एप्पल फोन उत्पाद (Article on Production of Apple Phones- Essay in Hindi) [ Current News (Concise) ]

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प्रस्तावना: - दुनिया में लोग एप्पल कंपनी के आईफोन और टेबलेट इस विशेषता के कारण खरीदते हैं कि उसमें संगृहीत सामग्री सुरक्षित रहे। अन्य कोई भी बिना कोड के इन फोन में मौजूद सामग्री को नहीं देख सकता है, लेकिन कंपनी के उत्पादों की यही विशेषता अपराध की दुनिया के लोगों के लिए वरदान साबित हो रही हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या कंपनी के उत्पादों की इस विशेषता को केवल व्यापक सामाजिक हितों की रक्षा के लिए छोड़ा नहीं जा सकता है। कंपनी के कारोबारी हित विश्व समाज के हितों से अधिक महत्वपूर्ण हैं। ऐसी तकनीक किस काम की जो नागरिकों और राष्ट्र की सुरक्षा को खतरे में डाल दें या फिर बड़े-बड़े घोटालों को उजागर ही न होने दें।

विवाद: - सबसे पहले हम समझें कि अमरीका में केलिफोर्निया के न्यायालय ने केलिफोर्निया के सैन बर्नार्डिनो में दिसंबर 2015 को हुए शूटआउट एक आतंकी हमले में 14 लोगों की मौत हुई थी। मौके से एप्पल कंपनी का आईफोन मिला था। अमरीका की जांच एजेंसी फेडरल ब्यूरों ऑफ इन्वे जांच (एफबीआई) चाहती है मौके पर मिले आईफोन में छिपी सामग्री की जांच की जाए ताकि आंतकियों के तार किन लोगों से जुड़े है और किन लोगों को खतरा है, पता लगाया जा सके। अमरीका का न्यायालय भी इस मामले में एप्पल को एफबीआई की मदद करने को कह चुका हैं लेकिन, कंपनी कोर्ट के निर्देश मानने के लिए तैयार नहीं है। उसका तर्क है यदि सुरक्षित सामग्री को देखने के लिए तकनीकी जानकारी उपलब्ध कराई गई तो लोगों की निजता का हनन तो होगा ही साथ में यही तकनीक अन्य फोनों पर भी इस्तेमाल की जाने लगेगी। ऐसा करना एप्पल के ग्राहकों के साथ धोखा होगा। मामले में सभी रिट्‌स कानून के तहत आदेश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से अपना आदेश एप्पल कंपनी के आइफोन-5 सी के संदर्भ में दिया है। कोर्ट का कहना है कि इस शूटआउट के मुख्य आरोपी सैयद रिजवान फारुक के इस विशिष्ट आईफोन में जो जानकारियां छिपी हैं, उन जानकारियों को हासिल करने के लिए एप्पल को तकनीकी सहायता के लिए आगे आना चाहिए। इसके लिए यदि सॉफ्टवेयर बनाना पड़े तो बनाया जाए। उल्लेखनीय है कि इस आईफोन में यदि 10 बार गलत पासकोड डाला जाता है तो इसकी जानकारियां खुद ब खुद समाप्त हो जाती हैं। ऐसे में न्यायालय ने साफ कहा है कि नया सॉफ्टवेयर ऐसा हो जिसके तहत यह सुविधा हो कि जानकारियां एकत्र करने के लिए पासकोड यदि डाला जाए तो फोन स्वत: सामग्री को समाप्त नहीं करे। एप्पल का कहना है कि यदि उसने एक बार भी ऐसा किया तो वह जानकारियों को सुरक्षित रखने वाला कोई उत्पाद नहीं बेच सकेगा। उसके ऐसा करते ही सॉफ्टवेयर का दुरुपयोग शुरू हो जाएगा और अन्य कंपनियों को इस कारोबार में पीछे के दरवाजे से प्रवेश की अनुमति मिल जाएगी। एफबीआई के निदेशक जेम्स कॉमी का कहना हैं कि एप्पल कंपनी से उनका आग्रह केवल एक आइफोन के नमूने के संदर्भ में है। दूसरी बात यह है के कानून के मुताबिक उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में जानकारियां जुटाने का पूरा अधिकार भी हैं। माइक्रोसॉफ्ट कंपनी के बिल गेट्‌स भी यही कह रहे हैं कि सरकार को यह जानने का हक है कि आखिर देश के लोगों की सुरक्षा को लेकर चल क्या रहा है? यहां यह बात साफ है कि एप्पल कुछ भी तर्क दे, वह भले ही अमरीका की सुप्रीम कोर्ट में भी चली जाए लेकिन उसे केलिफोर्निया के न्यायालय का आदेश तो मानना ही पड़ेगा।

