कार्यकर्ता) बताता है तो कोई किसी को पागल करार देने से नहीं चूकता। हद तो तब हो जाती है जब किसी के टुकड़े-टुकड़े करने या जीभ काटकर लाने वालों को ईनाम देने की बातें होने लगती है।

विभिन्न नेताओं के विवादित बोल: - निम्न हैं-

  • कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने मोदी को चायवाला बताया और कांग्रेस मीटिंग (सभा) में चाय की स्ऑल (दुकान) लगाने की बात कही।
  • केंद्रीय मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति ने कहा-दिल्ली के लोग यह निर्णय कर लें कि वे ’रामजादो’ की सरकार चाहते हैं या………. जादों की?
  • राजद नेता लालू प्रसाद यादव ने कहा-मुझे शैतान कहने वाला खुद ब्रह्यपिशाच है। हम पिशाच का इलाज करना अच्छी तरह से जानते हैं।
  • मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान अरविंद केजरीवाल को एके 49 कहकर पाकिस्तान का कार्यकर्ता बताया।
  • एमआईएमआईएम नेता असदुद्दीन ओवैसी बोले-कोई मेरी गर्दन पर छुरी भी रख दे तो भी मैं कभी भारत माता की जय नहीं बोलूंगा।

चुनौती: - कोई भी पार्टी हमेशा ही तो ऊंचाई पर नहीं रहती। भाजपा के साथ भी ऐसा ही हो रहा है, उसकी लोकप्रियता की छवि नीचे आने लगी है ऐसे में उसके सामने जनाधार बढ़ाने की बड़ी चुनौती है। ऐसे में वह बहुत ही फूंक-फूंक कर कदम बढ़ा रही है। हरियाणा से लगते पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बड़ी संख्या में जाट मतदाता हैं। यही कारण रहा है कि उसे हरियाणा में जाटो की आरक्षण की मांग माननी पड़ी। इसी तरह उसे लग रहा है कि अल्पसंख्यक मत तो उसके हो नहीं सकते, ऐसे में दलितों को अपने साथ बनाए रखना उसकी जरूरत बनी हुई है। भाजपा जानती है कि उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यकों के साथ यदि दलितों को बसपा ने खींच लिया तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश में वह मजबूती के साथ उभरेगी। ऐसे में भाजपा दलितों को लेकर कोई भी ऐसा कदम नहीं उठा सकती जो भविष्य में उसे नुकसान उठाने को मजबूर कर दे। यही कारण है कि उसने मधु मिश्रा तो आनन-फानन में पार्टी से निष्कासित दलितों की हितैषी पार्टी होने का संदेश दिया है।

औपचारिक संस्था: -में नियम-कायदे होते हैं। उनमें नियम होता है कि यदि किसी कर्मचारी या अधिकारी ने दलित के विरुद्ध कोई बयानबाजी की तो निलंबित किया जा सकता है और मुकदमा चलाया जा सकता है। राजनीतिक दल चूंकि औपचारिक संस्था में नहीं आते इसलिए वे इन मामलों में भी बचे रहते हैं। जहां तक भाजपा की उत्तर प्रदेश शाखा की महिला मोर्चा अध्यक्ष की बयानबाजी का सवाल है तो उनके खिलाफ की गई पार्टी स्तर की कार्रवाई का स्वागत किया जाना चाहिए और इसे सुधार की ओर से की गई अच्छी पहल कहा जाएंगा।

आरटीआई: - राजनीतिक दल वास्तव में औपचारिक संस्थाओं की श्रेणी में नहीं आते है। इसी बात की आड़ लेकर वे खुद को आरटीआई के दायरे से बाहर रखने की कोशश में लगे रहते हैं। आम जनता उनमें पारदर्शिता चाहती है, खासतौर पर पैसा कहां से आया और कहां गया? लेकिन राजनेता पार्टी को अनौपचारिक संस्था बताने की कोशिश में लगे रहते हैं।