एप्पल और एफबीआई: - पूरी दुनिया में एप्पल और एफबीआई के बीच नीजी व्यक्तिगत का विवाद अधिक गंभीर हो गया है। क्योंकि एफबीआई आतंकवादियों का आईफोन का ताला खोलना चाहती है, उधर एपल इसके लिए तैयार नहीं है। एफबीआई ने इस केस को कानून और राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ा है, जबकि एपल इसे यूजर की निजी गोपनीयता का विषय बता रही हैं। एप्पल ऐसा करेगी या नहीं। एफबीआई संसद की मदद से एपल को ऐसा करने पर विवश कर देगी। स्मार्टफोन और इंटरनेट से जुड़ी बड़ी कंपनियों ने इस मसले पर हस्तक्षेप करके एपल का समर्थन किया है। वे उपयोगकर्ता की गोपनीयता को आधार बनाकर अलग से कानूनी कार्रवाई करने जा रही हैं।

कोर्ट: - अमेरिकी फेडरल कोर्ट के आदेश और एपल कंपनी के बीच लगातार तकरार बढ़ रही है। कोर्ट ने एपल से कहा है कि वह जांच एजेंसी एफबीआई को कानूनी कार्रवाई में सहायता करे। उधर, एपल ने पहली बार जवाब दाखिल करके कहा कि कोर्ट एफबीआई की मांग खारिज कर दे। इस जवाब एवं उसके आधार को माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, फेसबुक और याहू जैसी बड़ी कंपनियों ने समर्थन दिया है। इन कंपनियों का कहना है कि वे जल्द कैलिफोर्निया की कोर्ट में एपल के जवाब का समर्थन करेंगी।

टेक कंपनियों की ओर से कानूनी कार्रवाई की इड़बड़ाहट इसलिए है, क्याेेकि एफबीआई नीजी व्यक्तिगत का यह विवाद संसद ले गई है। उसने स्पष्ट करने के लिए कहा है कि एजेंसी किस तरह उपयोगकर्ता के व्यक्तिगत डेटा तक पहुंच सकती है। इसके लिए उसने अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा को सामने रखा है। उसने स्पष्ट किया है कि आतंकवादी के मोबाइल फोन का डेटा हासिल करने में कुछ गलत नहीं किया है। एफबीआई के अध्यक्ष जेम्स बी. कूमी ने संसद की बुद्धि या हौसिंयार सभा के समक्ष कहा कि उन्हें कोर्ट से मदद नहीं मिल रही है, ऐसा आगे भी संभव नहीं लगता है।

कैलिफोर्निया की फेडरल जिला कोर्ट के जज शेरी पेम ने अपने ऑर्डर में एपल से कहा है कि वह उस आईफोन के सुरक्षा कार्य सम्पादन कम करें, जिसकी जाचं एजेंसी को करनी है। वह आईफोन सेन बर्नेडिनो (कैलिफोर्निया) में गोलाबारी करने वाले एक आतंकवादी का है। इससे जांच में मदद मिलेगी। एपल ने तुरंत कहा कि वह ऐसा नहीं कर सकती है। इसी कारण यह मसला व्यक्तिगत एवं नम्रता स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा हो गया था।

व्यक्तिगत: -इस व्यक्तिगत विवाद से अन्य कंपनियों का तनाव इसलिए बढ़ गया है, क्योंकि एक तरफ नीजी उपयोगकर्ता का भारी-भरकम डेटा है, दूसरी तरफ सरकार है। एपल कहती है कि यूजर के डेटा तक उपयोगकर्ता ही पहुंच सकता है, ताकि नम्रता स्वतंत्रता सुरक्षित रहे। जबकि एफबीआई के अध्यक्ष मि. कूमी कहते हैं कि शिष्टाचार तकनीकी मजबूत होने के कारण उन्हें आपराधिक तत्वों पर कार्रवाई करने में मुश्किलें आ रही हैं। एपल के सीईओ टिम कुक का मानना है कि यह केस अंतत: सुप्रीम कोर्ट के समक्ष खत्म हो सकता है। इसके पहले एपल ने कोर्ट से कहा कि उसे अपना आदेश रद्द कर देना चाहिए, क्योंकि उससे मौजूदा कानून ’सभी रिट्‌स कानून’ का उल्लंघन होता है। कंपनी का मानना है कि ’ इस आदेश का व्यापक असर होगा, उससे नुकसान अधिक है सिविल लिबर्टी को, सोसाइटी को और राष्ट्रीय सुरक्षा को। इसलिए लोगों की इच्छा के अनुरूप इसे आगे बढ़ने से रोकना चाहिए। कंपनी का पूरा जोर ऑल रिट्‌स एक्ट पर है, जो 1789 का कानून है। महत्वपूर्ण यह है कि कोर्ट इस मसले में अपने अधिकारी का इस्तेमाल नहीं कर सकती है। स्नोडेन ने खुलासा किया कि ओबामा प्रशासन ने वर्ष 2011 में प्रस्ताव तैयार किया था, जिसमें प्राइवेसी के मुद्दे पर जोर-शोर से चर्चाएं होने वाली थीं। उसमें कुछ बातें गोपनीय थी, लेकिन वह प्रस्ताव प्रभावशील होता, उसके पहले ही एनएसए में काम करने वाले एडवर्ड स्नोडेन ने सरकार के द्वारा लोगों की व्यापक निगरानी का खुलासा कर दिया था।

एफबीआई: - एफबीआई अध्यक्ष ने संसद से आग्रह किया है कि वह व्यक्तिगत विवाद में हस्तक्षेप करे, लेकिन कई लोग एकमत नहीं हैं। उनका मानना है कि फिलहाल उपयोगकर्ता की व्यक्तिगत और जांच एजेंसियों के बीच किस तरह की लकीरें खीची जाए, यह स्पष्ट नहीं है।

सेन बनैर्डियों के दो आतंकियों के पास से मिला आइफोन बंद अथवा ताला था, (अमेरिका में लॉक्ड और अलॉक्ड मोबाइल फोन मिलते है।) जिसका डेटा हासिल करने के लिए एफबीआई ने एपल से कहा। वह यह भी चाहती हैं कि एपल ऐसा सॉफ्टवेयर बना दे, जिससे फोन के सुरक्षा सिस्टम तक पहुंचने में मदद मिले। यही नहीं संदिंग्ध यूजर उसमें पासवर्ड डालने के 10 बार असफल प्रयास करें और फोन का डेटा शुन्य हो जाता हैं।

कारण: - निम्न हैं-

  • सरकार ऐसा सॉफ्टवेयर के लिए दबाव डाल रही है, जो नहीं है। ऐसा करना खुद की तकनीकी हैक करना है।
  • अगर ऐसा किया तो सभी आईफोन उपयोगकर्ता के लिए सुरक्षा खतरा होगी।
  • इसके बाद अमेरिका व अन्य देशों की एजेंसी भी मामलों का निराकरण करने के लिए एपल की मदद मांगेगी।
  • कंपनी ने लिखित जवाब में कहा है कि 9 अन्य केस ऐसे हैं, जिसमें उससे फोन के ताले को खोलने के लिए कहा गया है।

कंपनियां: - निम्न हैं-

माइक्रोसाफ्ट- अध्यक्ष एवं मुख्य कानून अधिकारी ब्रेड स्मिथ ने एपल के समर्थन में कहा कि हम दमखम के साथ कोर्ट में अपना पक्ष रखने वाले हैं।

गूगल- के सीईओ सुंदर पिचाई ने ट्‌वीट करके कहा कि जांच अधिकारी उपयोगकर्ता की डिवाइस एवं डेटा हैक करना चाहते हैं। यह परेशानी का नया उदाहरण बन सकता हैं।