बड़े नेता: - कई बार ऐसा भी होता है कि पार्टी के बड़े नेता इस तरह की बात बोल देते हैं कि उन पर पार्टी स्तर पर कार्रवाई अपेक्षित लगती है। लेकिन, दुख तब होता है जब पार्टी की ओर से उस बयान से यह कहकर किनारा कर लिया जाता है कि यह फलांं नेता का निजी बयान है या उनकी निजी सोच है, पार्टी उनकी राय से इत्तेफाक नहीं रखती। लेकिन, जरूरत इस बात की है कि यदि राजनीतिक दल इस तरह के बोलो पर लगाम लगाना चाहते हैं। तो सबसे चुने हुए जनप्रतिनिधियों को दंडित करने को लेकर नियम बनाएं जा सकते हैं। ऐसा किया जा सकता है कि यदि किसी विधायक, सांसद या मंत्री की ओर से दलितों, आदिवासियों के विरुद्ध बयान आएं तो उन्हें सीधें तौर पर इस्तीफा देने के लिए बाध्य किया जाए। इससे काफी हद तक अनर्गल बयानबाजी पर अंकुश लगाने में सहायता मिलेगी।

पार्टियां: - दूसरी ओर जहां तक दल की बात है तो इस मामले में पार्टी (बराबरी) के स्तर पर नियम-कायदे बनाए जाएं। एक ऐसी समिति बने जो यह तय करे कि पार्टी (दल) के किसी कार्यकर्ता ने यदि समाज को तोड़ने वाला गलत बयान दिया है तो उसे तुरंत निष्कासित किया जाए। पार्टी के किसी जिला स्तर पद या राज्य स्तर के पद पर कोई ही चला जाए। सभी राजनीतिक पार्टियां इस मामले में शुरुआत कर सकती हैं। हां. इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति होना जरूरी है।

मामला भाजपा का: - जहां तक भाजपा का मामला है तो रोहित आत्महत्या वाले मामले के बाद से उसकी छवि को धक्का लगा है। आम लोगों में यह संदेश गया कि भाजपा दलित विरोधी पार्टी है। इस मामले पर पार्टी के नेताओं की बयानबाजी ने उसके लिए काफी मुश्किलें खड़ी कर दीं। ऐसे में भाजपा के पास कोई चारा नहीं था। उसे दलित विरोधी बयानबाजी के विरुद्ध कार्रवाई करके संदेश तो देना ही था। इस तरह कहा जा सकता है कि भाजपा के इस कदम के पीछे कहीं न कहीं पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में राजनीतिक लाभ लेने की भावना छिपी हुई है। इसलिए यह कदम वास्तव में राजनीति से प्रेरित कदम ही माना जाएगा। इस सबके बावजूद इस बात से कोई भी इनकार नहीं करेगा कि भाजपा ने इस मामले में अच्छी परंपरा की शुरुआत की है। इस बात का कोई फर्क नहीं पड़ता कि यह कदम राजनीति से प्रेरित रहा है। सही मायने में इस तरह के कदम से अन्य राजनीतिक दलों को भी सीखने की जरूरत है कि वे भी जरूरत पड़ने पर ऐसा करें।

उपसंहार: -भाजपा ने मधु मिश्रा को 6 साल के लिए निष्कासित कर पार्टी के अन्य कार्यकताओं को संदेश दिया है कि किसी भी समाज के विरुद्ध अनर्गल बयानबाजी किसी भी कीमत पर सहन नहीं की जाएगी। इससे इनकार नहीं किया जा सकता है यह राजनीति से प्रेरित कदम रहा है। इस मामले में उसकी प्रशंसा करनी ही होगी कि उसने इस तरह की अनर्गल बयानबाजी पर अंकुश लगाने के लिए शुरुआत की है। अन्य दलों को इससे सीख लेनी ही चाहिए। ताकि भविष्य में हर नेता अपना बयान देने से पहले कई बार सोचें।

- Published/Last Modified on: May 12, 2016

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