ट्‌वीटर- के सीईओ जैक डोर्सी भी एपल के समर्थन में ट्‌वीट कर चुके हैं।

फेसबुक- के सीईओ मार्क जकरबर्ग ने भी कहा कि वे एपल का समर्थन करते हैं और इस तरह के मसलों के लिए पिछला दरवाजा बनाने के पक्ष में नहीं हैं।

गोपनीयता व सुरक्षा: - दुनिया में निजता, गोपनीयता और सुरक्षा को लेकर लंबे समय से बहस जारी है। देश के नागरिकों की निजता और गोपनीयता बनाए रखना उस देश की सरकार की जिम्मेदारी है। हर स्थिति में इनका संतुलन बनाये रखना जरूरी होता है। इस संतुलन के आधार पर बात करें तो एप्पल का तर्क ठीक लगता है लेकिन, मामला जब राष्ट्र की सुरक्षा से जुड़ जाता है निजता और गोपनियता का मुद्दा गौण हो जाता है। कोई भी कंपनी जिस भी देश में काम कर रही हो, वह उस देश के कानून से ऊपर नहीं है। कानून को बनाए रखना, देश के नागरिकों को सुरक्षा देना उस सरकार की जिम्मेदारी है। ऐसे में न्यायालय और सरकार कंपनी को उस देश के कानून के दायरे में काम करने को बाध्य कर सकती हैं।

मामला: - यह मामला केवल एप्पल तक ही सीमित नहीं है। वाट्‌सअप की तरह की काम करने वाली एक सेवा प्रदाता कंपनी है, इंस्टाग्राम। समझा जाता है कि पेरिस पर हुए हमले में इसे इस्तेमाल किया गया था। जब किसी भी कंपनी को कोई उत्पाद राष्ट्रीय सुरक्षा के विपरीत खड़ा होता दिखाई देगा तो उस देश की सरकार को अधिकार है कि उस उत्पाद से संबंधित जांच करे। केवल आतंकी हमले के मामले में ही नहीं, मामला अपहरण फिरौती को हो, पैसों की हेराफेरी का हो या फिर किसी अन्य किस्म के अपराध का, सरकार को उसे रोकने का अधिकार है।

विशेषता: - सभी आईफोन में एक विशिष्ट नंबर होता है जिसके बिना इसकी सामग्री को देख पाना संभव नहीं होता है। तकनीकी विशेषज्ञों के मुताबिक यदि पूरी दुनिया के कंप्यूटरों को मिलाकर भी इसका पता लगाने की कोशिश की जाए तो पूरी जिंदगी बीत सकती है। आईफोन का सॉफ्टवेयर ऐसा है कि यदि इसमें 10 बार गलत पासकोड इस्तेमाल किया जाए तो इसकी सारी सामग्री नष्ट हो जाती है।

राजस्थान: - राजस्थान के खान महाघूस कांड में एक प्रमुख आरोपित अशोक सिंघवी भी एप्पल कंपनी के आईफोन और टेबलेट इस्तेमाल करते थे। उनसे पूछताछ जारी है लेकिन करीब पांच माह बाद भी फोन और टेबलेट में छिपी जानकारियां पता नहीं चल पाने से मामला कमजोर पड़ता लग रहा है।

उपसंहार: - निजता और गोपनीयता का अधिकार उन नागरिकों के लिए है जो ईमानदारी से देश में रोजी-रोटी कमाते हैं। उन लोगों के लिए यह अधिकार नहीं जो उन्नत व नई तकनीक को इस्तेमाल करके घोटालों को छिपाने और राष्ट्र की सुरक्षा से खिलवाड़ के लिए करते हैं। इसलिए कोई भी कंपनी जिस भी देश में काम कर रही हो, वह उस देश के कानून से ऊपर नहीं है। कानून को बनाए रखना, देश के नागरिकों को सुरक्षा देना उस सरकार की जिम्मेदारी है। ऐसे में न्यायालय और सरकार कंपनी को उस देश के कानून के दायरे में काम करने को बाध्य कर सकती हैं।

- Published/Last Modified on: March 11, 2016